मुंबई के स्लम-जीवन पर केन्द्रित स्लमडॉग मिलियनेयर देखकर हॉल से निकलने के बाद अनुभूतियाँ मिश्रित थीं। फिल्म में मुंबई के झोपटपट्टी जीवन की जो छवि दिखाई गई है, उसे देख कर काफी बेचैनी लगी। अमरीकी सिनेदर्शकों से भरे हॉल में ऐसा लगा जैसे हमें पश्चिम वालों के सामने नंगा किया जा रहा है। फिल्म के पहले हिस्से में ऐसा लगा यह क्या देखने आ गए — फिल्म छोड़ कर जाने का भी विचार आया। साथ में यह भी सोचा कि जो दिखाया जा रहा है, अतिशयोक्ति के साथ ही सही, है तो सच्चाई ही। ऐसा लगा कि सलाम बॉम्बे फिर दिखाई जा रही है। अन्तर यह था कि सलाम बॉम्बे में गन्दगी दिखाने वाली हमारी अपनी मीरा नायर थीं, और यह फिल्म अंग्रेज़ निर्देशक डैनी बॉयल ने बनाई है।

तो क्या हॉलीवुड को भारत में गन्दगी के इलावा कुछ नहीं दिखता? यहाँ पर मुद्दे से हट कर एक बात की जाए, तो यह कहा जा सकता है कि हाल के मुंबई हमले ने भारत का एक ऐसा सकारात्मक रूप दर्शाया जो आम तौर पर भारत से बाहर नहीं दिखाया जाता।

यह फिल्म विकास स्वरूप द्वारा लिखित उपन्यास क्यू एंड ए पर आधारित है। जमाल मलिक नाम का किशोर जो झोपड़पट्टी में पला है, और अब एक कॉलसेंटर में चायवाले की नौकरी करता है, कौन बनेगा करोड़पति में भाग लेता है, और दो करोड़ रुपए जीतने के बहुत करीब पहुँच जाता है। चायवाला, और करोड़पति? स्लम का कुत्ता और मिलियनेयर? वह भी एक कुइज़ शो के द्वारा? यह बात शो के होस्ट (अनिल कपूर) को नहीं पचती। बात पुलिस तक पहुँचती है और थर्ड डिग्री के द्वारा जमाल से राज़ उगलवाने की कोशिश की जाती है, कि आखिर उसे इन सब प्रश्नों के उत्तर कहाँ से मिले। हर एक सवाल के जवाब में खुलता है जमाल की ज़िन्दगी का एक अध्याय, और इस तरह फिल्म आगे बढ़ती है। रास्ते में सब वह चीज़ें दिखती हैं जिन से हम भारतीय मुँह मोड़ने की कोशिश करते हैं। बेघरों, भिखारियों, झोपड़पट्टी वासियों की ज़िन्दगी, सांप्रदायिक दंगे, गन्दगी, धोखाधड़ी और जाने क्या क्या।

पहला प्रश्न है अमिताभ बच्चन की एक फिल्म के बारे में। अब यह तो किसी भी भारतीय को मालूम होगा, पर उस प्रश्न के उत्तर को सब से अधिक नाटकीय रूप दिया गया है। जमाल अमिताभ का कितना बड़ा फैन है, यह दिखाने के लिए फ्लैश बैक जाता है जमाल के बचपन में। जमाल हवाई अड्डे के पास एक कूड़े के महाढ़ेर के बीच बने शौचालय में बैठा फुर्सत से मलत्याग कर रहा है। उस का बड़ा भाई सलीम, जो कि बिज़नेस-माइंडेड है, बाहर किसी गाहक से पैसे ले चुका है उस शौचालय के इस्तेमाल के लिए, पर जमाल है कि निकलने का नाम नहीं लेता। गाहक छूट जाता है, और गुस्से में सलीम अपने भाई जमाल को अन्दर ही बन्द कर के चला जाता है। इतनी देर में बाहर शोर मच जाता है कि अमिताभ बच्चन का हेलिकॉप्टर पास में लैंड कर रहा है। अब तो जमाल को बाहर निकलना ही है। बहुत कोशिश करने के बाद जब वह नहीं निकल पाता, तो अन्त में नीचे मल से भरे गड्ढे में कूद जाता है, और सिर से पैर तक मल में सना हुआ दौड़ता है अमिताभ का ऑटोग्राफ लेने के लिए। ऑटोग्राफ तो मिल जाता है, पर जल्द ही उस का भाई उस ऑटोग्राफ किए हुए फोटो को सस्ते में बेच देता है।

इसी तरह हर प्रश्न के साथ कहानी आगे बढ़ती है। फिल्म में रोमांच है, रोमान्स है, बढ़िया अदायगी है। सब अच्छा है, बस केवल यही अच्छा नहीं लगता कि हॉलीवुड को भारत का अच्छा पहलू दिखाने में क्या दिक्कत है। कुल मिला कर फिल्म देखने लायक है, बस दिल कड़ा कर के जाना होगा हॉल में। सुना है भारत में 23 जनवरी को स्लमडॉग करोड़पति के नाम से फिल्म का हिन्दी रूपान्तर रिलीज़ हो रहा है। उस में पश्चिम में दिखाई जा रही फिल्म के मुकाबले कितना परिवर्तन होगा, यह देखने पर ही मालूम होगा।

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8 Comments on स्लम-डॉग मिलियनेयर – एक समीक्षा

  1. कमाल है। अमिताभ बच्चन को देखने के लिये बच्चा मल के गड्डे से होकर निकल आये। क्या कहा जाये!

  2. अच्छी बातें भारत की, पश्चिम को ना भाय.
    नीचा दिखाके भारत को, गुलाम रखना भाय.
    गुलाम रखाना भाय, सिनेमा-निर्देशक तक.
    इसी दिशा में लिये मोर्चा निवेशक तक.
    कह साधक कविराय, बात सुनती शक्ति की.
    शक्ति से मानेगा पश्चिम, बात भारत की.

  3. बहुत बहुत आभार इस फिल्म की चर्चा की साझीदारी के लिए ! भारत कीगंदगी हालीवुड फिल्मों का स्थायी भाव है ! आते ही देखूंगा !

  4. http://www.lavanyashah.com/200.....st_24.html

    ये लिन्क भी देखियेगा – होलीवुड, हिन्दी और ओस्कर पर लिखा हुआ है
    – लावण्या

  5. आपका ब्‍लॉग बेहद पसंद आया।

  6. vidhu says:

    samikshaa aur kahani ke liye dhanyvaad

  7. […] पहलू दिखाने में क्या दिक्कत है। – रमण कौल Cartoon by Kirtish […]

  8. […] articles (Hindi): Slumdog Millionaire Review, Box item on BBC review on Samayiki Tags: Anil Kapoor, Bollywood, Hollywood, Oscar, Slumdog […]

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