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	<title>इधर उधर की &#187; विविध</title>
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	<description>इधर की ईंट उधर का रोड़ा</description>
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		<title>पाकिस्तान फैशन वीक है जी</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Apr 2010 13:17:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[मनोरंजन]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[Fashion]]></category>
		<category><![CDATA[Paskistan]]></category>

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		<description><![CDATA[आज हफिंगटन पोस्ट में पिछले नवंबर में हुए पाकिस्तान फैशन वीक से यह तस्वीर छपी है। पोस्ट नें लेख का शीर्षक दिया है &#8220;वाट द&#8230;.?&#8221;। सच है, तस्वीर अपनी कहानी खुद कहती है, शब्दों की अधिक आवश्यकता नहीं है। मेरा बस यह कहना है&#8230; यह फैशन वीक है, या फैशन वीक है?

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			<content:encoded><![CDATA[<p>आज <a href="http://www.huffingtonpost.com/">हफिंगटन पोस्ट</a> में पिछले नवंबर में हुए पाकिस्तान फैशन वीक से यह तस्वीर छपी है। पोस्ट नें लेख का शीर्षक दिया है &#8220;वाट द&#8230;.?&#8221;। सच है, तस्वीर अपनी कहानी खुद कहती है, शब्दों की अधिक आवश्यकता नहीं है। मेरा बस यह कहना है&#8230; यह फैशन वीक है, या फैशन वीक है?<span id="more-538"></span></p>
<p><a href="http://www.huffingtonpost.com/2010/04/09/pakistan-fashion-week-wha_n_531442.html" target="_new"><img src="http://images.huffingtonpost.com/2010-04-09-PAKISTANFASHIONWEEK.jpg" alt="" /></a></p>
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		<title>छाता लेकर निकले हम</title>
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		<pubDate>Sun, 04 Apr 2010 01:24:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[फरवरी में भारत यात्रा के दौरान कार्यक्रम बना श्रीलंका घूमने का। श्रीलंका भ्रमण का अनुभव बहुत ही बढ़िया रहा। विस्तार से जल्दी लिखूँगा, फिल्हाल यह लघु-चित्र-प्रविष्टि। वहाँ, छाते का एक अनूठा प्रयोग देखने को मिला। अक्सर प्रेमी युगल छाता साथ लेकर चलते हैं &#8212; अकस्मात वर्षा हो जाए, उसमें तो काम आ ही जाएगा, पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>फरवरी में भारत यात्रा के दौरान कार्यक्रम बना श्रीलंका घूमने का। श्रीलंका भ्रमण का अनुभव बहुत ही बढ़िया रहा। विस्तार से जल्दी लिखूँगा, फिल्हाल यह लघु-चित्र-प्रविष्टि। वहाँ, छाते का एक अनूठा प्रयोग देखने को मिला। अक्सर प्रेमी युगल छाता साथ लेकर चलते हैं &#8212; अकस्मात वर्षा हो जाए, उसमें तो काम आ ही जाएगा, पर न भी हो तो आप कहीं भी अपना निजी प्रणय-कक्ष बना सकते हैं। <a target="_new" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Galle_International_Stadium">गाल अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम</a> के पास खींचे गए यह दो चित्र देखिए।<span id="more-527"></span></p>
<p><img src="http://lh3.ggpht.com/_L2kIv3KX6CU/S5vfHgAlP-I/AAAAAAAABUc/utt-C8TEjuU/s800/DSCF3947.JPG" alt="Umbrella couple" /><br />
एक युगल</p>
<p><img src="http://lh6.ggpht.com/_L2kIv3KX6CU/S5vfJULFvOI/AAAAAAAABUk/-BlTjxjywkc/s800/DSCF3949.JPG" alt="Umbrella Couple" /><br />
दो युगल</p>
<p><img src="http://lh6.ggpht.com/_L2kIv3KX6CU/S5vfIp_scuI/AAAAAAAABUg/ayPIQYgq35k/s800/DSCF3948.JPG" alt="Cricket Stadium at Galle" /><br />
ऊपर के चित्र में जो दीवार है, वहाँ से गाल स्टेडियम का यह दृष्य। यह स्टेडियम 2004 की त्सुनामी में बिल्कुल नष्ट हो गया था। </p>
]]></content:encoded>
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		<title>गूगल ने नाम बदला, टोपीका रखा</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Apr 2010 02:09:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[april fool]]></category>
		<category><![CDATA[google]]></category>
		<category><![CDATA[topeka]]></category>

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		<description><![CDATA[आज सुबह सुबह गूगल खोला तो देखा गूगल के स्थान पर नाम है &#8220;टोपीका&#8221;। उसके नीचे लिंक था &#8220;हमारे नए नाम के बारे में जानें&#8220;। गूगल ब्लॉग पर बताया गया है कि गूगल ने अपना नाम क्यों बदला। 

इस ब्लॉग पर गूगल के अध्यक्ष एरिक श्मिट बताते हैं कि ऐसा उन्होंने अमरीका के कैन्सस राज्य [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज सुबह सुबह गूगल खोला तो देखा गूगल के स्थान पर नाम है &#8220;टोपीका&#8221;। उसके नीचे लिंक था &#8220;<a target="_new" href="http://googleblog.blogspot.com/2010/04/different-kind-of-company-name.html">हमारे नए नाम के बारे में जानें</a>&#8220;। गूगल ब्लॉग पर बताया गया है कि गूगल ने अपना नाम क्यों बदला। <span id="more-517"></span></p>
<p><center><img src="http://kaulonline.com/images/topeka.jpg" alt="" /></center></p>
<p>इस ब्लॉग पर गूगल के अध्यक्ष एरिक श्मिट <a target="_new" href="http://googleblog.blogspot.com/2010/04/different-kind-of-company-name.html">बताते हैं</a> कि ऐसा उन्होंने अमरीका के कैन्सस राज्य की राजधानी टोपीका की बराबरी करने के लिए किया &#8212; दरअसल हाल ही में टोपीका शहर के मेयर ने शहर का नाम बदल कर <a target="_new" href="http://www.loktej.com/pages/article.php?news_id=15670&#038;cat_no=2">गूगल कर दिया था</a>।  आज की तिथि का ध्यान आते ही गूगल के नाम परिवर्तन का रहस्य तो समझ में आ गया (अप्रैल फूल के चक्कर में नाम परिवर्तन एक दिन का ही होगा), पर यह जानकर हैरानी हुई कि एक शहर ने अपना नाम गूगल कर दिया था &#8211; बेशक एक महीने के लिए ही सही। </p>
<p>टोपीका शहर ने अपना नाम गूगल क्यों रखा, इस के लिए डेढ़ महीना पीछे जाने की आवश्यकता है &#8212; फरवरी में गूगल ने <a target="_new" href="http://googleblog.blogspot.com/2010/02/think-big-with-gig-our-experimental.html">घोषणा की</a> कि वे कुछ गिने चुने क्षेत्रों में निःशुल्क तीव्र-गति ब्रॉडबैंड नेटवर्क स्थापित करेंगे, जिस से उन क्षेत्रों में रहने वाले हज़ारों लाखों लोग मुफ्त में एक गिगाबिट प्रति सेकंड की रफ्तार से मुफ्त इंटरनेट का आनन्द उठा पाएँगे। पर इसके लिए उन शहरों को गूगल के पास योजनाएँ बनाकर भेजनी पड़ेंगी कि वे इस सुविधा का किस प्रकार प्रयोग करेंगे। उदाहरण के लिए चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग, शिक्षा क्षेत्र में उपयोग, आदि। जिन शहरों की योजनाएँ गूगल को पसन्द आएँगी, उस शहरों में यह सुपर हाइ-स्पीड फाइबर नेटवर्क लग जाएगा। प्रपोज़ल भेजने की अन्तिम तारीख थी पिछले सप्ताह &#8211; 26 मार्च को। पर अमरीका के शहरों में होड़ लग गई है गूगल के इस नेटवर्क के हकदार बनने की, वैसे ही जैसे ओलंपिक गेम्स की मेज़बानी करने के लिए लग जाती है। </p>
<p>कुछ शहरों ने गूगल का ध्यान आकर्षित करने के लिए अजीब हथकंडे अपनाए। डुलूथ, मिनिसोटा के मेयर ने बर्फीली झील में <a target="_new" href="http://www.youtube.com/watch?v=Tn1D9OVkruM">छलाँग लगाई</a>, और कहा कि हम अपने शहर में पैदा होने वाले कई बच्चों का नाम गूगल रखेंगे।  टोपीका, कैन्सस ने अपना नाम एक महीने के लिए गूगल रख लिया। सैरासोटा, फ्लोरिडा के मेयर <a target="_new" href="http://www.mysuncoast.com/Global/story.asp?S=12154976">शार्कों भरे तालाब में तैरे</a>। बाल्टीमोर की मेयर ने एक विशेष मन्त्री नियुक्त किया, जिसे <a target="_new" href="http://techcrunch.com/2010/03/13/google-czar/">गूगल ज़ार</a> की उपाधि दी गई। गूगल ने बताया है कि उन्हें कोई 600 क्षेत्रों से आवेदन प्राप्त हुए हैं। फैसला 2010 के अन्त तक होगा।</p>
<p>एक साइड नोट यह कि मुझे आज तक मालूम नहीं था कि कैन्सस राज्य की राजधानी टोपीका है। टोपीका, यह कोई नाम है? देश के अधिकांश राज्यों की राजधानियाँ बड़े नामी गिरामी शहरों में न होकर अनजाने से शहरों में हैं, जिसका फंडा मुझे समझ में नहीं आया। <a target="_new" href="http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_capitals_in_the_United_States">विकीपीडिया के अनुसार</a>, पचास में से 33 राज्यों की राजधानियों उन शहरों में हैं जो उन राज्यों के बड़े शहर नहीं हैं। उदाहरण के लिए कैलिफोर्निया की राजधानी लॉस-एंजेल्स न होकर सैक्रामेंटो है, न्यूयॉर्क की न्यूयॉर्क न होकर आल्बनी, फ्लोरिडा की मयामी न होकर टालाहासी, आदि।   </p>
<p>जैसा भारत में पढ़ने वाले अधिकांश पाठक जानते होंगे, यह नाम परिवर्तन भारत में नहीं दिखा। Google.co.in के साथ साथ मैक्सिको, ब्राज़ील, आदि सभी देशों के गूगल का नाम अपरिवर्तित रहा। गूगल को लगता है ज़्यादा बेवकूफ अमरीकियों को ही बनाया जा सकता है।</p>
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		<title>पाठकों की प्रतीक्षा में</title>
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		<pubDate>Mon, 04 Jan 2010 02:48:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[कई साल पहले (2004 में) जब यह चिट्ठा शुरू हुआ तो यही कोई 20 चिट्ठाकार थे हिन्दी चिट्ठा जगत में &#8212; पाठकों की संख्या भी एकाध सैंकड़े से अधिक नहीं रही होगी। इन्तज़ार रहता था कि कोई लिखे तो हम पढ़ें और टिप्पणी करें। आजकी स्थिति, जब हज़ारों की संख्या में हिन्दी चिट्ठाकार हैं और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कई साल पहले (2004 में) जब यह चिट्ठा शुरू हुआ तो यही कोई 20 चिट्ठाकार थे हिन्दी चिट्ठा जगत में &#8212; पाठकों की संख्या भी एकाध सैंकड़े से अधिक नहीं रही होगी। इन्तज़ार रहता था कि कोई लिखे तो हम पढ़ें और टिप्पणी करें। आजकी स्थिति, जब हज़ारों की संख्या में हिन्दी चिट्ठाकार हैं और शायद लाखों में पाठक हैं, तब एक स्वप्न लगती थी। सितंबर 2005 में लिखा <a href="http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/">यह लेख</a> उस स्वप्न को दर्शाता है।<span id="more-505"></span></p>
<p>पिछले 2-3 वर्षों से मेरा लेखन बहुत ढ़ीला पड़ गया है। जब मैंने चिट्ठे पर लिखना छोड़ दिया, तो स्वाभाविक था कि पाठकों ने भी आना छोड़ दिया। इस बार नव वर्ष पर प्रण किया है कि नियमित लिखने लगूँगा। कोशिश करूँगा कि रोज़ एक प्रविष्टि लिखूँ। साथ में लेखन की गुणवत्ता बढ़ानी पड़ेगी क्योंकि अब पहले वाले गारंटीशुदा पाठक नहीं हैं &#8212; हज़ारों अन्य चिट्ठों और चिट्ठाकारों के बीच पाठकों के लिए रेस है। </p>
<p>आज साल का तीसरा दिन है, और यह मेरी तीसरी पोस्ट। स्टैटकाउंटर देखकर दिल डूब रहा है। इक्का-दुक्का पाठक गूगल के ज़रिए पुरानी प्रविष्टियों पर आए हैं, पर नई प्रविष्टियों पर ट्रैफिक शून्य के बराबर है। ज़ाहिर है, फिर से यहाँ जगह बनाने में समय लगेगा। पर इस बार मैं लगा रहूँगा.. अपने लिए।   </p>
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		<title>राजीव श्रीनिवासन &#8211; गांधार के कुरुक्षेत्र से</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2010/01/rajiv-srinivasan-kandahar/</link>
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		<pubDate>Sun, 03 Jan 2010 02:24:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[मैं आजकल राजीव श्रीनिवासन के चिट्ठे का नियमित पाठक बन गया हूँ। राजीव एक 23 वर्षीय युवा चिट्ठाकार हैं &#8211; पर इस चिट्ठाकार के विषय में विशेष यह है कि यह जिस जगह से अपना ब्लॉग  लिख रहे हैं, वह आजकल विश्व की सब से जोखिम भरी जगहों में से एक है। जी हाँ, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मैं आजकल <a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.net/">राजीव श्रीनिवासन के चिट्ठे</a> का नियमित पाठक बन गया हूँ। राजीव एक 23 वर्षीय युवा चिट्ठाकार हैं &#8211; पर इस चिट्ठाकार के विषय में विशेष यह है कि यह जिस जगह से अपना ब्लॉग  लिख रहे हैं, वह आजकल विश्व की सब से जोखिम भरी जगहों में से एक है। जी हाँ, राजीव अमरीकी थल सेना में लेफ्टिनेंट (या अमरीकी अंग्रेज़ी में &#8211; ल्यूटिनेंट) हैं, और आजकल पलटन कमांडर के रूप में कंदहार अफ्गानिस्तान में तैनात हैं। <span id="more-476"></span></p>
<p>राजीव का चिट्ठा मुझे तब मिला जब मैं अमरीकी फौज में भारतीय मूल के लोगों के विषय में जानने की कोशिश कर रहा था। यहाँ परदेस में यह देख कर तो अच्छा लगता है कि भारतीय मूल के लोग डॉक्टरी, सूचना-तकनीकी, विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि  क्षेत्रों में छाए हुए हैं, पर तब और अच्छा लगता है जब इस प्रकार भारतीयों को एक असामान्य क्षेत्र में देखते हैं। </p>
<p>पिछले महीने जब निदाल हसन नाम के एक फिलस्तीनी मूल के सैन्य मेजर ने अपनी ही सेना के लोगों पर <a target="_new" href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2009/11/091113_forthood_charge_pp.shtml">गोलियाँ चलाईं</a>, तो सेना में विदेशी मूल के लोगों के विषय में उत्सुकता हुई। उसी उत्सुकता के चलते इंटरनेट पर भारतीय मूल के लोगों के विषय में खोज की तो राजीव का चिट्ठा मिला।  </p>
<p>पूरी परवरिश वर्जीनिया में होने के बाद भी राजीव अपने भारतीय मूल को नहीं भूले हैं। वे शुद्ध शाकाहारी हैं; जीवन और युद्ध के विभिन्न पहलुओं में भारतीयता और अपनी हिन्दू आस्था को भूलते नहीं। सब से बड़ी बात है कि युद्धक्षेत्र से भी अपना ब्लॉग लिखना नहीं भूलते।  </p>
<p><a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/10/31/twenty-somethings/">ट्वेंटी समथिंग्स</a> नाम के पोस्ट में राजीव अपनी ब्रिगेड के चैपलेन (सेना के प्रीस्ट) से जीवन मृत्यु के फलसफे के बारे में बात कर रहे हैं, और यहाँ तक कि उन्हें कृष्णार्जुन संवाद का फंडा समझा रहे हैं। <a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/08/26/for-thatha/">ताता</a> वाले पोस्ट में राजीव चेन्नइ में अपने दादाजी के निधन से चिन्तित हैं और उन के नाम एक निबन्ध समर्पित करते हैं &#8211; My Battle Within: The Identity Crisis of a Hindu Soldier in the U.S. Army (मेरे भीतर का युद्ध &#8211; अमरीकी सेना में एक हिन्दू सैनिक की पहचान का संकट)। इस निबन्ध को हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन ने पुरस्कृत भी किया है। </p>
<p>राजीव के कीबोर्ड में सरस्वती है, पर उन की हास्य भावना भी बहुत खूब है। <a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/11/21/higher/">हायर</a> नाम के पोस्ट में वे लिखते हैं</p>
<blockquote><p>“अरे, ब्रुक्स!” मैं ने टेंट के भीतर आवाज़ लगाई। </p>
<p>“रोजर, सर!” स्पेशलिस्ट  (सिपाही) ब्रुक्स विनोद भरे अन्दाज़ से अपनी चारपाई से उछल कर सावधान की मुद्रा में आया, जिस से मुझे &#8220;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/M*A*S*H_(TV_series)">मैश</a>&#8221; टीवी सीरियल के घिसे पिटे सिपाहियों की याद आ गई। हँसी को रोकने की कोशिश  में उसके होंठ काँप रहे थे।</p>
<p>“राष्ट्रपति को फोन लगाओ, अभी!”</p>
<p>“रोजर, सर, अभी लीजिए!”</p>
<p>शायद मैंने अपने पाठकों को अभी यह नहीं बताया कि FOB (Forward Operating Base) रैमरॉड में मेरी पलटन के टेंट में अमरीका के राष्ट्रपति के साथ सीधी फोन लाइन है। हाँ जी हाँ, बिल्कुल है। यह फोन एक भारी भरकम काला टचटोन फोन है, जो शायद मेरे पैदा होने से भी पहले खरीदा गया है। ब्रुक्स को हाल ही में घर से मिले पार्सल में प्राप्त चीज़ों में शायद यह सब से बेकार की चीज़ मिली होगी, पर हम ने इस को सही काम में लगा दिया।
</p></blockquote>
<p>इस से आगे वे ओबामा से अपने वार्तालाप के बारे में लिखते हैं। काफी मज़ेदार है, पढ़िए। </p>
<p>हाल के एक और पोस्ट (<a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/12/04/sitting-indian-style/">सिटिंग इंडियन स्टाइल</a>) में राजीव बताते हैं कि कैसे एक अफ़गान सेना के कप्तान के सामने आलथी-पालथी मार कर बैठे और उनसे वह संबन्ध जोड़ा जो शायद एक गोरे सिपाही के लिए आसान न होता। और इससे अगले क्रम के पोस्ट में बता रहे हैं कि कैसे अफग़ानिस्तान में चौकड़ी लगाते लगाते उन के <a target="_new" href="http://rajivsrinivasan.wordpress.com/2009/12/12/my-foot-falls-asleep/">पैर सोने लगे हैं</a>।  इस लेख में मुझे उनका लिखा यह सुभाषित भी मिला, जो इस समस्या का अच्छा सार है।</p>
<blockquote><p>We take people for face value because strong democratic countries allow us the freedom, if not the expectation, to be genuine.</p></blockquote>
<p>राजीव अमरीकी सेना की प्रतिष्ठित वेस्ट पॉइंट मिलिट्री अकेडमी के ग्रैजुएट हैं। उन के लेखन को देखते हुए लगता है कि युद्घ के अनुभवों के आधार पर उन की लिखी पुस्तक शीघ्र ही उपलब्ध होगी। सैन्य अफसर, चिट्ठाकार होने के अतिरिक्त राजीव <a href="http://beyondorders.org/">BeyondOrders.org</a> को प्रारंभ करने में सहायक रहे हैं। यह साइट एक नॉन-प्रॉफिट संगठन की है जो ईराक और अफगानिस्तान में सैनिकों की ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करता है।</p>
<p>चलते चलते, राजीव के एक टीवी इंटरव्यू का यूट्यूब संस्करण</p>
<p><object width="480" height="385"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/JqlYghHCxkc&#038;hl=en_US&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;color1=0x3a3a3a&#038;color2=0x999999"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/JqlYghHCxkc&#038;hl=en_US&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;color1=0x3a3a3a&#038;color2=0x999999" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="480" height="385"></embed></object></p>
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		<title>एक साल एक दहाई</title>
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		<pubDate>Sat, 02 Jan 2010 04:09:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[new year]]></category>

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		<description><![CDATA[इस चिट्ठे को पढ़ने वाले सभी दोस्तों को नया साल मुबारक। इस दिन पर इस चिट्ठे पर बहुत दिनों बाद कुछ बड़बड़।
आज एक नई दहाई शुरु हुई है, जो उम्मीद है दुनिया के लिए कुछ खुश खबर ले कर आएगी। इस सदी की पहली दहाई में आतंक का ही बोलबाला रहा &#8211; 9-11, 26-11, 7-7, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>इस चिट्ठे को पढ़ने वाले सभी दोस्तों को नया साल मुबारक। इस दिन पर इस चिट्ठे पर बहुत दिनों बाद कुछ बड़बड़।</p>
<p>आज एक नई दहाई शुरु हुई है, जो उम्मीद है दुनिया के लिए कुछ खुश खबर ले कर आएगी। इस सदी की पहली दहाई में आतंक का ही बोलबाला रहा &#8211; 9-11, 26-11, 7-7, ईराक, अफगानिस्तान, ईरान, सूडान, और न जाने क्या क्या? पर घटनाएँ आम तौर पर अंकों की मोहताज नहीं होती। समयचक्र के लिए एक नई दहाई शुरू होने का कोई अर्थ नहीं है।  विश्व घटनाक्रम के लिए 1 जनवरी 2010, ऐसा ही है जैसा कोई और दिन। इसलिए यह उम्मीद करना कि दहाई बदलने से घटनाक्रम बदल जाएगा, खुद को झूठी तसल्ली देना ही है। मैं अंकविद्या में विश्वास नहीं करता, इस कारण व्यक्तिगत जीवन मे सदी या दहाई बदलने से कुछ होगा, यह नहीं मानता। <span id="more-490"></span></p>
<p>यह नई दहाई है या नहीं, यह भी बातचीत का विषय हो सकता है। यह शताब्दी 2000 में शुरू हुई थी या 2001 में? भई देखा जाए तो 31-दिसंबर-2000 बीसवीं शताब्दी का अन्तिम दिन था, और उसी तर्क से 31-दिसंबर-2010, इस शताब्दी की पहली दहाई का अन्तिम दिन होगा। दूसरी ओर अंग्रेज़ी भाषी परेशान हैं कि इस दशक को क्या कहा जाए &#8211;   भई 80s थे, फिर 90s आए, उसके बाद अभी यही समझ में नहीं आ रहा था कि पहले दशक को क्या कहा जाए, कि दूसरा दशक भी आ गया। 10s कहना तो सही नहीं होगा &#8211; पर कोई बात नहीं &#8211; उस शब्दावली से यह नई दहाई शुरू हुई है। </p>
<p>अपने लिए यह पिछली दहाई बहुत परिवर्तन की रही। 2000 में ही भारत से आए, साल भर कैनेडा में रहने के बाद यू.एस. में पैर जमाए। अब पैर तो लगभग जम गए, दिल अभी नहीं जमा। </p>
<p>इस नए साल की शुरुआत आम सालों की ही तरह हुई &#8212; सुबह के डेढ़ बजे पार्टी से लौटे। होशोहवास बराबर रखने, क्योंकि घंटे भर की ड्राइविंग कर के घर पहुँचना था &#8212; वह भी बहुत खराब मौसम में। शून्य के आसपास तापमान, वर्षा के साथ हल्का हल्का हिमपात भी हो रहा था, पुलिस वाले चौकन्ने हो कर ताक लगाए बैठे थे कि कौन लेन से भटके कि उन्हें धर पकड़ें। </p>
<p>&#8211;</p>
<p>नए साल के साथ स्वयं से वादा है इस चिट्ठे पर नियमित लिखने का। आज पहले दिन कुछ खास नहीं, बस यही कि नए साल की शुरुआत कैसे हुई। </p>
<p><strong>श्री शिवा-विष्णु टैंपल</strong></p>
<p><a target="_new" href="http://www.flickr.com/photos/kaul/4235150687/" title="kdk_0445 by Kaul, on Flickr"><img src="http://farm5.static.flickr.com/4070/4235150687_666b7a290d_m.jpg" align="right" width="240" height="180" alt="kdk_0445" /></a>कुछ मित्रों का फोन आया, पहली जनवरी को मन्दिर जाना चाहते थे। देखते देखते तीन युगल इकट्ठे हुए और <a href="http://ssvt.org" target="_new">श्री शिवा-विष्णु टैंपल</a> का कार्यक्रम बना। यह मन्दिर वाशिंगटन डीसी की बेल्टवे (मुद्रिका मार्ग) के पास है, और मेरे घर से कोई 50 मील दूर। बहुत भीड़ थी आज। मन्दिर के अहाते की पार्किंग फुल थी, और मन्दिर के बाहर का पार्किंग लॉट भी फुल था। बहुत दूर जा कर पार्किंग कर के आना पड़ा, और फिर ठंड में पैदल मन्दिर तक पहुँचना पड़ा। </p>
<p>शिवा-विष्णु मन्दिर पर एक दक्षिण भारतीय मन्दिर की झलक है। अन्दर के हॉल में कई छोटे छोटे मन्दिर हैं। प्रवेश करते ही एक शीशे के डिब्बे में ओबामा देवता की भी फोटो देखी। दरअसल यह फोटो उस दिन ली गई थी जब <a href="http://www.whitehouse.gov/photos-and-video/video/president-observes-diwali">व्हाइट हाउस में दीवाली मनाई गई थी</a> और इस मन्दिर ने दीपक, मिठाई और पुरोहित उपलब्ध कराए थे। </p>
<p>खैर मन्दिर में दर्शनाभिलाषियों ने दर्शन किए,  भोजनाभिलाषियों ने भोजन किया <img src='http://kaulonline.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';-)' class='wp-smiley' /> । अब इतनी दूर आए थे तो सोचा कि पास के थिएटर में थ्री ईडियट्स देखी जाए। </p>
<p><strong>थ्री ईडियट्स</strong></p>
<p>थ्री ईडियट्स की बहुत प्रशंसा सुनी थी, और फिल्म उस प्रशंसा पर खरी उतरी। शायद ही कोई और फिल्म देखी हो, जो शिक्षाप्रद होने के साथ साथ इतनी मनोरंजक भी हो। पूरा हॉल हँस हँस कर लोटपोट हो रहा था। कुछ मज़ाक फूहड़ किस्म के थे, पर यह ज़माने की माँग है। फिल्म सोचने पर मजबूर करती है &#8212; अपनी करीयर चॉइसेज़ याद आती हैं, क्या सही किया, क्या ग़लत, बच्चों की करियर चॉइस में हमारा क्या रोल रहता है, वह याद आता है।</p>
<p>यूँ लगता है कि यह दशक हिन्दी फिल्मों के लिए काफी अच्छा रहा। पिछले दिनों तीन फिल्में देखीं और तीनों लीक से हटकर थीं &#8211; पा, रॉकेट सिंह, और अब थ्री ईडियट्स।</p>
<p>एक बार फिर नया साल मुबारक। </p>
]]></content:encoded>
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		<title>हमनाम हमसफ़र</title>
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		<pubDate>Sun, 19 Jul 2009 21:13:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विदेश]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[Kelly Hildebrandt]]></category>

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		<description><![CDATA[यह समाचार रोचक है। आज सुबह एमएसएनबीसी पर देखा, तो सोचा आप के साथ शेयर करूँ। इसी बहाने कई दिन बाद कुछ लिखा जाएगा। तो हुआ यूँ कि केली हिल्डेब्राँड नाम की एक युवती फेसबुक पर थी। उसने सोचा, जैसा कि हम सब सोचते हैं, कि अपने नाम पर खोज की जाए। अब यह नाम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यह समाचार रोचक है। आज सुबह एमएसएनबीसी पर देखा, तो सोचा आप के साथ शेयर करूँ। इसी बहाने कई दिन बाद कुछ लिखा जाएगा। तो हुआ यूँ कि केली हिल्डेब्राँड नाम की एक युवती फेसबुक पर थी। उसने सोचा, जैसा कि हम सब सोचते हैं, कि अपने नाम पर खोज की जाए। अब यह नाम तो इतना आम नहीं है, पर पता लगा कि फेसबुक पर उसी नाम का एक और प्रयोक्ता है, पर वह पुरुष है। उसे ऐसे ही एक संदेश भेजा, कि हम हमनाम हैं तो मैं ने सोचा नमस्ते कह दूँ। बात कुछ आगे बढ़ी, और कुछ समय बाद पुरुष केली  सफर पर रवाना हुए और स्त्री कैली से मिल आए। बात फिर आगे बढ़ी और अब केली और केली शादी कर रहे हैं। जी हाँ, केला और केली नहीं, केली और केली। पूरी कहानी उन्हीं की ज़बानी सुनिए &#8211; <span id="more-412"></span></p>
<div><iframe height="339" width="425" src="http://www.msnbc.msn.com/id/22425001/vp/31992773#31992773" frameborder="0" scrolling="no"></iframe>
<p style="font-size:11px; font-family:Arial, Helvetica, sans-serif; color: #999; margin-top: 5px; background: transparent; text-align: center; width: 425px;">Visit msnbc.com for <a style="text-decoration:none !important; border-bottom: 1px dotted #999 !important; font-weight:normal !important; height: 13px; color:#5799DB !important;" href="http://www.msnbc.msn.com">Breaking News</a>, <a href="http://www.msnbc.msn.com/id/3032507" style="text-decoration:none !important; border-bottom: 1px dotted #999 !important; font-weight:normal !important; height: 13px; color:#5799DB !important;">World News</a>, and <a href="http://www.msnbc.msn.com/id/3032072" style="text-decoration:none !important; border-bottom: 1px dotted #999 !important; font-weight:normal !important; height: 13px; color:#5799DB !important;">News about the Economy</a></p>
</div>
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		<title>सीएनएन और ऐशटन कूचर की ट्विट्टर जंग</title>
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		<pubDate>Thu, 16 Apr 2009 05:22:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[ashton]]></category>
		<category><![CDATA[cnn]]></category>
		<category><![CDATA[kutcher]]></category>
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		<description><![CDATA[140 अक्षरों की संदेश पत्रिका, यानी ट्विट्टर पर आप कितने सक्रिय हैं, इस के तीन मुख्य मापदंड हैं &#8211; आप कितना लिख रहे हैं (अपडेट्स या लेख संख्या), आप कितने लोगों का लिखा पढ़ रहे हैं (फॉलोइंग या पठन संख्या) और आप को कितने लोग पढ़ रहे हैं (फॉलोवर्स या पाठक संख्या)। पहली दो संख्याएँ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a target="_new" href="http://twitter.com/kaulcenter"><img align="right" src="http://kaulonline.com/images/kaulcenter.png" alt="kaulcenter@twitter" /></a>140 अक्षरों की संदेश पत्रिका, यानी ट्विट्टर पर आप कितने सक्रिय हैं, इस के तीन मुख्य मापदंड हैं &#8211; आप कितना लिख रहे हैं (अपडेट्स या लेख संख्या), आप कितने लोगों का लिखा पढ़ रहे हैं (फॉलोइंग या पठन संख्या) और आप को कितने लोग पढ़ रहे हैं (फॉलोवर्स या पाठक संख्या)। पहली दो संख्याएँ बढ़ाना तो आप के अपने हाथ में है, यानी आप बहुत लिखिए और बहुत लोगों को पढ़िए, पर वास्तव में सफलता की निशानी है पाठक संख्या, यानी आप को कितने लोग पढ़ रहे हैं। और यह संख्या बढ़ाना आसान नहीं है।<span id="more-361"></span></p>
<p><a target="_new" href="http://wefollow.com/"><img align="right" src="http://kaulonline.com/images/wefollow.png" alt="wefollow screenshot " /></a>इस के लिए आप को या तो <a target="_new" href="http://twitter.com/aplusk">ऐशटन कूचर</a> या <a target="_new" href="http://twitter.com/britneyspears">ब्रिट्नी स्पियर्स</a> की तरह सेक्सी होना होगा, या <a target="_new" href="http://twitter.com/cnnbrk">सीएनएन</a> की तरह सूचनाप्रद। या फिर कुछ टेढ़े हथकंडे अपनाने पड़ेंगे, जैसे कि हाल में <a target="_new" href="http://twitter.com/mallikasarabhai">मल्लिका साराभाई</a> ने अपनाया, और बहुत से और लोग अपना रहे हैं &#8211; हज़ारों लोगों को फॉलो कीजिए, वे वापस आप को फॉलो करेंगे, फिर आप उन को फॉलो करना बन्द कीजिए, और उम्मीद कीजिए उन को पता नहीं चलेगा और वे आप को वापस फॉलो करना बन्द नहीं करेंगे। फिर भी मल्लिका का आंकड़ा 250 के आसपास ही है।</p>
<p>अभी तक विश्व में कोई भी ट्विट्टर मिलियनेयर नहीं है, यानी दस लाख पाठक संख्या वाला। इसीलिए बात हो रही है <a target="_new" href="http://twitter.com/cnnbrk">सीएनएन</a> और <a target="_new" href="http://twitter.com/aplusk">ऐशटन कूचर</a> के बीच प्रतियोगिता की। इन दोनों के ट्विट्टर खाते इस समय पाठकों की संख्या के लिहाज़ से सब से आगे है, और तेज़ी से मिलियन (10 लाख) की संख्या की ओर बढ़ रहे हैं। बात कुछ अजीब सी है, क्योंकि कहाँ सीएनएन का ब्रेकिंग न्यूज़ ट्विट्टर खाता समाचार का तीव्रतम स्रोत है, और कहाँ ऐशटन जो बस एक फिल्म स्टार है &#8212; वह भी बेहतरीन नहीं। टीवी के <a target="_new" href="http://en.wikipedia.org/wiki/That_%2770s_Show">दैट सेवंटीज़ शो</a> से उभरा यह 30 वर्षीय कलाकार स्वयं से उम्र में पन्द्रह साल बड़ी तारिका डेमी मूर से प्रणय और फिर विवाह के लिए अधिक सुर्खियों में रहा है। </p>
<p><object width="425" height="344"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/1QRyNWLZZmo&#038;hl=en&#038;fs=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/1QRyNWLZZmo&#038;hl=en&#038;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"></embed></object></p>
<p>इस यूट्यूब वीडियो में देखिए ऐशटन सीएनएन को चैलेंज दे रहा है कि वह सीएनएन से पहले ट्विट्टर मिलियनेयर बनेगा। ऐशटन वीडियो में कह रहा है कि यदि उस ने सीएनएन को हरा दिया तो वह एटलांटा में सीएनएन के मालिक टेड टर्नर के मकान पर डिंग-डांग-डिच करेगा। वह क्या होता है? भैया किस ज़माने के हो? मुझे तो एक ज़माने से (श्शश, पाँच मिनट से) मालूम है। विकिपीडिया के अनुसार <a target="_new" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Knock_down_ginger">डिंग-डांग-डिच</a> का मतलब होता है किसी के घर पर जा कर दरवाज़ा खटखटाना, या घंटी मारना, और किसी के दरवाज़ा खोलने से पहले ही चंपत हो जाना। क्या यार, बच्चों वाले काम करते हो। वैसे, जार्जिया प्रदेश में (जहाँ एटलांटा है), डिंग-डांग-डिच करना गैर कानूनी है और अपराधी पाए जाने पर 100 डॉलर का जुर्माना हो सकता है। इस के इलावा वह एक वयस्कों वाला काम भी करेगा &#8211; यदि जीतेगा तो अफ्रीका में 10,000 मच्छरदानियाँ भेजेगा, हारेगा तो 1,000 भेजेगा। सीएनएन ने यह वाली शर्त मंज़ूर कर ली है और वादा किया है कि <a target="_new" target="_new" href="http://www.cnn.com/2009/TECH/04/15/ashton.cnn.twitter.battle/index.html">वे भी ऐसा ही करेंगे</a>। </p>
<p><img src="http://kaulonline.com/images/tweetrace.png" align="right" alt="tweetrace screenshot" />हाँ तो इस समय का स्कोर देखने के लिए ऊपर दी गयी और साथ वाली सारणियाँ देखें &#8211; दोनों स्क्रीनशॉट थोड़ी देर पहले लिए गए हैं, 16-अप्रैल की सुबह। देखते हैं, कौन जीतता है। दो दिन पहले जो अन्तर 50,000 का था अब <a target="_new" href="http://wefollow.com/">वीफॉलो</a> के अनुसार दो हज़ार का रह गया है, पर <a target="_new" href="http://www.tweetrace.com/ ">ट्वीटरेस</a> के हिसाब से अन्तर अभी भी 20,000 से अधिक का है। सीधे ट्विट्टर पर देखने पर भी अन्तर 20,000 से अधिक का दिख रहा है। </p>
]]></content:encoded>
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		<title>मरने से पहले जीना सीख ले</title>
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		<pubDate>Mon, 02 Feb 2009 02:48:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[Lasantha Wickramatunga]]></category>
		<category><![CDATA[randy paush]]></category>
		<category><![CDATA[sri lanka]]></category>

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		<description><![CDATA[ज़िन्दगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी
मौत महबूबा है अपने साथ ले कर जाएगी।
यदि किसी को मालूम हो कि उस का जीवन कुछ दिन, सप्ताह, महीने, में समाप्त होने वाला है, तो उस दशा में उस को कैसा महसूस होता होगा? हाल में कुछ इस तरह के व्यक्तियों के बारे में पढ़ने-सुनने-देखने को मिला। और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://kaulonline.com/images/pausch.jpg" hspace="5" align="right">ज़िन्दगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी<br />
मौत महबूबा है अपने साथ ले कर जाएगी।</p>
<p>यदि किसी को मालूम हो कि उस का जीवन कुछ दिन, सप्ताह, महीने, में समाप्त होने वाला है, तो उस दशा में उस को कैसा महसूस होता होगा? हाल में कुछ इस तरह के व्यक्तियों के बारे में पढ़ने-सुनने-देखने को मिला। और इन लोगों के साहस ने मुझे बहुत प्रेरित किया है। कहने में आसान लगता है, पर यदि मेरे साथ ऐसा हो तो मैं क्या करूँगा? यह सिचुएशन बार बार सोचने पर मजबूर करती है। जब <a href="http://bunokahani.blogspot.com">बुनो कहानी</a> में &#8220;<a target="_new" href="http://bunokahani.blogspot.com/2005/01/blog-post_30.html">मृत्युंजय</a>&#8221; कहानी बुनी जा रही थी, तब भी हम इसी सूरते-हाल का विश्लेषण कर रहे थे। पर वह तो किस्सा-कहानी की बात थी, जो जी में आया <a target="_new" href="http://bunokahani.blogspot.com/2005/02/blog-post_15.html">लिख दिया</a>।</p>
<p>इस पोस्ट को संक्षिप्त रख कर दो और सूक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा जो जीवन-यापन में सहायता कर सकती हैं<span id="more-194"></span></p>
<p>Of course the game is rigged. Don’t let that stop you–if you don’t play, you can’t win. &#8211; <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Robert_A._Heinlein">Robert Heinlein</a><br />
बेशक खेल में धाँधली हो रही है। पर उस से खेलना मत बन्द कीजिए &#8212; खेलेंगे नहीं तो जीतेंगे कैसे। &#8211; <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Robert_A._Heinlein">राबर्ट हाइनलाइन</a></p>
<p>We cannot change the cards we are dealt, just how we play the hand. &#8211; <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Randy_Pausch">Randy Pausch</a><br />
जो हमें पत्ते बाँटे गए, उसे तो हम बदल नहीं सकते, बस अपने खेल को बदल सकते हैं। &#8211; <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Randy_Pausch">रैंडी पाउश</a></p>
<p>यानी दूसरे शब्दों में, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। </p>
<p><a href="http://download.srv.cs.cmu.edu/~pausch/">रैंडी पाउश</a> का लास्ट लेक्चर किस ने नहीं सुना। पिट्सबर्ग की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस के 47-वर्षीय प्राध्यापक रैंडी पाउश को पिछले वर्ष पता चला कि उन्हें पैन्क्रियाटिक कैन्सर है और उन के पास केवल कुछ महीने बचे हैं। उन्हीं दिनों कार्नेगी मेलन वालों ने उन्हें एक भाषण देने को कहा। इस भाषण शृंखला का प्रारूप ही ऐसा था कि कल्पना कीजिए आप को जीवन का अन्तिम भाषण देना हो तो आप क्या कहेंगे। पाउश के केस में यह शायद उन का अन्तिम भाषण ही था। उन्होंने भाषण में कैसे एक सकारात्मक रवैये के साथ बताया कि वे क्या करने वाले हैं, यह आप स्वयं देखिए और सुनिए। भाषण 76 मिनट का है, पर एक एक मिनट कीमती है।</p>
<p><object width="425" height="344"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/ji5_MqicxSo&#038;hl=en&#038;fs=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/ji5_MqicxSo&#038;hl=en&#038;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"></embed></object></p>
<p>यह यूट्यूब वीडियो लाखों-करोड़ों लोगों ने ईमेल द्वारा एक दूसरे को भेजी और देखी। भाषण के बाद रैंडी पाउश इतने मशहूर हुए, उन्होंने इतने लोगों को प्रेरित किया, कि अपने अन्तिम दिनों में एक किताब भी लिख डाली &#8212; उस का नाम भी है <a href="http://www.thelastlecture.com/">द लास्ट लेक्चर</a> और मैं आजकल उसे पढ़ रहा हूँ। बहुत ही प्रेरणादायक पुस्तक है, हालाँकि कई बार लगता है कि क्या वास्तव में यह बन्दा सच कह रहा है। पर फिर ध्यान आता है कि उसकी मृत्यु तो एक सच है, और उस ने उस से पहले जो किया वह सब सच है। </p>
<p><img src="http://kaulonline.com/images/lasantha.jpg" hspace="5" align="right">अभी यह सब फिर याद आया जब पिछले हफ्ते <a href="http://debashish.com">देबाशीश</a> ने मुझे कहा कि <a href="http://www.samayiki.com/">सामयिकी</a> के लिए लसंत विक्रमतुंगा के लिखे अन्तिम संपादकीय का अनुवाद करूँ। यूँ तो आप किसी भी लेख या पुस्तक को सरसरी अन्दाज़ से पढ़ कर समझ सकते हैं, पर जब अनुवाद करना हो तो हर वाक्य, हर शब्द का अर्थ समझना पड़ता है। लेख ऐसा असाधारण हो तो सोचने पर भी मजबूर करता है। लसंत विक्रमतुंगा, जो श्रीलंका के साप्ताहिक पत्र <a href="http://www.thesundayleader.lk/">द संडे लीडर</a> के संस्थापक-संपादक थे, 50 वर्ष के थे, और श्रीलंका के कलह पूर्ण समीकरण से ऐसे जुड़े थे कि उन्हें मालूम था उन्हें किसी भी समय कत्ल किया जा सकता है। यह सोच कर उन्होंने अपना अन्तिम संपादकीय पहले ही लिख रखा था। इसे उनकी हत्या के उपरान्त प्रकाशित किया गया। उन के इस संपादकीय का <a href="http://www.samayiki.com/2009/01/then-they-came-for-me">मेरा अनुवाद</a> सामयिकी पर अवश्य पढ़ें।</p>
<p>रैंडी पाउश और लसंत विक्रमतुंगा विश्व के दो विभिन्न क्षेत्रों से थे, एक को कैन्सर ने मारा और दूसरे को आतंकवाद ने। पर दोनों की आयु में अधिक अन्तर नहीं था। दोनों के तीन छोटे छोटे बच्चे थे, जिन के भविष्य की उन्हें चिन्ता थी। आइए इन दोनों के जीवन से प्रेरणा लें और मरने से पहले जीना सीख लें।</p>
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		<title>चक्कर चार सौ बीस का</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2009/01/chakkar-420-ka/</link>
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		<pubDate>Thu, 29 Jan 2009 03:44:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[420]]></category>
		<category><![CDATA[ganja]]></category>

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		<description><![CDATA[आज बीबीसी की वेबसाइट पर समाचार देखा कि स्पेन की पुलिस ने धोखेबाज़ों के एक गिरोह को 420 मिलियन पाउंड की धोखाधड़ी के लिए गिरफ्तार किया है। यूँ तो इस धनराशि को डॉलर, यूरो आदि में परिवर्तित किया जाए तो कुछ और ही अंक सामने आएँगे, पर फिर भी 420 अंक के संयोग को अनदेखा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img align="left" border="1" hspace="5" src="http://kaulonline.com/images/420.png" alt="420 million pound fraud" />आज बीबीसी की वेबसाइट पर <a href="http://news.bbc.co.uk/2/hi/business/7855679.stm">समाचार</a> देखा कि स्पेन की पुलिस ने धोखेबाज़ों के एक गिरोह को 420 मिलियन पाउंड की धोखाधड़ी के लिए गिरफ्तार किया है। यूँ तो इस धनराशि को डॉलर, यूरो आदि में परिवर्तित किया जाए तो कुछ और ही अंक सामने आएँगे, पर फिर भी 420 अंक के संयोग को अनदेखा नहीं किया जा सकता। गूगल भैया की सहायता से 420 के महत्व को जानने की कोशिश की गई। देस में तो चार-सौ-बीसी या फोर-ट्वेंटी धोखाधड़ी की पर्याय है, पर पश्चिम में यह अंक सुनने को नहीं मिलता। खोज करने पर पता चला कि यदि मैं ने अमरीका में 420 अंक का प्रयोग नहीं सुना तो उस का कारण यह है कि मेरी सही लोगों से (या ग़लत लोगों से?) दोस्ती नहीं है। मालूम हुआ कि यहाँ भी 420 का अर्थ कुछ अच्छा नहीं है। इस का इस्तेमाल गाँजे (मेरियुआना) का नशा करने वालों द्वारा प्रयोग किया जाता है। <span id="more-171"></span></p>
<p>भारतीय उपमहाद्वीप में 420 अंक का प्रचलन इसलिए हुआ है कि डेढ़ सौ साल पुराने भारतीय दंड संहिता (इंडियन पेनल कोड) की <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Section_420">धारा 420</a> का संबन्ध धोखाधड़ी से है। विकिपीडिया के अनुसार पाकिस्तान, बांगलादेश, अफ़ग़ानिस्तान में भी इसी धारा का प्रयोग होता है, और इसी शब्दावली का भी। म्यांमार में भी कभी दफ़ा चार सौ बीस का प्रयोग होता था, और वहाँ भी 420 का यही अर्थ है। नाइजीरिया से आप को <a href="http://potifos.com/fraud/">अमीर बनाने के ईमेल</a> भेजने वाले लोग हम से भले ही इक्कीस हों, पर उन के यहाँ संबन्धित धारा का अंक है चार सौ उन्नीस।</p>
<p>इसी अंक से प्रेरित थी 1955 में बनी मशहूर हिन्दी फिल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shree_420">श्री 420</a>। उस से भी पहले 1937 में बनी थी <a href="http://www.imdb.com/title/tt0361932/">मिस्टर 420</a>, और इस के बाद 1998 में <a href="http://www.imdb.com/title/tt0233422/">चाची 420</a>। पाकिस्तान कहाँ पीछे रहने वाला था, सुना है उन्हों ने भी 1992 में <a href="http://www.imdb.com/title/tt0239674/">मिस्टर 420</a> बना ही डाली।</p>
<p>अमरीका में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/420_(drug_culture)">420</a> &#8220;शब्द&#8221; डेढ़ सौ साल पुराना नहीं है। इस की शुरुआत तब हुई जब 1971 में सैन रफायल कैलिफोर्निया के सैन रफायल हाई स्कूल में छात्र छात्राओं ने स्कूल के बाद 4 बज कर बीस मिनट का समय निश्चित किया नियमित रूप से गाँजा (मेरियुआना) पीने के लिए इकट्ठे होने का। यूँ तो स्कूल आम तौर पर दो बजे छूटता है, पर वह समय था डिटेन्शन के बाद स्कूल से छूटने का। <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/School_punishment#Detention">डिटेन्शन</a> यानी यदि आप स्कूल में किसी भी प्रकार की अनुशासनहीनता करते हैं, तो आप को सज़ा डिटेन्शन के रूप में मिलती है &#8212; यानी आप को स्कूल का समय समाप्त होने के बाद स्कूल में घंटा-दो घंटा अतिरिक्त रुकना पड़ता है। अब यह सब बच्चे तो डिटेन्शन के बाद ही स्कूल से छूट सकते थे न? इसलिए सब की सुविधा के लिए समय रखा गया 4:20 का, और यही बना अमरीका के चार-सौ-बीस का मूल। </p>
<p>उस के बाद नशा करने वालों में &#8220;420&#8243; एक आपसी मेलजोल का पर्याय बन गया। इस के साथ एक और शब्द युग्म प्रचलित हुआ है &#8211; &#8220;420-फ़्रेंडली&#8221; यानी यदि आप किराये पर मकान दे रहे हैं, या खोज रहे हैं, तो आप पेट (pet)-फ्रेंडली (जहाँ कुत्ता बिल्ली आप के साथ रह सकते हैं), स्मोक फ्रेंडली (जहाँ आप सिगरेट पी सकते हैं), 420 फ्रेंडली (जहाँ आप गाँजे का सेवन कर सकते हैं) मकान का इश्तेहार दे सकते हैं। कुछ साइटें हैं जो ऐसे ही लोगों को मिलाती हैं, जैसे कि <a href="http://www.singles420.com/">420 सिंगल्स</a>। एक यह साइट देखिए <a href="http://www.concept420.com/index.html">कान्सेप्ट 420</a>, जिस पर गाँजे से संबन्धित सभी बातों पर आप जानकारी खोज सकते हैं। </p>
<p><img src="http://kaulonline.com/images/ban_concept420.gif" alt="concept420.com" /></p>
<p>अमरीका में केन्द्रीय सरकार ने मेरियुआना के सेवन और बिक्री पर रोक लगा रखी है, पर कुछ राज्यों में इस विषय में ढ़ील बरती जाती है। कुछ लोग इस के औषधिक गुणों के गुण गाते हैं, तो कुछ इस को धार्मिक अथवा पारंपरिक प्रथाओं के लिए आवश्यक मानते हैं।  यहाँ पर कुछ ऐसी संस्थाएँ हैं, जो मेरियुआना संबन्धित कानूनों में सुधार (यानी ढ़िलाई) के लिए कार्यरत हैं। ऐसे ही एक संगठन &#8220;नैश्नल ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर द रिफ़ार्म ऑफ मेरियुआना लॉज़&#8221; की <a href="http://norml.org/index.cfm?Group_ID=4516">इस साइट</a> पर देखिए आप को हर राज्य के मेरियुआना संबन्धित कानूनों की जानकारी मिलेगी &#8212; यानी किस राज्य में कितना गाँजा पीने से या कितना बेचने से आप को कितनी सज़ा मिलेगी। अफ़वाहों का पर्दाफाश करने वाली साइट &#8220;स्नोप्स&#8221; के <a href="http://www.snopes.com/language/stories/420.asp">इस पृष्ठ</a> पर देखिए कि 420 शब्द की उत्पत्ति का सही कारण क्या है, और अफ़वाही कारण कौन कौन से हैं। </p>
<p>भारत में हिन्दुओं की प्रथाओं में भी चरस, गांजे, भांग के प्रयोग के अनगिनत उदाहरण हैं। विकिपीडिया के <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Spiritual_use_of_cannabis">इस पृष्ठ</a> पर देखिए धर्म की आड़ में लोग किस तरह नशीले पदार्थों का प्रयोग करते हैं। </p>
<p>टिप्पणी कर के बताएँ कि आप कौन से चार सौ बीस हैं &#8212; देसी या परदेसी? कुछ नहीं तो होली पर तो भांग पी ही होगी?</p>
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