दो बातें

1. विशेषज्ञों की सलाह मानकर मैंने भी वर्डप्रेस को अपना ब्लाग-यन्त्र बनाया। मैं अपना ब्लागस्थान ब्लागर से बदल कर यहाँ ले आया हूँ, अपने जालस्थल पर।

2. यदि आप अपने ब्लाग पर सभी हिन्दी ब्लागरों की कड़ियां रखते हैं तो उसको अपटुडेट रखने के लिए मेरा एक पंक्ति का जावास्क्रिपट प्रयोग करें। यहां देखें।

इधर उधर की

कई दिनों से कुछ भी लिख नहीं पाया हूँ। लिखने का समय न मिलने पर भी मन में यही चलता रहता है यह लिखूँ, वह लिखूँ। इस सप्ताहान्त लाइब्रेरी से एक पुस्तक उठा लाया “सैम्ज़ टीच यौरसेल्फ मुवेब्ल टाइप इन २४ आवर्स”। और लोगों की तरह ब्लागर से विदा होकर अपना घर बसाने का विचार बढ़िया लगा। पुस्तक पढ़ने से तो लग रहा है कि अपने ब्लाग पर इससे ज़्यादा नियन्त्रण रहेगा। जाने मूवेब्ल टाइप और वर्डप्रेस में से कौन सा बेहतर है? ख़ैर मूवेब्ल टाइप की पुस्तक है, अभी तो यही बेहतर है। वर्डप्रेस की साइट पर जो सहायता विभाग है, वह मुझे अपर्याप्त लगा। जीतू जी ने तो भली भान्ति समझा दिया है पर इस मूढ़ को sql जैसे शब्दों से ही ड़र लगता है। ख़ैर धीरे धीरे रास्ता मिल ही जाएगा।

इसके अतिरिक्त शनिवार को देवनागरी टाइपराइटर्स की सूची भी पूरी की। हिन्दी के चिट्ठों और ग्रुप्स पर जितने नए आगन्तुक होते हैं उन का अक्सर यही पहला सवाल होता है — कम्प्यूटर पर यूनिकोड देवनागरी कैसे लिखी जाए? और, सब विशेषज्ञो के अलग अलग जवाब होते हैं। इसलिए मैंने सोचा टीका-टिप्पणी सहित एक पूरी सूची बना दी जाए। इस पर आप लोगों की कोई टीका-टिप्पणी हो तो बताया जाए।

एक और प्रश्न — ऍडिटर (as in टाइपराइटर) की हिन्दी क्या होनी चाहिए? “सम्पादक” तो सही नहीं है। याहूग्रुप हिन्दी-फोरम के नारायणजी कहते हैं कि “सम्पादित्र” होना चाहिए, क्योंकि संस्कृत में कुछ करने वाले यन्त्र का शब्द बनाने के लिए मूल शब्द के साथ “इत्र” लगता है। बात ठीक लगी, और हम ने अपने सम्पादित्र पर वही शब्द अपना लिया। पर ऍडिटर का काम मूलतः ऍडिट (सम्पादन) करना तो नहीं है, फिर इसे ऍडिटर या सम्पादित्र क्यों कहें। इसका काम तो कम्पोज़ करना है। टाइपराइटर फिर भी बेहतर शब्द है। हिन्दी में क्या कहें? टंकण-यन्त्र? या फिर, टंकित्र? अनु-तख्ती? कोई सुझाव?

कम्पयूटर की हिन्दी शब्दावली का कोई केन्द्रीय स्थान हो तो बताएँ। भारत सरकार की एक साइट है जो हमेशा काम नहीं करती, और यूनिकोड का प्रयोग भी नहीं करती।

अनुगूंज पर “आतंक से मुख्यधारा” पर सबका दृष्टिकोण देख कर कुछ अनकम्फोर्टिब्ल सी फीलिंग हुई। लगा कि हम भारतीय मूलतः उदारहृदयी हैं। ख़ैर ख्यालों को तरतीब दे कर कुछ लिखूंगा इसके बारे में।

आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?

Anugunj: Third event
हाल ही के कुछ समाचार माध्यमों में खबर थी, १९९० के पूर्वार्ध में जम्मू कश्मीर छात्र स्वातंत्र्य फ्रंट के कर्ताधर्ता और आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों की संस्था इख़्वान‍-उल-मुस्लिमीन के सर्वोच्च कमांडर ताहिर शेख इख़्वानी ने टेरिटोरियल सेना के अफसरों की चयन परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। बहस उठी कि क्या यह मुनासिब है कि पूर्व आतंकवादियों को सामरिक रूप से महत्वपूर्ण पद सोंपे जाएँ? यही बना तीसरी अनुगूँज का विषय: “आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?”

मेरे विचार में आतंक से मुख्यधारा की राह जो भी हो, उस की मंज़िल भारतीय सेना नहीं होनी चाहिए। पहले तो आतंक से मुख्य धारा की राह हो ही क्यों? यदि सामान्य जीवन में कोई क़त्ल करता है, तो चाहे पकड़ा जाए या आत्मसमर्पण करे, उस की राह जेल में जाके ही रुकती है। अगला पड़ाव मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास, नहीं तो लम्बा कारावास। मुख्य धारा की बात हो भी तो सज़ा काटने के बाद। जिन आतंकियों ने असंख्य हत्याएँ की हों उनके साथ मुख्य धारा की बात क्यों हो? क़त्ल भी ऐसे वैसे नहीं किए होते इन लोगों ने — फौजियों को मारा होता है। अब इन्हीं लोगों को फौज में शामिल करेंगे आप? परीक्षा तो कोई भी उत्तीर्ण कर ले, जाने क्या स्थितियाँ रही होंगी जब ताहिर मियाँ ने टेरिटोरियल सेना के अफसरों की चयन परीक्षा उत्तीर्ण की होगी। हो सकता है उसमें उन्हीं राजनीतिक शक्तियों का हाथ हो जो उन्हें सेना का अफ़सर बनाने पर तुले हुए हैं। यों तो मुन्ना भाई ने भी डाक्टरी की एक से बढ़ के एक परीक्षा टाप करी थी, यह तो उनसे आपरेशन करवाने वाली बात हो गई।

चलिए माना इखवान वाले सरकारी आतंकवादी हैं। इन लोगों ने काफी सहायता की है भारतीय एजेंसीज़ की। बेचारे ताहिर मियाँ पर तो जानलेवा हमले भी हुए पाकिस्तान-परस्त आतंकियों द्वारा। इख़वानुल-मुस्लिमीन का संस्थापक और पूर्व अध्यक्ष कुका परे तो राजनीति में भी कूद पड़ा था। १९९६ में विधायक का चुनाव भी जीता। पर पिछले वर्ष मार दिया गया। कई साथी भी मारे गए। पर विश्व भर में ऐसे गुटों का इतिहास देखिए। अक्सर देखा गया है कि यह लोग आस्तीन के साँप होते हैं, कभी न कभी पालने वाले को ही काट खाते हैं। जरनैल सिंह भिंडरावाले से ले कर तालिबान तक कई लोग और गुट किसी न किसी रूप में पहले “सरकारी” आतंकी रहे हैं।

अब प्रश्न यह है कि यदि इन लोगों ने सरकार की सहायता की है और उसे अगर पुरस्कृत करना ही है तो कैसे किया जाए? पैट्रोल पम्प दे दीजिए। गैस एजेन्सी दे दीजिए। राजनीति भी चल जाएगी, वैसे ही देश-द्रोहियों से भरी पड़ी है। पर फौजी अफ़्सर? नहींऽऽऽऽ !!!

देस परदेस

इस सप्ताह पंकज जी के भूत ने अक्षरग्राम पर एक नया शोशा छोड़ा था — मानसिक लुच्चेपन का। बातों में फुरसतिया अनूप जी ने महेश भट्ट की पूजा का ज़िक्र किया। भई बॉलीवुड तो वैसे ही अपने आप में अलग संस्कृति है।

इस बीच देसी मूल्यों के पश्चिम में धुन्धला जाने और इससे माता-पिता-सन्तान की खींचातानी और कुण्ठा पर दो क़िस्से पढ़े पिछले दिनों। उनका ज़िक्र करना चाहूँगा। पहला क़िस्सा दरअसल एक कहानी है अभिव्यक्ति पर — काहे को ब्याही विदेश। मुद्दा है एक काशी पण्डित के अमरीका आने पर बेटी को खो देने का। दूसरा क़िस्सा है एक सच्चा समाचार बीबीसी पर — Marriages Made in Hell — कैसे इंगलैंड में पली एक लड़की को उसके माता-पिता धोखे से पाकिस्तान ले गए और वहाँ ब्याह दिया, और छोड़ दिया दुख झेलने को।

यह दोनों क़िस्से एक ही सिक्के के दो विपरीत पहलू दर्शाते हैं कि कुछ आप्रवासियों की पहली पीढ़ी को बच्चों के रस्ते बदल जाने से कितनी कुण्ठा होती है। साथ ही इस बात का ख़्याल आया कि विभिन्न लोग बच्चों और नए देश को कैसे बैलेन्स करते हैं।

कुछ लोग कहते हैं, “बच्चों के लिए ही तो आए हैं, ताकि उनका भविष्य सुधर जाए, वरना यहाँ क्या धरा है। बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ, हम तो चले अपने देस।”

कुछ कहते पाए जाएँगे, “बस रोज़ी रोटी की बात है, वरना बच्चे तो यहाँ बिगड़ जाते हैं। बच्चों के बड़े होने से पहले वापस चलेंगे।”

होता यह है कि बहुत कम लोग वापस जाते हैं। किसी भी बहाने से आए हों — पढ़ाई, पर्यटन, नौकरी, तबादला या कुछ और, बाइ-हुक-या-बाइ-क्रुक अटक जाने की ही कोशिश करते हैं। सालों तक एक वीज़ा कैटेगरी से दूसरी, फिर ग्रीन कार्ड और आखिर सिटिज़नशिप का चक्कर। कुछ अपवाद देखता हूँ तो मन प्रसन्न होता है, खुद चाहे जो करूँ। एक मित्र के बारे में सुना जो यहाँ कुछ साल रहे, यहाँ बच्चों को होम-स्कूलिंग कराई और सिटिज़नशिप लेकर वापस चले गए (यह मेरी समझ में नहीं आया कि फिर सिटिज़नशिप के पीछे क्यों थे, खैर कभी मिलेंगे तो पूछूँगा)। एक दंपति से मिला जो यहाँ रहते हुए दो शिशुओं के जन्म के लिए दो बार भारत गए ताकि वापस जाने का इरादा कमज़ोर न हो, जबकि लोग जान-बूझ कर बच्चों का जन्म अमरीका में कराने की कोशिश करते हैं।

ख़ैर, यह था पहला चिट्ठा। कुछ तो खुजली मिटी है। गाँव वालो क्या कहते हो इस विषय पर?

राम राम

राम राम गाँव वालो। पडौस में नया आया हूँ। जब तक घर ठीक से बसा लूँ, गुड़-चीनी की ज़रूरत पड़े तो दे देना भाई लोगो। कई दिनों से इस ब्लाग-नगरी की गलियों के चक्कर लगा रहा हूँ। बड़े बड़े दिग्गज बैठे हैं डेरा जमाए। खैर इधर-उधर की हम भी हाँक ही लेंगे। अपना अन्दाज़े-बयाँ और हो या न हो,
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे …