वर्डप्रेस 2.3 और एक समस्या

दो बातें संक्षेप में –

वर्डप्रेस का नया संस्करण पिछले सप्ताह जारी हो गया है। यदि आप अपने सर्वर पर वर्डप्रेस इस्तेमाल करते हैं, तो क्या आप ने अपग्रेड किया। यदि नहीं तो कर लीजिए। मैं ने कल ही अपग्रेड किया। अक्षरग्राम जैसे सामूहिक चिट्ठों की भी जिन के पास कुंजी है, वे भी ध्यान दें। इस में कहने को तो कई फीचर्स जोड़े गए हैं, पर अभी तक जो बात मुझे मुख्य लगी वह यह है, कि आप श्रेणियों के अतिरिक्त टैग भी जोड़ सकते हैं।

एक समस्या जो मुझे उम्मीद थी नया संस्करण अपलोड करने से हल हो जाएगी, नहीं हुई। कुछ महीनों से नई टिप्पणियाँ आने पर मुझे मेल नहीं आती, और न ही तब जब कोई टिप्पणी मॉडरेशन के लिए रोकी जाती है। इस कारण टिप्पणियों की मंज़ूरी या उन पर प्रतिक्रिया विलंबित हो जाती है। वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर इस के लिए जो सेटिंग्स ज़रूरी थी, वह सब करने के बाद भी ऐसा हो रहा है। वर्डप्रेस के सपोर्ट फोरम में खोजने पर भी कोई हल नहीं मिला। वहाँ इतनी समस्याएँ अहलित हैं कि लगता है वहाँ लोग सो रहे हैं। आप में से किसी को ऐसी समस्या का सामना हुआ हो और उस का हल पता हो तो बताया जाए।

सोच रहा हूँ, जब कहने को लंबा चौड़ा कुछ न हो तो मुख़्तसर ही सही, कुछ न कुछ लिखा जाए। इस से चिट्ठाकारी और चिट्ठाकारों से संबन्ध बना रहेगा।

छः लाख रुपए में मुँह मीठा कीजिए

Image courtesy: BBC Newsजी हाँ, यही है इस महंगे होटल में इस नए डेसर्ट की कीमत – और यह होटल लंदन, न्यूयॉर्क या टोकियो में नहीं, श्रीलंका के दक्षिणी तट के शहर गालि (காலி) में है।

छः लाख की चॉकलेट आइसक्रीम? इस में हीरे मोती जड़े हैं क्या?

वैसे भी यह होटल (द फोर्ट्रेस) एशिया के सब से महंगे होटलों में है, और वहाँ के कमरे का किराया 1700 डॉलर (68,000 रुपए) तक हो सकता है।

SMS का कमाल, प्रशान्त तामांग

Prashant Tamang and Amit Paulप्रशान्त तामांग बुरे गायक नहीं हैं, पर अमित पॉल से जीतने की शक्ति उन में गाने के आधार पर तो नहीं थी। प्रशान्त की इंडियन आइडल के फाइनल में जीत ने यह साबित कर दिया कि उन के समर्थकों ने एस.एम.एस. द्वारा अमित को ही नहीं, बल्कि और कई अच्छे गायकों को धूल चटा दी। फाइनल तक सब ठीक था – इमॉन, दीपाली, चारू, पूजा, अंकिता जैसे अच्छे गायकों का बाहर हो जाना तब तक नहीं खला, जब तक अमिल पॉल बचा हुआ था और उस के जीतने की उम्मीद मौजूद थी। मैं मानता था कि इस खेल में एसएमएस पर काफी दारोमदार है, पर सारा खेल उसी का है, यह अन्त में प्रशान्त की जीत ने साबित कर दिया।

इंटरनेट पर नेपाल और दार्जीलिंग के कई फोरम चल रहे थे, जहाँ से प्रशान्त के लिए वोटिंग जुटाई जा रही थी। कुछ फ्री एसएमएस का भी जुगाड़ था।

इंडियन आइडल पर मेरे पिछले पोस्ट पर संजय बेंगाणी ने जो भविष्यवाणी की थी, वह सौ फीसदी सच साबित हुई। फिर भी यदि जजों की बातों में, खासकर जावेद अख़्तर की बातों में, कुछ ईमानदारी थी, तो अमित पॉल को पार्श्वगायन का काम मिलना चाहिए।

टैक्सी नंबर 9-11

कल 11 सितंबर थी, और ऐतिहासिक 11 सितंबर की छठी बरसी। कल जितना समय रेडियो सुना, अधिकांश कार्यक्रम इसी घटना से संबन्धित थे। कई कार्यक्रम रोचक लगे – जैसे कि वर्जीनिया की दारुल-नूर मस्जिद के युवा इमाम की कहानी, जिस के लिए अमरीकी मुसलमानों को शान्ति का पाठ पढ़ाना एक चुनोती है, या एक पाकिस्तानी मूल की युवती की आपबीती जिसे ट्रेन में आतंकवादी की नज़र से देखा गया (नीचे पढ़ें)। या फिर न्यू यॉर्क शहर की एक टैक्सी चालिका की कहानी….

मलिस्सा प्लाउट पिछले तीन साल से न्यूयॉर्क में टैक्सी चलाती हैं। यही नहीं, उन का ब्लॉग भी है, और उन्होंने अपने टैक्सी चालन के अनुभवों पर एक किताब भी लिखी है – Hack: How I Stopped Worrying About What to Do with My Life and Started Driving a Yellow Cab.

मलिस्सा का 11 सितंबर वाला लेख आप यहाँ सुन सकते हैं, यहाँ अंग्रेज़ी में पढ़ सकते हैं, और यह रहा उस का हिन्दी अनुवाद..

2004 में वह एक शनिवार का दिन था जब मैं ने पहली बार न्यूयॉर्क में टैक्सी चलाई। जब मैं उस सुबह मैनहैटन की ओर जाने वाले 59थ स्ट्रीट के पुल की ओर बढ़ी तो बाहर अभी धुंधलका था। यूँ तो उस जॉब के पहले दिन की याद मेरे मस्तिष्क में धुंधली हैं, पर कुछ यात्रियों की तस्वीर एकदम साफ है – जैसे कि वह जोड़ा जिसे में ने ग्रैमर्सी पार्क में टैक्सी में बिठाया था। कोई 30-35 साल के थे, बढ़िया कपड़े पहने, एक दूसरे का हाथ थामे।

“बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड होंगे”, में ने सोचा। “ब्रंच करने जा रहे होंगे।”

मैं लोगों को “पढ़ने” की कोशिश कर रही थी, यानी जो कला टैक्सी चालकों को अपने रोज़मर्रा के काम में आते आते आती है, मुझे वहम हुआ कि मुझे पहले ही दिन आ जाएगी। जब यह जोड़ा बैठा तो उन के गन्तव्य स्थान ने कुछ और ही कहानी कही।

“ग्राउंड ज़ीरो प्लीज़।”

“अरे हाँ, बिल्कुल। आज 11 सितंबर है।”

यह तारीख मेरे दिमाग़ के पार्श्व में सुबह से थी, पर इस से यह अगली सीट पर आ गई। उन के टैक्सी में बैठते ही मुझे 11 सितंबर 2001 की वह सुबह याद आ गई, जब मैं डाउनटाउन एक टफ़्तर में काम पर जा रही थी। मैं सबवे की ट्रेन में बैठ गई थी पर कुछ ही मिनट बाद वह टनल में रुक गई थी और लगभग दो घंटे तक हम उस के चलने का इंतज़ार करते रहे।

ट्रेन पर किसी को भनक नहीं थी कि ऊपर क्या हो रहा है। यह पता था कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से एक जहाज़ टकराया है, पर सब यह कह रहे थे कि यह कोई अजीबोग़रीब दुर्घटना है। हम लोग ट्रेन के लेट होने पर कुढ़ते रहे, पर घबराहट किसी को नहीं हुई।

आख़िरकार जब 11 बजे के क़रीब हम लोगों को टनल से निकाला गया तो सड़कों पर हो रहे पागलपन ने मुझे चौंका दिया। पुलिसवाले चिल्ला रहे थे, साइरन बज रहे थे, पे-फोन पर लोगों की कतारें थीं। सब से ज़्यादा मेरा इस बात से माथा ठनका कि लोग खड़ी कारों के गिर्द जमा थे, और रेडियो पर समाचार सुन रहे थे। कुछ बड़ी मुसीबत सी आई दिख रही थी। और जब मैं ने फिफ्थ एवेन्यू की ओर नज़र डाली तो दृष्य अवास्तविक था। पच्चीस ब्लॉक परे, जहाँ टॉवर दिखने चाहिएँ थे, वहाँ केवल धुआँ दिख रहा था।

तीन साल बाद शनिवार की उस शान्त सुबह को टैक्सी में बैठे हुए भी मुझे वह कुछ अवास्तविक सा ही लग रहा था। पर फिर मुझे अहसास हुआ कि मैं इस जोड़े को उस समृति सभा में ले जा रही थी, जो इस शहर के इतिहास के बदतरीन दिन की याद में आयोजित हो रही थी, और वे मृत अपनों का मातम मनाने जा रहे थे।

मैं ट्रैफिक में घुसी तो मुझे लगा मैं किसी ऐसे चालक की तरह हूँ जिसो कोई महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया हो। पूरा रास्ता वे चुपचाप बैठे रहे, और आईने में मैं ने देखा कि वे खिड़कियों से इस शहर को देख रहे थे। मैं ने रेडियो धीमा किया, और उन का सफ़र कुछ आरामदेह करने की कोशिश की।

मैं स्मृति-स्थल के जितना क़रीब जा सकती थी, उतना क़रीब जा कर मैं ने उन को उतारा – रास्ते में उन सब सुरक्षा नाकों और सीमेंट की रुकावटों को पार करते हुए, जो पिछले तीन सालों में खड़ी की गई थीं। किसी भी टैक्सी वाले को इन सब के बारे में पहले ही पता होगा, पर मैं एकदम नई थी, और मुझे डर था कि मेरी सवारियों को इस से झुंझलाहट न हो।

उन्हें परवा नहीं थी। बल्कि वे टैक्सी से उतरे तो उन्होंने मुझे सहृदय धन्यवाद दिया। यह यात्रा कुल दस मिनट की थी, और मैनहैटन के दो मील भर का रास्ता था, पर जब मैं ने उन्हें जाते देखा, मुझे लगा कि उस दिन टैक्सी चला कर मैं इस शहर को कुछ लौटा रही थी।

और अब, उन हमलों की छठी बरसी पर, और टैक्सी चालक के रूप में उस पहले दिन के तीन साल बाद, मुझे ग्राउंड ज़ीरो का रास्ता बख़ूबी मालूम है।

और अब, उस पाकिस्तानी (शायद) मूल की युवती की कहानी, जो मैं ने NPR पर सुनी पर उसे इंटरनेट पर नहीं खोज पाया। उस युवती का लहजा अमरीकी था, पर नाम देसी।

“9-11 के बाद के अमरीका में मुसलमान हो कर लोगों की अजीब नज़रों से बचना काफी मुश्किल काम है। एक घटना खास तौर पर याद आती है। मैं एमट्रैक (अमरीका की “शताब्दी एक्सप्रेस”) की ट्रेन में बैठी, तो मेरे पास वाली सीट खाली थी। गाड़ी चलने से पहले एक महिला जल्दी में आईं और बिना देखे मेरे पास बैठ गईं। कुछ देर बाद उन्होंने मुझे देखा तो हड़बड़ाहट में एकदम उठकर दो कतार पीछे एक सीट पर बैठ गईं। मुझे अजीब लगा, मैं ने मुड़ कर पूछा, क्या हुआ, क्या आप को लगा मैं इस गाड़ी को बम से उड़ा दूँगी? ऐसे में ईमानदारी की उम्मीद करना मुश्किल है, पर उस महिला ने चुपचाप हाँ में सिर हिला दिया। मैं ने कहा, फिर तो दो कतार पीछे भी आप बच नहीं पाएँगी।”