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बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ।

1861 में अंग्रेज़ों की बनाई IPC धारा 377 के अनुसार आदमी-आदमी के प्यार को अपराध करार दिया गया था। आज डेढ़ सौ साल बाद हम इस धारा को हटाने के प्रयासों में असफल हो गए हैं। मेरे हर दोस्त का इस बारे में कुछ कहना है, और बहुत कम लोगों को सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ग़लत लगा है। मुझसे पहले की पीढ़ी के लोगों के ऐसे विचार हों, ऐसा स्वाभाविक है, पर मेरी पीढ़ी और कुछ मुझ से अगली पीढ़ी के कुछ लोगों के भी इस मामले पर विचार कुछ पुराने हैं। स्वयं को इस शोर में अकेला तो पा रहा हूँ, पर एक खुशी है कि यह चर्चा अब बंद नहीं होने जा रही, और जितनी चर्चा होगी, उतनी लोगों को सूचना मिलेगी और उतनी लोगों की आँखें खुलेंगी। ऐसी मेरी उम्मीद है। मैं स्वयं भी पहले समलैंगिकता के विषय पर पूरी तरह निष्पक्ष नहीं था, इस कारण मैं किसी को पूरी तरह दोषी भी नहीं ठहराता। पर जैसे जैसे और जानकारी हासिल की, मेरे विचार बदले। आशा करता हूँ कि और लोग भी आँखें खुली रखेंगे, जानकारी हासिल करेंगे, और फिर निर्णय लेंगे।

भारतीय टीवी चैनलों पर चल रही बहसों को तो इन दिनों नहीं देखा है, पर मित्रों की टिप्पणियाँ देख कर लगता है कि वहाँ 377 के विरोधियों को अपनी बात कहने का कुछ मौका मिला है। हालाँकि फेसबुक को देख कर तो लगता है कि 377 के समर्थकों का ही बोलबाला है। या शायद मेरी संगत ही परंपरा समर्थक लोगों से अधिक है। लोगों की बहुत सारी अवधारणाएँ, पूर्वाग्रह और पक्षपातपूर्ण रवैये इस बीच में सामने आए हैं। लगभग सभी अवधारणाओं वाले लोग बहुत पढ़े लिखे हैं, और विज्ञान का अच्छा ज्ञान रखते हैं, इस कारण अच्छे तर्क को ठुकराएँगे नहीं, ऐसी आशा है।

यहाँ मैं समलैंगिकता के विषय में लोगों के 7 मुख्य पूर्वाग्रहों पर बात करना चाहूँगा।

1. समलैंगिकता से एड्स होता है
यह ग़लत है कि समलैंगिकता से एड्स होता है। जो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। एड्स एच-आइ-वी वाइरस के संक्रमण से होता है जिस के फैलने के कई साधनों में से एक है असुरक्षित और अनेक लोगों (एड्स रोगियों) से सेक्स , वह चाहे विषमलैंगिक हो या समलैंगिक। हाँ, जहाँ तक मेरी जानकारी है anal सेक्स से यह रोग फैलने की संभावना बढ़ जाती है, चाहे वह स्त्री-पुरुष के बीच हो या पुरुष-पुरुष के बीच। इस कारण एड़स के रोगियों में MSM का प्रतिशत अधिक है। पर यदि एक स्वस्थ, समलैंगिक युगल है, परस्पर वचनबद्ध है और उन्हें वाइरस के संपर्क में आने का कोई कारण नहीं है, तो हमारे-आपकी तरह ही उन्हें कभी एड्स नहीं हो सकता। इस कारण यदि आपकी मुख्य चिंता एड्स का प्रसार है तो असुरक्षित सैक्स पर रोक लगाने की बात कीजिए, समलैंगिकता पर नहीं। समलैंगिक संबंधों की परस्पर वचनबद्धता को स्वीकार कीजिए, उनके अपराधीकरण को नहीं।

2. समलैंगिकता एक मानसिक बीमारी है
अमेरिकन मनोचिकित्सक संगठन (APA) कहता है कि ऐसा नहीं है। यह संगठन कोई पाश्चात्य संस्कृति का क्लब नहीं है, पढ़े लिखे मनोचिकित्सकों का संगठन है जो रिसर्च के आधार पर ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा है। आजसे 40 वर्ष पहले यानी 1973 में APA ने अपने DSM (Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders जिसे विश्व के मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक एक मानक के रूप में मानते हैं) में मानसिक विकारों की सूची से समलैंगिकता को हटा दिया था। यदि आप के मन से अभी नहीं हटा तो अब हटा लीजिए। भारतीय मनोचिकित्सक संगठन की साइट पर भी इस विषय पर कुछ रोचक लेख हैं, जो सब इस ओर इंगित करते हैं कि न तो समलैंगिक कोई मर्ज़ी से बनता है, न ही इस “बीमारी” का कोई इलाज है। किसको अच्छा लगेगा समाज में प्रताडित होना?

3. समलैंगकता अप्राकृतिक है
अप्राकृतिक से आपका अर्थ क्या है? यदि आप ईश्वर में विश्वास करते हैं तो यह समझिए कि ईश्वर ने उन्हें ऐसा ही बनाया है और उन्हें समाज का अंग न मानने का आपको कोई अधिकार नहीं है। और ईश्वर की बनाई हुई 1500 पशु जातियाँ समलैंगिक कृत्य करती हैं। यदि आपको लगता है कि उससे बच्चे नहीं होते इसलिए ग़लत है तो यह बताएँ कि क्या सेक्स का मूल उद्देश्य परस्पर प्रेम और आनंद है या बच्चे पैदा करना। आपके द्वारा किए गए कितने यौन कृत्यों का उद्देश्य प्रजनन था? और फिर हर रिश्ता केवल सैक्स पर आधारित नहीं होता। समलैंगिक युगलों का पारस्परिक प्रेम उसी तरह बहुआयामी है, जैसे विषमलैंगिक युगलों का। और यदि आप ईश्वर पर विश्वास नहीं करते तो शायद इस तरह के पूर्वाग्रहों से आप पहले ही मुक्त होंगे। यदि नहीं तो नीचे टिप्पणी करें।

4. समलैंगिकता एक पाश्चात्य बीमारी है, हमारी संस्कृति के विरुद्ध है
मैं तो यह कहूँगा कि धारा 377 पश्चिम की देन है, समलैंगिकता नहीं। यह धारा अंग्रेजों ने 1861 में लागू की थी और इसका मूल स्रोत पश्चिमी पूर्वाग्रह रहे होंगे, न कि भारतीय संस्कृति। अंग्रेज़ चले गए, अपने कानून छोड़ गए। अपने यहाँ जाकर तो उन्होंने बदल दिए पर हम अभी भी उन्हीं से चिपके हुए हैं। हिंदुत्व में समलैंगिकता को उतना स्पष्ट रूप से नहीं नकारा गया है जितना इस्लाम और ईसाई धर्म में। हिन्दू धर्म की पुस्तकों में जहाँ अर्धनारीश्वर की बात है, वहीं शिखंडी का वर्णन है। खजुराहो और अन्य स्थानों पर जो मूर्तियाँ हैं उनमें से कई समलैंगिक संबंधो को दर्शाती हैं (इस पृष्ठ को देखें)। कहना यह है कि भारत की प्राचीन संस्कृति में पुरुष-स्त्री सैक्शुएलिटी के कई आयाम संभव थे। इसके विपरीत मुस्लिम देशों में समलैंगिकता की बात करना भी जुर्म है। पश्चिम के देशों में हालाँकि समलैंगिकों को काफी बराबरी दी जा रही है, पर संस्कृति के पहरेदार वहाँ भी विलाप ही करते रहते हैं। हम यहाँ किन लोगों का अनुसरण करना चाहते हैं — मुस्लिम देशों का या ईसाई कट्टरपंथियों का? बात पश्चिम की नकल की नहीं है, बात है अपने कानूनों को रूढिवाद से दूर रखने की। और फिर, यदि संस्कृति की ही बात करनी है, तो सती प्रथा हमारी संस्कृति थी, जातिवाद और छुआछूत हमारी संस्कृति थी, विधवाओं का शोषण हमारी संस्कृति थी। क्या इन सब को हम निकाल बाहर करने की कोशिश नहीं कर रहे? फिर समलैंगिकों के शोषण को क्यों न निकाल बाहर करें?

5. समलैंगिक लोगों की संख्या नहीं के बराबर है
इस तर्क का प्रयोग इसलिए किया जाता है ताकि यह कहा जाए कि इन लोगों की संख्या इतनी कम है कि इन्हें संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। यह तर्क कई स्तरों पर त्रुटिपूर्ण है। क्या आप लंगड़े, बहरे, अंधे, या वामहस्त लोगों के खिलाफ कानून बनाएँगे क्योंकि उनकी संख्या कम है? दूसरी बात, इन की संख्या नहीं के बराबर इसलिए दिखती है क्योंकि समाज में इन्हें छिपे रहना पड़ता है। यह बात तो मान्य है कि इनकी संख्या विषमलैंगिकों से बहुत बहुत कम है, पर इतनी कम भी नहीं जैसे अहमदीनिजाद के अनुसार ईरान में है। आपके स्कूल में, दफ्तर में, ट्रेन में, आप ऐसे लोगों को देखते होंगे जिनकी लैंगिकता सपष्ट नहीं है, पर वे समाज के डर से सामने नहीं आते। चलिए समलैंगिक लोगों को छोड़िए, हिजड़ों की बात कीजिए। हमारा समाज उन्हें अलग रहने पर और लगभग भीख मांगने पर क्यों मजबूर करता है? वे क्यों नहीं दफ्तरों, स्कूलों में काम कर सकते? क्या वे अपने हालात के लिए खुद ज़िम्मेदार हैं? L, G, B या T कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं होता, न ही वह चाह कर अपनी सैक्शुअलिटी को बदल सकता है। यह सोचिए कि यदि ईश्वर ने आपको या मुझे इस हाल में रखा होता तो क्या होता?

6. सेम सैक्स विवाह से विवाह के पावन रिश्ते पर असर पड़ता है
यह तर्क अभी भारत में अधिक नहीं सुनाई दे रहा क्योंकि भारत में अभी हम समलैंगिक संबंधों के अपराधीकरण में ही अटके हुए हैं। विवाह की बात तो दूर की है। पर पश्चिम में जैसे जैसे सेम-सेक्स विवाह संबंधी कानून बन रहे हैं, ईसाई कट्टरपंथी कहते हैं कि इस से विवाह की परिभाषा बदल जाती है। अरे भाई, तुम्हें कोई थोड़े ही बलपूर्वक गे-मैरिज करा रहा है। तुम्हें जो मर्ज़ी है तुम वह करो। औरों को जो मर्ज़ी है, उनको वह करने दो। बल्कि यदि आप एक समलैंगिक को एक विषमलैंगिक रिश्ते में बांध देंगे तो दोनों का जीवन नर्कमय हो जाएगा — जाने हमारे आपके आसपास ऐसे कितने युगल होंगे। दूसरों के हक को छीनने का हमें क्या हक है, खासकर जब उनके हक से हमें कोई हानि नहीं होती।

7. यदि आप समलैंगिकता की अनुमति देते हैं तो आगे क्या – पशुओं के साथ सेक्स?
कई लोग कहते हैं कि यदि समलैंगिकता की अनुमति दी जाती है तो फिर क्या भाई बहनों के बीच या पशुओं के साथ सेक्स भी सही करार देना पड़ेगा। यह तर्क भी कुतर्क ही है। सबसे बड़ी बात है कि यहाँ बात पारस्परिक सहमति की है, जो पशुओं के साथ नहीं हो सकती। दरअसल कानून केवल ज़बरदस्ती के बारे में होने चाहिएँ न कि सेक्स कैसे करें, किस से करें, इस के बारे में। इसका कोई कारण नहीं है कि यदि आप एक ही लिंग के व्यक्तियों के परस्पर प्रेम को मान्यता देंगे तो उससे यह सब नई मांगें उत्पन्न हो जाएँगी। बल्कि आप यदि धार्मिक रूढिताओं के आधार पर कानून बनाएँगे, को कल और कानून ऐसे बन सकते हैं जो हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आड़े आएँगे।

खैर, तर्कों-वितर्कों का कोई अंत नहीं है। मेरा कहना यह है कि जो लोग समलैंगिकों के अधिकारों के विरुद्ध हैं, वे समय के साथ नहीं हैं। आने वाली पीढ़ियाँ इस कानून से लड़ेंगी और कभी न कभी इस का अंत होगा, वैसे ही जैसे सती प्रथा का अंत हुआ है, अस्पृश्यता का अंत हुआ है (?)। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि उच्चतम न्यायालय ने मूल रूप से कानून को सही नहीं ठहराया पर यह कहा कि इसे बदलने का अधिकार केवल संसद को है। यह बात तकनीकी रूप से सही है, पर यहाँ संसद से कोई उम्मीद रखना बेकार है। उच्चतम न्यायालय के पास एक मौका था इस ऐतिहासिक गलती को सुधारने का और उन्होंने यह मौका गवाँ दिया।

यह बात कुछ हद तक संतोषजनक है कि भारत में इस तरह के कानूनों का उतनी सख्ती से कार्यान्वयन नहीं होता जितना मुस्लिम देशों में। पर फिर भी पुलिस को घूस खाने और लोगों को तंग करने का एक बहाना कम हो सकता था, वह नहीं हुआ। और फिर इससे जुड़ी बहुत सी और समस्याएँ हैं जो इस कानून के चलते नहीं सुलझ सकतीं — LGBT लोगों को मकान, नौकरी, आदि मिलने की मुश्किलें, नौकरियों में समलैंगिकों के विरुद्ध पक्षपात, विवाह न कर पाने, बच्चे गोद ले पाने की मुश्किल, आदि।

इस आशा के साथ कि भविष्य में विश्व के सभी LGBT लोगों को पूरे अधिकार मिलेंगे, आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत करता हूँ।

वैसे एक और बात देखी जाए। हालाँकि धारा 377 को मुख्यतः सेक्शुअल अल्पसंख्यकों के विरुद्ध माना जाता है, पर यह वह काम भी पूरी तरह अंजाम नहीं देता। धारा 377 केवल anal सेक्स को मुजरिमाना करार देती है। इस तरह से स्त्री-स्त्री संबंधों पर तो कोई रोक नहीं होनी चाहिए। और anal सेक्स विवाहित स्त्री-पुरुष के बीच भी मुजरिमाना है — दस साल की सज़ा। इसलिए बात केवल इस वाहियात कानून को निरस्त करने भर की नहीं है, बात है कुल मिला कर अपने समाज में सेक्शुअल अल्पसंख्यकों के विरोध को समाप्त करने की। हाँ, हमारे समाज में PDA कुछ लोगों को uncomfortable कर देता है, इस कारण दोनों, तीनों, सब तरह के युगलों को अपनी सेक्शुअल डिस्पले बेडरूम में छोड़ आनी चाहिए। एक पारंपरिक समाज के साथ इतना तो समझौता करना ही पड़ेगा।

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5 Comments on 377 पर 7 तर्क

  1. Aziz Rai says:

    समय के साथ चलना हमने सीखा ही कहाँ है ! किसी भी अच्छाई को बाद में स्वीकारते हैं और बाद तक स्वीकार किये रहते हैं। तब तक उसमें परिवर्तन हो चुका होता है।

    आपने लोगों के मन में आने वाले एक एक तर्क का जबाब दिया है। और साथ ही उस सम्भावित तर्क का उत्तर भी दिया है जो लोगों कि सोच पर अभी तक हावी नहीं हुआ है। अच्छा तरीका है। कुछ लोगों को यह सोचने में मजबूर कर दिया है कि आखिर हम विरोध किसका और क्यों कर रहें है ?

  2. sayoni sinha says:

    haemin in tathyon se parichit karwane ke liye bahut bahut dhanya vaad….mere jaise samlaingiyon ko ye yuktiyukt, vaigyaanik aur tarksangat tathya paryaapt saahas dega….hum jaise logo ko samajhne ke liya dhanyavaad….

  3. Mohan Chakravaishy says:

    धारा ३७७ पर आपके आलेख में कई बातें स्पष्ट है लेकिन यह भी एकपक्षीय पहलु दर्शाती है | आपने इस सन्दर्भ में जो तर्क रखे है उन्हें पूर्णतः स्वीकार नहीं किया जा सकता | समलैंगिकता को भारत में अस्वीकारने का अर्थ ये नहीं समझना चाहिए की ये महज रूढ़िवादी सोच है बल्कि इसके कई सामाजिक और नैतिक परिप्रेक्ष्य भी है | व्यक्ति समाज के बिना अधुरा है और कोई भी मापदण्ड जो समाज को प्रभावित करें
    1) यदि आप ईश्वर की बात कर रहें है तो ईश्वर ने ही स्त्री-पुरुष के रूप में में विषमलिंगी स्वरुप बनाये है जिससे परस्पर सम्मिलन से पूर्णता हो | इसके विपरीत जाना अथवा मन माफिक परिवर्तन करना ईश्वरीय व्यवस्था का अनादर होगा |
    २) शरीर के जिस भाग का उपयोग मलत्याग के लिए किया गया है उसे यौन संतुष्टि के लिए उपयोग में लाना न केवल अवैज्ञानिक है बल्कि आप्राकृतिक भी है |
    ३) प्रत्येक नागरिक को समाज में ससम्मान रहने का अधिकार है लेकिन किसी स्वछन्दकारी वृत्तियों को मानवाधिकार की दृष्टी से देखना कहीं भी उचित नहीं है |
    ४) जिसप्रकार हर परिवार, समाज की अपनी कुछ व्यवस्था होती है और उसका अनुपालन करना अनिवार्य होता है वैसे ही किसी देश की अपनी अपनी सामाजिक मान्यताय व मापदण्ड होते है जिन्हें सिर्फ रूढ़िवादी कह देना सही नहीं होगा |
    ५) समाजशास्त्र के अनुसार व्यक्ति का समाजीकरण होता है न की किसी व्यक्ति विशेष की मान्यता का समाजीकरण | यदि समाज को नियंत्रित न जाये तो उन्मुक्तता बढ़ेगी और व्यवस्था चौपट हो जाएगी |

    कुछ लोग यदि समलैंगिकता को जन्मगत कमी मानते है तो इसके लिए उनके प्रति ससम्मान सहानुभूति का भाव होना चाहिए न की उनकी स्वच्छंद क्रियाओं को अधिकारिक रूप देकर समाज में इस फैलने दें |

  4. admin says:

    पढ़ने और टिप्पणी करने के लिए धन्यवाद।
    मोहन जी, मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि इस मुद्दे के कुछ सामाजिक परिपेक्ष्य हैं। नैतिक परिपेक्ष्य हैं, इस से मैं सहमत नहीं हूँ। आपने बहुत अच्छे बिंदु उठाए हैं जिनका मैं प्रत्युत्तर देना चाहूँगा।
    1) ईश्वर के बारे में मेरा तथ्य संख्या 3 देखें। यदि मान भी लिया जाए कि सब जीव जंतु ईश्वर ने सोच समझ कर बनाए हैं तो हम किस आधार पर कह सकते हैं कि ईश्वर की क्या इच्छा है? यह लोग भी तो उसी ईश्वर ने बनाए हैं।
    2) तो क्या जो भाग मूत्र त्याग के लिए प्रयोग होता है, उसे यौन संतुष्टि के लिए उपयोग में लाना वैज्ञानिक और प्राकृतिक है? जो भाग बच्चे को दूध पिलाने के लिेए प्रयोग होता है, जो भाग खाना खाने के लिए प्रयोग होता है, यदि उन अंगों के खिलाफ भी कानून बन जाए तो? यह कहाँ का विज्ञान है कि शरीर के एक भाग का एक ही उपयोग हो सकता है?
    3) आप इस तरह के व्यवहार को स्वच्छंदकारी कह रहे हैं, पर सुना है ये लोग यह कृत्य स्वेच्छा से नहीं करते। इनके मस्तिष्क और शरीर की बनावट ही ऐसी है जो इन्हें विपरीत लिंग के बजाय समान लिंग की ओर खींचती है। मनोवैज्ञानिक तो यही कहते हैं। यदि वे एक साजिश के तहत ऐसा कहते हैं तो मैं कुछ नहीं कह सकता।
    4) परिवार-समाज की व्यवस्था में परिवर्तन होते रहते हैं। कुछ समय पहले तक अस्पृश्यता भी समाज की व्यवस्था थी, बल्कि कई स्थानों में अभी भी है। स्त्रियों पर अत्याचार भी समाज की व्यवस्था थी, है। समाज की व्यवस्था के नाम पर एक अन्याय को सदा के लिए सही नहीं ठहराया जा सकता। हो सकता है अभी कुछ और वर्षों या दशकों तक आप डटे रहें, पर भारत जैसे देश में तो यह कानून अंततः हट ही जाएगा। मुस्लिम देशों का नहीं कह सकता।
    5) एक बार फिर, यहाँ बात व्यक्ति विशेष की मान्यता की नहीं, उसके मस्तिष्क एवं शरीर की बनावट की है। आप इस तरह के नियंत्रण को समाप्त करेंगे तो कोई विषमलैंगिक खुशी से समलैंगिक नहीं बन जाएँगे। हमें जो अच्छा लगता है हम वही करेंगे; समलैंगिकता की छूट मिलने पर हम समलैंगिक नहीं बन जाएँगे।
    “कुछ लोग” समलैंगिकता को कुछ भी मानें, मनोवैज्ञानिक इसे एक कमी नहीं पर एक विभिन्नता के रूप में देखते हैं, वैसे ही जैसे कुछ लोग वामहस्त होते हैं। यदि आप इसे कमी मान कर सहानुभूति का भाव भी रखना चाहें, तो भी इसका अपराधीकरण कहाँ तक उचित है?

  5. aman says:

    thanks for giving such a useful support and will you please give me information that how we can know our partner is homosexual ?

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