मोहल्ले के कैन्सर से बचाव के लिए एक अपील

मोहल्ला हिन्दी चिट्ठा जगत में एक कैन्सर बन कर उभर रहा है — ऐसा कैन्सर जिस का कोई इलाज नहीं लग रहा। इस चिट्ठे का और इस से जुड़े कुछ और चिट्ठों का एक ही मकसद है – हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों को हिन्दू मुस्लिम झगड़े में उलझाना। हम लोग अच्छे खासे भाईचारे में चल रहे थे, इन चिट्ठों ने तूफान मचा दिया। आम तौर पर चिट्ठे मुक्त लेखन में विश्वास करते हैं – कभी कुछ लिख दिया कभी कुछ, और स्वाभाविक है इस में कभी कभार धर्म-समाज आदि की भी बात आ जाती है। पर कुछ चिट्ठे किसी एक थीम पर ही आधारित होते हैं – कुछ खेल पर, कुछ तकनीकी विषयों पर, कुछ मनोरंजन पर। और इन्होंने एक समाज विशेष को लताड़ना अपनी थीम बना रखा है, इसी का ठेका ले रखा है। यह लोग कोई समस्या हल नहीं करना चाहते, चाहते तो एक तार्किक बहस में यकीन रखते। पर यहाँ तो अहं की अति है, और दूसरों पर लांछन लगाने की अति है। एक ही कूची से सभी को रंगने की मानसिकता है। जो प्रश्न उन्हीं के विषय के सन्दर्भ में पूछे जाते हैं, उन्हें सन्दर्भहीन कहा जाता है। और खुद बेबुनियाद इलज़ाम लगाते जाते हैं दूसरों पर। जो लोग दावे के साथ यह कहें कि अमरीकी सरकार ने स्वयं वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, पैंटागन पर हमला कर के हज़ारों लोगों को मारा, और गुजरात सरकार नें स्वयं गोधरा में कार सेवकों को जलाया, उन लोगों को किसी तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, न आप उन से तर्क या प्रमाण की बात कर सकते हैं। वे सिर्फ एक समुदाय को ही दूध का धुला समझते हैं और उस के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

उन के चिट्ठे पर कई बार टिप्पणी करने पर कोई हल नहीं मिला। कीचड़ में पत्थर फेंकते हैं तो खुद को छींटें आती हैं। और उन का मक़सद पूरा हो जाता है गन्द फैलाने का। अपने चिट्ठे पर मैं उन के प्रश्नों का उत्तर दे देता, पर मैं अपने चिट्ठे पर यह कीचड़ नहीं लाना चाहता। इसलिए मैं ने निश्चय किया है कि मैं इन लोगों से बहस में अपना समय नष्ट नहीं करुँगा। मैं ने अपने फीड रीडर से इन की फीड हटा दी है। नारद की फीड में इन की नफरत दिखती रहेगी, पर कोशिश करूँगा कि उस में से सही पोस्टें ही चुन कर पढ़ूँ। मैं उन सब चिट्ठाकारों और पाठकों से अपील करता हूँ कि यदि आप मोहल्ले की विभाजक विचारधारा से सहमत नहीं हैं, तो उन को अपने उद्देश्य में सफल न होने दें। उन के ब्लॉग पर टिप्पणी करना बन्द कर दें। अपने चिट्ठों पर भी इस विभाजक विषय पर लिखना बन्द कर दें। यदि वे आपस में ही बहस करते रहना चाहते हैं तो करें। यदि उन को इसी में अपनी जीत लगती है तो लगे। हमें इस रोज़ रोज़ के झगड़े में दिलचस्पी नहीं है। हम ने काफी कोशिश की कि इन का विलाप बन्द हो, पर यदि इन के पास और कोई विषय नहीं है तो क्या करें। बाकी लोगों के पास और भी काम हैं, और भी ग़म हैं।

क्या क्रिकेट में हार भारत के लिए फ़ायदेमंद है?

Its never just a game when you’re winning.
George Carlin

अब चूँकि हम हार गए हैं, तो हम कह सकते हैं कि इट्स जस्ट ऍ गेम।

बीबीसी पर मुकुल केशवन पूछते हैं, क्या भारत की हार क्रिकेट के लिए फ़ायदेमंद है? मुकुल का तर्क बिल्कुल सही है। वे भारत और पाकिस्तान के घर लौट आने पर कहते हैं

क्रिकेट जगत के इन दोनों दिग्गज़ (sic) काग़जी शेर (sic) के बाहर होने से अब क्रिकेट प्रेमियों का ध्यान असली क्रिकेटरों और क्रिकेट खेल पर जा सकेगा.

पर मेरा प्रश्न दूसरा है, क्या (भारत की) क्रिकेट में हार भारत के लिए फ़ायदेमंद है? यदि भारत की क्रिकेट-क्रेज़ी जनता, मीडिया और सब से ज़रूरी, खेल प्रबन्धक जागें तो। जैसा मैं ने बहुत पहले एक पोस्ट में लिखा था, क्रिकेट हमारे बाकी खेलों पर और विश्व स्तर पर हमारी खेल-क्षमता पर परछाई बन कर खड़ा हुआ है। यह एक विडंबना ही है, कि जिस खेल का हमारे उपमहाद्वीप में सब से ज़्यादा बोलबाला है, वह अंग्रेज़ों की गुलामी की याद दिलाता है। क्या कारण है कि नीदरलैंड्स को छोड़ कर एक भी ऐसा देश क्रिकेट नहीं खेलता जो अंग्रेज़ों का गुलाम न रहा हो। जो देश क्रिकेट खेलते भी हैं, उन में (भारतीय उपमहाद्वीप के देशों को छोड़ कर) एक भी ऐसा नहीं है जिस में क्रिकेट मुख्य खेल हो। कैनाडा में यदि आम आदमी से क्रिकेट के बारे में पूछा जाए तो शायद ही उसे इस खेल के बारे में कुछ मालूम हो या यह पता हो कि कैनाडा की कोई क्रिकेट टीम है, जो विश्व कप क्रिकेट में भाग ले रही है। इस से मिलता जुलता हाल ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में होगा। भारत के लिए बहुत ज़रूरी है कि ऐसे खेलों की तरफ ध्यान दे, जो उन की ओलंपिक मैडल तालिका को शून्य से ऊपर सरका सके।

खैर फिलहाल मीडिया से ले कर दर्शकों, कंपनियों, और ब्लॉगरों तक लोगों को लग रहा है कि उन के साथ धोखा हुआ है। इस वर्ष के इंडीब्लॉग्स विजेता ग्रेटबौंग ने पहले ही दिन अपने दो सौ डॉलर को अलविदा कह दिया था जो उन्होंने क्रिकेट वर्ल्ड कप को टीवी पर देखने के लिए खर्च कर दिए थे – जब भारत बांग्लादेश के हाथों मार खा गया था। अब उन को दो सौ डॉलर यानी लगभग नौ हज़ार रुपए में भारत के केवल तीन मैच देखने को मिलने थे, जिन में से एक वह हार चुका था। आखिरी मैच के समय उन को विश्वास हो गया कि सौ करोड़ “नीलस्वप्नदर्शियों” के वेट-ड्रीम का शीघ्रपतन हो गया है।

चलिए इस बात पर गर्व किया जाए कि बर्म्यूडा को भारत ने धूल चटाई। पर उस से पहले बर्म्यूडा पर एक नज़र डाली जाए, ताकि इस “ऐतिहासिक” विजय को सही परिपेक्ष्य में देखा जाए

– बर्म्यूडा की आबादी 67,000 है, यानी झुमरी तलैया से कम
– बर्म्यूडा का क्षेत्रफल 53.3 वर्ग कि.मी. है – यूँ समझिए कि कनॉट प्लेस को केन्द्र मान कर 4 किलोमीटर त्रिज्या का वृत खींच दीजिए। इंडिया गेट से दरयागंज तक का जो इलाका बनेगा, उसे 138 टुकड़ों में बांट दीजिए। यह बर्म्यूडा है, जिस में 138 द्वीप हैं।

ऐसे देश की क्रिकेट टीम है, यह विश्व क्रिकेट की मजबूरी को दर्शाता है, और इस देश की टीम ने भारत के पाँच खिलाड़ी आउट कर दिए, यह भारतीय टीम की मजबूर हालत को।

अन्त में भारतीय क्रिकेट टीम की शान में विशेष रूप से रिकार्ड किया गया यह गीत देखिए और सुनिए (सूचना सौजन्य RMIM)

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एक डॉलर का डोमेन

Godaddy 99 cent domain sale जी हाँ, गोडैडी 99 सेंट का डोमेन बेच रहा है, पर केवल डॉट-इन्फो (.info)। मैं ने एक डोमेन खरीदा जो टैक्स आदि मिला कर 1.24 का पड़ा – यानी 55 रुपए के करीब। है न अच्छा सौदा? डोमेन बुक कीजिए और उसे ब्लॉगर पर मुफ्त होस्ट कीजिए।
बस समस्या यह है कि एक साल बाद जब रिन्यू करने का मौका आएगा तो शायद सामान्य रेट देना पडेगा, जो कि आज की तारीख में USD8.95 है।

यूनिनागरी में अब शुषा, कृतिदेव लेआउट, और उर्दू भी

आप साइबर कैफे में, लाइब्रेरी में, दफ्तर में या किसी ऐसे कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं जहाँ आप को कुछ भी इन्स्टाल करने की आज़ादी नहीं है, और आप हिन्दी लिखना चाहते हैं। ऐसे में यूनिनागरी और हग जैसे ऑनलाइन टाइपराइटर बहुत काम आते हैं। मेरी साइट पर यूनिनागरी पिछले दो वर्षों से अधिक से चल रहा है, और कई लोग इसे नियमित प्रयोग कर रहे हैं। अनुभवी लेखकों के काम आने के इलावा इस तरह के टूल उन के भी काम आते हैं जो हिन्दी में लिखना शुरू कर रहे हैं, और अभी कुछ डाउनलोड-इन्स्टाल करने की स्थिति में नहीं हैं।

यूनिनागरी का अपना डिफॉल्ट कुंजीपटल फोनेटिक है, पर फोनेटिक नहीं भी। मतलब यह कि यह ट्रान्सलिट्रेशन नहीं करता, एक कुंजी से एक अक्षर टाइप होता है, जो जहाँ तक हो सके फोनेटिक होने के नज़दीक है (ट्रान्स्लिट्रेशन के लिए हग टूल बहुत बढ़िया काम करता है)। डिफॉल्ट कुंजीपटल के अतिरिक्त मैं ने यूनिनागरी में कुछ समंय पहले इन्स्क्रिप्ट कुंजीपटल जोड़ा था, जो कई लोगों के काम आ रहा है। रवि भाई का इसरार था कि इस में उन लोगों के लिए भी कीबोर्ड लेआउट बनाए जाएँ जो रेमिंगटन/कृतिदेव पर या शुषा पर लिखने के आदी हैं। इस से उन लोगों को भी यूनिकोड में कन्वर्ट करने में आसानी होगी, जो टाइपिंग की आदत नहीं बदलना चाहते और उस कारण कृतिदेव या शुषा प्रयोग कर रहे हैं, या यूनिकोड पर तो आ गए हैं, पर टाइपिंग में दिक्कत महसूस कर रहे हैं।

तो लीजिए हाज़िर है यूनिनागरी का नया रूप – जिस में कृतिदेव/रेमिंगटन और शुषा से मिलते जुलते कीबोर्ड जोड़ दिए गए हैं। जब इन्स्क्रिप्ट जोड़ा था तो साथ में गुरुमुखी लिपि का टाइपराइटर भी जोड़ा था। अब की बार बोनस है उर्दू का टाइपराइटर। इंटरनेट पर ऑनलाइन उर्दू एडिटर की कमी बहुत खल रही थी। उम्मीद है, भारत से और उर्दू चिट्ठाकार उभर कर आएँगे – अभी तक दो तीन ही हैं – जिन में से एक अपने शुएब भाई हैं। नए प्रयोक्ताओं के लिए एक आम प्रश्नोत्तरी भी जोड़ दी है। आगे का इरादा और भारतीय भाषाओं की टाइपिंग जोड़ने का है, ताकि यूनिनागरी एक इंडिक ऑनलाइन टाइपराइटर बन सके।

यदि आप स्वयं के कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो आम तौर पर ऑनलाइन टाइपराइटर की दरकार नहीं होती। मेरा मानना है कि मानकीकरण के लिए हम सब को इन्स्क्रिप्ट टाइपराइटर की आदत डाल लेनी चाहिए। इन्स्क्रिप्ट टाइपराइटर माइक्रोसॉफ्ट के इंडिक

Keyboard options on Indic IME 1 ver. 5

आइ.एम.ई. में उपलब्ध है ही। इंडिक आइ.एम.ई. 1 वर्जन 5 में और कई और कुंजीपटलों का चुनाव संभव है – रेमिंगटन है, पर शुषा नहीं। आप यह भी जानते होंगे (नहीं जानते हैं तो जान लीजिए) कि माइक्रोसॉफ्ट के कीबोर्ड लेआउट क्रिएटर टूल के द्वारा आप अपनी मर्ज़ी का कीबोर्ड लेआउट बना सकते हैं। इसे डाउनलोड कीजिए और जो लेआउट आप को पसन्द हो वह बनाइए।

बर्गन का वह पागलखाना

Asylum at Bergenसफर शुरू हुए दो घंटे हो चुके थे। मैं ने किताब से नज़र हटा कर खिड़की से बाहर देखा। शाम होने को थी, बादल थे, पर अभी उजाला था — मुझे मालूम था आधी रात टलने तक ऐसा ही रहना है। बाहर देहात तीव्र गति से गुज़र रहा था — चीड़ और शंकुवृक्ष नीची पहाड़ियों को घेरे थे, नॉर्वे की ग्रीष्म ऋतु की ठंडी धूप से नहाए हुए से। जैसे जैसे रेलगाड़ी ऊँचाई को जाने लगी, पहाड़ी दीवारों से चिपके बर्फ के पैबन्द भी दिखने लगे – गहरे हरे रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद चमकते हुए। मैं कुछ मिनट ऐसे ही देखता रहा, फिर वह कर्कष सौन्दर्य अखरने लगा; मैं ने जैकेट को ज़ोर से लपेटा और दोबारा किताब पढ़ने लगा।

‘माफ कीजिए आप वह ब्रेन सर्जन हैं क्या?’

मेरे सामने वाली सीट पर बैठा आदमी अधेड़, गंजा और थोड़ा सा मोटा था। मैं ने मुस्करा कर जवाब दिया –

‘हाँ’

‘मैंने आप के बारे में सुना है – अखबार पर ट्रान्सप्लांट के बारे में जो खबर थी उस में। ओ, आप भारत से हैं, हैं न?’

मेरी मुस्कान चौड़ी हुई। मुझे इस बात की आदत हो गई थी कि मेरे काम से ज़्यादा रुचि मेरी नस्ल में जताई जाती हो, कई बार तो मेरे सहकर्मियों द्वारा भी। मैं ने हाँ में सिर हिलाया और फिर किताब की ओर लौट कर अपना पन्ना खोजने लगा।

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यह शुरुआत है उस साइ-फाइ कहानी की जिस के लिए आदित्य सुदर्शन को साइंटिफिक इंडियन द्वारा आयोजित विज्ञान फंतासी कथा लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था। मैं ने इस कहानी का निरन्तर के नवीनतम अंक के लिए हिन्दी अनुवाद किया है। यदि आप ने पहले से नहीं पढ़ी तो, निरन्तर की साइट पर इसे अवश्य पढ़ें; बहुत ही रोमांचकारी कहानी लिखी है आदित्य ने। मूल अंग्रेज़ी कहानी यहाँ पर है।