ज़िन्दगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी
मौत महबूबा है अपने साथ ले कर जाएगी।

यदि किसी को मालूम हो कि उस का जीवन कुछ दिन, सप्ताह, महीने, में समाप्त होने वाला है, तो उस दशा में उस को कैसा महसूस होता होगा? हाल में कुछ इस तरह के व्यक्तियों के बारे में पढ़ने-सुनने-देखने को मिला। और इन लोगों के साहस ने मुझे बहुत प्रेरित किया है। कहने में आसान लगता है, पर यदि मेरे साथ ऐसा हो तो मैं क्या करूँगा? यह सिचुएशन बार बार सोचने पर मजबूर करती है। जब बुनो कहानी में “मृत्युंजय” कहानी बुनी जा रही थी, तब भी हम इसी सूरते-हाल का विश्लेषण कर रहे थे। पर वह तो किस्सा-कहानी की बात थी, जो जी में आया लिख दिया

इस पोस्ट को संक्षिप्त रख कर दो और सूक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा जो जीवन-यापन में सहायता कर सकती हैं

Of course the game is rigged. Don’t let that stop you–if you don’t play, you can’t win. – Robert Heinlein
बेशक खेल में धाँधली हो रही है। पर उस से खेलना मत बन्द कीजिए — खेलेंगे नहीं तो जीतेंगे कैसे। – राबर्ट हाइनलाइन

We cannot change the cards we are dealt, just how we play the hand. – Randy Pausch
जो हमें पत्ते बाँटे गए, उसे तो हम बदल नहीं सकते, बस अपने खेल को बदल सकते हैं। – रैंडी पाउश

यानी दूसरे शब्दों में, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

रैंडी पाउश का लास्ट लेक्चर किस ने नहीं सुना। पिट्सबर्ग की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस के 47-वर्षीय प्राध्यापक रैंडी पाउश को पिछले वर्ष पता चला कि उन्हें पैन्क्रियाटिक कैन्सर है और उन के पास केवल कुछ महीने बचे हैं। उन्हीं दिनों कार्नेगी मेलन वालों ने उन्हें एक भाषण देने को कहा। इस भाषण शृंखला का प्रारूप ही ऐसा था कि कल्पना कीजिए आप को जीवन का अन्तिम भाषण देना हो तो आप क्या कहेंगे। पाउश के केस में यह शायद उन का अन्तिम भाषण ही था। उन्होंने भाषण में कैसे एक सकारात्मक रवैये के साथ बताया कि वे क्या करने वाले हैं, यह आप स्वयं देखिए और सुनिए। भाषण 76 मिनट का है, पर एक एक मिनट कीमती है।

यह यूट्यूब वीडियो लाखों-करोड़ों लोगों ने ईमेल द्वारा एक दूसरे को भेजी और देखी। भाषण के बाद रैंडी पाउश इतने मशहूर हुए, उन्होंने इतने लोगों को प्रेरित किया, कि अपने अन्तिम दिनों में एक किताब भी लिख डाली — उस का नाम भी है द लास्ट लेक्चर और मैं आजकल उसे पढ़ रहा हूँ। बहुत ही प्रेरणादायक पुस्तक है, हालाँकि कई बार लगता है कि क्या वास्तव में यह बन्दा सच कह रहा है। पर फिर ध्यान आता है कि उसकी मृत्यु तो एक सच है, और उस ने उस से पहले जो किया वह सब सच है।

अभी यह सब फिर याद आया जब पिछले हफ्ते देबाशीश ने मुझे कहा कि सामयिकी के लिए लसंत विक्रमतुंगा के लिखे अन्तिम संपादकीय का अनुवाद करूँ। यूँ तो आप किसी भी लेख या पुस्तक को सरसरी अन्दाज़ से पढ़ कर समझ सकते हैं, पर जब अनुवाद करना हो तो हर वाक्य, हर शब्द का अर्थ समझना पड़ता है। लेख ऐसा असाधारण हो तो सोचने पर भी मजबूर करता है। लसंत विक्रमतुंगा, जो श्रीलंका के साप्ताहिक पत्र द संडे लीडर के संस्थापक-संपादक थे, 50 वर्ष के थे, और श्रीलंका के कलह पूर्ण समीकरण से ऐसे जुड़े थे कि उन्हें मालूम था उन्हें किसी भी समय कत्ल किया जा सकता है। यह सोच कर उन्होंने अपना अन्तिम संपादकीय पहले ही लिख रखा था। इसे उनकी हत्या के उपरान्त प्रकाशित किया गया। उन के इस संपादकीय का मेरा अनुवाद सामयिकी पर अवश्य पढ़ें।

रैंडी पाउश और लसंत विक्रमतुंगा विश्व के दो विभिन्न क्षेत्रों से थे, एक को कैन्सर ने मारा और दूसरे को आतंकवाद ने। पर दोनों की आयु में अधिक अन्तर नहीं था। दोनों के तीन छोटे छोटे बच्चे थे, जिन के भविष्य की उन्हें चिन्ता थी। आइए इन दोनों के जीवन से प्रेरणा लें और मरने से पहले जीना सीख लें।

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“मरने से पहले जीना सीख ले” पर 9 टिप्पणियाँ

  1. nirmlakapila says:

    aapki post ne man me ek naya utsah bhar dya bahut bahut bdhai aur shukria sakaaratmak soch hi jeevan ko manjil tak le jaati hai

  2. जिन्दगी है चार दिनों की…
    पांचवें के फ़िक्र में गुजार दी!

    रमन भाई, सामयिकी पर लसंत विक्रमतुंगा वाले आलेख का अनुवाद कमाल का रहा। लगा ही नहीं कि ये मूल रूप से किसी और भाषा में लिखा गया है।

  3. बेहतरीन लेख। वह लेख मैंने पढ़ा था जिसका अनुवाद आपने किया था। बेहतरीन अनुवाद। बहुत अच्छा लगा!

  4. KAMLESH KUMAR says:

    Good

  5. dheeraj says:

    लिखने का नजरिया बहुत ही बेहतर है । पढ़कर दिल खुश हो गया । आपको बधाई

  6. कुछ दिन पहले एक बुजुर्ग महिला ने कहा सब हमउम्र का साथ छूटता जा रहा है. मुझे पता है की मेरा भी नम्बर आनेवाला है ,पर मैं भगवान की इतनी सुन्दर दुनिया छोड़कर जाने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रही हूँ. जिनके बारे में आपने लिखा वह वाकई साहसी हैं.

  7. dr. kazmi says:

    bahut satik aur sundar anawad kiya gaya hai. Jeewan ki sarthakta his iske anjam par dhyan dena hai.

    bahut bahut shukriya.
    - DR. KAZMI

  8. जमना शंकर says:

    बहुत देर से पढा! लेकिन जीवन मे ताजगी भर गया .

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