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	<title>इधर उधर की</title>
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	<description>इधर की ईंट उधर का रोड़ा</description>
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		<title>गूगल की उर्दू &#8211; कराची मतलब भारत</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Jun 2010 02:44:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[उर्दू]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>
		<category><![CDATA[google]]></category>
		<category><![CDATA[translation]]></category>
		<category><![CDATA[urdu]]></category>

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		<description><![CDATA[गूगल ने उर्दू के शौकीनों के लिए बहुत ही नायाब टूल उपलब्ध करा दिया है। पिछली 13 मई से गूगल अनुवादक में उर्दू जोड़ दी गई है, यानी आप अब उर्दू से, या उर्दू में, दर्जनों भाषाओं का अनुवाद कर सकते हैं। गूगल ट्रान्सलेट पर जाइए, &#8220;Translate from&#8221; में &#8220;Urdu ALPHA&#8221; चुनिए, &#8220;Translate to&#8221; में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>गूगल ने उर्दू के शौकीनों के लिए बहुत ही नायाब टूल उपलब्ध करा दिया है। पिछली 13 मई से गूगल अनुवादक में <a href="http://googleblog.blogspot.com/2010/05/five-more-languages-on.html" target="_new">उर्दू जोड़ दी गई है</a>, यानी आप अब उर्दू से, या उर्दू में, दर्जनों भाषाओं का अनुवाद कर सकते हैं। गूगल ट्रान्सलेट पर जाइए, &#8220;Translate from&#8221; में &#8220;Urdu ALPHA&#8221; चुनिए, &#8220;Translate to&#8221; में हिन्दी, अंग्रेज़ी या दर्जनों अन्य भाषाओं में से कोई भी चुन लीजिए और ट्रान्सलेट का बटन दबाइए। अनुवादक अभी एल्फा, या यूँ कहें अलिफ़ अवस्था में है, इस कारण कुछ बचपना, कुछ शरारतें तो करेगा ही, पर कुल मिला कर काम की चीज़ है। </p>
<p>बढ़िया बात यह है कि  इस टूल का प्रयोग न केवल अनुवाद करने में किया जा सकता है, बल्कि उर्दू लिखनें में भी किया जा सकता है, और कुछ शब्दों का हिन्दी से लिप्यन्तरण करने में भी प्रयोग किया जा सकता है। यानी यदि आप को उर्दू लिखनी पढ़नी नहीं आती, तो भी आप रोमन अक्षरों का प्रयोग कर उर्दू टाइप कर सकते हैं। ध्यान रखें कि Type Phonetically वाला चैकबॉक्स सक्रिय हो, अब उर्दू वाले बक्से में bhaarat लिखें और आप को بھارت लिखा मिल जाएगा। </p>
<p>कुछ वर्ष पहले मैं ने <a href="http://kaulonline.com/chittha/2007/07/urdu-devanagari-comparison/">एक पोस्ट लिखी थी</a> जिस में मैं ने बताया था कि जैसे अन्य भारतीय भाषाओं में एक लिपि से दूसरी में लिप्यन्तरण संभव है, वह उर्दू के साथ क्यों संभव नहीं है। लिपि की भिन्नता की यह समस्या किसी हद तक गूगल ने इस टूल के द्वारा हल कर दी है, हालाँकि कमियाँ अभी मौजूद हैं। </p>
<p>अनुवाद की कुछ कमियाँ तो बड़ी रोचक हैं, और इनकी ओर ध्यान दिलाने के लिए <a href="http://shuaib.in/" target="_new">शुएब</a> और <a href="http://indopersica.blogspot.com/" target="_new">अरविन्द</a> का धन्यवाद &#8212; उन से बज़ पर कुछ बातचीत हुई थी इस बारे में। मुलाहिज़ा फरमाइए गूगल-उर्दू-अनुवादक के कुछ नमूने</p>
<table border="1">
<tr>
<td><u>उर्दू में लिखिए</u></td>
<td><u>हिन्दी अनुवाद</u></td>
</tr>
<tr>
<td>کراچی (कराची)</td>
<td>भारत</td>
</tr>
<tr>
<td>افغانستان (अफ़ग़ानिस्तान)</td>
<td>भारत</td>
</tr>
<tr>
<td>انڈیا (इंडिया)</td>
<td>भारत और पड़ौस</td>
</tr>
<tr>
<td>پاکستان (पाकिस्तान)</td>
<td>भारत</td>
</tr>
</table>
<p>यानी गूगल वालों को इस क्षेत्र में भारत के सिवाय कुछ नहीं दिखता। यह विशेष अनुवाद उर्दू से हिन्दी में ही उपलब्ध है, उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद ठीक हो रहा है। यह आश्चर्च की बात है कि जब कि उर्दू से हिन्दी में अनुवाद सब से आसान होना चाहिए था, इसी में दिक्कतें आ रही हैं। अरे गूगल भाई, कुछ नहीं आता तो शब्द को जस का तस लिख दो। हिन्दी से उर्दू के अनुवाद में भारत का अनुवाद भारत ही है, पर भारत और पड़ौस लिखेंगे तो उसका अनुवाद है انڈیا (इंडिया)। </p>
<p>ऊपर दिए शब्दों के इस स्क्रीनशॉट में देखिए<br />
<img width="580" src="http://kaulonline.com/images/urdu-alpha.jpg" alt="Google Translator Urdu Alpha " /></p>
<p>वैसे कुछ उर्दू पृष्ठ जो आप अभी तक नहीं समझ पाते थे, अब समझ पाएँगे। पृष्ठ का यूआरएल, या मसौदा, गूगल के अनुवादक में डालिए और अनुवाद पाइए। समझ पाने लायक तो अनुवाद हो ही जाएगा। उदाहरण के लिए शुएब के <a href="http://www.shuaib.in/blog/2010/05/14/495/" target="_new">इस ब्लॉग-पोस्ट</a> का अनुवाद</p>
<p><img width="580" src="http://kaulonline.com/images/urdu-sh.jpg"></p>
<p>कुछ प्रश्न हों, कुछ संशय हों, कृपया टिप्पणी खाने में पूछें। यदि आपको भी कुछ अजीबोग़रीब तरजमे मिले हों तो अवश्य बताएँ।</p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>पाकिस्तान से जुड़ी एक और कड़ी आतंक की</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2010/05/pakistan-se-judi-ek-aur-kadi/</link>
		<comments>http://kaulonline.com/chittha/2010/05/pakistan-se-judi-ek-aur-kadi/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 05 May 2010 03:20:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[पाकिस्तान]]></category>
		<category><![CDATA[faisal shahzad]]></category>
		<category><![CDATA[pakistan]]></category>
		<category><![CDATA[terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[विश्व भर में आजकल आतंकवाद की जितनी घटनाओं का पर्दाफाश होता है, वह चाहे भारत में हो, योरप या अमरीका में &#8212; उन में से अधिकांश की जड़ें किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जा मिलती हैं। न्यूयॉर्क में कल पाकिस्तानी मूल के अमरीकी नागरिक फैसल शाहज़ाद का पकड़ा जाना इसी सिलसिले की नवीनतम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>विश्व भर में आजकल आतंकवाद की जितनी घटनाओं का पर्दाफाश होता है, वह चाहे भारत में हो, योरप या अमरीका में &#8212; उन में से अधिकांश की जड़ें किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जा मिलती हैं। न्यूयॉर्क में कल पाकिस्तानी मूल के अमरीकी नागरिक फैसल शाहज़ाद का पकड़ा जाना इसी सिलसिले की नवीनतम कड़ी है।</p>
<p>मीडिया में जो रिपोर्टें आईं हैं, उन के हिसाब से फैसल शाहज़ाद के पकड़े जाने का घटनाक्रम किसी जासूसी उपन्यास से कम नहीं लगता। तीन दिन पहले, यानी 1 मई को न्यू यॉर्क के टाइम्स स्क्वायर में एक निसान पाथफाइंडर कार खड़ी पाई गई, जिस का इंजन चालू था और गाड़ी में से धुँवा निकल रहा था। आसपास के लोगों की सतर्कता और पुलिस-एफ.बी.आइ. आदि की मेहनत से दो दिन बाद इस गाड़ी के मालिक फैसल शहज़ाद को तब पकड़ा गया जब वह पाकिस्तान की ओर अपनी यात्रा आरंभ कर चुका था। आज़ादी की ओर अपने सफर के पहले हिस्से में वह न्यू यॉर्क के जे.एफ.के. हवाई अड्डे पर दुबई के जहाज़ में बैठा था। जहाज़ चलने वाला था, जब उसे रोका गया और फैसल को गिरफ्तार किया गया। भारत को इस से सीख लेनी चाहिए। </p>
<p><object hspace="5" align="right" width="416" height="374" classid="clsid:D27CDB6E-AE6D-11cf-96B8-444553540000" id="ep"><param name="allowfullscreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="wmode" value="transparent" /><param name="movie" value="http://i.cdn.turner.com/cnn/.element/apps/cvp/3.0/swf/cnn_416x234_embed.swf?context=embed&#038;videoId=us/2010/05/04/am.meserve.time.square.terror.cnn" /><param name="bgcolor" value="#000000" /><embed src="http://i.cdn.turner.com/cnn/.element/apps/cvp/3.0/swf/cnn_416x234_embed.swf?context=embed&#038;videoId=us/2010/05/04/am.meserve.time.square.terror.cnn" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000000" allowfullscreen="true" allowscriptaccess="always" width="416" wmode="transparent" height="374"></embed></object>फैसल भाई ने पिछले वर्ष ही अमरीकी नागरिकता की शपथ ली थी। उससे पहले अमरीका में ही बी.एस. और एम.बी.ए. किया था &#8212; यानी पढ़ा लिखा था। उस ने अपनी ओर से काफी सतर्कता से काम लिया था। सस्ती सेकंड हैंड गाड़ी दो हफ्ते पहले खरीदी थी। जिससे खरीदी थी, उससे इंटरनेट द्वारा संपर्क किया था, किसी मॉल के पार्किंग लॉट में मुलाकात की थी, और नकदी दे कर गाड़ी ली थी। गाड़ी का उस के नाम से संबन्ध न जुड़े, इस लिए उसे अपने नाम रजिस्टर नहीं कराया था। उस पर किसी और गाड़ी के नंबर प्लेट लगा लिए थे। गाड़ी के सामने के शीशे के अन्दर गाड़ी का VIN (Vehicle Identification Number) खुदा रहता है, जिसके साथ छेड़छाड़ करना गैरकानूनी होता है। गाड़ी का मालिक कोई बने, नंबर कोई लगे, पर VIN से गाड़ी की मूल पहचान बनी रहती है। इस गाड़ी में VIN को मिटा दिया गया था।</p>
<p>फैसल को शायद यह मालूम नहीं था (मुझे भी आज ही मालूम हुआ), कि गाड़ी के निचले हिस्से में भी इंजन पर VIN खुदा रहता है। पुलिस ने उस से गाड़ी के पिछले मालिक का पता खोजा। उस ने फैसल के साथ गाड़ी के विषय में जो ईमेल किये थे, उससे फैसल के विषय में कुछ पता चला। अन्त में फैसल के नागरिकता संबन्धी कागज़ों से उस का चित्र लेकर गाड़ी के मालिक को दिखाया गया, जिससे उसने फैसल की पहचान की। फैसल को फटाफट नो-फ्लाई लिस्ट पर डाला गया, पर जब तक वह जहाज़ में बैठा तब तक एयरलाइन के कंप्यूटर में नई लिस्ट आई नहीं थी। पर इस से पहले कि जहाज़ उड़ता, यात्रियों की सूची अधिकारियों के पास पहुँची और जहाज़ को उड़ने से रोका गया। इस पूरे मरहले में अधिकारियों की सतर्कता का तो हाथ था ही, किस्मत ने भी अधिकारियों का खासा साथ दिया लगता है। वरना एक बार शहज़ाद साहब कराची पहुँच जाते तो अल्लाह हाफिज़।</p>
<p><a href="http://www.cnn.com/2010/CRIME/05/04/new.york.car.bomb/index.html" target="_new"><img src="http://img62.imageshack.us/img62/3185/storysuspecttimessquare.jpg" align="right"></a>प्रश्न यह उठता है कि पाकिस्तान में ऐसा क्या है कि पूरे विश्व को आतंकवाद निर्यातित करने की उन्होंने फैक्ट्री लगा रखी है? माना कि उन्हें अमरीकी नीतियों से इख्तिलाफ है, पर इस तरह मासूमों की भीड़ पर हमला करना, यह क्या किसी किताब में लिखा है? शायद वे सोचते हैं कि जो भी मरेंगे, उन में से अधिकतर काफिर होंगे और वे इस तरह खुदा का ही काम कर रहे हैं। हैरानी इस बात की है कि कई बार ये लोग पढ़े लिखे नौजवान होते हैं। कितनी नफरत चाहिए इतनी शिक्षा को शून्य करने के लिए। (ऊपर दिया गया चित्र सी.एन.एन. डॉट कॉम से लिया गया है और लगता है फैसल के औरकुट खाते से है।)</p>
<p>इस घटना का सीधा परिणाम यह होगा कि पाकिस्तानियों को अमरीका का वीज़ा मिलने में और दिक्कतें आएँगी। एयरपोर्टों पर अधिक छानबीन का सामना करना पड़ेगा। इंटरनेट पर पाकिस्तानी लोग इन बातों का रोना रो रहे हैं। पर यह कोई नहीं कहता कि इसका ज़िम्मेदार कौन है &#8212; सभी लोग एयरपोर्ट वालों पर, अमरीकियों पर, नस्लभेद का इलज़ाम लगाते हैं, पर यह कोई नहीं कहता कि इस का मूल कारण इस तरह के आतंकी हैं। जितना ऐसा आतंकी पढ़ा लिखा हो, भोली सूरत वाला हो, उतना ही नस्ल आधारित खोजबीन का शिकंजा बड़ा होता जाता है। मेरा पड़ौसी यदि यह मेरे बारे में सोचे कि पड़ौस के इस दक्षिण ऐशियाई बन्दे से सावधान रहना चाहिए तो मैं उसे दोष नही देता। दोष देता हूँ हम जैसे दिखने वाले ऐसे पाकिस्तानियों को जिन्होंने पाकी को एक नापाक शब्द बना दिया है।</p>
<p>ऐसे मौकों पर मुझे फिर सुदर्शन की लिखी कहानी <a href="http://kaulonline.com/chittha/2006/05/haar-ki-jeet/">हार की जीत</a> याद आती है। यदि आजकल का बाबा भारती दीन-दुखी-अन्धे को देख कर मुख मोड़ता है या उन पर विश्वास नहीं करता तो इस में गलती बाबा भारती की है या खड़ग सिंह की?</p>
]]></content:encoded>
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		<title>पाकिस्तान फैशन वीक है जी</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2010/04/pakistan-fashion-wek/</link>
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		<pubDate>Fri, 09 Apr 2010 13:17:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[मनोरंजन]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[Fashion]]></category>
		<category><![CDATA[Paskistan]]></category>

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		<description><![CDATA[आज हफिंगटन पोस्ट में पिछले नवंबर में हुए पाकिस्तान फैशन वीक से यह तस्वीर छपी है। पोस्ट नें लेख का शीर्षक दिया है &#8220;वाट द&#8230;.?&#8221;। सच है, तस्वीर अपनी कहानी खुद कहती है, शब्दों की अधिक आवश्यकता नहीं है। मेरा बस यह कहना है&#8230; यह फैशन वीक है, या फैशन वीक है?

]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज <a href="http://www.huffingtonpost.com/">हफिंगटन पोस्ट</a> में पिछले नवंबर में हुए पाकिस्तान फैशन वीक से यह तस्वीर छपी है। पोस्ट नें लेख का शीर्षक दिया है &#8220;वाट द&#8230;.?&#8221;। सच है, तस्वीर अपनी कहानी खुद कहती है, शब्दों की अधिक आवश्यकता नहीं है। मेरा बस यह कहना है&#8230; यह फैशन वीक है, या फैशन वीक है?<span id="more-538"></span></p>
<p><a href="http://www.huffingtonpost.com/2010/04/09/pakistan-fashion-week-wha_n_531442.html" target="_new"><img src="http://images.huffingtonpost.com/2010-04-09-PAKISTANFASHIONWEEK.jpg" alt="" /></a></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>छाता लेकर निकले हम</title>
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		<pubDate>Sun, 04 Apr 2010 01:24:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[फरवरी में भारत यात्रा के दौरान कार्यक्रम बना श्रीलंका घूमने का। श्रीलंका भ्रमण का अनुभव बहुत ही बढ़िया रहा। विस्तार से जल्दी लिखूँगा, फिल्हाल यह लघु-चित्र-प्रविष्टि। वहाँ, छाते का एक अनूठा प्रयोग देखने को मिला। अक्सर प्रेमी युगल छाता साथ लेकर चलते हैं &#8212; अकस्मात वर्षा हो जाए, उसमें तो काम आ ही जाएगा, पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>फरवरी में भारत यात्रा के दौरान कार्यक्रम बना श्रीलंका घूमने का। श्रीलंका भ्रमण का अनुभव बहुत ही बढ़िया रहा। विस्तार से जल्दी लिखूँगा, फिल्हाल यह लघु-चित्र-प्रविष्टि। वहाँ, छाते का एक अनूठा प्रयोग देखने को मिला। अक्सर प्रेमी युगल छाता साथ लेकर चलते हैं &#8212; अकस्मात वर्षा हो जाए, उसमें तो काम आ ही जाएगा, पर न भी हो तो आप कहीं भी अपना निजी प्रणय-कक्ष बना सकते हैं। <a target="_new" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Galle_International_Stadium">गाल अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम</a> के पास खींचे गए यह दो चित्र देखिए।<span id="more-527"></span></p>
<p><img src="http://lh3.ggpht.com/_L2kIv3KX6CU/S5vfHgAlP-I/AAAAAAAABUc/utt-C8TEjuU/s800/DSCF3947.JPG" alt="Umbrella couple" /><br />
एक युगल</p>
<p><img src="http://lh6.ggpht.com/_L2kIv3KX6CU/S5vfJULFvOI/AAAAAAAABUk/-BlTjxjywkc/s800/DSCF3949.JPG" alt="Umbrella Couple" /><br />
दो युगल</p>
<p><img src="http://lh6.ggpht.com/_L2kIv3KX6CU/S5vfIp_scuI/AAAAAAAABUg/ayPIQYgq35k/s800/DSCF3948.JPG" alt="Cricket Stadium at Galle" /><br />
ऊपर के चित्र में जो दीवार है, वहाँ से गाल स्टेडियम का यह दृष्य। यह स्टेडियम 2004 की त्सुनामी में बिल्कुल नष्ट हो गया था। </p>
]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>गूगल ने नाम बदला, टोपीका रखा</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2010/04/google-ka-naam-topeka/</link>
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		<pubDate>Fri, 02 Apr 2010 02:09:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[april fool]]></category>
		<category><![CDATA[google]]></category>
		<category><![CDATA[topeka]]></category>

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		<description><![CDATA[आज सुबह सुबह गूगल खोला तो देखा गूगल के स्थान पर नाम है &#8220;टोपीका&#8221;। उसके नीचे लिंक था &#8220;हमारे नए नाम के बारे में जानें&#8220;। गूगल ब्लॉग पर बताया गया है कि गूगल ने अपना नाम क्यों बदला। 

इस ब्लॉग पर गूगल के अध्यक्ष एरिक श्मिट बताते हैं कि ऐसा उन्होंने अमरीका के कैन्सस राज्य [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज सुबह सुबह गूगल खोला तो देखा गूगल के स्थान पर नाम है &#8220;टोपीका&#8221;। उसके नीचे लिंक था &#8220;<a target="_new" href="http://googleblog.blogspot.com/2010/04/different-kind-of-company-name.html">हमारे नए नाम के बारे में जानें</a>&#8220;। गूगल ब्लॉग पर बताया गया है कि गूगल ने अपना नाम क्यों बदला। <span id="more-517"></span></p>
<p><center><img src="http://kaulonline.com/images/topeka.jpg" alt="" /></center></p>
<p>इस ब्लॉग पर गूगल के अध्यक्ष एरिक श्मिट <a target="_new" href="http://googleblog.blogspot.com/2010/04/different-kind-of-company-name.html">बताते हैं</a> कि ऐसा उन्होंने अमरीका के कैन्सस राज्य की राजधानी टोपीका की बराबरी करने के लिए किया &#8212; दरअसल हाल ही में टोपीका शहर के मेयर ने शहर का नाम बदल कर <a target="_new" href="http://www.loktej.com/pages/article.php?news_id=15670&#038;cat_no=2">गूगल कर दिया था</a>।  आज की तिथि का ध्यान आते ही गूगल के नाम परिवर्तन का रहस्य तो समझ में आ गया (अप्रैल फूल के चक्कर में नाम परिवर्तन एक दिन का ही होगा), पर यह जानकर हैरानी हुई कि एक शहर ने अपना नाम गूगल कर दिया था &#8211; बेशक एक महीने के लिए ही सही। </p>
<p>टोपीका शहर ने अपना नाम गूगल क्यों रखा, इस के लिए डेढ़ महीना पीछे जाने की आवश्यकता है &#8212; फरवरी में गूगल ने <a target="_new" href="http://googleblog.blogspot.com/2010/02/think-big-with-gig-our-experimental.html">घोषणा की</a> कि वे कुछ गिने चुने क्षेत्रों में निःशुल्क तीव्र-गति ब्रॉडबैंड नेटवर्क स्थापित करेंगे, जिस से उन क्षेत्रों में रहने वाले हज़ारों लाखों लोग मुफ्त में एक गिगाबिट प्रति सेकंड की रफ्तार से मुफ्त इंटरनेट का आनन्द उठा पाएँगे। पर इसके लिए उन शहरों को गूगल के पास योजनाएँ बनाकर भेजनी पड़ेंगी कि वे इस सुविधा का किस प्रकार प्रयोग करेंगे। उदाहरण के लिए चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग, शिक्षा क्षेत्र में उपयोग, आदि। जिन शहरों की योजनाएँ गूगल को पसन्द आएँगी, उस शहरों में यह सुपर हाइ-स्पीड फाइबर नेटवर्क लग जाएगा। प्रपोज़ल भेजने की अन्तिम तारीख थी पिछले सप्ताह &#8211; 26 मार्च को। पर अमरीका के शहरों में होड़ लग गई है गूगल के इस नेटवर्क के हकदार बनने की, वैसे ही जैसे ओलंपिक गेम्स की मेज़बानी करने के लिए लग जाती है। </p>
<p>कुछ शहरों ने गूगल का ध्यान आकर्षित करने के लिए अजीब हथकंडे अपनाए। डुलूथ, मिनिसोटा के मेयर ने बर्फीली झील में <a target="_new" href="http://www.youtube.com/watch?v=Tn1D9OVkruM">छलाँग लगाई</a>, और कहा कि हम अपने शहर में पैदा होने वाले कई बच्चों का नाम गूगल रखेंगे।  टोपीका, कैन्सस ने अपना नाम एक महीने के लिए गूगल रख लिया। सैरासोटा, फ्लोरिडा के मेयर <a target="_new" href="http://www.mysuncoast.com/Global/story.asp?S=12154976">शार्कों भरे तालाब में तैरे</a>। बाल्टीमोर की मेयर ने एक विशेष मन्त्री नियुक्त किया, जिसे <a target="_new" href="http://techcrunch.com/2010/03/13/google-czar/">गूगल ज़ार</a> की उपाधि दी गई। गूगल ने बताया है कि उन्हें कोई 600 क्षेत्रों से आवेदन प्राप्त हुए हैं। फैसला 2010 के अन्त तक होगा।</p>
<p>एक साइड नोट यह कि मुझे आज तक मालूम नहीं था कि कैन्सस राज्य की राजधानी टोपीका है। टोपीका, यह कोई नाम है? देश के अधिकांश राज्यों की राजधानियाँ बड़े नामी गिरामी शहरों में न होकर अनजाने से शहरों में हैं, जिसका फंडा मुझे समझ में नहीं आया। <a target="_new" href="http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_capitals_in_the_United_States">विकीपीडिया के अनुसार</a>, पचास में से 33 राज्यों की राजधानियों उन शहरों में हैं जो उन राज्यों के बड़े शहर नहीं हैं। उदाहरण के लिए कैलिफोर्निया की राजधानी लॉस-एंजेल्स न होकर सैक्रामेंटो है, न्यूयॉर्क की न्यूयॉर्क न होकर आल्बनी, फ्लोरिडा की मयामी न होकर टालाहासी, आदि।   </p>
<p>जैसा भारत में पढ़ने वाले अधिकांश पाठक जानते होंगे, यह नाम परिवर्तन भारत में नहीं दिखा। Google.co.in के साथ साथ मैक्सिको, ब्राज़ील, आदि सभी देशों के गूगल का नाम अपरिवर्तित रहा। गूगल को लगता है ज़्यादा बेवकूफ अमरीकियों को ही बनाया जा सकता है।</p>
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		<title>पाठकों की प्रतीक्षा में</title>
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		<pubDate>Mon, 04 Jan 2010 02:48:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कई साल पहले (2004 में) जब यह चिट्ठा शुरू हुआ तो यही कोई 20 चिट्ठाकार थे हिन्दी चिट्ठा जगत में &#8212; पाठकों की संख्या भी एकाध सैंकड़े से अधिक नहीं रही होगी। इन्तज़ार रहता था कि कोई लिखे तो हम पढ़ें और टिप्पणी करें। आजकी स्थिति, जब हज़ारों की संख्या में हिन्दी चिट्ठाकार हैं और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कई साल पहले (2004 में) जब यह चिट्ठा शुरू हुआ तो यही कोई 20 चिट्ठाकार थे हिन्दी चिट्ठा जगत में &#8212; पाठकों की संख्या भी एकाध सैंकड़े से अधिक नहीं रही होगी। इन्तज़ार रहता था कि कोई लिखे तो हम पढ़ें और टिप्पणी करें। आजकी स्थिति, जब हज़ारों की संख्या में हिन्दी चिट्ठाकार हैं और शायद लाखों में पाठक हैं, तब एक स्वप्न लगती थी। सितंबर 2005 में लिखा <a href="http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/">यह लेख</a> उस स्वप्न को दर्शाता है।<span id="more-505"></span></p>
<p>पिछले 2-3 वर्षों से मेरा लेखन बहुत ढ़ीला पड़ गया है। जब मैंने चिट्ठे पर लिखना छोड़ दिया, तो स्वाभाविक था कि पाठकों ने भी आना छोड़ दिया। इस बार नव वर्ष पर प्रण किया है कि नियमित लिखने लगूँगा। कोशिश करूँगा कि रोज़ एक प्रविष्टि लिखूँ। साथ में लेखन की गुणवत्ता बढ़ानी पड़ेगी क्योंकि अब पहले वाले गारंटीशुदा पाठक नहीं हैं &#8212; हज़ारों अन्य चिट्ठों और चिट्ठाकारों के बीच पाठकों के लिए रेस है। </p>
<p>आज साल का तीसरा दिन है, और यह मेरी तीसरी पोस्ट। स्टैटकाउंटर देखकर दिल डूब रहा है। इक्का-दुक्का पाठक गूगल के ज़रिए पुरानी प्रविष्टियों पर आए हैं, पर नई प्रविष्टियों पर ट्रैफिक शून्य के बराबर है। ज़ाहिर है, फिर से यहाँ जगह बनाने में समय लगेगा। पर इस बार मैं लगा रहूँगा.. अपने लिए।   </p>
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		<title>राजीव श्रीनिवासन &#8211; गांधार के कुरुक्षेत्र से</title>
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		<pubDate>Sun, 03 Jan 2010 02:24:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[मैं आजकल राजीव श्रीनिवासन के चिट्ठे का नियमित पाठक बन गया हूँ। राजीव एक 23 वर्षीय युवा चिट्ठाकार हैं &#8211; पर इस चिट्ठाकार के विषय में विशेष यह है कि यह जिस जगह से अपना ब्लॉग  लिख रहे हैं, वह आजकल विश्व की सब से जोखिम भरी जगहों में से एक है। जी हाँ, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मैं आजकल <a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.net/">राजीव श्रीनिवासन के चिट्ठे</a> का नियमित पाठक बन गया हूँ। राजीव एक 23 वर्षीय युवा चिट्ठाकार हैं &#8211; पर इस चिट्ठाकार के विषय में विशेष यह है कि यह जिस जगह से अपना ब्लॉग  लिख रहे हैं, वह आजकल विश्व की सब से जोखिम भरी जगहों में से एक है। जी हाँ, राजीव अमरीकी थल सेना में लेफ्टिनेंट (या अमरीकी अंग्रेज़ी में &#8211; ल्यूटिनेंट) हैं, और आजकल पलटन कमांडर के रूप में कंदहार अफ्गानिस्तान में तैनात हैं। <span id="more-476"></span></p>
<p>राजीव का चिट्ठा मुझे तब मिला जब मैं अमरीकी फौज में भारतीय मूल के लोगों के विषय में जानने की कोशिश कर रहा था। यहाँ परदेस में यह देख कर तो अच्छा लगता है कि भारतीय मूल के लोग डॉक्टरी, सूचना-तकनीकी, विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि  क्षेत्रों में छाए हुए हैं, पर तब और अच्छा लगता है जब इस प्रकार भारतीयों को एक असामान्य क्षेत्र में देखते हैं। </p>
<p>पिछले महीने जब निदाल हसन नाम के एक फिलस्तीनी मूल के सैन्य मेजर ने अपनी ही सेना के लोगों पर <a target="_new" href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2009/11/091113_forthood_charge_pp.shtml">गोलियाँ चलाईं</a>, तो सेना में विदेशी मूल के लोगों के विषय में उत्सुकता हुई। उसी उत्सुकता के चलते इंटरनेट पर भारतीय मूल के लोगों के विषय में खोज की तो राजीव का चिट्ठा मिला।  </p>
<p>पूरी परवरिश वर्जीनिया में होने के बाद भी राजीव अपने भारतीय मूल को नहीं भूले हैं। वे शुद्ध शाकाहारी हैं; जीवन और युद्ध के विभिन्न पहलुओं में भारतीयता और अपनी हिन्दू आस्था को भूलते नहीं। सब से बड़ी बात है कि युद्धक्षेत्र से भी अपना ब्लॉग लिखना नहीं भूलते।  </p>
<p><a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/10/31/twenty-somethings/">ट्वेंटी समथिंग्स</a> नाम के पोस्ट में राजीव अपनी ब्रिगेड के चैपलेन (सेना के प्रीस्ट) से जीवन मृत्यु के फलसफे के बारे में बात कर रहे हैं, और यहाँ तक कि उन्हें कृष्णार्जुन संवाद का फंडा समझा रहे हैं। <a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/08/26/for-thatha/">ताता</a> वाले पोस्ट में राजीव चेन्नइ में अपने दादाजी के निधन से चिन्तित हैं और उन के नाम एक निबन्ध समर्पित करते हैं &#8211; My Battle Within: The Identity Crisis of a Hindu Soldier in the U.S. Army (मेरे भीतर का युद्ध &#8211; अमरीकी सेना में एक हिन्दू सैनिक की पहचान का संकट)। इस निबन्ध को हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन ने पुरस्कृत भी किया है। </p>
<p>राजीव के कीबोर्ड में सरस्वती है, पर उन की हास्य भावना भी बहुत खूब है। <a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/11/21/higher/">हायर</a> नाम के पोस्ट में वे लिखते हैं</p>
<blockquote><p>“अरे, ब्रुक्स!” मैं ने टेंट के भीतर आवाज़ लगाई। </p>
<p>“रोजर, सर!” स्पेशलिस्ट  (सिपाही) ब्रुक्स विनोद भरे अन्दाज़ से अपनी चारपाई से उछल कर सावधान की मुद्रा में आया, जिस से मुझे &#8220;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/M*A*S*H_(TV_series)">मैश</a>&#8221; टीवी सीरियल के घिसे पिटे सिपाहियों की याद आ गई। हँसी को रोकने की कोशिश  में उसके होंठ काँप रहे थे।</p>
<p>“राष्ट्रपति को फोन लगाओ, अभी!”</p>
<p>“रोजर, सर, अभी लीजिए!”</p>
<p>शायद मैंने अपने पाठकों को अभी यह नहीं बताया कि FOB (Forward Operating Base) रैमरॉड में मेरी पलटन के टेंट में अमरीका के राष्ट्रपति के साथ सीधी फोन लाइन है। हाँ जी हाँ, बिल्कुल है। यह फोन एक भारी भरकम काला टचटोन फोन है, जो शायद मेरे पैदा होने से भी पहले खरीदा गया है। ब्रुक्स को हाल ही में घर से मिले पार्सल में प्राप्त चीज़ों में शायद यह सब से बेकार की चीज़ मिली होगी, पर हम ने इस को सही काम में लगा दिया।
</p></blockquote>
<p>इस से आगे वे ओबामा से अपने वार्तालाप के बारे में लिखते हैं। काफी मज़ेदार है, पढ़िए। </p>
<p>हाल के एक और पोस्ट (<a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/12/04/sitting-indian-style/">सिटिंग इंडियन स्टाइल</a>) में राजीव बताते हैं कि कैसे एक अफ़गान सेना के कप्तान के सामने आलथी-पालथी मार कर बैठे और उनसे वह संबन्ध जोड़ा जो शायद एक गोरे सिपाही के लिए आसान न होता। और इससे अगले क्रम के पोस्ट में बता रहे हैं कि कैसे अफग़ानिस्तान में चौकड़ी लगाते लगाते उन के <a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/12/12/my-foot-falls-asleep/">पैर सोने लगे हैं</a>।  इस लेख में मुझे उनका लिखा यह सुभाषित भी मिला, जो इस समस्या का अच्छा सार है।</p>
<blockquote><p>We take people for face value because strong democratic countries allow us the freedom, if not the expectation, to be genuine.</p></blockquote>
<p>राजीव अमरीकी सेना की प्रतिष्ठित वेस्ट पॉइंट मिलिट्री अकेडमी के ग्रैजुएट हैं। उन के लेखन को देखते हुए लगता है कि युद्घ के अनुभवों के आधार पर उन की लिखी पुस्तक शीघ्र ही उपलब्ध होगी। सैन्य अफसर, चिट्ठाकार होने के अतिरिक्त राजीव <a href="http://beyondorders.org/">BeyondOrders.org</a> को प्रारंभ करने में सहायक रहे हैं। यह साइट एक नॉन-प्रॉफिट संगठन की है जो ईराक और अफगानिस्तान में सैनिकों की ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करता है।</p>
<p>चलते चलते, राजीव के एक टीवी इंटरव्यू का यूट्यूब संस्करण</p>
<p><object width="480" height="385"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/JqlYghHCxkc&#038;hl=en_US&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;color1=0x3a3a3a&#038;color2=0x999999"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/JqlYghHCxkc&#038;hl=en_US&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;color1=0x3a3a3a&#038;color2=0x999999" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="480" height="385"></embed></object></p>
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		<title>एक साल एक दहाई</title>
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		<pubDate>Sat, 02 Jan 2010 04:09:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[new year]]></category>

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		<description><![CDATA[इस चिट्ठे को पढ़ने वाले सभी दोस्तों को नया साल मुबारक। इस दिन पर इस चिट्ठे पर बहुत दिनों बाद कुछ बड़बड़।
आज एक नई दहाई शुरु हुई है, जो उम्मीद है दुनिया के लिए कुछ खुश खबर ले कर आएगी। इस सदी की पहली दहाई में आतंक का ही बोलबाला रहा &#8211; 9-11, 26-11, 7-7, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>इस चिट्ठे को पढ़ने वाले सभी दोस्तों को नया साल मुबारक। इस दिन पर इस चिट्ठे पर बहुत दिनों बाद कुछ बड़बड़।</p>
<p>आज एक नई दहाई शुरु हुई है, जो उम्मीद है दुनिया के लिए कुछ खुश खबर ले कर आएगी। इस सदी की पहली दहाई में आतंक का ही बोलबाला रहा &#8211; 9-11, 26-11, 7-7, ईराक, अफगानिस्तान, ईरान, सूडान, और न जाने क्या क्या? पर घटनाएँ आम तौर पर अंकों की मोहताज नहीं होती। समयचक्र के लिए एक नई दहाई शुरू होने का कोई अर्थ नहीं है।  विश्व घटनाक्रम के लिए 1 जनवरी 2010, ऐसा ही है जैसा कोई और दिन। इसलिए यह उम्मीद करना कि दहाई बदलने से घटनाक्रम बदल जाएगा, खुद को झूठी तसल्ली देना ही है। मैं अंकविद्या में विश्वास नहीं करता, इस कारण व्यक्तिगत जीवन मे सदी या दहाई बदलने से कुछ होगा, यह नहीं मानता। <span id="more-490"></span></p>
<p>यह नई दहाई है या नहीं, यह भी बातचीत का विषय हो सकता है। यह शताब्दी 2000 में शुरू हुई थी या 2001 में? भई देखा जाए तो 31-दिसंबर-2000 बीसवीं शताब्दी का अन्तिम दिन था, और उसी तर्क से 31-दिसंबर-2010, इस शताब्दी की पहली दहाई का अन्तिम दिन होगा। दूसरी ओर अंग्रेज़ी भाषी परेशान हैं कि इस दशक को क्या कहा जाए &#8211;   भई 80s थे, फिर 90s आए, उसके बाद अभी यही समझ में नहीं आ रहा था कि पहले दशक को क्या कहा जाए, कि दूसरा दशक भी आ गया। 10s कहना तो सही नहीं होगा &#8211; पर कोई बात नहीं &#8211; उस शब्दावली से यह नई दहाई शुरू हुई है। </p>
<p>अपने लिए यह पिछली दहाई बहुत परिवर्तन की रही। 2000 में ही भारत से आए, साल भर कैनेडा में रहने के बाद यू.एस. में पैर जमाए। अब पैर तो लगभग जम गए, दिल अभी नहीं जमा। </p>
<p>इस नए साल की शुरुआत आम सालों की ही तरह हुई &#8212; सुबह के डेढ़ बजे पार्टी से लौटे। होशोहवास बराबर रखने, क्योंकि घंटे भर की ड्राइविंग कर के घर पहुँचना था &#8212; वह भी बहुत खराब मौसम में। शून्य के आसपास तापमान, वर्षा के साथ हल्का हल्का हिमपात भी हो रहा था, पुलिस वाले चौकन्ने हो कर ताक लगाए बैठे थे कि कौन लेन से भटके कि उन्हें धर पकड़ें। </p>
<p>&#8211;</p>
<p>नए साल के साथ स्वयं से वादा है इस चिट्ठे पर नियमित लिखने का। आज पहले दिन कुछ खास नहीं, बस यही कि नए साल की शुरुआत कैसे हुई। </p>
<p><strong>श्री शिवा-विष्णु टैंपल</strong></p>
<p><a target="_new" href="http://www.flickr.com/photos/kaul/4235150687/" title="kdk_0445 by Kaul, on Flickr"><img src="http://farm5.static.flickr.com/4070/4235150687_666b7a290d_m.jpg" align="right" width="240" height="180" alt="kdk_0445" /></a>कुछ मित्रों का फोन आया, पहली जनवरी को मन्दिर जाना चाहते थे। देखते देखते तीन युगल इकट्ठे हुए और <a href="http://ssvt.org" target="_new">श्री शिवा-विष्णु टैंपल</a> का कार्यक्रम बना। यह मन्दिर वाशिंगटन डीसी की बेल्टवे (मुद्रिका मार्ग) के पास है, और मेरे घर से कोई 50 मील दूर। बहुत भीड़ थी आज। मन्दिर के अहाते की पार्किंग फुल थी, और मन्दिर के बाहर का पार्किंग लॉट भी फुल था। बहुत दूर जा कर पार्किंग कर के आना पड़ा, और फिर ठंड में पैदल मन्दिर तक पहुँचना पड़ा। </p>
<p>शिवा-विष्णु मन्दिर पर एक दक्षिण भारतीय मन्दिर की झलक है। अन्दर के हॉल में कई छोटे छोटे मन्दिर हैं। प्रवेश करते ही एक शीशे के डिब्बे में ओबामा देवता की भी फोटो देखी। दरअसल यह फोटो उस दिन ली गई थी जब <a href="http://www.whitehouse.gov/photos-and-video/video/president-observes-diwali">व्हाइट हाउस में दीवाली मनाई गई थी</a> और इस मन्दिर ने दीपक, मिठाई और पुरोहित उपलब्ध कराए थे। </p>
<p>खैर मन्दिर में दर्शनाभिलाषियों ने दर्शन किए,  भोजनाभिलाषियों ने भोजन किया <img src='http://kaulonline.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';-)' class='wp-smiley' /> । अब इतनी दूर आए थे तो सोचा कि पास के थिएटर में थ्री ईडियट्स देखी जाए। </p>
<p><strong>थ्री ईडियट्स</strong></p>
<p>थ्री ईडियट्स की बहुत प्रशंसा सुनी थी, और फिल्म उस प्रशंसा पर खरी उतरी। शायद ही कोई और फिल्म देखी हो, जो शिक्षाप्रद होने के साथ साथ इतनी मनोरंजक भी हो। पूरा हॉल हँस हँस कर लोटपोट हो रहा था। कुछ मज़ाक फूहड़ किस्म के थे, पर यह ज़माने की माँग है। फिल्म सोचने पर मजबूर करती है &#8212; अपनी करीयर चॉइसेज़ याद आती हैं, क्या सही किया, क्या ग़लत, बच्चों की करियर चॉइस में हमारा क्या रोल रहता है, वह याद आता है।</p>
<p>यूँ लगता है कि यह दशक हिन्दी फिल्मों के लिए काफी अच्छा रहा। पिछले दिनों तीन फिल्में देखीं और तीनों लीक से हटकर थीं &#8211; पा, रॉकेट सिंह, और अब थ्री ईडियट्स।</p>
<p>एक बार फिर नया साल मुबारक। </p>
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		<title>सुर बने हमारा</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2009/08/sur-bane-hamara/</link>
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		<pubDate>Sat, 15 Aug 2009 05:01:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[Indian]]></category>
		<category><![CDATA[Mile sur mera tumhara]]></category>
		<category><![CDATA[Patriotic]]></category>

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		<description><![CDATA[बासठवें स्वतन्त्रता दिवस पर सभी भारतवासियों को शुभकामनाएँ। 
इस अवसर पर एक बार फिर पढ़िए आज से चार वर्ष पहले लिखी यह पोस्ट जिस में मिले सुर मेरा तुम्हारा के हर भाषा के बोल संकलित किए गए थे। आज एक और छोटी सी सूचना, समय-लाइव के सौजन्य से
शास्त्रीय गायक दिवंगत पंडित पी. वैद्यनाथन और लुई [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बासठवें स्वतन्त्रता दिवस पर सभी भारतवासियों को शुभकामनाएँ। </p>
<p>इस अवसर पर एक बार फिर पढ़िए <a href="http://kaulonline.com/chittha/2005/08/mile-sur-mera-tumhara/">आज से चार वर्ष पहले लिखी यह पोस्ट</a> जिस में मिले सुर मेरा तुम्हारा के हर भाषा के बोल संकलित किए गए थे। आज एक और छोटी सी सूचना, <a href="http://hindi.samaylive.com/articles/2350236723542375-236023692352-2350237523522366-23402369235023812361236623522366-23402379-236023692352-234823442375-23612350236623522366.html">समय-लाइव</a> के सौजन्य से<span id="more-468"></span></p>
<blockquote><p>शास्त्रीय गायक दिवंगत पंडित पी. वैद्यनाथन और लुई बैंक्स द्वारा संगीतबद्ध मिले सुर मेरा तुम्हारा गीत ने दूरदर्शन के छोटे पर्दे को अचानक नयी ऊचाई पर पहुंचा दिया था।</p></blockquote>
<p>यह गीत जब भी सुनता हूँ, मन को भा जाता है। यदि किसी को गीत से विभिन्न भाषाओं के गायकों के नाम भी मालूम हों तो कृपया बताएँ। कुछ स्वर जो इस में सुनाई दिए थे, वे हैं &#8211; भीमसेन जोशी, लता मंगेशकर, बालमुरली कृष्ण, आदि। इन गायकों के अतिरिक्त कुछ चेहरे जो दिखे थे वे हैं कपिल देव, कमल हासन, तनुजा, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, शर्मिला टैगोर, अमिताभ बच्चन, जीतेन्द्र, मिठुन चक्रवर्ती। जो चेहरे और स्वर मैं नहीं पहचान पाया हूँ, उन के विषय में सूचना मिलेगी तो आभारी रहूँगा।</p>
<p>गीत का ऑडियो (एमपी3) और वीडियो एक बार फिर प्रस्तुत है </p>
<p><a href="http://mysite.verizon.net/vzetafut/sitebuildercontent/sitebuilderfiles/milesur.mp3"><img src="http://kaulonline.com/images/spkr.jpg" alt="listen" title="listen" /> सुनने के लिए क्लिक करें</a> (mp3 डाउनलोड करने के लिए माउस का दायाँ बटन दबाएँ)</p>
<p><object width="480" height="385"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/caUMs9gKh7A&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/caUMs9gKh7A&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="480" height="385"></embed></object></p>
]]></content:encoded>
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<enclosure url="http://mysite.verizon.net/vzetafut/sitebuildercontent/sitebuilderfiles/milesur.mp3" length="5341228" type="audio/mpeg" />
		</item>
		<item>
		<title>कश्मीर की जंग पॉलीथीन के संग</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2009/08/kashmir-ki-jang-polythene-ke-san/</link>
		<comments>http://kaulonline.com/chittha/2009/08/kashmir-ki-jang-polythene-ke-san/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 07 Aug 2009 03:21:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[उर्दू]]></category>
		<category><![CDATA[कश्मीर]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[Kashmir]]></category>
		<category><![CDATA[Plastic bags]]></category>
		<category><![CDATA[Polyethene]]></category>
		<category><![CDATA[Srinagar]]></category>
		<category><![CDATA[War]]></category>

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		<description><![CDATA[श्रीनगर, कश्मीर के अंग्रेज़ी अखबार ग्रेटर कश्मीर का ई-पेपर संस्करण देख रहा था तो मुख्यपृष्ठ पर यह रोचक उर्दू विज्ञापन दिखा। विज्ञापन को पढ़िए, स्वयं समझ जाएँगे कि क्या रोचक है इस में। यदि उर्दू नहीं आती तो नीचे हिन्दी अनुवाद दिया हुआ है।



श्रीनगर म्यूनिसिपल कार्पोरेशन
पाकीज़ा शहरे-श्रीनगर को मनहूस पॉलीथीन के ज़हर से
पाक रखने के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>श्रीनगर, कश्मीर के अंग्रेज़ी अखबार <a target="_new" href="http://greaterkashmir.com/">ग्रेटर कश्मीर</a> का <a target="_new" href="http://paper.greaterkashmir.com/782009/epaperhome.aspx">ई-पेपर संस्करण</a> देख रहा था तो मुख्यपृष्ठ पर यह रोचक उर्दू विज्ञापन दिखा। विज्ञापन को पढ़िए, स्वयं समझ जाएँगे कि क्या रोचक है इस में। यदि उर्दू नहीं आती तो नीचे हिन्दी अनुवाद दिया हुआ है।<span id="more-458"></span><br />
<center><br />
<img src="http://img291.imageshack.us/img291/9135/smcad.jpg" alt="Urdu Ad in GreaterKashmir.com Newspaper against use of plastic bags" /></p>
<blockquote>
<h3>श्रीनगर म्यूनिसिपल कार्पोरेशन</h3>
<p><strong>पाकीज़ा शहरे-श्रीनगर को मनहूस पॉलीथीन के ज़हर से<br />
पाक रखने के लिए 14 लाख शहरियों को मुबारकबाद</strong></p>
<p>खबरदार, अभी भी चन्द इस्तेहसाल पसन्द अनासिर इस मनहूसियत को वापस<br />
लाने की ताक में हैं।<br />
उन से बचिए, वह आप के दुशमन हैं।<br />
आप किसी भी दुकानदार को पॉलीथीन बेचते हुए पकड़ कर उसे नज़दीकी पोलीस<br />
स्टेशन या म्यूनिसिपल वार्ड में लाएँ।<br />
जो शख्स पॉलीथीन पकड़वाने में मदद करेगा उसे म्यूनिसिपल हुक्काम की तरफ़ से<br />
इनाम दिया जाएगा।<br />
जो शख्स अब पॉलीथीन बैग हाथ में लेकर चलेगा या पॉलीथीन के ज़हर में कोई शै<br />
बेचे, उस पर 5000 रुपए का जुर्माना आयद किया जाएगा और<br />
उस के ख़िलाफ़ म्यूनिसिपल अदालत में केस दायर किया जाएगा।</p>
<p>मेयर &#8230;&#8230;&#8230;&#8230;. कमिश्नर<br />
म्यूनिसिपल कार्पोरेशन &#8230;&#8230;&#8230;&#8230;. म्यूनिसिपल कार्पोरेशन<br />
</center></p></blockquote>
<p>यानी अब श्रीनगर की पुलिस और स्थानीय सरकार न केवल उन लोगों पर मुकद्दमा चलाएगी जो पॉलीथीन बैग में सामान बेचेंगे, बल्कि उन पर भी जो ऐसी थैली में सामान घर ले जाते हुए पकड़े जाएँगे। वाह री सरकार, आतंकियों को तो पकड़ नहीं पाते हो, आम जनता को लूटने का एक और तरीका खोज निकाल लिया। श्रीनगर को सिंगापोर बनाने का इरादा लगता है मेयर और कमिश्नर साहिबान का।</p>
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