जादू का खेल

इस खेल की कड़ी मेरे पास मेरे मित्र राज कौशिक ने सिडनी से भेजी। यदि आप ने यह खेल पहले नहीं देखा हो तो थोड़ी देर के लिए सिर चकरा देता है। यदि आप ने ईमानदारी से इसका रहस्य स्वयं पता किया हो तो आप को बधाई। लेकिन राज़ को राज़ ही रहने दो, वरना राज ना-राज़ हो जाएगा।

बिना मताधिकार के मोहरे

[१९९० के आरंभ तक उत्तर कश्मीर के कलूसा गाँव के जिस घर में मेरा परिवार दशकों से रहा, उस में तब से या तो हिज़्बुल-मुजाहिदीन का डेरा रहा है या राष्ट्रीय राइफ्ल्ज़ का, जिस का जिस समय वर्चस्व रहा। वह क्षेत्र “शान्त” क्षेत्रों में से है, क्योंकि वहाँ अभी भी गिनती के दो-चार हिन्दू बचे हुए हैं। ३० किलोमीटर दूर सोपोर में जहाँ मेरे कई रिश्तेदार रहते थे, अब हिन्दू मोहल्ला खंडहर बन चुका है, जहाँ कोई नहीं रहता और घर जल कर शब्दशः मिट्टी में मिले हुए हैं। अगली पीढ़ियों के लिए कश्मीर का कुछ अर्थ हो या न हो, हमारी पीढ़ी तो इसे अपने दिलो-दिमाग़ से नहीं निकाल सकती। इसी पीढ़ी के हैं रेडिफ स्तंभकार ललित कौल। उन के पिछले सप्ताह के लेख का मैं ने हिन्दी अनुवाद किया है जो नीचे प्रस्तुत है।]

कश्मीरी हिन्दू समुदाय ने १९-२० जनवरी को कश्मीरी हिन्दू हालोकास्ट दिवस के रूप में मनाया। १५ वर्ष पहले इसी दिन इस्लामी आतंकियों ने कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिन्दुओं के सामूहिक निष्कासन का अभियन्त्रण किया।

१९ जनवरी १९९० की रात कश्मीरी हिन्दुओं के इतिहास में सबसे काली रात थी। उस रात, घाटी की सभी मस्जिदों के लाउडस्पीकर चीख चीख कर इस अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध ज़हरीली धमकियाँ उगल रहे थे। रात भर, इस शान्तिप्रिय समुदाय को धमकी दी जा रही थी कि या तो धर्म परिवर्तन कर लें या घाटी को छोड़ दें। या फिर, मरने के लिए तैयार हो जाएँ।

१९४७ में, जब पाकिस्तानी कबाइली आक्रामक, पाकिस्तानी सेना की मदद से श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे तब कश्मीरी हिन्दुओं को ऐसी ही स्थिति का सामना था। उन दिनों हर परिवार की स्त्रियों को विष की पुड़ियाँ बाँटी गई थीं ताकि आक्रामकों के घर में घुसने की स्थिति में वे उसे खा लें। नार्कीय बल के विरुद्ध यह ज़हर की पुड़िया ही उन का इकलौता बचाव थी। अस्मिता हरण से पहले मौत।

जनवरी की उस रात भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। स्त्रियों को घरों के अन्धेरे कोनों में छिपाया जा रहा था, ताकि भाड़े के आतंकी उन्हें ढ़ूँढ़ न पाएँ। जैसे जैसे रात गहरा रही थी, भय के बादल घने होते जा रहे थे। अन्ततः सुबह होने पर कश्मीरी हिन्दू और न सह पाए और जान बचाने के लिए सब कुछ छोड़ छाड़ कर भागे — वे मन्दिर जो उन्हें सुकून और शान्ति देते थे, वे विद्यालय जहाँ से उन्होंने ज्ञान और बुद्धिमत्ता पाई थी, वे घर और चौखटें जिनसे उनकी जीवन भर की यादें जुड़ी हुई थीं, वे पुल जिन पर उन्होंने वितस्ता (जेहलम) नदी को सराहते हुए अपनी शामें गुज़ारी थीं, चिनार के वे शानदार वृक्ष जिनकी छाया भर से उनके घाव भर जाते थे, कश्मीरी में ‘डब’ कहलाई जाने वाली वह बाल्कनियाँ जिन पर वे अपने घरों की टीन की छतों पर गिरती बारिश की छन छन सुनते थे। हर चीज़ जिनसे उन्हें प्यार और लगाव था।

पन्द्रह वर्ष हुए हैं तब से, और उनके लिए बहुत कुछ नहीं बदला है। तब कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया। आज भी किसी को उनकी परवा नहीं है। तब कश्मीरी हिन्दू कश्मीर की शतरंज में मोहरे थे। आज भी वे मोहरे ही हैं।

आजकल जम्मू कश्मीर राज्य में २७ वर्ष बाद स्थानीय चुनाव हो रहे हैं। ज़रा अन्दाज़ा लगाएँगे? घाटी के ४००,००० कश्मीरी हिन्दुओं में से एक का नाम भी मतदाता सूची में नहीं है। एक ही झटके में सभी ४००,००० कश्मीरी हिन्दुओं का मतदान करने का मूल अधिकार उनसे छीन लिया गया है। क्यों? क्योंकि वे अब घाटी में नहीं रहते। और क्यों नहीं रहते घाटी में वे? फिर समझाना पड़ेगा क्या?

इधर इन कश्मीरी हिन्दुओं के मूलभूत अधिकारों का हनन हो रहा है, उधर सभी राजनीतिक दल अपने अपने स्वार्थ के लिए स्थिति का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्य मन्त्री मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनके पीडेपा वाले चमचे कह रहे हैं कि चूँकि ये कश्मीरी हिन्दू घाटी में नहीं रहते, उन्हें मतदाता सूची में नहीं रखा जा सकता। उन की बहस का मुद्दा यह है कि इन खाना-बदोश लोगों को वहाँ की मतदाता सूची में होना चाहिए जहाँ वे रहते हैं, जैसे जम्मू, उधमपुर, आदि।

मुफ्ती साहब के उप मुख्य मन्त्री मंगत राम शर्मा जो उन की साझेदार पार्टी काँग्रेस-इ से हैं (और जम्मू से हैं), राज्य के राज्यपाल से अधिसूचना की माँग कर रहे हैं कि इन कश्मीरी हिन्दुओं को घाटी की मतदाता सूचियों में वापस ड़ाल दिया जाए। (जम्मू के) भाजपा वाले भी इन शरणार्थियों को घाटी की मतदाता सूचियों में ही रखना चाहते हैं। यानी कुछ लोग उन्हें कश्मीर से निकालने के चक्कर में हैं और कुछ लोग जम्मू से। कुछ लोग अपने यहाँ की मतदाता सूचियों से उन्हें बाहर देखना चाहते हैं तो कुछ लोग दूसरी जगह की मतदाता सूचियों में ड़ालना चाहते हैं।

राजनीतिक दलों की इस उठापटक के चलते प्रभावित लोगों की कोई नहीं सुन रहा। कश्मीरी हिन्दू क्या चाहते हैं इस की किसी को परवाह नहीं।

भारत जैसे जनतान्त्रिक देश में कोई मतदान का संवैधानिक अधिकार कितनी आसानी से खो सकता है, यह देख कर घिन्न होती है। एम्नेस्टी इंटरनेश्नल और ह्यूमन राइट्स वाच अब कहाँ हैं? शायद मैनहटन न्यूयार्क के किसी पैंटहाउस में स्काच की चुस्कियाँ लेने में व्यस्त होंगे।

अपने यहाँ के राजनीतिज्ञ किस तरह गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं, यह देख कर ग्लानि होती है। जब सत्ता में होते हैं तब अपनी ही ऐंठ में होते हैं और जिन लोगों को हानि पहुंची है उन की वाजिब माँगों को भी नकार देते हैं। और जब हार कर विपक्ष में बैठते हैं, फिर मसीहा बने फिरते हैं।

अभी कुछ ही दिन पहले भूतपूर्व उप प्रधान मन्त्री लाल कृष्ण आड़वानी कश्मीरी हिन्दू हालोकास्ट दिवस के उपलक्ष्य में कश्मीरी हिन्दुओं से मिले। प्रतिनिधिमण्डल को सम्बोधित करते हुए बोले, “मैं स्वीकार करता हूँ कि राजग सरकार कश्मीरी हिन्दुओं की समस्या को हल करने के लिए बहुत कुछ नहीं कर पाई। गठबन्धन की कई अड़चनें थीं। फिर भी भाजपा सरकार में रहते हुए इस समस्या के बारे में अब के मुकाबले अधिक हासिल कर सकती थी।

“इस के बावजूद”, वे बोले “मैं समुदाय को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि विपक्ष, विशेषकर भाजपा, इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर उठाएगा। मैं यूपीए सरकार पर इस मुद्दे की महत्ता को व्यक्त करता रहूँगा और इस समुदाय को न्याय दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ूँगा। अपनी ही मातृभूमि में इस समुदाय का सफाया कर देना दुर्भाग्यपूर्ण है और दुनिया को इस मुद्दे की ख़बर होनी चाहिए।”

यह वक्तव्य बहुत अच्छा समझें तो परिहासपूर्ण है, बुरा समझें तो धूर्तता-पूर्ण।

अब हम आड़वानी जी पर कैसे भरोसा कर लें? यदि उन्होंने सत्ता में रहते कुछ नहीं किया तो कैसे मान लें कि अब कुछ कर पाएँगे। किस को शेख़ चिल्ली की कहानियाँ सुना रहे हैं वे? विश्वास नहीं होता कि किस तरह ये राजनीतिज्ञ हर मुद्दे को वोटों की जमा-तफ़रीक में बदल देते हैं। मानववादी शर्तें भी इन स्वार्थी राजनीतिज्ञों के लिए कोई अर्थ नहीं रखतीं।

यूपीए सरकार के लिए यह एक मौका है त्रुटिनिवारण का, और दुनिया को दिखाने का कि उसका सभी समुदायों के साथ न्याय में पक्का विश्वास है। मैं चुनौती देता हूँ उन को, कि कश्मीरी हिन्दुओं के घाटी से सफाया किए जाने के कारणों का निरीक्षण करने के लिए एक जाँच आयोग बिठाएँ, इस घिनौनी कृति के लिए ज़िम्मेदार लोगों को खोज निकालें और उन्हें देश के विधान के अनुसार दंडित करें।

यदि लालू प्रसाद यादव गोधरा काँड की पुनः जाँच करने के लिए जस्टिस बैनर्जी की अध्यक्षता में जाँच समिति नियुक्त कर सकते हैं, तो गृह मन्त्री शिवराज पाटिल कश्मीरी हिन्दुओं के सफाए की जाँच के लिए आयोग क्यों नहीं नियुक्त कर सकते?

क्या यूपीए सरकार यह चुनौती स्वीकार करने को तैयार है? कोई सुन रहा है यूपीए सरकार सरकार में? कोई सुन रहा है? कोई है?


ललित कौल “कश्मीर हेराल्ड” के सम्पादक हैं। उनके अन्य लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

पेज थ्री

आज “पेज थ्री” देखी। फिल्म देखने के लिए बैठ रहा था तो ज़्यादा उम्मीदें नहीं थीं, सोचा शायद कुछ देर बाद उठ जाऊँगा और परिवार के बाकी लोग देख लेंगे, जैसा घर में आई अक्सर फिल्मों के साथ होता है। शुरू में कुछ धीमी भी लगी पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई, उसका आकर्षण बढ़ता गया, और अब मैं यही कहना चाहूँगा, कि फिल्म को देखे बिना छोड़िए मत।

Konkana Sensharmaफिल्म की थीम लीक से हट कर है, एक तरह से आर्ट फिल्म की श्रेणी में ही आती है। पर फिर भी बाक्स ऑफिस पर अच्छी चल रही है, यह जान कर सुखद आश्चर्य ही हुआ। कोंकणा सेनशर्मा की एक पत्रकार की मुख्य भूमिका बहुत ही शक्तिशाली है। गर्ल-नेक्सट-डोर वाले व्यक्तितव की इस अभिनेत्री की यह पहली फिल्म देखी है मैंने, पर अब पता चला पहले ही “मिस्टर एण्ड मिसेज़ अइयर” में धाक छोड़ चुकी है, और कई पुरस्कार भी पा चुकी है। अब तो वह फिल्म भी देखनी पड़ेगी। देब भाई कौन सी चक्की का पिसा खाते हो आप बंगाली लोग जो इतना टेलेंट पाए हो।

बस एक बात का ख्याल रखें। यहाँ देसी डीवीडी लेते समय हम रेटिंग पर इतना ध्यान नहीं देते, और कई बार देखते देखते पता चलता है कि अगर यह अँग्रेज़ी फिल्म होती तो “आर” रेटिड होती। थोड़ा थोड़ा ही सही, इस फिल्म ने बॉलीवुड़ की कुछ शालीनता सीमाओं को कई जगह पार किया है, हालाँकि भौंडा लगे बिना। समलैंगिक यौन, द “ग” वर्ड़, हॉलीवुड़ स्टाइल चुम्बन, यहाँ तक कि बच्चों को भी वासना का शिकार होते हुए दिखाया गया है। मैं यह नहीं कहूँगा कि बच्चों को इस फिल्म से वंचित किया जाए, पर पहली बार खुद देखें, फिर निश्चय करें।

चलते चलते अतुल को बधाई, उन के शहर की ईगल्ज़ ७-० से आगे हैं। भई मैं तो हाफ टाइम का इन्तज़ार कर रहा हूँ, पर क्या फायदा इस बार जेनेट जैकसन तो है नहीं। सॉरी अतुल भाई, इस बार महा कटोरी (सुपर बोउल) कोई और ले गया।

ग़ज़ल का सिर पैर और …पूँछ

लगभग सभी हिन्दी भाषी जो कविता में रुचि रखते हैं, हिन्दी संगीत में रुचि रखते हैं, किसी न किसी रूप में ग़ज़ल में भी रुचि रखते हैं। जो लोग उर्दू-दाँ नहीं भी हैं और महदी हसन, ग़ुलाम अली की गाई कुछ पेचीदा ग़ज़लें नहीं भी समझ पाते, उनके लिए पंकज उधास अवतार सरीखे आए। उन्होंने सरल ग़ज़लों को सरल धुनों में गाया और ग़ज़ल भारत में जन-जन की चहेती हो गई। फिर अपने जगजीत सिंह तो हैं ही ग़ज़लों के बादशाह — कौन होगा जिसके म्यूज़िक कलेक्शन में जगजीत सिंह के सीडी-कसेट नहीं होंगे।

ग़ज़ल क्या है

चलिए बात करते हैं कि ग़ज़ल क्या है। ग़ज़ल शे’रों का एक समूह है जिसके शुरू में मतला होता है, आख़िर में मक़ता होता है, मक़ते में अक़्सर शायर का तख़ल्लुस होता है। पूरी ग़ज़ल में एक सा बहर होता है। क़ाफ़िया ज़रूर होता है, रदीफ़ हो या न हो। यानी ग़ज़ल हमरदीफ़ भी हो सकती है और ग़ैरमुदर्रफ़ भी।

एक मिनट! एक मिनट! कुछ ज़्यादा उर्दू हो गई, है न? चलिए इसको ज़रा आसान बनाते हैं एक मिसाल की मदद से। नासिर क़ाज़मी की इस सीधी-सादी ग़ज़ल को लीजिए (ग़ज़ल यहाँ सुन सकते हैं)।

दिल धड़कने का सब याद आया
वो तेरी याद थी अ याद आया

आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अज याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए त याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में ‘नासिर’
हम बहुत रोये वो ज याद आया

Rhyming sequence पर ध्यान दें — AA-BA-CA-DA….

शे’र – ग़ज़ल का हर शे’र अपने आप में दो पंक्तियों की पूरी कविता होती है। यानी हर शे’र को अलग से प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रायः ग़ज़ल में एक कहानी या कविता सा लगातार प्रवाह भी नहीं होता। यानी आप अश’आर (शे’रों) को ऊपर नीचे भी कर सकते हैं और उन की संख्या को घटा बढ़ा भी सकते हैं। हर शे’र की पहली पंक्ति को सुनाना, दोहराना, दूसरी लाइन का सस्पेन्स बिल्ड करना, फिर दूसरी लाइन पर वाहवाही लूटना एक अच्छे शायर का हुनर है, और कई चुटकुलों की पृष्ठभूमि भी।

मतला – ग़ज़ल के पहले शे’र को मतला कहते हैं। इसकी दोनों पंक्तियों का समान अन्त होता है (तुकबन्दी)। यही अन्त बाक़ी सभी शे’रों की दूसरी लाइन का होता है। ग़ज़ल के मतले से ही उस के बहर, रदीफ़ और क़ाफिए का पता चलता है।

बहर – हर पंक्ति की लंबाई एक सी होती है और इस लंबाई को बहर कहते हैं। ग़ज़ल ऊपर लिखी ग़ज़ल की तरह मध्यम बहर की हो सकती है, या फिर “अपनी धुन में रहता हूँ / मैं भी तेरे जैसा हूँ” की तरह छोटे बहर की, या “ऐ मेरे हमनशीं, चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं / बात होती गुलों की तो सह लेते हम अब तो काँटों पे भी हक़ हमारा नहीं” की तरह लम्बे बहर की।

रदीफ़ – हर शे’र के अन्त में आने वाले समान शब्द/शब्दों को रदीफ़ कहते हैं। ऊपर लिखी ग़ज़ल में रदीफ़ है “याद आया”। एक से रदीफ़ वाली ग़ज़लें हमरदीफ़ कहलाती हैं। कुछ ग़ज़लें बिना रदीफ़ की होती हैं, यानी ग़ैर-मुदर्रफ़, जैसे “दैरो हरम में बसने वालो / मैख़ानों में फूट न डालो।”।

क़ाफ़िया – रदीफ़ से पहले आने वाले मिलते जुलते शब्द को क़ाफ़िया कहते हैं। इस ग़ज़ल का क़ाफ़िया है अब, अजब, तब, आदि।

मक़ता – ग़ज़ल के आखिरी शे’र को मक़ता कहते हैं। इसमें अक़्सर शायर का तख़ल्लुस यानी उपनाम बताया जाता है। जैसे ऊपर की ग़ज़ल में “नासिर”, या अपने रवि भाई की ग़ज़लों में “रवि”। आजकल कई ग़ज़लें बिना मक़ते के भी लिखी जाती हैं।

ग़ज़ल और ग़ैर-ग़ज़ल की पहचान

ग़ज़ल  क्या है, यह समझने के साथ यह समझना भी ज़रूरी है कि ग़ज़ल क्या नहीं है। कई बार हम मशहूर ग़ज़ल गायकों की गाई हर नज़्म को ग़ज़ल समझते हैं। दरअसल जगजीत सिंह, महदी हसन, गुलाम अली का गाया हर गीत, नज़्म गाना, ग़ज़ल नहीं होता। यदि गीत में ऊपर दिया rhyming sequence (AA-BA-CA) और शे’रों का समूह न हो तो उसे ग़ज़ल नहीं कहा जा सकता। जैसे कि नीचे लिखे गए गीत ग़ज़लें नहीं है।

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों में तेरा ज़िक्र भी ले आएँगे

आज जाने की ज़िद ना करो
मेरे पहलू में बैठे रहो
तुम ही सोचो ज़रा क्यों न रोकें तुम्हें
जान जाती है जब उठके जाते हो तुम

चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
और कुछ और सितम सह ले तड़प लें रो लें

इसके विपरीत कई फिल्मी ग़ैर-फिल्मी गाने जिन्हें कुछ लोग शायद ग़ज़लें न समझते हों, वास्तव में ग़ज़लें हैं। जैसे…

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा

इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं
इन आँखों से वाबस्ता अफ़साने हज़ारों हैं

निगाहें मिलाने को जी चाहता है
दिलो-जाँ लुटाने को जी चाहता है


यह तो हुई ग़ज़ल के सिर-पैर की बात, पर इस पोस्ट के शीर्षक में पूँछ का क्या ज़िक्र है? बताते हैं। अपने करीयर की शुरुआत में हम और हमारे मित्रगण जिस कंपनी में थे, काम कम करते थे और ग़ज़लें ज़्यादा बाँचते थे। अब शायरी तो आती नहीं थी, सो ग़ज़लों की पूँछ बना दिया करते थे। यानी बहर, रदीफ़ और क़ाफ़िया तो था ही, उसको लेकर थोड़ी तुकबन्दी की और बेकार से एक दो और शे’र जोड़ दिए।

जैसे “अब”, “अजब”, “तब” के साथ “रब” पर कुछ सोचा जाए –

कुफ़्र छूटा यूँ सितम ढ़ाए तूने
इस क़दर गुज़री कि रब याद आया।

या फिर “कब” पर

ता हयात भूलता रहा तू मुझे
याद आया भी तो कब याद आया।


ग़ज़ल इतनी लोकप्रिय हो गई है कि अब हर भाषा में ग़ज़लें लिखी जाने लगी हैं। हिन्दी में तो पहले ही लिखी जाती थी, मराठी, गुजराती, नेपाली, यहाँ तक कि अँग्रेज़ी में भी ग़ज़ल लिखी जाती है।

चलते चलते एक बात और — ग़ज़ल मूल रूप से अरबी भाषा का शब्द है और अरबी में इसका अर्थ है स्त्रियों से बतियाना।

अनु-झोपड़पट्टी

साइबर स्क्वैटिंग को हिन्दी में क्या कहेंगे? अनु-झोपड़पट्टी? कुछ समय पहले तक साइबर स्क्वैटिंग बहुत ही आम बीमारी थी। लोग बड़ी-बड़ी कंपनियों के डोमेन-नेम रजिस्टर करा लेते थे और बाद में उनसे अच्छी ख़ासी रक़म वसूलते थे। अब कई कानून बन गए हैं जिनसे साइबर स्क्वैटिंग करने वालों के लिए मुश्किल हो गई है पर तब भी यह लोग कुछ न कुछ रास्ते निकाल ही लेते हैं। एक तरीक़ा है टाइपो-स्क्वैटिंग का, यानी आप ने URL ग़लत टाइप किया नहीं कि आप पहुँच गए किसी अश्लील साइट पर। कंपनियों के लिए परेशानी रहती है कि किस तरह अपने नाम के हर रूप के URL को रजिस्टर करा लें। क्या आप जानते हैं कि whitehouse.com एक अश्लील साइट है और whitehouse.org एक व्यंग्यात्मक साइट जिसका वाइट-हाउस से कोई लेना देना नहीं है? बेचारे वाइट-हाउस वालों को whitehouse.gov से गुज़ारा करना पड़ा।

इस बारे में एक दिलचस्प क़िस्सा है भारतीय मूल के कैनेडियन ग्राफिक आर्टिस्ट आनन्द रामनाथ मणि का जिन्होंने अपने नाम के आधार पर armani.com रजिस्टर करा लिया था। विश्व प्रसिद्ध स्विस फ़ैशन कंपनी अरमानी को जब पता चला तो उनकी सुलग गई। काफी समय तक कोर्ट कचहरी करने के बाद संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी World Intellectual Property Organization (WIPO) ने फैसला दे कर मणि जी को armani.com का सही हक़दार क़रार दिया। लेकिन अब लगता है कि ज्योर्जियो अरमानी कंपनी ने इस नाम को ख़रीद लिया है।

यह बात कैसे छिड़ी? जैसा मेरा ब्लाग पढ़ने वालों में से कुछ लोग जानते हैं, मेरा ब्लाग हुआ करता था idharudharki.blogspot.com पर। अपनी साइट पर वर्डप्रेस वाला ब्लाग ड़ालने के बाद मैंने blogspot से idharudharki हटा दिया था। कुछ दिन पहले मैंने ग़लती से पुराना URL टाइप किया तो यह पृष्ठ खुला। किसी महानुभाव ने मेरे डिलीट किए URL को ले कर, मेरे पहले पोस्ट के साथ एक डमी पोस्ट डाल दिया है और एक डमी ब्लाग बना लिया है। किस लाभ की उम्मीद में हैं यह साहब (या साहिबा) यह समझ में नहीं आया। बस यही कहूँगा कि यदि ब्लागस्पाट पर आप की पहचान बनी हुई है तो ब्लागस्पाट को छोड़ते वक़्त नाम को मत छोड़िए।