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रमण कौल | 13 जुलाई, 2006

विवाह के विषय में कुछ सुभाषित (पुरुषों की नज़र से)
मैं ने सुना है कि प्रेम रसायनशास्त्र की तरह है। शायद यही वजह है मेरी पत्नी मुझे विषैले पदार्थ के समान समझती है।   
- डेविड बिसोनेट
कोई व्यक्ति यदि आप की पत्नी को चुरा लेता है, तो उस से बदला लेने का सब से बेहतर तरीका है कि [...]

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रमण कौल | 14 अप्रैल, 2006

बहुत ही टेढ़ा विषय दिया है संजय ने। जितना इस विषय पर विवाद होने का डर रहता है, उतना शायद ही किसी और विषय पर रहता हो। अभी तक इसीलिए इस तरह के विषय हिन्दी चिट्ठाजगत में नहीं उठाए जा रहे थे। पर यह प्रसन्नता की ही बात है कि अब हिन्दी चिट्ठाजगत भी वयस्क [...]

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भारतीय मुद्रा बदलने का रजनीश का सुझाव विचारणीय तो है, पर मेरे विचार में इस का उत्तर है — नहीं। अर्थशास्त्र पर अपनी पकड़ वैसे बहुत कमज़ोर है, इसलिए डिस्क्लेमर पहले सुना दूँ — इस विषय पर व्यक्‍त किए गए मेरे विचार पूर्ण रूप से व्यक्‍तिगत और अव्यवसायिक हैं, और पढ़ने वाला किसी भी नतीजे [...]

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स्वामी जी बढ़िया रहे। इस विषय पर उन की प्रविष्टि पहले आई, और अनुगूँज बाद में घोषित हुई। यह तो वही हुआ कि जो आप ने पहले ही पढ़ा है उसी पर आप को डिग्री दी जाएगी। फिर खानापूर्ति के लिए एक और प्रविष्टि लिख दी, जिस पर अनूप भाई ने कंजूसी का आरोप सही [...]

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रमण कौल | 24 सितम्बर, 2005

यह चर्चा आरंभ करने के लिए आलोक का धन्यवाद।
सब से पहली बात यह समझने की है कि इंटरनेट हमारे समाज का ही आईना है। हमारे समाज का एक अधूरा आईना, जिस में हम केवल समाज के पढ़े-लिखे, “आधुनिक”, मध्यम-आय (और ऊपर) और मध्यम-आयु (और नीचे) वर्ग का प्रतिबिम्ब देख सकते हैं। समाज के इस वर्ग [...]

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मेरी प्यारी पाती,
मुझे बहुत दुख है कि तुम अब इस दुनिया में नहीं रही। खैर जहाँ भी हो, सुखी रहो। इस दुनिया में फिर आने की तो उम्मीद छोड़ दो क्योंकि इस दुनिया में तुम्हारा स्थान ईमेल ने ले लिया है। सालों हो गए तुम्हें गुज़रे हुए। वास्तव में तुम्हारी याद तो बहुत आती [...]

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रमण कौल | 28 अप्रैल, 2005

मैं एक इनक्युअरेब्ल ऑपटिमिस्ट हूँ, यानी लाइलाज आशावादी। मैं इस बात में सौ प्रतिशत विश्वास करता हूँ कि आशा ही जीवन है। ज़िन्दगी में कुछ भी गुज़र जाए, मैं हमेशा यही मानता हूँ कि शायद इस से बुरा भी हो सकता था, और जो मेरे साथ हो रहा है, हज़ारों-लाखों लोगों के साथ रोज़ इस [...]

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बचपन के मीत — बड़ा ही भावुक और दिल के करीब का विषय है यह। जैसे ही विषय की घोषणा हुई, मैंने सोचा कि अपनी प्रविष्टि तो निश्चित है। पर अलाली का आलम यह है कि कोई बात तब तक नहीं होती जब तक उस की अन्तिम तिथि न आ जाए। अंकल सैम से टैक्स [...]

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रमण कौल | 23 फरवरी, 2005

“मेरा चमत्कारी अनुभव” – मैंने अनुगूंज का यह विषय चुन कर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। स्वयं का कोई ढ़ंग का अनुभव है नहीं, लिखूँ तो क्या लिखूँ? यही होता है जब नौसिखियों को कोई ज़िम्मेवारी का काम दिया जाता है। समस्या यह है कि जब तक मैं स्वयं न लिखूँ तब तक [...]

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रमण कौल | 12 दिसम्बर, 2004

हाल ही के कुछ समाचार माध्यमों में खबर थी, १९९० के पूर्वार्ध में जम्मू कश्मीर छात्र स्वातंत्र्य फ्रंट के कर्ताधर्ता और आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों की संस्था इख़्वान‍-उल-मुस्लिमीन के सर्वोच्च कमांडर ताहिर शेख इख़्वानी ने टेरिटोरियल सेना के अफसरों की चयन परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। बहस उठी कि क्या यह मुनासिब है कि पूर्व [...]

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