कई साल पहले (2004 में) जब यह चिट्ठा शुरू हुआ तो यही कोई 20 चिट्ठाकार थे हिन्दी चिट्ठा जगत में — पाठकों की संख्या भी एकाध सैंकड़े से अधिक नहीं रही होगी। इन्तज़ार रहता था कि कोई लिखे तो हम पढ़ें और टिप्पणी करें। आजकी स्थिति, जब हज़ारों की संख्या में हिन्दी चिट्ठाकार हैं और शायद लाखों में पाठक हैं, तब एक स्वप्न लगती थी। सितंबर 2005 में लिखा यह लेख उस स्वप्न को दर्शाता है। Read the rest of this entry »

मैं आजकल राजीव श्रीनिवासन के चिट्ठे का नियमित पाठक बन गया हूँ। राजीव एक 23 वर्षीय युवा चिट्ठाकार हैं – पर इस चिट्ठाकार के विषय में विशेष यह है कि यह जिस जगह से अपना ब्लॉग लिख रहे हैं, वह आजकल विश्व की सब से जोखिम भरी जगहों में से एक है। जी हाँ, राजीव अमरीकी थल सेना में लेफ्टिनेंट (या अमरीकी अंग्रेज़ी में – ल्यूटिनेंट) हैं, और आजकल पलटन कमांडर के रूप में कंदहार अफ्गानिस्तान में तैनात हैं। Read the rest of this entry »

admin on January 2, 2010

इस चिट्ठे को पढ़ने वाले सभी दोस्तों को नया साल मुबारक। इस दिन पर इस चिट्ठे पर बहुत दिनों बाद कुछ बड़बड़।

आज एक नई दहाई शुरु हुई है, जो उम्मीद है दुनिया के लिए कुछ खुश खबर ले कर आएगी। इस सदी की पहली दहाई में आतंक का ही बोलबाला रहा – 9-11, 26-11, 7-7, ईराक, अफगानिस्तान, ईरान, सूडान, और न जाने क्या क्या? पर घटनाएँ आम तौर पर अंकों की मोहताज नहीं होती। समयचक्र के लिए एक नई दहाई शुरू होने का कोई अर्थ नहीं है। विश्व घटनाक्रम के लिए 1 जनवरी 2010, ऐसा ही है जैसा कोई और दिन। इसलिए यह उम्मीद करना कि दहाई बदलने से घटनाक्रम बदल जाएगा, खुद को झूठी तसल्ली देना ही है। मैं अंकविद्या में विश्वास नहीं करता, इस कारण व्यक्तिगत जीवन मे सदी या दहाई बदलने से कुछ होगा, यह नहीं मानता। Read the rest of this entry »

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admin on August 15, 2009

बासठवें स्वतन्त्रता दिवस पर सभी भारतवासियों को शुभकामनाएँ।

इस अवसर पर एक बार फिर पढ़िए आज से चार वर्ष पहले लिखी यह पोस्ट जिस में मिले सुर मेरा तुम्हारा के हर भाषा के बोल संकलित किए गए थे। आज एक और छोटी सी सूचना, समय-लाइव के सौजन्य से Read the rest of this entry »

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श्रीनगर, कश्मीर के अंग्रेज़ी अखबार ग्रेटर कश्मीर का ई-पेपर संस्करण देख रहा था तो मुख्यपृष्ठ पर यह रोचक उर्दू विज्ञापन दिखा। विज्ञापन को पढ़िए, स्वयं समझ जाएँगे कि क्या रोचक है इस में। यदि उर्दू नहीं आती तो नीचे हिन्दी अनुवाद दिया हुआ है। Read the rest of this entry »

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यह गीत किस फिल्म का है? बोल कुछ इस प्रकार हैं

गली गली में रामा चर्चा हुआ है
शोर मचा है रामा शोर मचा है
गाँव में इक छोरी सोलह की हुई है
रूप से गोरी बड़ी बला की मुई है Read the rest of this entry »

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admin on July 19, 2009

यह समाचार रोचक है। आज सुबह एमएसएनबीसी पर देखा, तो सोचा आप के साथ शेयर करूँ। इसी बहाने कई दिन बाद कुछ लिखा जाएगा। तो हुआ यूँ कि केली हिल्डेब्राँड नाम की एक युवती फेसबुक पर थी। उसने सोचा, जैसा कि हम सब सोचते हैं, कि अपने नाम पर खोज की जाए। अब यह नाम तो इतना आम नहीं है, पर पता लगा कि फेसबुक पर उसी नाम का एक और प्रयोक्ता है, पर वह पुरुष है। उसे ऐसे ही एक संदेश भेजा, कि हम हमनाम हैं तो मैं ने सोचा नमस्ते कह दूँ। बात कुछ आगे बढ़ी, और कुछ समय बाद पुरुष केली सफर पर रवाना हुए और स्त्री कैली से मिल आए। बात फिर आगे बढ़ी और अब केली और केली शादी कर रहे हैं। जी हाँ, केला और केली नहीं, केली और केली। पूरी कहानी उन्हीं की ज़बानी सुनिए – Read the rest of this entry »

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James Von Brunnऐसा लगता है कि अमरीका में डेमोक्रेटिक पार्टी की लिबरल (उदारवादी) विचारधारा की सरकार बनने के बाद दक्षिणपन्थी कुछ अधिक ही सक्रिय हो गए हैं। पिछले सप्ताह एक गर्भपात कराने वाले डॉक्टर का कत्ल होने के बाद आज एक और नस्लवादी घटना हुई। वाशिंगटन डीसी के हॉलोकास्ट म्यूज़ियम, जिस में यहूदियों पर हुए अत्याचारों को दर्शाया जाता है, पर एक 88 साल के बूढ़े नव-नाज़ी ने कथित रूप से हमला किया। नियो-नाज़ी लोग हिटलर के प्रशंसक होते हैं और उसी की तरह यहूदियों और अश्वेतों से घृणा करते हैं।

यह व्यक्ति जिस का नाम जेम्स वॉन ब्रन था, 25 साल पहले भी नस्लवाद के आरोपों पर 6 वर्ष की सज़ा काट चुका था और अपनी वेबसाइट (holywesternempire.org जो कि कुछ देर पहले हटा ली गई है) पर कहता था कि उस की सज़ा के लिए काले और यहूदी जज/वकील/जूरी ज़िम्मेदार थे। ब्रन कहता था कि यहूदियों पर कोई ज़ुल्म नहीं हुआ, और ऍन फ्रैंक की डायरी मनघडन्त थी। ब्रन की वेबसाइट के विषय में यह वीडियो देखिए।

ब्रन को म्यूज़ियम के सुरक्षा कर्मचारियों ने रोका, पर फिर भी एक सुरक्षा कर्मचारी जो कि अश्वेत था, उस की गोली का शिकार हुआ और बाद में मारा गया।

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kaulcenter@twitter140 अक्षरों की संदेश पत्रिका, यानी ट्विट्टर पर आप कितने सक्रिय हैं, इस के तीन मुख्य मापदंड हैं – आप कितना लिख रहे हैं (अपडेट्स या लेख संख्या), आप कितने लोगों का लिखा पढ़ रहे हैं (फॉलोइंग या पठन संख्या) और आप को कितने लोग पढ़ रहे हैं (फॉलोवर्स या पाठक संख्या)। पहली दो संख्याएँ बढ़ाना तो आप के अपने हाथ में है, यानी आप बहुत लिखिए और बहुत लोगों को पढ़िए, पर वास्तव में सफलता की निशानी है पाठक संख्या, यानी आप को कितने लोग पढ़ रहे हैं। और यह संख्या बढ़ाना आसान नहीं है। Read the rest of this entry »

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वरुण गांधी प्रकरण टीवी पर तो छाया ही हुआ है, देसी इंटरनेट पर भी हाल में इस प्रकरण पर जितना कहा जा रहा है, उस के और उदाहरण कम हैं। चुनाव का समय है भई, यह तो होगा ही। पर आश्चर्य की बात यह है कि वरुण गांधी की वीडियो की सच्चाई पर कोई उंगली नहीं उठा रहा, सिवाय स्वयं वरुण गांधी के।

इंटरनेट पर जो लोग इस विषय पर चिट्ठे लिख रहे हैं, वीडियो डाल रहे हैं, चहचहा (ट्विट्टर पर) रहे हैं, और टिप्पणियाँ कर रहे हैं, उन को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है — वे जो उन के “वक्तव्यों” के कारण वरुण से नफ़रत करते हैं, और वे जो उन का समर्थन करते हैं। यदि आप भाजपा समर्थक हैं तो आप पहले वर्ग में हैं, अन्यथा दूसरे वर्ग में। इंटरनेट पर पहले वर्ग का ही बोलबाला लगता है। Read the rest of this entry »