रमण कौल | 22 जून, 2006

मिक्स्ड डबल्ज़ का तो मैं ने नाम भी नहीं सुना था, पर डीवीडी के आवरण पर कोंकणा सेनशर्मा का नाम देख कर उठा लाया। पेज थ्री और मिस्टर ऐण्ड मिसेज़ अइयर देखने के बाद कोंकणा की एक और फिल्म देखने को मिली। कोंकणा ने नाराज़ नहीं किया।
बॉलीवुड में आजकल अलग ढ़र्रे की कई फिल्में [...]

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रमण कौल | 15 सितम्बर, 2005

परिणीता को रिलीज़ हुए कुछ महीने हो गए हैं, पर मुझे अभी देखने का मौका मिला। देख कर इतनी अच्छी लगी कि यहाँ लिखने का मन हुआ। न तो मैंने शरतचन्द्र का मूल उपन्यास पढ़ा है, और न ही मीनाकुमारी वाली पुरानी “परिणीता” देखी है (देखी भी होगी तो याद नहीं)। इस कारण उत्सुकता के [...]

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रमण कौल | 28 जुलाई, 2005

बंटी और बबली फिल्म में एक गाना है
छोटे छोटे शहरों से, खाली भोर दुपहरों से, हम तो झोला उठा के चले।
बारिश कम कम लगती है, नदिया मद्धम लगती है, हम समन्दर के अन्दर चले।
पिछले दिनों लगता है बड़ा शहर मुम्बई वास्तव में समन्दर के अन्दर चला गया। मुम्बई और आसपास के इलाकों में ४३० [...]

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रमण कौल | 27 जुलाई, 2005

ये वर्ल्ड है ना वर्ल्ड, इस में दो तरह के लोग रहते हैं, एक वह जिन्होंने बंटी और बबली नहीं देखी, और दूसरे वह जिन्होंने देखी है। आज हम “दूसरे” लोगों में शामिल हुए। कई दिनों से पड़ौस की देसी वीडियो दुकान के चक्कर लग रहे थे, अब जा कर मिली है। फिल्म के गाने [...]

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रमण कौल | 21 फरवरी, 2005

आज हम भी “ब्लैक” देख कर आए, और सोचा पहले आशीष जी को धन्यवाद दें — फिल्म को सुझाने के लिए, और इस सुझाव के लिए कि फिल्म को सिनेमा हॉल में ही देखें। हमारा भी यही सुझाव है कि फिल्म को बिलकुल मिस न किया जाए। नाम को देख कर तो लग रहा था [...]

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रमण कौल | 6 फरवरी, 2005

आज “पेज थ्री” देखी। फिल्म देखने के लिए बैठ रहा था तो ज़्यादा उम्मीदें नहीं थीं, सोचा शायद कुछ देर बाद उठ जाऊँगा और परिवार के बाकी लोग देख लेंगे, जैसा घर में आई अक्सर फिल्मों के साथ होता है। शुरू में कुछ धीमी भी लगी पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई, उसका आकर्षण [...]

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