गूगल की उर्दू – कराची मतलब भारत

गूगल ने उर्दू के शौकीनों के लिए बहुत ही नायाब टूल उपलब्ध करा दिया है। पिछली 13 मई से गूगल अनुवादक में उर्दू जोड़ दी गई है, यानी आप अब उर्दू से, या उर्दू में, दर्जनों भाषाओं का अनुवाद कर सकते हैं। गूगल ट्रान्सलेट पर जाइए, “Translate from” में “Urdu ALPHA” चुनिए, “Translate to” में हिन्दी, अंग्रेज़ी या दर्जनों अन्य भाषाओं में से कोई भी चुन लीजिए और ट्रान्सलेट का बटन दबाइए। अनुवादक अभी एल्फा, या यूँ कहें अलिफ़ अवस्था में है, इस कारण कुछ बचपना, कुछ शरारतें तो करेगा ही, पर कुल मिला कर काम की चीज़ है।

बढ़िया बात यह है कि इस टूल का प्रयोग न केवल अनुवाद करने में किया जा सकता है, बल्कि उर्दू लिखनें में भी किया जा सकता है, और कुछ शब्दों का हिन्दी से लिप्यन्तरण करने में भी प्रयोग किया जा सकता है। यानी यदि आप को उर्दू लिखनी पढ़नी नहीं आती, तो भी आप रोमन अक्षरों का प्रयोग कर उर्दू टाइप कर सकते हैं। ध्यान रखें कि Type Phonetically वाला चैकबॉक्स सक्रिय हो, अब उर्दू वाले बक्से में bhaarat लिखें और आप को بھارت लिखा मिल जाएगा।

कुछ वर्ष पहले मैं ने एक पोस्ट लिखी थी जिस में मैं ने बताया था कि जैसे अन्य भारतीय भाषाओं में एक लिपि से दूसरी में लिप्यन्तरण संभव है, वह उर्दू के साथ क्यों संभव नहीं है। लिपि की भिन्नता की यह समस्या किसी हद तक गूगल ने इस टूल के द्वारा हल कर दी है, हालाँकि कमियाँ अभी मौजूद हैं।

अनुवाद की कुछ कमियाँ तो बड़ी रोचक हैं, और इनकी ओर ध्यान दिलाने के लिए शुएब और अरविन्द का धन्यवाद — उन से बज़ पर कुछ बातचीत हुई थी इस बारे में। मुलाहिज़ा फरमाइए गूगल-उर्दू-अनुवादक के कुछ नमूने

उर्दू में लिखिए हिन्दी अनुवाद
کراچی (कराची) भारत
افغانستان (अफ़ग़ानिस्तान) भारत
انڈیا (इंडिया) भारत और पड़ौस
پاکستان (पाकिस्तान) भारत

यानी गूगल वालों को इस क्षेत्र में भारत के सिवाय कुछ नहीं दिखता। यह विशेष अनुवाद उर्दू से हिन्दी में ही उपलब्ध है, उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद ठीक हो रहा है। यह आश्चर्च की बात है कि जब कि उर्दू से हिन्दी में अनुवाद सब से आसान होना चाहिए था, इसी में दिक्कतें आ रही हैं। अरे गूगल भाई, कुछ नहीं आता तो शब्द को जस का तस लिख दो। हिन्दी से उर्दू के अनुवाद में भारत का अनुवाद भारत ही है, पर भारत और पड़ौस लिखेंगे तो उसका अनुवाद है انڈیا (इंडिया)।

ऊपर दिए शब्दों के इस स्क्रीनशॉट में देखिए
Google Translator Urdu Alpha

वैसे कुछ उर्दू पृष्ठ जो आप अभी तक नहीं समझ पाते थे, अब समझ पाएँगे। पृष्ठ का यूआरएल, या मसौदा, गूगल के अनुवादक में डालिए और अनुवाद पाइए। समझ पाने लायक तो अनुवाद हो ही जाएगा। उदाहरण के लिए शुएब के इस ब्लॉग-पोस्ट का अनुवाद

कुछ प्रश्न हों, कुछ संशय हों, कृपया टिप्पणी खाने में पूछें। यदि आपको भी कुछ अजीबोग़रीब तरजमे मिले हों तो अवश्य बताएँ।

उर्दू देवनागरी लिपियाँ – एक तुलनात्मक अध्ययन

[आज जुलाई का अन्तिम दिन है। यदि आज मैं यह प्रविष्टि नहीं लिखता तो इस चिट्ठे की पौने तीन वर्ष की आयु में पहला महीना ऐसा चला जाता जिस में कुछ भी न लिखा गया हो। अपने चिट्ठे को सुप्तावस्था से बाहर लाने की कोशिश है यह प्रविष्टि, जो मैं ने कुछ समय पहले आरंभ की थी और इसे अभी भी पूरा नहीं कर पाया हूँ।]

USA and Britain are called two nations divided by the same language. I think Hindi and Urdu remain the same language divided by a script.

अभय अग्रवाल के चिट्ठे से लिया यह उद्धरण मुझे बहुत सटीक लगा। उर्दू इतनी हसीन ज़बान है और इतनी अपनी लगती है, पर इस की लिपि ने इसे पराई कर दिया है। यह बात नहीं है कि उर्दू में प्रयुक्त नस्तालीक़ लिपि सीखी नहीं जा सकती, पर उसी ज़बान को लिखने के लिए जब हम देवनागरी जैसी लिपि का प्रयोग जानते हैं, तो उसी के लिए एक और लिपि सीखना मेहनत का काम तो है ही। हिन्दी वालों ने संस्कृत के शब्दों से और उर्दू वालों ने अरबी-फ़ारसी शब्दों से इस एक ही भाषा में जो दरार डाली है, उसे आम तौर पर हिन्दुस्तानी बोलने वालों ने सीधी-सादी भाषा बोल कर पाट दिया है। पर लिपियों की भिन्नता ने जो दरार डाली है, उसे पाटने के लिए बहुत मेहनत चाहिए।

जितना हिन्दी चिट्ठाजगत का कारवाँ बढ़ रहा है, उतनी तेज़ी से नस्तालीक़ में लिखे उर्दू चिट्ठे तो सामने नहीं आ रहे हैं, पर उर्दू में जितना भी लिखा जा रहा है, उसे पढ़ने की ललक हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों में बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष मैं ने उर्दू में लिखे चिट्ठों पर एक नज़र डाली थी, और उम्मीद की थी कि इसे नियमित रूप से लिख पाऊँगा। पर जैसा इस चिट्ठे पर होता आया है, वही हुआ। महीने में कुल जमा दो-तीन पोस्ट लिखे जाते हैं, और वह भी बिना किसी प्लानिंग के। इस के इलावा भारत से उर्दू के कोई खास चिट्ठे भी सामने नहीं आए। शुऐब का उर्दू चिट्ठा نئی باتیں / نئی سوچ (नई बातें नई सोच) नियमित पढ़ता हूँ। इंडस्क्राइब का बेस्ट ग़ज़ल्स भी बढ़िया है पर वे यूनिकोड उर्दू न लिख कर ग़ज़लों को स्कैन कर के छापते हैं। हिन्दी चिट्ठाजगत में उर्दूदानों की संख्या बढ़ गई है, पर उर्दू चिट्ठाकारों की संख्या ज्यों की त्यों है।

इस बीच एक अच्छे इरादे से कोशिश हो रही है उर्दू-हिन्दी लिप्यन्तरण (ट्रान्सलिट्रेशन) सॉफ्टवेयर बनाने की। भोमियो के पीयूष, जो कि भारतीय लिपियों को आपस में परिवर्तित करने में बहुत सफल रहे हैं, अब प्रयत्न कर रहे हैं उर्दू से हिन्दी ट्रान्सलिट्रेशन की। जो अभी तक हासिल हुआ है, उस के बारे में यही कहा जा सकता है कि कुछ न होने से तो बेहतर है। कई लोग इस से उत्साहित हैं, पर इस मामले में मैने शुरू से जो टिप्पणियाँ दी हैं, वे बहुत अधिक उत्साहवर्धक नहीं रही हैं इस काम में लगे लोगों के लिए, या इस सॉफ्टवेयर का इन्तज़ार कर रहे लोगों के लिए। इसका कारण यह है कि मैं दोनों लिपियों को समझता हूँ और यह मानता हूँ कि उर्दू से हिन्दी (या उर्दू से रोमन) का सही लिप्यन्तरण लगभग असंभव है। जो लोग उत्साहित हैं वे उर्दू नहीं जानते। जो जानते हैं, उन्हें मालूम है कि मंजिल दूर है। अपनी इस राय के कारण को विस्तार से समझाने की कोशिश करूँगा इस पोस्ट में।

भारतीय लिपियों के बीच ट्रान्सलिट्रेशन बहुत सरल है। देवनागरी, गुरमुखी, गुजराती, बंगाली, तमिल आदि लिपियों की संरचना समान है, बस अक्षरों के आकार भिन्न हैं। इन सब लिपियों से रोमन में ट्रान्सलिट्रेशन भी सरल है, क्योंकि जो रोमन आप को हासिल होती है, वह अग्रेज़ी हिज्जों या नियमों की मोहताज नहीं है। इस सरलता ने हमारी उम्मीदें बढ़ा दी हैं, और अब हम बिना उर्दू सीखे ही उसे भी पढ़ना चाहते हैं। पर कल्पना कीजिए कि आप को अंग्रेज़ी से देवनागरी का ट्रान्सलिट्रेशन बनाने को कहा जाए। एक सीधे से वाक्य “George Bush is the President of United States of America” का लिप्यान्तरण बनेगा “गेओर्गे बुश इस थे प्रेसिदेन्त ओफ उनितेद स्ततेस ओफ अमेरिका”। यदि आप को इस तरह का लिप्यन्तरण चलता है तो फिर ठीक है। पर सही लिप्यन्तरण के लिए इस में ऐसे टूल डालने पड़ेंगे जो हर शब्द का ध्वन्यात्मक रूप खोजे और उसे फिर देवनागरी में लिपिबद्ध करे – यानी एक अंग्रेज़ी का टेक्स्ट-टू-वॉइस कन्वर्टर और हिन्दी का वॉइस-टू-टेक्सट कन्वर्टर। यूँ समझिए कि उर्दू की हालत इस से कई गुणा जटिल है। उर्दू में हर शब्द का क्या उच्चारण है यह इस बात पर निर्भर करता है कि सन्दर्भ क्या है। उदाहरण के लिए “क्या” और “किया” एक ही तरह से लिखा जाता है। “अस”, “इस” और “उस” एक ही तरीके से लिखा जाता है। पढ़ने वाला मज़मून के मुताबिक उसे सही पढ़ता है। यह उम्मीद कंप्यूटर से तो नहीं की जा सकती न?

आइए उर्दू लिपि की संरचना पर एक नज़र डालें (हिन्दुस्तानी भाषा की दृष्टि से – फारसी या अरबी की दृष्टि से नहीं), जो इस को आम कंप्यूटर की समझ से बाहर कर देते हैं।

1. उर्दू अक्षरमाला
उर्दू लिपि में 37 अक्षर हैं और कुछ चिह्न हैं, पर हिन्दुस्तानी की दृष्टि से कई ध्वनियाँ डुप्लिकेट हैं, और कई अक्षर हैं ही नहीं। दो “अ” हैं (अलिफ़ और ऐन), चार-पाँच “ज़” हैं (ज़े, ज़ाल, ज़ुआद, ज़ोए, और तीन बिन्दियों वाला रे), दो “त” हैं (ते और तोए), दो “स” हैं (से और सुआद)। इन सब में आपस में उच्चारण का कोई अन्तर नहीं है; शायद अरबी फ़ारसी में होता हो, उर्दू में नहीं है। पर नियमानुसार यह भी आवश्यक है कि अरबी फ़ारसी से आए शब्दों के लिए सही अक्षर का ही प्रयोग हो। मसलन यदि “मसलन” के लिए “से” का प्रयोग होता है तो “सुआद” या “सीन” का प्रयोग नहीं हो सकता (या इस का उल्टा)। “मसलन” के आखिर में जो न की ध्वनि है उस के लिए “नून” नहीं लिखा जाता पर “अलिफ़” के ऊपर दो लकीरें डाली जाती हैं, पता नहीं क्यों। ख, घ, छ, झ, आदि के लिए उर्दू में अक्षर नहीं है पर इन्हें क, ग, च, ज, आदि के साथ ह (दोचश्मी-हे) जोड़ कर लिखा जाता है। कीफ़-क़ाफ़, गाफ़-ग़ैन, आदि में कुछ उच्चारण का अन्तर है, जो हिन्दुस्तानी बोलने वाले आम तौर पर जानते हैं, पर हमेशा नहीं। देवनागरी में नुक़्ते वाले अक्षर क़, ग़ आदि इसी के लिए प्रयोग होते हैं।

2. स्वर/मात्राएँ
उर्दू लिपि में कुछ स्वरों के लिए अक्षरों का प्रयोग होता है (अलिफ़, ऐन, ये, वाव) और कुछ स्वरों के लिए ऊपर या नीचे लगाए जाने वाले चिह्न (ज़ेर, ज़बर, पेश)। पर जो चिह्न हैं, उन का प्रयोग बिल्कुल ऐच्छिक (optional) है, यानी लगाया तो लगाया, नहीं लगाया तो नहीं लगाया। आम तौर पर इन चिह्नों को नहीं ही लगाया जाता है। यही कारण है कि क+स लिखने पर यह पढ़ने वाले को स्वयं अन्दाज़ा लगाना है कि यह किस है, कस है या कुस। शब्द में जितने अधिक अक्षर होंगे उतनी संभावनाएँ बढ़ जाएँगी। क+स+न = कसन / किसन / कसिन / कुसन / कसुन / किसिन / कुसुन / कस्न / कुस्न / किस्न / क्सन। अब हमें तो मालूम है “किसन” होगा, पर कंप्यूटर बेचारे को क्या पता कहाँ पर कौन सी मात्रा लगानी है, या किस अक्षर को आधा कर के पढ़ना है।

व के लिए जो अक्षर प्रयोग होता है (वाव) वही ऊ, ओ और औ के लिए भी प्रयोग होता है। यानी कौल लिखेंगे तो उसे कौल, कोल, कवल, कूल कुछ भी पढ़ा जा सकता है।

य के लिए जो अक्षर प्रयोग होता है (नीचे दो बिन्दियाँ) वही ई, ए, ऐ के लिए भी प्रयोग होता है। यानी सेठ को सैठ, सेठ, सयठ, सीठ, कुछ भी पढ़ा जा सकता है।

3. ह का प्रयोग
जैसा मैं ने बताया ख, घ, छ, झ, आदि के लिए अक्षर नहीं है पर इन्हें क, ग, च, ज, आदि के साथ ह (दोचश्मी-हे) जोड़ कर लिखा जाता है। दो चश्मी हे को कई बार ह के लिए भी प्रयोग किया जाता है (शब्द के आरंभ में)। हे को अन्त में कई बार आ की ध्वनि के लिए प्रयोग किया जाता है – जैसे वग़ैरा/वग़ैरह, मुज़ाहिरा/मुज़ाहिरह, हमला/हमलह, इन सब के अन्त में अलिफ़ (आ) के स्थान पर हे (ह) आता है।

4. शब्दों के बीच स्थान
शब्दों के बीच अलग से स्थान छोड़ने का नियम नहीं है। पर अक्षरों को जोड़ने के जो नियम हैं, उन से एक शब्द के बीच ऐसे स्थान आ जाता है, कि वे दो शब्द लगते हैं। जैसे, क्या आप बता सकते हैं कि इस शेर की एक लाइन में कितने अल्फ़ाज़ (शब्द) हैं?
daagh dehlvi
कंप्यूटर के लिए भी यह समझना कठिन होगा कि कौन सा शब्द कहाँ आरंभ होता है और कहाँ समाप्त होता है। दोनों पंक्तियों के बीच जो बिन्दियाँ हैं, वे ऊपर के अक्षरों के साथ हैं, या नीचे के अक्षरों के साथ, यह समझना भी एक मशीन के लिए मुश्किल है। यानी, ओ.सी.आर. भी दिक्कत का काम है।

इस सब को देखते हुए मेरा यह मानना है कि उर्दू पढ़नी हो तो सब से सही तरीका है, उर्दू सीखो। अच्छी खबर यह है कि उर्दू सीखना मुश्किल नहीं है। फ़ुर्सत रही तो उर्दू को आसानी से सिखाने के लिए कुछ लेख भी लिखूँगा। दिल यह कहता है कि उर्दू को भी देवनागरी में लिखा जाए तो कितना ही अच्छा हो। पर उर्दू के ठेकेदारों को यह बात नागवार गुज़रनी है।

पीयूष ने अपने लिप्यन्तरण सॉफ्टवेयर पर उर्दूदानों की राय जानने के लिए उर्दू के यूज़नेट वाले ग्रुप में मदद मांगी थी, पर वहाँ बहस ऐसी छिड़ी और ऐसी मुड़ी कि नतीजा कुछ नहीं निकला।

यूनिनागरी में अब शुषा, कृतिदेव लेआउट, और उर्दू भी

आप साइबर कैफे में, लाइब्रेरी में, दफ्तर में या किसी ऐसे कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं जहाँ आप को कुछ भी इन्स्टाल करने की आज़ादी नहीं है, और आप हिन्दी लिखना चाहते हैं। ऐसे में यूनिनागरी और हग जैसे ऑनलाइन टाइपराइटर बहुत काम आते हैं। मेरी साइट पर यूनिनागरी पिछले दो वर्षों से अधिक से चल रहा है, और कई लोग इसे नियमित प्रयोग कर रहे हैं। अनुभवी लेखकों के काम आने के इलावा इस तरह के टूल उन के भी काम आते हैं जो हिन्दी में लिखना शुरू कर रहे हैं, और अभी कुछ डाउनलोड-इन्स्टाल करने की स्थिति में नहीं हैं।

यूनिनागरी का अपना डिफॉल्ट कुंजीपटल फोनेटिक है, पर फोनेटिक नहीं भी। मतलब यह कि यह ट्रान्सलिट्रेशन नहीं करता, एक कुंजी से एक अक्षर टाइप होता है, जो जहाँ तक हो सके फोनेटिक होने के नज़दीक है (ट्रान्स्लिट्रेशन के लिए हग टूल बहुत बढ़िया काम करता है)। डिफॉल्ट कुंजीपटल के अतिरिक्त मैं ने यूनिनागरी में कुछ समंय पहले इन्स्क्रिप्ट कुंजीपटल जोड़ा था, जो कई लोगों के काम आ रहा है। रवि भाई का इसरार था कि इस में उन लोगों के लिए भी कीबोर्ड लेआउट बनाए जाएँ जो रेमिंगटन/कृतिदेव पर या शुषा पर लिखने के आदी हैं। इस से उन लोगों को भी यूनिकोड में कन्वर्ट करने में आसानी होगी, जो टाइपिंग की आदत नहीं बदलना चाहते और उस कारण कृतिदेव या शुषा प्रयोग कर रहे हैं, या यूनिकोड पर तो आ गए हैं, पर टाइपिंग में दिक्कत महसूस कर रहे हैं।

तो लीजिए हाज़िर है यूनिनागरी का नया रूप – जिस में कृतिदेव/रेमिंगटन और शुषा से मिलते जुलते कीबोर्ड जोड़ दिए गए हैं। जब इन्स्क्रिप्ट जोड़ा था तो साथ में गुरुमुखी लिपि का टाइपराइटर भी जोड़ा था। अब की बार बोनस है उर्दू का टाइपराइटर। इंटरनेट पर ऑनलाइन उर्दू एडिटर की कमी बहुत खल रही थी। उम्मीद है, भारत से और उर्दू चिट्ठाकार उभर कर आएँगे – अभी तक दो तीन ही हैं – जिन में से एक अपने शुएब भाई हैं। नए प्रयोक्ताओं के लिए एक आम प्रश्नोत्तरी भी जोड़ दी है। आगे का इरादा और भारतीय भाषाओं की टाइपिंग जोड़ने का है, ताकि यूनिनागरी एक इंडिक ऑनलाइन टाइपराइटर बन सके।

यदि आप स्वयं के कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो आम तौर पर ऑनलाइन टाइपराइटर की दरकार नहीं होती। मेरा मानना है कि मानकीकरण के लिए हम सब को इन्स्क्रिप्ट टाइपराइटर की आदत डाल लेनी चाहिए। इन्स्क्रिप्ट टाइपराइटर माइक्रोसॉफ्ट के इंडिक

Keyboard options on Indic IME 1 ver. 5

आइ.एम.ई. में उपलब्ध है ही। इंडिक आइ.एम.ई. 1 वर्जन 5 में और कई और कुंजीपटलों का चुनाव संभव है – रेमिंगटन है, पर शुषा नहीं। आप यह भी जानते होंगे (नहीं जानते हैं तो जान लीजिए) कि माइक्रोसॉफ्ट के कीबोर्ड लेआउट क्रिएटर टूल के द्वारा आप अपनी मर्ज़ी का कीबोर्ड लेआउट बना सकते हैं। इसे डाउनलोड कीजिए और जो लेआउट आप को पसन्द हो वह बनाइए।

कौन उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं

मोहल्ले में आजकल रोज़ की तानेबाज़ी चल रहा है। लगता है मोहल्ले वालों को सकारात्मक कुछ नहीं दिखता। संगीत में विभिन्न धर्मों के लोग हैं, यह तो सदियों पुरानी बात है, इस के लिए सुदर्शन को ताना। उर्दू बोलने वालों को कोई दहशतगर्द भले न कहे, पर ताने दो और वाहवाही लूटो। अरे भाई, इस सब से ऊपर उठो, हाथ मिलाओ और चलो वतन को आगे बढ़ाते हैं।

मैं स्वयं को राइट-ऑफ-सेंटर विचारधारा वाला समझता हूँ, और अपनी विचारधारा वाले कई लोगों को जानता हूँ। फिर भी मैं ने किसी को यह नहीं कहते सुना कि हर उर्दू बोलने वाला दहशतगर्द है, या यदि इस ताने के भीतरी अर्थ को समझा जाए तो यह कि हर मुसलमान दहशतगर्द है। पर हाँ, यदि दहशतगर्द को भी दहशतगर्द कहना गुनाह है तो फिर मुँह पर टेप लगा कर बैठ जाते हैं।

यदि कुछ बेहूदा लोग यह कहते हैं कि हर मुसलमान दहशतगर्द है, तो उतने ही बेहूदा लोग यह भी कहते हैं कि हर बुतपरस्त काफिर है, या फिर पाकिस्तान ज़िन्दाबाद का नारा लगाते हैं। ऐसे बेहूदा लोगों की बातों को ले कर रोना धोना और तानेबाज़ी कहाँ तक सही है? सकारात्मक पहलू पर ज़ोर क्यों नहीं दिया जाता? फिर यदि कुछ लोग इस तरह की बदकलामी करते भी हैं, तो क्या उस का कुछ इलज़ाम उन के सर नहीं जाता जो असल में दहशतगर्द हैं और पूरी कौम को बदनाम कर रहे हैं। यह दहशतगर्दी तो पूरी दुनिया में फैली है।

इस मुल्क में हर धर्म के लोगों का हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व है। पिछले चुनावों में बहुमत से एक ईसाई धर्म की स्त्री को देश का नेतृत्व सौंपा गया। अन्त में एक सिख धर्म के व्यक्ति ने उन का स्थान लिया। उन को शपथ दिलाने वाले राष्ट्रपति इस्लाम से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें एक हिन्दूवादी कहे जाने वाले दल ने उस पद के लिए नामांकित किया था। यह सब किस देश में हो सकता है? इस सब पर गर्व करने के स्थान पर आप बेहूदा लोगों की बातों को ले कर क्यों मनमुटाव पैदा करते हैं?

हम तो उस मुल्क को जानते हैं, जहाँ हर बन्दा उर्दू बोलता है। जीवन को जिन्दगी कहता है, और स्थान को जगह। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ गुलाम अली और महदी हसन को सिर-आँखों पर बिठाया जाता है, शाहरुख खान और इरफान पठान तो हमारे लख़्ते जिगर हैं ही। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ नौजवानों के लब पर यह गाना है

है यार मेरा खुशबू की तरह
है जिस की ज़ुबाँ उर्दू की तरह

इस के बरअक्स उर्दू बोलने वालों या मौसीकीकारों का हाल अलगाव के बूते पर बने मुल्कों में क्या होता है, उस तफ़सील में मैं नहीं जाना चाहता। उन से हम अपनी तुलना क्यों करें? पर यह भी नहीं चाहता कि यहाँ भी अलगाव की आग लगाई जाए।

मेरा सकारात्मक रवैया इस के बावजूद है कि जीवन में कुछ बहुत ही कड़ुवे अनुभव भी हुए हैं। कोशिश यही की है कि अच्छे को याद रखो बुरे को दरकिनार करने की कोशिश करो। मैं अपने कुछ अनुभव बाँटना चाहता हूँ।

– चौथी या पाँचवीं जमात में पढ़ता था, उत्तर कश्मीर के एक गाँव के सरकारी स्कूल में। मैं अकेला हिन्दू बच्चा था कक्षा में। रोज़ तख्ती (जिसे हम मश्क कहते थे) लिख कर ले जानी होती थी। कुछ भी लिख कर ले जाओ, पर लिखना ज़रूरी था – उर्दू की लिखाई सुधारने के लिए। मेरे सहपाठी कई बार यह लिख कर लाते थे – सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा। अच्छा नहीं लगता था, पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। टीचर ने कभी कुछ नहीं कहा।

– मिडल स्कूल में यह आम बात थी कि टीचर या प्रिन्सिपल कक्षा में या असेंबली में हिन्दू बच्चों को खड़ा होने को कहे, ताकि उन्हें आइडेंटिफाइ किया जा सके।

– हाई स्कूल में (या उस से पहले) सुबह की प्रेयर में कभी जन-गण-मन नहीं गाया, वन्दे मातरम तो सुना ही नहीं था। हम कश्मीरी भाषा में दो प्रार्थनाएँ गाते थे; एक सेक्यूलर प्रेयर – साहिबो सथ छम मे चानी, और एक मुस्लिम प्रेयर नबी (सल्ल-लाहो-अलहे-वस्सलम) की शान में – या खुदा सारिय खुदाई आसिहे पर्दन अन्दर, आसिहे नय ज़ान ज़ुल्मातन रसूले मोहतरम। क्या एक कश्मीरी हिन्दू वही हल्ला कर सकता था जो भारत में वन्दे मातरम् के खिलाफ होता है? मैं यह नहीं मानता कि वन्दे मातरम् गाने से देश का कुछ भला होगा, पर गाने से गाने वालों का कुछ बुरा भी नहीं होगा, यह मानता हूँ। बेकार का हल्ला है।

– जब भुट्टो को दी गई फाँसी के विरोध में हमारा इंजीनियरिंग कॉलेज बन्द हुआ तो एहतिजाजी जुलूस में हमें भी शामिल होना पड़ा।

फिर वहाँ एक तूफान आया जिस के बाद हमें वहाँ सब छोड़ कर आना पड़ा। एक हिन्दू अल्पसंख्यक के रूप में जीवन कैसा था, इस की ज़्यादा तफ़सील में भी नहीं जाऊँगा। फिर भी यह लगता था कि कश्मीर में मुसलमानों की अक्सरियत है, शायद ये सही कहते हैं कश्मीर घाटी पाकिस्तान का ही भाग होना चाहिए। उस बात पर अपने विचार किसी अन्य पोस्ट में लिखूँगा।

दोस्त मेरे हमेशा मुसलमान रहे, और अब भी हैं। धर्म के अतिरिक्त हर चीज़ पर बहस होती थी – मैं ठहरा नास्तिक और उन में से किसी में खुदा को नकारने की हिम्मत नहीं थी। सातवीं से नौवीं तक मेरठ में पढ़ने का मौका मिला। वहाँ मेरा दोस्त था सलीम। वह हैरान होता था जब मैं उस को कश्मीर की (भारत विरोधी) बातें बताता था, और उस हिन्दुस्तानी मुसलमान की हैरानगी मुझे खुशी देती थी।

फिर कॉलेज के अन्तिम वर्ष में ऑल-इंडिया टूर के तहत हैदराबाद जाना हुआ। मैं और दो और कश्मीरी हिन्दू दोस्त चारमीनार देखने गए तो एक रिक्शे वाले ने पेशकश की – चलिए साहब शहर घुमा लाता हूँ। भाड़ा तय हुआ और हम चल पड़े। उस से नाम पूछा तो उस ने कुछ मुस्लिम नाम बताया, और हम से भी नाम पूछे। मेरे दोस्त को जाने क्या मज़ाक सूझा, उस ने भी तीनों के नाम मुस्लिम बताए। फिर वह खुल कर हमें वहाँ की बातें बताने लगा, यह देखिए यह सारा हमारा इलाका है यूँ समझिए पाकिस्तान है। हिन्दुओं के खिलाफ बातें बताने लगा। हम चुपचाप सुनते रहे – अपने घर से इतनी दूर भी पाकिस्तान हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह हमें एक ज़ियारत में भी ले कर गया। हम ने जैसे तैसे पीछा छुड़ाया कि कहीं हमारा झूठ न पकड़ा जाए।

यह सब अनुभव मेरे भारत के भविष्य के बारे में विश्वास को नहीं डिगाते। बल्कि मेरा विश्वास मज़बूत होता है कि इतनी नकारात्मकता के बावजूद सकारात्मकता इतनी है कि हमारा देश आगे चल रहा है – बेशक दौड़ न रहा हो, और इस में हर धर्म के लोगों का हाथ है।

मैं यह नहीं मानता कि अधिकांश मुसलमान ऐसे हैं। न यह मानता हूँ कि सभी हिन्दू अच्छा ही सोचते हैं। पर भाई इन्हीं बातों का ज़िक्र छेड़ोगे तो दोनो तरफ इन्हीं बातों का ज़िक्र होगा। यह तो कभी खत्म न होने वाली बहस है, जिस का कोई सही नतीजा नहीं निकलेगा। पर यह भी बात है, कि जो चिट्ठे यही एजेंडा ले कर शुरू हुए हैं, वे फिर क्या लिखेंगे। यह जो सांप्रदायिकता वाले चिट्ठा-पोस्टों का तांता लगा हुआ है, क्या इस का वास्तविक मकसद हंगामा खड़ा करना ही नहीं है? टिप्पणियाँ इस पोस्ट पर भी पढ़ी जा चुकीं थीं, पर एक इफेक्ट के लिए टिप्पणियों की अलग पोस्ट बनाई गई, जिस का टाइटल था – हंगामा खड़ा करना मक़सद नहीं। ठीक है, आप अपना लिखने के लिए मुक्त हैं, और हम अपना। अगर चिट्ठा जगत में अब इसी का चर्चा होना है तो इसी का सही।

मुनव्वर राना अपनी ग़ज़ल में कहते हैं

मदीने तक में हम ने मुल्क की खातिर दुआ मांगी
किसी से पूछ ले इस को वतन का दर्द कहते हैं।

वतन का दर्द वतन की औलाद को नहीं होगा तो किसे होगा। हाँ मदीने वाला या कैलाश पर्बत वाला कितनी सुनता है, यह मालूम नहीं। खासकर जिस मुल्क में कुफ्र का बोलबाला हो, उस की अल्लाह क्या सुनेगा।

PS: राना साहब की हसीन ग़ज़ल के जवाब में मैं ने उस की टिप्पणी में यह ग़ज़ल की पूँछ जोड़ी थी, जिसे राजीव जी के प्रोत्साहन (नीचे पहली टिप्पणी देखें) पर यहाँ दोहरा रहा हूँ (बहर और क़ाफ़िए की गड़बड़ के लिए माज़रत-ख़्वाह हूँ)।

करा दो तआर्रुफ़ हम से भी ज़रा उन का
जो उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं।

कब ख़त्म होगा सिलसिला यह रोते धोते रहने का
जो माज़ी को भूल बढ़े आगे उसी को मर्द कहते हैं।

तमिल बोले, तेलुगू, बंगाली, उर्दू या कश्मीरी
यहाँ सब लोग हिन्दी हैं, यही सब फ़र्द कहते हैं।

उर्दू वाला नहीं मोहाजिर वो है हिस्सा वतन का
नहीं यकीं तो देख क्या वतन के सद्र कहते हैं।

बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे

बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे।

इक खेल है औरंगे-सुलेमाँ मेरे नज़दीक
इक बात है ऐजाज़े-मसीहा मेरे आगे।

जुज़ नाम नहीं सूरते-आलम मुझे मंज़ूर
जुज़ वहम नहीं हस्तिए-अशिया मेरे आगे।

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे।

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।

सच कहते हो ख़ुदबीनो-ख़ुद-आरा न क्यों हों
बैठा है बुते-आईना-सीमा मेरे आगे।

फिर देखिये अन्दाज़े-गुल-अफ़्शानीए-गुफ़्तार
रख दे कोई पैमाना-ओ-सहबा मेरे आगे।

नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है, मैं रश्क से गुज़रा
क्योंकर कहूँ लो नाम न उसका मेरे आगे।

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
कआबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।

आशिक़ हूँ, पे माशूक़-फ़रेबी है मेरा काम
मजनूं को बुरा कहती है लैला मेरा आगे।

ख़ुश होते हैं पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते
आई शबे-हिजराँ की तमन्ना मेरे आगे।

है मौज-ज़न इक क़ुलज़ुमे-ख़ूँ, काश यही हो
आता है अभी देखिये क्या-क्या मेरे आगे।

गो हाथ में जुंबिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़रो-मीना मेरे आगे।

हम-पेशा ओ’ हम-मशरब ओ’ हम-राज़ है मेरा
‘ग़ालिब’ को बुरा क्यों कहो, अच्छा मेरे आगे।

– मिर्ज़ा असद्दुल्ला खाँ ‘ग़ालिब’

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शब्दार्थ :
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल = बच्चों का खिलौना
शबो-रोज़ = रात दिन
औरंगे-सुलेमाँ = सुलेमान का सिंहासन
ऐजाज़े-मसीहा = मसीहा का चमत्कार
जुज़ नाम = नाम के सिवाय
हस्तिए-अशिया = चीज़ों का अस्तित्व
निहाँ = छुपना
सहरा = रेगिस्तान
जबीं = मस्तक
ख़ुदबीनो-ख़ुद-आरा = अहं से भरा हुआ
बुते-आईना-सीमा = दर्पण जैसी मूर्ति
अन्दाज़े-गुल-अफ़्शानीए-गुफ़्तार = पुष्पवर्षा सा बातचीत का ढ़ंग
पैमाना-ओ-सहबा = मदिरा का प्याला
कलीसा = गिरजाघर
वस्ल = मिलन
शबे-हिजराँ = विरह की रात
मौज-ज़न = लहराता हुआ
क़ुलज़ुमे-ख़ूँ = रक्त का समुद्र
जुंबिश = हरक़त
साग़रो-मीना = मदिरा की सुराही
हम-मशरब = मेरी जैसी आदतों वाला