टी.वी.रामन – आँखें खोल देने वाला व्यक्तित्व

इंटरनेट पर, किसे मालूम है कि आप एक कुत्ता नहीं हो। या फिर यह कि आप फिर वही कुत्ता नहीं हो।

यदि आप को मेरा अनुवाद समझ में नहीं आया, तो यह रहा टी.वी. रमण रामन का मूल कथन

On the Internet, no one knows you aren’t a dog! Nor even if you are still the same dog!

जी हाँ, अमरीका के प्रतिष्ठित कॉर्नेल विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त टी.वी.रमण रामन ने सोर्सफोर्ज पर अपने वेबपृष्ठ पर यही लिखा है। दरअसल टी.वी. रमण रामन की दिनचर्या में श्वानवंश की प्राणी हबल का अच्छा खासा योगदान है। रमण रामन नेत्रहीन हैं, और उन की उपलब्धियाँ मुझ जैसे लाखों आँखों वालों को शर्मिन्दा कर देंगीं।

हाल ही में डा. रमण रामन के बारे में तब पता चला जब गूगल ब्लॉग पर उन की यह प्रविष्टि दिखी। इस में वे गूगल के एक अनूठे इस्तमाल के बारे में बता रहे हैं – यदि आप को किसी शब्द, विशेषकर व्यक्तिवाचक संज्ञा (स्थान आदि का नाम) के हिज्जों में कन्फ्यूजन है तो उसे गूगल पर खोज कर देखें। वे आजकल गूगल में काम करते हैं, और इंटरनेट को नेत्रहीन लोगों के लिए सुलभ बनाने के कार्य में जुटे हुए हैं। उन की यह प्रविष्टि भी पढ़िए जिस में वे बताते हैं कि नेत्रहीन लोगों के लिए उन का गूगल खोज इंजन कैसे उन वेब पृष्ठों को प्राथमिकता देता है जिन पर चित्र कम हैं, और इस कारण उन्हें नेत्रहीनों द्वारा प्रयुक्त वाचक यन्त्र द्वारा सरलता से पढ़ा जा सकेगा।

डा. रमण रामन ब्लॉगिंग समुदाय के सक्रिय सदस्य हैं, और जैसा उन के ब्लॉगर प्रोफाइल से मालूम होता है, वे कई तकनीकी चिट्ठों के मालिक हैं।

Image source http://emacspeak.sourceforge.net/raman/वेब सुलभता (नेत्रहीनों के लिए) के विषय पर अपने साक्षात्कार में डा. रमण रामन अपनी सर्च इंजन तकनीक के बारे में और काफी जानकारी देते हैं। अपने बारे में पूछे जाने पर वे संक्षेप में बताते हैं – “ज़रूर, http://emacspeak.sf.net/raman”। और वहाँ जाने पर उन के काम की और जानकारी मिलती है। उन के रिज़मे से पता चलता है कि उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से गणित में स्नातन के बाद आइ.आइ.टी. मुंबई से कंप्यूटर विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है, और फिर कॉर्नेल से एम.एस. और पी.एच.डी.।

ज़ाहिर है, नेत्रहीनों के कंप्यूटर में मॉनीटर का कोई काम नहीं है। उन के प्रोग्राम और वेबपृष्ठ दिखते नहीं, बोलते हैं। शब्दों की प्राथमिकता है, चित्रों की नहीं। क्या निकट भविष्य में हिन्दी के लिए ऐसा काम हो सकेगा? जब टी.वी.रमण रामन की प्रविष्टियों पर इस प्रविष्टि का पिंगबैक आएगा, तो क्या वे इसे “पढ़” पाएँगे?

मेरे लिए ऐसे व्यक्ति बड़ी प्रेरणा के स्रोत होते हैं, जो कठिनाइयों के बावजूद अपने लिए जगह बनाते हैं, न कि वे जो शिकायतों में ही सारी ज़िन्दगी निकाल देते हैं। टी.वी.रमण रामन को मेरा शत् शत् नमन।

जिन लोगों को दक्षिण भारतीय नामों की पहचान हो क्या वे बता सकेंगे कि क्या सही उच्चारण रमण है, या रामन्?

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7 Comments

  1. साधुवाद इस अनुपम, अद्वितीय व्यक्तित्व को। यह कल्पना करना कठिन है कि वे नेत्रहीन होने के बावजूद कंप्यूटर जगत में इतना काम कर रहे हैं।

    गूगल ब्लॉग पर उनकी पोस्ट पढ़ी। मैं काफी समय से सही स्पैलिंग जानने के लिए इस तरीके को प्रयोग कर रहा हूँ। लेकिन मुझे नहीं लगता था कि यह भी एक तकनीकी टिप कही जा सकती है। यदि ऐसा है तो मैं इस पर एक पोस्ट लिख सकता हूँ। सच है ब्लॉग ही एक ऐसी चीज है जिस पर कुछ भी लिखा जा सकता है। 🙂

  2. “…रमण नेत्रहीन हैं, और उन की उपलब्धियाँ मुझ जैसे लाखों आँखों वालों को शर्मिन्दा कर देंगीं।…”

    आपने सचमुच आंखे खोल देने वाली बात बताई. रमण जी को नमन्.

  3. रमण कौल जी, धन्यवाद आपका कि आपने डॉ Raman से अवगत हेतु।
    उनके नाम का सही उच्चारण रामन है।

  4. सभी टिप्पणियों के लिए धन्यवाद।
    श्रीश, स्पेलिंग के बारे में डा.रामन की यह कड़ी भी देखें। गूगल इंटरनेट पर प्रयुक्त हिज्जों में से अधिक प्रयुक्त हिज्जे को सही मान कर आप से पूछता है, “Did you mean …”। आशा है भविष्य में “श्रीष” खोजने पर वह पूछे कि “क्या आप श्रीश खोजना चाहते हैं?”। वैसे हिन्दी पृष्ठों पर ग़लत वर्तनी की इतनी भरमार है कि गूगल भी चकरा जाता होगा।

    वसन्त जी यह महत्वपूर्ण सूचना देने के लिए धन्यवाद। मैं भी यही सोचता था, पर मुझे याद है नोबल विजेता सी.वी.रमण के बारे में हिन्दी पुस्तकों में पढ़ते हैं तो हमेशा रमण ही लिखा मिलता है। क्या उन का नाम भी चन्द्रशेखर वेंकट रामन है? या वेंकटरामन? रोमन स्क्रिप्ट में लिखे जाने पर नाम बिगड़ जाता है, यह तो स्वाभाविक है, पर हमारे अपने देश के नाम हमारी अपनी लिपि में बिगड़ जाएँ, यह सही नहीं है।

  5. धन्यवाद, डॉ. रामन से परिचित कराने के लिए।

    हिन्दी के वेबपेज को सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी के जरिए टेक्स्ट से स्पीच में बदलने की दिशा में काम तेजी से चल रहा है, सी-डैक, पुणे में। मैंने टेक्स्ट टू स्पीच का परीक्षण खुद तो नहीं किया है, लेकिन मेरे वहां के मित्र मुझे इसकी प्रगति के बारे में अपडेट करते रहते हैं समय-समय पर।

    हिन्दी में स्पीच टू टेक्स्ट वाले सॉफ्टवेयर पर मैंने परीक्षण किया है और अभी तक की प्रगति से मैं कुल मिलाकर संतुष्ट हूं।

    शायद भारत के कुछ और संस्थानों में इस पर काम चल रहा है। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट तो इस दिशा में कार्य कर ही रहे हैं। आशा है कि बहुत जल्द कंप्यूटर-इंटरनेट और मोबाइल पर यह टेक्नोलॉजी लोकप्रिय हो जाएगी।

  6. सृजन शिल्पी जी, टिप्पणी के लिए धन्यवाद। शायद नेत्रहीनों के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट की दुनिया में लेखन-से-ध्वनि या ध्वनि-से-लेखन की तकनीकें पूरी तस्वीर का केवल एक हिस्सा हों। हमारे लिए यह सोचना काफी मुश्किल है, कि वे किस तरह वेब-सर्फिंग करते होंगे। यह कैसे पता चलता होगा कि इस शब्द के साथ हाइपरलिंक है, और यदि है तो उसे क्लिक कैसे करते होंगे। यूआरएल कैसे डालते होंगे, कीबोर्ड किस तरह का होगा। यह अपने आप में पूरी दुनिया है, जो हम से अलग ज़रूर है, पर हम से कमतर कतई नहीं – कम से कम नेत्रहीनों की “नज़र” में तो नहीं।

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