कश्मीर की जंग पॉलीथीन के संग

श्रीनगर, कश्मीर के अंग्रेज़ी अखबार ग्रेटर कश्मीर का ई-पेपर संस्करण देख रहा था तो मुख्यपृष्ठ पर यह रोचक उर्दू विज्ञापन दिखा। विज्ञापन को पढ़िए, स्वयं समझ जाएँगे कि क्या रोचक है इस में। यदि उर्दू नहीं आती तो नीचे हिन्दी अनुवाद दिया हुआ है।


Urdu Ad in GreaterKashmir.com Newspaper against use of plastic bags

श्रीनगर म्यूनिसिपल कार्पोरेशन

पाकीज़ा शहरे-श्रीनगर को मनहूस पॉलीथीन के ज़हर से
पाक रखने के लिए 14 लाख शहरियों को मुबारकबाद

खबरदार, अभी भी चन्द इस्तेहसाल पसन्द अनासिर इस मनहूसियत को वापस
लाने की ताक में हैं।
उन से बचिए, वह आप के दुशमन हैं।
आप किसी भी दुकानदार को पॉलीथीन बेचते हुए पकड़ कर उसे नज़दीकी पोलीस
स्टेशन या म्यूनिसिपल वार्ड में लाएँ।
जो शख्स पॉलीथीन पकड़वाने में मदद करेगा उसे म्यूनिसिपल हुक्काम की तरफ़ से
इनाम दिया जाएगा।
जो शख्स अब पॉलीथीन बैग हाथ में लेकर चलेगा या पॉलीथीन के ज़हर में कोई शै
बेचे, उस पर 5000 रुपए का जुर्माना आयद किया जाएगा और
उस के ख़िलाफ़ म्यूनिसिपल अदालत में केस दायर किया जाएगा।

मेयर …………. कमिश्नर
म्यूनिसिपल कार्पोरेशन …………. म्यूनिसिपल कार्पोरेशन

यानी अब श्रीनगर की पुलिस और स्थानीय सरकार न केवल उन लोगों पर मुकद्दमा चलाएगी जो पॉलीथीन बैग में सामान बेचेंगे, बल्कि उन पर भी जो ऐसी थैली में सामान घर ले जाते हुए पकड़े जाएँगे। वाह री सरकार, आतंकियों को तो पकड़ नहीं पाते हो, आम जनता को लूटने का एक और तरीका खोज निकाल लिया। श्रीनगर को सिंगापोर बनाने का इरादा लगता है मेयर और कमिश्नर साहिबान का।

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4 Comments

  1. यह सिर्फ़ श्रीनगर का ही हाल नहीं है। कुछ मित्र बता रहे थे कि शिमला में भी ऐसा कानून है कि यदि आप प्लास्टिक बैग में किसी को सामान देते हैं अथवा प्लास्टिक का बैग लेकर बाज़ार में निकलते हैं तो आपको पकड़कर आप पर 5000 का जुर्माना किया जा सकता है। अन्य हिल स्टेशनों पर भी प्लास्टिक बैन किया जा रहा है। यहाँ दिल्ली में भी कोई दो महीने पहले लगभग सभी दुकानों ने प्लास्टिक बैग देने बंद कर दिए हैं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर, जो प्लास्टिक बैग देगा उस दुकानदार पर जुर्माना लगेगा। बड़ी दुकानों नें कागज़ के थैले देने आरंभ कर दिए हैं, रिलायंस फ्रेश जैसे स्टोर अब प्लास्टिक के थैले नहीं दे रहे वरन्‌ वे जूट के थैले रखते हैं जिनको तीन रूपए और छह रूपए में खरीदा जा सकता है सामान रखने के लिए। छोटी दुकानों ने थैले देने ही बंद कर दिए हैं क्योंकि वे फ्री में कागज़/जूट के थैले सामान के साथ देना अफोर्ड नहीं कर सकते, इसलिए साधारण कागज़ के लिफ़ाफ़ों में सामान डाल देते हैं, थैले लाना ग्राहक की ज़िम्मेदारी है।

    हिल स्टेशनों के मामले में देखा जाए तो यह अच्छा ही है, लोगों में अक्ल की बहुतया कमी होती है और इस तरह वे जगह-२ प्लास्टिक के थैले आदि फेंक के पर्यावरण की ऐसी कि तैसी करते हैं, थैलियाँ नालियों में बह जाती हैं तो सीवरों में फंस के बहाव को रोकती हैं और उनको जाम कर देती हैं।

    लेकिन सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि कागज़ के थैलों पर भी अवरोध अथवा नियंत्रण लगाए क्योंकि इससे अधिक कागज़ उत्पन्न करने की माँग बढ़ेगी और पेड़ों की कटाई तेज़ी से होगी जबकि पेड़ उतनी तेज़ी से लगते नहीं हैं और न ही उगते हैं। तो इनसे पर्यावरण की और अधिक वाट लग जाएगी। रीसाइकलिंग तो अपने यहाँ माशाल्लाह है ही, इसलिए यह प्लास्टिक से अधिक बड़ा चिंता का विषय है!!

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