मैं आजकल राजीव श्रीनिवासन के चिट्ठे का नियमित पाठक बन गया हूँ। राजीव एक 23 वर्षीय युवा चिट्ठाकार हैं – पर इस चिट्ठाकार के विषय में विशेष यह है कि यह जिस जगह से अपना ब्लॉग लिख रहे हैं, वह आजकल विश्व की सब से जोखिम भरी जगहों में से एक है। जी हाँ, राजीव अमरीकी थल सेना में लेफ्टिनेंट (या अमरीकी अंग्रेज़ी में – ल्यूटिनेंट) हैं, और आजकल पलटन कमांडर के रूप में कंदहार अफ्गानिस्तान में तैनात हैं।

राजीव का चिट्ठा मुझे तब मिला जब मैं अमरीकी फौज में भारतीय मूल के लोगों के विषय में जानने की कोशिश कर रहा था। यहाँ परदेस में यह देख कर तो अच्छा लगता है कि भारतीय मूल के लोग डॉक्टरी, सूचना-तकनीकी, विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि क्षेत्रों में छाए हुए हैं, पर तब और अच्छा लगता है जब इस प्रकार भारतीयों को एक असामान्य क्षेत्र में देखते हैं।

पिछले महीने जब निदाल हसन नाम के एक फिलस्तीनी मूल के सैन्य मेजर ने अपनी ही सेना के लोगों पर गोलियाँ चलाईं, तो सेना में विदेशी मूल के लोगों के विषय में उत्सुकता हुई। उसी उत्सुकता के चलते इंटरनेट पर भारतीय मूल के लोगों के विषय में खोज की तो राजीव का चिट्ठा मिला।

पूरी परवरिश वर्जीनिया में होने के बाद भी राजीव अपने भारतीय मूल को नहीं भूले हैं। वे शुद्ध शाकाहारी हैं; जीवन और युद्ध के विभिन्न पहलुओं में भारतीयता और अपनी हिन्दू आस्था को भूलते नहीं। सब से बड़ी बात है कि युद्धक्षेत्र से भी अपना ब्लॉग लिखना नहीं भूलते।

ट्वेंटी समथिंग्स नाम के पोस्ट में राजीव अपनी ब्रिगेड के चैपलेन (सेना के प्रीस्ट) से जीवन मृत्यु के फलसफे के बारे में बात कर रहे हैं, और यहाँ तक कि उन्हें कृष्णार्जुन संवाद का फंडा समझा रहे हैं। ताता वाले पोस्ट में राजीव चेन्नइ में अपने दादाजी के निधन से चिन्तित हैं और उन के नाम एक निबन्ध समर्पित करते हैं – My Battle Within: The Identity Crisis of a Hindu Soldier in the U.S. Army (मेरे भीतर का युद्ध – अमरीकी सेना में एक हिन्दू सैनिक की पहचान का संकट)। इस निबन्ध को हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन ने पुरस्कृत भी किया है।

राजीव के कीबोर्ड में सरस्वती है, पर उन की हास्य भावना भी बहुत खूब है। हायर नाम के पोस्ट में वे लिखते हैं

“अरे, ब्रुक्स!” मैं ने टेंट के भीतर आवाज़ लगाई।

“रोजर, सर!” स्पेशलिस्ट (सिपाही) ब्रुक्स विनोद भरे अन्दाज़ से अपनी चारपाई से उछल कर सावधान की मुद्रा में आया, जिस से मुझे “मैश” टीवी सीरियल के घिसे पिटे सिपाहियों की याद आ गई। हँसी को रोकने की कोशिश में उसके होंठ काँप रहे थे।

“राष्ट्रपति को फोन लगाओ, अभी!”

“रोजर, सर, अभी लीजिए!”

शायद मैंने अपने पाठकों को अभी यह नहीं बताया कि FOB (Forward Operating Base) रैमरॉड में मेरी पलटन के टेंट में अमरीका के राष्ट्रपति के साथ सीधी फोन लाइन है। हाँ जी हाँ, बिल्कुल है। यह फोन एक भारी भरकम काला टचटोन फोन है, जो शायद मेरे पैदा होने से भी पहले खरीदा गया है। ब्रुक्स को हाल ही में घर से मिले पार्सल में प्राप्त चीज़ों में शायद यह सब से बेकार की चीज़ मिली होगी, पर हम ने इस को सही काम में लगा दिया।

इस से आगे वे ओबामा से अपने वार्तालाप के बारे में लिखते हैं। काफी मज़ेदार है, पढ़िए।

हाल के एक और पोस्ट (सिटिंग इंडियन स्टाइल) में राजीव बताते हैं कि कैसे एक अफ़गान सेना के कप्तान के सामने आलथी-पालथी मार कर बैठे और उनसे वह संबन्ध जोड़ा जो शायद एक गोरे सिपाही के लिए आसान न होता। और इससे अगले क्रम के पोस्ट में बता रहे हैं कि कैसे अफग़ानिस्तान में चौकड़ी लगाते लगाते उन के पैर सोने लगे हैं। इस लेख में मुझे उनका लिखा यह सुभाषित भी मिला, जो इस समस्या का अच्छा सार है।

We take people for face value because strong democratic countries allow us the freedom, if not the expectation, to be genuine.

राजीव अमरीकी सेना की प्रतिष्ठित वेस्ट पॉइंट मिलिट्री अकेडमी के ग्रैजुएट हैं। उन के लेखन को देखते हुए लगता है कि युद्घ के अनुभवों के आधार पर उन की लिखी पुस्तक शीघ्र ही उपलब्ध होगी। सैन्य अफसर, चिट्ठाकार होने के अतिरिक्त राजीव BeyondOrders.org को प्रारंभ करने में सहायक रहे हैं। यह साइट एक नॉन-प्रॉफिट संगठन की है जो ईराक और अफगानिस्तान में सैनिकों की ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करता है।

चलते चलते, राजीव के एक टीवी इंटरव्यू का यूट्यूब संस्करण

“राजीव श्रीनिवासन – गांधार के कुरुक्षेत्र से” पर 2 टिप्पणियाँ

  1. ePandit says:

    आपने एक रुचिकर शख्सियत से परिचित कराया। अच्छा लगा, आभार।

    परदेस मैं पहचान का संकट सिर्फ सैनिक को ही नहीं, सभी को होता है। हम तो अपने ही देश के दूसरे प्रान्त में होते हुये भी परदेस जैसा महसूस करते हैं।

  2. आपने चिट्ठाचर्चा वाला काम किया है. साधूवाद. सोच में ही नहीं था कि कोई भारतीय सैनिक अमेरिकन फौज में होगा और वह भी अफगानिस्तान में लड़ रहा होगा. अच्छा लगा.

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