मूल अंग्रेज़ी लेख7 Things to Consider Before Choosing Sides in the Middle East Conflict
लेखकअली अमजद रिज़वी, अनुवादक – रमण कौल


[इसराइल-फ़लस्तीन मुद्दे पर हम सभी अपना अपना पाला चुनते हैं। इस मुद्दे पर संतुलित विचार बहुत कम मिलते हैं। अली रिज़वी, जो एक पाकिस्तानी मूल के कनैडियन लेखक-डॉक्टर-संगीतज्ञ हैं, का यह लेख इस कमी को बहुत हद तक पूरा करता है। लेखक की अनुमति से मैंने मूल लेख को यहाँ अनूदित किया है।]


आप “इसराइल समर्थक” हैं या “फ़लस्तीन समर्थक”? आज अभी दोपहर भी नहीं हुई है और मुझ पर दोनों होने के आरोप लग चुके हैं।

इस तरह के लेबल मुझे बहुत परेशान करते हैं क्योंकि वे सीधे इसराइल फ़लस्तीनी संघर्ष की हठधर्मी कबीलावादी प्रकृति की ओर इशारा करते हैं। अन्य देशों के बारे में तो इस तरह से बात नहीं की जाती। फिर इन्हीं देशों के बारे में क्यों? इसराइल और फ़लस्तीन दोनों के मुद्दे जटिल हैं, दोनों के इतिहास और संस्कृतियाँ विविधता से भरी हैं, और दोनों के मज़हबों में बहुत सी समानताएँ हैं, भले ही ग़ज़ब के विभाजन हों। इस मुद्दे पर दोनों में से एक पक्ष का समर्थन करना मुझे तर्कसंगत नहीं लगता।

ग़ौरतलब है कि विश्व भर में अधिकतर मुसलमान फ़लस्तीनियों का समर्थन करते हैं, और अधिकतर यहूदी इसराइल का। यूँ तो यह बात कुदरती है — पर इसमें एक समस्या भी है। इसका अर्थ यह हुआ कि मुद्दा यह नहीं है कि कौन सही है और कौन ग़लत, बल्कि यह कि आप की वफादारी किस कबीले या देश की ओर है। यानी जो फ़लस्तीनी समर्थक है वह यदि इसराइली या यहूदी परिवार में जन्मा होता तो इतनी ही शिद्दत से इसराइल का समर्थन करता, और उसके उलट भी ऐसा ही होता। मतलब, जिन सिद्धांतों के आधार पर लोग इस झगड़े पर अपनी राय बनाते हैं वे सिद्धांत अधिकतर जन्म के संयोग पर आधारित हैं। और हम मध्य पूर्व के इस पचड़े के विभिन्न पहलुओं पर कितना भी दिमाग़ लगाएँ, कितना भी विश्लेषण करें, आखिरकार यह एक मूलतः कबाइली संघर्ष ही रहेगा।

पारिभाषिक रूप से, कबाइली संघर्ष तभी फलते फूलते हैं जब लोग पक्ष या पाले चुनते हैं। लोगों का पाले चुनना इस तरह के झगड़ों में आग में घी की तरह काम करता है और ध्रुवीकरण को और गहरा करता है। सब से बुरी बात यह है कि आप के पाले चुनने से आपके हाथ खून में रंग जाते हैं।

इसलिए इसराइल-फ़लस्तीन के इस नवीनतम संघर्ष में पाला चुनने से पहले इन सात प्रश्नों पर ध्यान दीजिए

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1. यहूदियों का नाम आते ही मसला और क्यों बिगड़ जाता है?

यह लेख लिखे जाने के समय ग़ज़ा में 700 से ज़्यादा लोग मर चुके हैं। दुनिया के मुसलमान जाग उठे हैं। पर क्या ऐसा वास्तव में मृतकों की संख्या के कारण हुआ है?

बशर-अल-असद ने दो साल में 1,80,000 से अधिक सीरियाइयों को मौत के घाट उतारा है, जिन में से अधिकतर मुसलमान थे। यह संख्या फ़लस्तीन में पिछले दो दशकों में मारे गए लोगों से अधिक है। आइसिस (ISIS) ने ईराक और सीरिया में पिछले दो महीनों में हज़ारों मुसलमानों को मारा है। तालिबान के हाथों भी दसियों हज़ार लोग मरे हैं। सूडान में अरब मुसलमानों ने पाँच लाख अश्वेत मुसलमानों को मौत की नींद सुलाया है। इस सूची का कोई अंत नहीं।

पर ग़ज़ा की बात हो तो दुनिया भर के मुसलमान, चाहे वह सुन्नी हों या शिया, ऐसे बोल पड़ते हैं जैसे वे अन्य मुद्दों पर नहीं बोलते। उनकी सोशल मीडिया टाइमलाइनों पर हर रोज़ ताज़ातरीन मौतों की गिनतियों और गज़ा के बच्चों की लाशों की भयावह तस्वीरों की बाढ़ लग जाती है। यदि यह बात लाशों की गिनती की ही होती, तो क्या ग़ज़ा के इलावा दूसरे तनाज़ों पर अधिक ध्यान नहीं होता? फिर यह बात है तो किस चीज़ की है?

सोचिए यदि असद और आइसिस (ISIS) यहूदी होते तो उनको किस तरह के विरोध का सामना होता?

हैरानी की बात यह है कि इंटरनेट पर प्रसारित हो रही मृत बच्चों की कई तस्वीरें जो इसराइली बमबारी के शिकार बच्चों की बताई जाती हैं, असल में सीरिया की तस्वीरें होती हैं — ऐसा बीबीसी की इस रिपोर्ट में कहा गया है। जिन बच्चों की आप तस्वीरें देखते हैं, उनमें से कई का कातिल असद है, जिसे ईरान का समर्थन हासिल है — वही ईरान जो हिज़बुल्ला और हमास को भी पैसा देता है। मृत बच्चों का इससे ज़्यादा शोषण क्या होगा कि आप अपने समर्थकों द्वारा मारे गए मासूम बच्चों की तस्वीरों का ठीकरा अपने दुश्मन पर फोड़ रहे हों, केवल इसलिए कि जब आपके अपने आपके अपनों को मार रहे थे तो आप पूरा ध्यान नहीं दे रहे थे?

इस सब के बावजूद इसराइली फौज की गुंडागर्दी, लापरवाही, और कभी कभी सरासर क्रूरता, को बख्शा नहीं जा सकता। पर यह बात इस संभवता की ओर इशारा करती है कि अहले इस्लाम का इसराइल विरोध केवल मृत लोगों की संख्या के कारण नहीं है।

मेरी तरह जो लोग मध्य पूर्व या अन्य मुस्लिम-बहुल देशों में बड़े हुए हैं, उन से एक सवाल है — यदि इसराइल अपने कब्ज़े वाले क्षेत्रों से कल एक झटके में फौजें हटा ले और 1967 की सीमाओं पर वापस चला जाए और फ़लस्तीनियों को पूर्व येरूशलम भी दे दे तो क्या आपको ईमानदारी से लगता है कि हमास झगड़ा करने के लिए कुछ और नहीं खोज निकालेगा? क्या आप ईमानदारी से यह सोचते हैं कि इसका वास्ता उनके यहूदी होने से बिल्कुल नहीं है? क्या आपको याद है कि फ़लस्तीन, सऊदी अरब या मिस्र में बड़े होते हुए आपने सरकारी टीवी पर क्या क्या देखा है और क्या क्या सुना है?

हाँ, कब्ज़ा अन्यायपूर्ण भी है और ग़ैरक़ानूनी भी। और हाँ, मानवीय अधिकारों के हनन की तो अति है। पर यह भी सही है कि दूसरी ओर की अधिकांश शत्रुता यहूदी-विरोध का नतीजा है। जो व्यक्ति अरब/मुस्लिम दुनिया में कुछ साल भी रहा हो, उसे यह बात मालूम है। चॉम्स्की और ग्रीनवाल्ड जैसे लेखक जो किसी एक तरफ पर इलज़ाम लगाते हैं, वैसा भी नहीं है। ग़लती दोनों तरफ है।

2. सब लोग यह क्यों कहते हैं कि यह मज़हबी संघर्ष नहीं है?

मध्य पूर्व तनाज़े की “जड़ों” के बारे में तीन व्यापक मिथकों का खूब प्रसारण हो रहा है
मिथक 1 – यहूदी धर्म का यहूदीवाद (ज़ायनिज़्म) से कोई वास्ता नहीं है
मिथक 2 – इस्लाम का आतंकवाद और यहूदी-विरोध से कोई वास्ता नहीं है
मिथक 3 – इस झगड़े का मज़हब से कोई वास्ता नहीं है

जो पहले मिथक के समर्थक हैं और कहते हैं कि “मुझे ज़ायनिज़्म से शिकायत है यहूदी धर्म से नहीं”, मैं उनसे यह पूछना चाहता हूँ कि क्या यह महज़ संयोग है कि बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट की यह पंक्तियाँ आजकल के घटनाक्रम का यथार्थ ब्यौरा देती हैं?

“मैं तुम्हारी सीमाएँ लाल सागर से भूमध्य सागर तक और मरुस्थल से फ़रात नदी तक स्थापित करूँगा। उस भूमि पर रहने वाले लोग तुम्हारे हवाले करूँगा और तुम आने से पहले उन्हें खदेड़ दोगे। उनके साथ और उनके खुदाओं के साथ कोई समझौता मत करना।” – एक्सोडस 23:31-32

या फिर यह?

“देखो मैंने तुम्हें यह भूमि दी है। जाओ और उस भूमि पर कब्ज़ा करो जो मालिक ने तुम्हारे पूर्वजों — इब्राहिम, इसहाक और याकूब — और उनके बाद उनके वंशजों को देने की कसम खाई थी।” – ड्यूटरोनॉमी 1:8

और भी है। जेनेसिस 15:18-21 और नंबर्स रब्बा 34 में सीमाओं के और विवरण दिए गए हैं। ज़ायनिज़्म यहूदी धर्म का “राजनीतिकरण” या उसकी “विकृति” नहीं है, बल्कि उसका पुनर्जीवन है।

और जो दूसरे मिथक के समर्थक हैं और कहते हैं कि “मसला इस्लाम का नहीं, सियासत का है”, वे यह बताएँ कि क्या कुरआन की यह आयत बेमतलब है?

“ओ विश्वास करने वालो, यहूदियों और ईसाइयों को साथी मत बनाना। वे [दरअसल] एक दूसरे के साथी हैं। और तुम में से जो उनका साथी बनेगा वह बेशक उन्हीं में से [एक] हो जाएगा। बेशक, अल्लाह ग़लती करने वालों का पथप्रदर्शन नहीं करता।” – क़ुरआन, 5:51

हमास के घोषणापत्र में जो बहुत सी आयतों और हदीसों का उद्धरण है, उनका क्या? और ग़रक़द वृक्ष की वह प्रसिद्ध हदीस जिसमें मुसलमानों को हुक्म हुआ है यहूदियों को मारने का?

मुझे यह बताएँ — इसराइल के निर्माण और फ़लस्तीन के कब्ज़े के सैंकड़ों-हज़ारों साल पहले लिखे इन वचनों के चलते — कोई यह कैसे कह सकता है कि मज़हब इस सब की जड़ नहीं है, या कम से कम इसकी मुख्य प्रेरक शक्ति नहीं है। आप शायद इन आयतों को नज़र अंदाज़ करें, पर इस युद्ध के दोनों ही तरफ के कई योद्धा इन्हें बहुत गंभीरता से लेते हैं। क्या उन के अस्तित्व को माना नहीं जाना चाहिए या उनकी बात का उत्तर नहीं दिया जाना चाहिए? ऐसा कब हुआ है आपने वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के फैलाव के समर्थन में कोई तर्कसंगत और धर्मनिरपेक्ष बहस सुनी हो?

मज़हब की भूमिका से इनकार करने का उद्देश्य यह लगता है कि लोगों की भावनाओं को “ठेस” पहुँचाने के डर से उनके ऐसे विश्वासों का “क्षमा याचना सहित आदर” भी किया जाए और साथ ही सियासत की आलोचना भी की जाए। पर इन अमानवीय विचारों का क्षमा याचना सहित आदर करने की क़ीमत क्या इतने लोगों की ज़िंदगियों की क़ीमत से बढ़ कर है?

लोगों के तो दुनिया भर के विश्वास होते हैं — कोई ज़मीन को चपटी मानता है तो कोई कहता है हिटलर ने यहूदियों को नहीं मारा। आप उन लोगों के ऐसे विचार रखने के अधिकार का आदर कर सकते हैं, पर उनके विचारों का आदर करने की आपको कोई मजबूरी नहीं हैं। साल 2014 है, और मज़हबों को किसी भी राजनीतिक विचारधारा या दार्शनिक विचार प्रणाली से अधिक आदर देने की कोई ज़रूरत नहीं है। मनुष्यों के अधिकार होते हैं। विचारों के नहीं। इब्राहमी मज़हबों में राजनीति और मज़हब के जिस विभाजन की आम तौर पर दुहाई दी जाती है वह झूठी और भ्रामक है। सारे ही इब्राहमी मज़हब मूलतः राजनीतिक हैं।

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3. इसराइल जान बूझ कर नागरिकों (सिविलियन्स) को क्यों मारना चाहेगा?

यह मुद्दा सबसे ज़्यादा लोगों का पारा चढ़ा देता है, और चढ़ाना भी चाहिए।

निर्दोष गज़ा-वासियों के मारे जाने का कोई औचित्य नहीं है। और ग़ज़ा के एक बीच पर चार बच्चों की हत्या जैसी घटनाओं में इसराइल की लापरवाही के लिए भी कोई बहाना नहीं चलेगा। पर एक मिनट पीछे हट कर इस बारे में सोचा जाए।

इसराइल जान बूझ कर सिविलियन्स को भला क्यों मारना चाहेगा?
जब आम नागरिक मरते हैं तो इसराइल एक दानव सा दिखता है। उसे अपने करीबी समर्थकों का भी गुस्सा झेलना पड़ता है। घायलों और निर्दोष मृतकों की भयावह तस्वीरों की मीडिया में बाढ़ आ जाती है। नॉर्वे से न्यू यॉर्क तक हर जगह इसराइल विरोधी प्रदर्शन होते हैं। और इसराइली घायलों और मृतकों की अपेक्षाकृत कम संख्या (उस पर अभी बात करेंगे) बार बार इसराइल के द्वारा अपेक्षाकृत अधिक बल प्रयोग के आरोपों को जन्म देती है। सबसे बड़ी बात यह है कि आम नागरिकों की मौतों से हमास को बहुत मदद मिलती है। यह सब इसराइल के पक्ष में कैसे हो सकता है भला?

यदि इसराइल आम नागरिकों को मारना चाहता है, तो वह इस खेल में अनाड़ी है। जितने नागरिक इसराइल ने दो सप्ताह में मारे, आइसिस (ISIS) ने दो दिन में उस से ज़्यादा (700 से ऊपर) मारे। कल्पना कीजिए यदि आइसिस या हमास के पास इसराइल जितने हथियार होते, उतनी फौज होती, उतनी वायुसेना होती, अमरीकी समर्थन होता, और परमाणु शस्त्रागार होता, तो उनके दुश्मनों का बरसों पहले नाश हो गया होता। यदि इसराइल वास्तव में ग़ज़ा को नष्ट करना चाहता, तो उसे ऐसा करने में एक दिन नहीं लगता, वह भी बिना ज़मीन पर उतरे। ऐसा कष्टदायक, खर्चीला ज़मीनी हमला क्यों करना जिससे उसके अपने फौजियों की जानें खतरे में पड़ती हों?

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4. क्या हमास वास्तव में अपने नागरिकों को ढाल की तरह इस्तेमाल करता है

फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से ही पूछ लीजिए कि वह हमास के दाँव-पेचों के बारे में क्या सोचते हैं।

“रॉकेट दाग कर तुम लोग क्या हासिल करने की कोशिश कर रहे हो?” वे पूछते हैं। “मुझे फ़लस्तीनी खून का सौदा करना अच्छा नहीं लगता।”
हमास अपने नागरिकों को जंग में आगे करता है, यह अब केवल अंदेशा लगाने की बात नहीं है।

हमास के वक्ता समी अबू ज़ुहरी ने ग़ज़ा के राष्ट्रीय टीवी पर साफ कबूला कि मानव-ढाल रणनीति “बहुत प्रभावी” सिद्ध हुई है।

संयुक्त राष्ट्र की राहत संस्था UNRWA ने पिछले हफ्ते एक नहीं, दो बाल विद्यालयों में छिपाए गए रॉकेट पाए जाने पर हमास की पुरज़ोर निंदा की

हमास इसराइल में हज़ारों रॉकेट दागता है, जिससे मुश्किल से ही कोई नागरिक मरता है या गहरा नुक्सान होता है। हमास इन रॉकेटों को घनी आबादी वाले क्षेत्रों से दागता है, जिस में अस्पताल और विद्यालय शामिल हैं।

ये रॉकेट ऐसे क्यों दागते हैं जिनसे दूसरे पक्ष को तो कुछ ज़्यादा नुक्सान नहीं होता, पर अपने लोगों पर नुक्सान की दावत दी जाती है? और फिर जब उन रॉकेटों का जवाब आता है तो वे अपने नागरिकों को बीच में डाल देते हैं। जब IDF नागरिकों को हमले से पहले घर छोड़ने की चेतावनी देता है, तो हमास उन्हें डटे रहने के लिए क्यों कहता है?

क्योंकि हमास को मालूम है कि जब ग़ज़ावासी मरते हैं तो उनका अपना पलड़ा भारी हो जाता है। यदि कोई एक चीज़ हमास को सबसे ज़्यादा मदद करती है — एक चीज़ जो उन्हें कुछ वैधता प्रदान करती है — वह है आम नागरिकों की मौत। स्कूलों में रॉकेट? हमास अपने बच्चों की मौत को इस्तेमाल करता है दुनिया की हमदर्दी हासिल करने के लिए। वह उन्हें हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है।

हमास से नफ़रत करने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि आप इसराइल को पसंद करें। देखा जाए तो इसराइल और फतह नैतिक रूप से लगभग बराबर हैं। दोनों के हक में कुछ सही बाते हैं। पर हमास की बात करें तो उनके हक में तिनके बराबर भी अच्छाई नहीं है।

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5. लोग इसराइल से ग़ज़ा का “कब्ज़ा” खत्म करने की माँग क्यों करते हैं?

क्योंकि उनकी याददाश्त कमज़ोर है।

2005 में इसराइल ने ग़ज़ा का कब्ज़ा समाप्त किया था। उन्होंने हर आखिरी इसराइली फौजी को वापस बुला लिया था। हर आखिरी बस्ती को हटा दिया था। कई इसराइली बस्तीवाले, जिन्होंने छोड़कर जाने से मना किया, चीखते चिल्लाते बलपूर्वक घरों से खदेड़े गए थे।

यह इसराइल द्वारा एक एकपक्षीय कदम था — इसराइलियों और फ़लस्तीनियों के बीच का टकराव कम करने की एक युद्धविराम मुहिम का हिस्सा। पूरी आज़ादी तो नहीं थी — ग़ज़ा की थल सीमा, जल सीमा, हवाई क्षेत्र पर अभी भी इसराइल का नियंत्रण था — पर इस इलाके के इतिहास को देखते हुए यह एक अच्छी खासी पहल थी।

फौजों की वापसी के बाद इसराइल ने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सीमा चौकियाँ खोली। फ़लस्तीनियों को 3000 ग्रीनहाउस दिए गए जो पहले ही कई सालों से निर्यात के लिए फल और फूल उपजा रहे थे।

पर हमास ने स्कूल, व्यवसाय, या अन्य बुनियादी ढाँचे स्थापित करने में निवेश न करने का निर्णय लिया। बल्कि, उन्होंने सुरंगों का एक बहुत पेचीदा जाल बनाया जिस में हज़ारों हज़ार रॉकेट और अन्य हथियार रखे, जिन में ईरान और सीरिया से हासिल किेए गए नए और जटिल हथियार भी थे। सभी ग्रीनहाउस नष्ट कर दिए गए।

हमास ने अपने लोगों के लिए बम आश्रयस्थल नहीं बनाए। हाँ अपने नेताओं के लिए कुछ बम आश्रयस्थल बनाए ताकि वे हवाई हमलों में उनमें छिप सकें। आम नागरिकों को इन आश्रयस्थलों में जाने की अनुमति नहीं है, बिल्कुल उसी कारण से जिस से हमास उन्हें बमबारी के समय घरों में रहने के लिए कहता है।

2005 में ग़ज़ा को एक बहुत बड़ा सुअवसर मिला था जिसे हमास ने इसे एक इसराइल विरोधी शस्त्रागार में बदल कर गवाँ दिया, बजाय इसके कि इसे एक संपन्न फ़लस्तीनी देश में बदला जाता, जो समय के साथ वेस्ट बैंक के भविष्य के लिए भी एक उदाहरण बन सकता था। यदि फतह को हमास से नफरत करने का एक और कारण चाहिए था, तो उन्हें वह मिल गया।

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6. ग़ज़ा में इसराइल से इतनी ज़्यादा जनहानि क्यों होती है?

इसराइल के नागरिक कम संख्या में मरते हैं इसका कारण यह नहीं है कि उनके ऊपर कम रॉकेट बरसते हैं। यह इसलिए है कि उनकी सरकार उनकी बेहतर सुरक्षा करती है।

जब हमास के प्रक्षेपास्त्र इसराइल की ओर बढ़ते हैं तो साइरन बजने शुरू हो जाते हैं, लौह छतरी (आइरन डोम) प्रभावशाली हो जाती है, और नागरिकों को बम आश्रयस्थलों में दौड़ाया जाता है। जब इसराइली प्रक्षेपास्त्र ग़ज़ा की ओर बढ़ते हैं तो हमास नागरिकों को घरों में रह कर उनका सामना करने को कहता है।

जब इसराइल की सरकार अपने नागरिकों को उनको निशाना बनाकर फेंके गए रॉकेटों से बच निकलने को कहती है, ग़ज़ा की सरकार अपने नागरिकों को उन मिज़ाइलों का सामना करने को कहती है जो उनको निशाना बनाकर नहीं फेंके गए होते।

इसका आम तौर पर यह स्पष्टीकरण दिया जाता है कि हमास के पास धन नहीं है और इसराइल की तरह उसके पास अपने लोगों की सुरक्षा के लिए संसाधन नहीं हैं। परंतु, लगता है कि वास्तविक कारण का वास्ता संसाधनों का कमी से न हो कर उनकी अव्यवस्थित प्राथमिकताओं से है (#5 देखें)। बात इच्छाशक्ति की है, सामर्थ्य की नहीं। वे सारे रॉकेट, मिज़ाइल, और सुरंगें बनानी या हासिल करनी सस्ती तो नहीं है। पर वे उनकी प्राथमिकता है। ऐसा भी नहीं है कि फ़लस्तीन के पास तेल वाले अमीर पडौसियों की कमी है जो उनकी मदद कर सकते थे जैसे अमरीका इसराइल की करता है।

समस्या यह है कि यदि ग़ज़ा में नागरिक हताहतों की संख्या गिरती है तो हमास अपने असरदार प्रचार प्रसार में काम आने वाला इकलौता हथियार खो देता है। इसराइल के राष्ट्रीय हित में है कि वह अपने नागरिकों को बचाए और ग़ज़ा में होनो वाली मौतों को कम से कम रखे। हमास के हित में यह है कि वह दोनों मुद्दों पर इस से ठीक उलट करे।

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7. यदि हमास इतना ही बुरा है तो इस संघर्ष में सभी इसराइल समर्थक क्यों नहीं हैं?

क्योंकि इसराइल की जो बुराइयाँ हैं, वह संख्या में कम भले ही हों, प्रभाव में व्यापक हैं।

ऐसा लगता है कि कई इसराइलियों की वही कबाइली मनोवृत्ति है जो उनके फ़लस्तीनी पडौसियों की है। वे ग़ज़ा की बमबारी पर वैसे ही खुशियाँ मनाते हैं जैसे कई अरबों ने 9/11 के समय मनाई थीं। हाल की एक संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पाया गया कि इसराइली फौजियों ने फ़लस्तीनी बच्चों को यातनाएँ दीं और उन्हें मानव-ढाल की तरह इस्तेमाल किया। उन्होंने नवयुवकों को पीटा। हवाई हमलों में वे आम तौर पर लापरवाही बरतते हैं। उनके उस्ताद उन्हें बताते हैं कि कैसे बलात्कार को वे दुश्मन के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। और कई तो बेदर्दी से और सब के सामने निर्दोष फ़लस्तीनी बच्चों की मौतों का ढोल पीटते हैं

सच कहा जाए तो इस तरह की चीज़ें दोनों तरफ होती हैं। 65 से ज़्यादा सालों से जब लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी एक दूसरे से नफरत करना सिखाया जाता हो तो ऐसा होना स्वाभाविक है। इसराइल से एक ऊँचे मानक की उम्मीद करने का अर्थ है फ़लस्तीनियों से कम की उम्मीद करना, जो एक तरह से नस्लवादी सोच है।

परंतु यदि इसराइल स्वयं को एक ऊँचे मानक पर रखता है, जैसे कि वह दावा करता है, तो उसे इसका बेहतर सबूत देना पड़ेगा कि वह अपने बुरे से बुरे पडौसियों जैसा नहीं है।

इसराइल स्वयं को दो बातों की वजह से बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय अलगाव और राष्ट्रीय आत्महत्या की ओर ओर ले जा रहा है — 1. फ़लस्तीनी इलाकों पर कब्ज़ा, और 2. यहूदी बस्तियों का विस्तार।

बस्तियों का विस्तार एकदम समझ से परे है। इसका मतलब किसी की समझ में नहीं आता। सच पूछो तो हर अमरीकी सरकार — निक्सन से बुश से ओबामा — ने इसका स्पष्ट रूप से विरोध किया है। बाइबल के आदेश (#2 देखें) के अतिरिक्त इसका कोई औचित्य नहीं है, जिसके कारण इसराइल के इरादों को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष समझना थोड़ा और मुश्किल हो जाता है।

फ़लस्तीनी इलाकों पर कब्ज़ा और भी पेचीदा है। दिवंगत क्रिस्टोफर हिचन्स ने सही कहा था, जब उन्होंने फ़लस्तीनी क्षेत्रों पर इसराइली कब्ज़े के बारे में यह बयान दिया था

“यदि इसराइल को मज़हबी बर्बरता, धर्मशास्त्री, या शायद थर्मो-परमाणु-धर्मशास्त्री, या परमाणु-धर्मशास्त्री, जो भी आप कहना चाहते हैं, उसके विरोधी संगठन का हिस्सा बनना है तो उसे कब्ज़े को छोड़ना पड़ेगा। बात सीधी सी है।

इसराइल चाहे तो यूरोपीय, पश्चिमी पद्धति का राष्ट्र बन सकता है, पर वह दूसरे लोगों पर उनकी मर्जी के खिलाफ हुकूमत नहीं कर सकता। वह आए दिन उन की ज़मीनें नहीं चुरा सकता। और इसराइल के लिए यह निहायत ही गैरज़्म्मेदाराना है कि वह अमरीका और उसके दुनिया भर के साथियों की स्थिति को जानते हुए भी इस तरह का अनुचित व्यवहार करे। माफ कीजिेए मुझे इस संघर्ष के इतिहास के विषय में इतना ज़्यादा मालूम है कि मैं इसराइल को भूखे भेड़ियों के समंदर से घिरा हुआ एक छोटा सा द्वीप नहीं मान सकता। मेरा मतलब है कि मुझे काफी कुछ मालूम है कि इस राष्ट्र की स्थापना कैसे हुई, और उसके साथ कितनी हिंसा और छीना झपटी हुई। मैं उस इल्म का कैदी हूँ। मैं जान कर अनजान नहीं हो सकता।”

जैसा 2005 में ग़ज़ा में देखा गया, एकतरफा युद्धविराम की बात करना आसान है पर वास्तव में निभाना मुश्किल। पर यदि इसराइल एक द्विराष्ट्रीय (या शायद हमास की बदौलत त्रिराष्ट्रीय) हल की तरफ और मेहनत से काम नहीं करता तो आखिर उसे चुनना पड़ेगा कि वह एक यहूदी बहुल राष्ट्र रहना चाहता है या एक प्रजातंत्र।

इसराइल को अभी एक रंगभेदी राष्ट्र कहना जल्दबाज़ी होगी, पर जब जॉन केरी ने कहा कि इसराइल भविष्य में शायद एक रंगभेदी राष्ट्र कहलाया जा सकता है तो वह पूरी तरह ग़लत भी नहीं थे। हिसाब सीधा है। गैर यहूदी अक्सरियत के साथ इसराइल अपनी यहूदी पहचान बनाए रखे इसके तरीके सीमित हैं। और उन तरीकों में से कोई भी भला नहीं है।

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इस बात से रूबरू होना ज़रूरी है कि भूमि अब दोनों की है। 1940 के दशक में ब्रिटेन की मदद से यहूदियों के लिए इसराइल फ़लस्तीन से उसी तरह काट कर बनाया गया, जैसे मुसलमानों के लिए मेरा जन्मस्थान पाकिस्तान उन्हीं दिनों भारत से काट कर बनाया गया। दोनों प्रक्रियाएँ पीडादायक थीं और दोनों ने लाखों लोगों को विस्थापित किया। पर अब लगभग 70 साल गुज़र चुके हैं। अब दो या तीन पीढ़ियाँ इस भूमि पर जन्मी हैं और पली बढ़ी हैं, जिनके लिए यह घर है, और जिनको अक्सर ऐसे ऐतिहासिक अत्याचारों का खमियाज़ा भुगतना पड़ता है जिनमें उनकी कोई ग़लती नहीं थी। उन्हें “दूसरों” का विरोध करना वैसे ही सिखाया जाता है जैसे फ़लस्तीनी बच्चों को। मूलतः यह एक कबाइली मज़हबी झगड़ा है, जो तब तक नहीं सुलझ सकता जब तक लोग पाले चुनना नहीं छोड़ते।

इसलिए आपको “इसराइल समर्थक” और “फ़लस्तीन समर्थक” के बीच चुनाव करने की कोई ज़रूरत नहीं है। यदि आप धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, और द्विराष्ट्रीय हल का समर्थन करते हैं — और हमास, बस्ती विस्तार, और कब्ज़े का विरोध करते हैं — तो आप दोनों ही हो सकते है।

उसके बाद भी अगर आपको एक पाला चुनने के लिए कहा जाए, तो कह दीजिए मैं हम्मस (चने से बना एक अरबी व्यंजन) के पाले में हूँ।

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1 Comment on मध्य पूर्व के तनाज़े में पाला चुनने से पहले 7 सवाल

  1. अनुवाद अच्छा है और अनुवाद के लिए चुना गया लेख भी अच्छा है

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