कौन उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं

मोहल्ले में आजकल रोज़ की तानेबाज़ी चल रहा है। लगता है मोहल्ले वालों को सकारात्मक कुछ नहीं दिखता। संगीत में विभिन्न धर्मों के लोग हैं, यह तो सदियों पुरानी बात है, इस के लिए सुदर्शन को ताना। उर्दू बोलने वालों को कोई दहशतगर्द भले न कहे, पर ताने दो और वाहवाही लूटो। अरे भाई, इस सब से ऊपर उठो, हाथ मिलाओ और चलो वतन को आगे बढ़ाते हैं।

मैं स्वयं को राइट-ऑफ-सेंटर विचारधारा वाला समझता हूँ, और अपनी विचारधारा वाले कई लोगों को जानता हूँ। फिर भी मैं ने किसी को यह नहीं कहते सुना कि हर उर्दू बोलने वाला दहशतगर्द है, या यदि इस ताने के भीतरी अर्थ को समझा जाए तो यह कि हर मुसलमान दहशतगर्द है। पर हाँ, यदि दहशतगर्द को भी दहशतगर्द कहना गुनाह है तो फिर मुँह पर टेप लगा कर बैठ जाते हैं।

यदि कुछ बेहूदा लोग यह कहते हैं कि हर मुसलमान दहशतगर्द है, तो उतने ही बेहूदा लोग यह भी कहते हैं कि हर बुतपरस्त काफिर है, या फिर पाकिस्तान ज़िन्दाबाद का नारा लगाते हैं। ऐसे बेहूदा लोगों की बातों को ले कर रोना धोना और तानेबाज़ी कहाँ तक सही है? सकारात्मक पहलू पर ज़ोर क्यों नहीं दिया जाता? फिर यदि कुछ लोग इस तरह की बदकलामी करते भी हैं, तो क्या उस का कुछ इलज़ाम उन के सर नहीं जाता जो असल में दहशतगर्द हैं और पूरी कौम को बदनाम कर रहे हैं। यह दहशतगर्दी तो पूरी दुनिया में फैली है।

इस मुल्क में हर धर्म के लोगों का हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व है। पिछले चुनावों में बहुमत से एक ईसाई धर्म की स्त्री को देश का नेतृत्व सौंपा गया। अन्त में एक सिख धर्म के व्यक्ति ने उन का स्थान लिया। उन को शपथ दिलाने वाले राष्ट्रपति इस्लाम से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें एक हिन्दूवादी कहे जाने वाले दल ने उस पद के लिए नामांकित किया था। यह सब किस देश में हो सकता है? इस सब पर गर्व करने के स्थान पर आप बेहूदा लोगों की बातों को ले कर क्यों मनमुटाव पैदा करते हैं?

हम तो उस मुल्क को जानते हैं, जहाँ हर बन्दा उर्दू बोलता है। जीवन को जिन्दगी कहता है, और स्थान को जगह। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ गुलाम अली और महदी हसन को सिर-आँखों पर बिठाया जाता है, शाहरुख खान और इरफान पठान तो हमारे लख़्ते जिगर हैं ही। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ नौजवानों के लब पर यह गाना है

है यार मेरा खुशबू की तरह
है जिस की ज़ुबाँ उर्दू की तरह

इस के बरअक्स उर्दू बोलने वालों या मौसीकीकारों का हाल अलगाव के बूते पर बने मुल्कों में क्या होता है, उस तफ़सील में मैं नहीं जाना चाहता। उन से हम अपनी तुलना क्यों करें? पर यह भी नहीं चाहता कि यहाँ भी अलगाव की आग लगाई जाए।

मेरा सकारात्मक रवैया इस के बावजूद है कि जीवन में कुछ बहुत ही कड़ुवे अनुभव भी हुए हैं। कोशिश यही की है कि अच्छे को याद रखो बुरे को दरकिनार करने की कोशिश करो। मैं अपने कुछ अनुभव बाँटना चाहता हूँ।

– चौथी या पाँचवीं जमात में पढ़ता था, उत्तर कश्मीर के एक गाँव के सरकारी स्कूल में। मैं अकेला हिन्दू बच्चा था कक्षा में। रोज़ तख्ती (जिसे हम मश्क कहते थे) लिख कर ले जानी होती थी। कुछ भी लिख कर ले जाओ, पर लिखना ज़रूरी था – उर्दू की लिखाई सुधारने के लिए। मेरे सहपाठी कई बार यह लिख कर लाते थे – सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा। अच्छा नहीं लगता था, पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। टीचर ने कभी कुछ नहीं कहा।

– मिडल स्कूल में यह आम बात थी कि टीचर या प्रिन्सिपल कक्षा में या असेंबली में हिन्दू बच्चों को खड़ा होने को कहे, ताकि उन्हें आइडेंटिफाइ किया जा सके।

– हाई स्कूल में (या उस से पहले) सुबह की प्रेयर में कभी जन-गण-मन नहीं गाया, वन्दे मातरम तो सुना ही नहीं था। हम कश्मीरी भाषा में दो प्रार्थनाएँ गाते थे; एक सेक्यूलर प्रेयर – साहिबो सथ छम मे चानी, और एक मुस्लिम प्रेयर नबी (सल्ल-लाहो-अलहे-वस्सलम) की शान में – या खुदा सारिय खुदाई आसिहे पर्दन अन्दर, आसिहे नय ज़ान ज़ुल्मातन रसूले मोहतरम। क्या एक कश्मीरी हिन्दू वही हल्ला कर सकता था जो भारत में वन्दे मातरम् के खिलाफ होता है? मैं यह नहीं मानता कि वन्दे मातरम् गाने से देश का कुछ भला होगा, पर गाने से गाने वालों का कुछ बुरा भी नहीं होगा, यह मानता हूँ। बेकार का हल्ला है।

– जब भुट्टो को दी गई फाँसी के विरोध में हमारा इंजीनियरिंग कॉलेज बन्द हुआ तो एहतिजाजी जुलूस में हमें भी शामिल होना पड़ा।

फिर वहाँ एक तूफान आया जिस के बाद हमें वहाँ सब छोड़ कर आना पड़ा। एक हिन्दू अल्पसंख्यक के रूप में जीवन कैसा था, इस की ज़्यादा तफ़सील में भी नहीं जाऊँगा। फिर भी यह लगता था कि कश्मीर में मुसलमानों की अक्सरियत है, शायद ये सही कहते हैं कश्मीर घाटी पाकिस्तान का ही भाग होना चाहिए। उस बात पर अपने विचार किसी अन्य पोस्ट में लिखूँगा।

दोस्त मेरे हमेशा मुसलमान रहे, और अब भी हैं। धर्म के अतिरिक्त हर चीज़ पर बहस होती थी – मैं ठहरा नास्तिक और उन में से किसी में खुदा को नकारने की हिम्मत नहीं थी। सातवीं से नौवीं तक मेरठ में पढ़ने का मौका मिला। वहाँ मेरा दोस्त था सलीम। वह हैरान होता था जब मैं उस को कश्मीर की (भारत विरोधी) बातें बताता था, और उस हिन्दुस्तानी मुसलमान की हैरानगी मुझे खुशी देती थी।

फिर कॉलेज के अन्तिम वर्ष में ऑल-इंडिया टूर के तहत हैदराबाद जाना हुआ। मैं और दो और कश्मीरी हिन्दू दोस्त चारमीनार देखने गए तो एक रिक्शे वाले ने पेशकश की – चलिए साहब शहर घुमा लाता हूँ। भाड़ा तय हुआ और हम चल पड़े। उस से नाम पूछा तो उस ने कुछ मुस्लिम नाम बताया, और हम से भी नाम पूछे। मेरे दोस्त को जाने क्या मज़ाक सूझा, उस ने भी तीनों के नाम मुस्लिम बताए। फिर वह खुल कर हमें वहाँ की बातें बताने लगा, यह देखिए यह सारा हमारा इलाका है यूँ समझिए पाकिस्तान है। हिन्दुओं के खिलाफ बातें बताने लगा। हम चुपचाप सुनते रहे – अपने घर से इतनी दूर भी पाकिस्तान हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह हमें एक ज़ियारत में भी ले कर गया। हम ने जैसे तैसे पीछा छुड़ाया कि कहीं हमारा झूठ न पकड़ा जाए।

यह सब अनुभव मेरे भारत के भविष्य के बारे में विश्वास को नहीं डिगाते। बल्कि मेरा विश्वास मज़बूत होता है कि इतनी नकारात्मकता के बावजूद सकारात्मकता इतनी है कि हमारा देश आगे चल रहा है – बेशक दौड़ न रहा हो, और इस में हर धर्म के लोगों का हाथ है।

मैं यह नहीं मानता कि अधिकांश मुसलमान ऐसे हैं। न यह मानता हूँ कि सभी हिन्दू अच्छा ही सोचते हैं। पर भाई इन्हीं बातों का ज़िक्र छेड़ोगे तो दोनो तरफ इन्हीं बातों का ज़िक्र होगा। यह तो कभी खत्म न होने वाली बहस है, जिस का कोई सही नतीजा नहीं निकलेगा। पर यह भी बात है, कि जो चिट्ठे यही एजेंडा ले कर शुरू हुए हैं, वे फिर क्या लिखेंगे। यह जो सांप्रदायिकता वाले चिट्ठा-पोस्टों का तांता लगा हुआ है, क्या इस का वास्तविक मकसद हंगामा खड़ा करना ही नहीं है? टिप्पणियाँ इस पोस्ट पर भी पढ़ी जा चुकीं थीं, पर एक इफेक्ट के लिए टिप्पणियों की अलग पोस्ट बनाई गई, जिस का टाइटल था – हंगामा खड़ा करना मक़सद नहीं। ठीक है, आप अपना लिखने के लिए मुक्त हैं, और हम अपना। अगर चिट्ठा जगत में अब इसी का चर्चा होना है तो इसी का सही।

मुनव्वर राना अपनी ग़ज़ल में कहते हैं

मदीने तक में हम ने मुल्क की खातिर दुआ मांगी
किसी से पूछ ले इस को वतन का दर्द कहते हैं।

वतन का दर्द वतन की औलाद को नहीं होगा तो किसे होगा। हाँ मदीने वाला या कैलाश पर्बत वाला कितनी सुनता है, यह मालूम नहीं। खासकर जिस मुल्क में कुफ्र का बोलबाला हो, उस की अल्लाह क्या सुनेगा।

PS: राना साहब की हसीन ग़ज़ल के जवाब में मैं ने उस की टिप्पणी में यह ग़ज़ल की पूँछ जोड़ी थी, जिसे राजीव जी के प्रोत्साहन (नीचे पहली टिप्पणी देखें) पर यहाँ दोहरा रहा हूँ (बहर और क़ाफ़िए की गड़बड़ के लिए माज़रत-ख़्वाह हूँ)।

करा दो तआर्रुफ़ हम से भी ज़रा उन का
जो उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं।

कब ख़त्म होगा सिलसिला यह रोते धोते रहने का
जो माज़ी को भूल बढ़े आगे उसी को मर्द कहते हैं।

तमिल बोले, तेलुगू, बंगाली, उर्दू या कश्मीरी
यहाँ सब लोग हिन्दी हैं, यही सब फ़र्द कहते हैं।

उर्दू वाला नहीं मोहाजिर वो है हिस्सा वतन का
नहीं यकीं तो देख क्या वतन के सद्र कहते हैं।