मोहल्ला हिन्दी चिट्ठा जगत में एक कैन्सर बन कर उभर रहा है — ऐसा कैन्सर जिस का कोई इलाज नहीं लग रहा। इस चिट्ठे का और इस से जुड़े कुछ और चिट्ठों का एक ही मकसद है – हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों को हिन्दू मुस्लिम झगड़े में उलझाना। हम लोग अच्छे खासे भाईचारे में चल रहे थे, इन चिट्ठों ने तूफान मचा दिया। आम तौर पर चिट्ठे मुक्त लेखन में विश्वास करते हैं – कभी कुछ लिख दिया कभी कुछ, और स्वाभाविक है इस में कभी कभार धर्म-समाज आदि की भी बात आ जाती है। पर कुछ चिट्ठे किसी एक थीम पर ही आधारित होते हैं – कुछ खेल पर, कुछ तकनीकी विषयों पर, कुछ मनोरंजन पर। और इन्होंने एक समाज विशेष को लताड़ना अपनी थीम बना रखा है, इसी का ठेका ले रखा है। यह लोग कोई समस्या हल नहीं करना चाहते, चाहते तो एक तार्किक बहस में यकीन रखते। पर यहाँ तो अहं की अति है, और दूसरों पर लांछन लगाने की अति है। एक ही कूची से सभी को रंगने की मानसिकता है। जो प्रश्न उन्हीं के विषय के सन्दर्भ में पूछे जाते हैं, उन्हें सन्दर्भहीन कहा जाता है। और खुद बेबुनियाद इलज़ाम लगाते जाते हैं दूसरों पर। जो लोग दावे के साथ यह कहें कि अमरीकी सरकार ने स्वयं वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, पैंटागन पर हमला कर के हज़ारों लोगों को मारा, और गुजरात सरकार नें स्वयं गोधरा में कार सेवकों को जलाया, उन लोगों को किसी तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, न आप उन से तर्क या प्रमाण की बात कर सकते हैं। वे सिर्फ एक समुदाय को ही दूध का धुला समझते हैं और उस के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

उन के चिट्ठे पर कई बार टिप्पणी करने पर कोई हल नहीं मिला। कीचड़ में पत्थर फेंकते हैं तो खुद को छींटें आती हैं। और उन का मक़सद पूरा हो जाता है गन्द फैलाने का। अपने चिट्ठे पर मैं उन के प्रश्नों का उत्तर दे देता, पर मैं अपने चिट्ठे पर यह कीचड़ नहीं लाना चाहता। इसलिए मैं ने निश्चय किया है कि मैं इन लोगों से बहस में अपना समय नष्ट नहीं करुँगा। मैं ने अपने फीड रीडर से इन की फीड हटा दी है। नारद की फीड में इन की नफरत दिखती रहेगी, पर कोशिश करूँगा कि उस में से सही पोस्टें ही चुन कर पढ़ूँ। मैं उन सब चिट्ठाकारों और पाठकों से अपील करता हूँ कि यदि आप मोहल्ले की विभाजक विचारधारा से सहमत नहीं हैं, तो उन को अपने उद्देश्य में सफल न होने दें। उन के ब्लॉग पर टिप्पणी करना बन्द कर दें। अपने चिट्ठों पर भी इस विभाजक विषय पर लिखना बन्द कर दें। यदि वे आपस में ही बहस करते रहना चाहते हैं तो करें। यदि उन को इसी में अपनी जीत लगती है तो लगे। हमें इस रोज़ रोज़ के झगड़े में दिलचस्पी नहीं है। हम ने काफी कोशिश की कि इन का विलाप बन्द हो, पर यदि इन के पास और कोई विषय नहीं है तो क्या करें। बाकी लोगों के पास और भी काम हैं, और भी ग़म हैं।

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29 Comments on मोहल्ले के कैन्सर से बचाव के लिए एक अपील

  1. kakesh says:

    बिल्कुल सही बात लिखी आपने रमन भाई . मैं भी आजतक इन पर लिखने से बच रहा था. पर आज कुछ ऎसे ही भाव की टिप्पणी भी की और पोस्ट भी लिखी.

    http://kakesh.wordpress.com/20.....laa_badlo/

    हमें बचना होगा उस कुचक्र में फसने से.

    काकेश

  2. अरुण says:

    कृपया “सुनो नारद” पर भी भेजें। आपकी राय सही है मै खुद यही कर रह हूँ।

  3. आज पंगेबाज ने अपने चिठ्ठे पर पत्तो पर कुछ तस्वीर सजायीं है.
    वो वाकई मजेदार है

  4. सागर चन्द नाहर says:

    मैने भी बहुत कुछ सहने के बाद नारदजी से शिकायत की पर अनूकूल उत्तर ना मिलने पर ऐसे गन्दे माहौल में चिट्ठा लिखने की बजाय नारद से बाहर निकलना ही ठीक समझा, रोज सुबह नारद लोगिन करो और सबसे पहले सड़ी हुई पोस्ट दिखती थी।
    इतने दिन से जहर फैलता रहा और सभी लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नारा लगाते रहे, जब एक मामूली टोटके लिखने वाले चिट्ठे को हटाया जा सकता था तो जहर फैलाने वाले लेखों वाले चिट्ठों को क्यों नहीं? दर असल हमें मोह था मिडिया पर प्रसिद्ध होने का।
    कुछ लोग मेरे जाने को नाटक कह रहे हैं, मैने उन्हें कुछ नहीं कहना जिसको जो इच्छा है समझे, पर सत्य यही है कि मैने आपना चिट्ठा सिर्फ और सिर्फ इन वाहियात चिट्ठों की वजह से हटाया है और मैने अपना नाम भी नरद से हटा लिया है।
    पहले तो जहर की शुरूआत हुई फिर रवीश ले कर आये सुन्दर गालियाँ अब कुछ दिनों में मस्तराम ब्रांडके चिट्ठे भी आयें और वो अगर किसी मीडिया ग्रुप के हों तो स्वागत कीजिगा भाई क्यों कि वो नारद का जिक्र अपने चैनल पर करेगा।
    इतने दिन जब वो लोगों को कहता रहा कि आप हत्यारे हो कितने मुसलमानों को मारा? तब किसी ने उन्हें चेतावनी नहीं दी पर जब आज नारद के संचालकों को भला बुरा कहा तो खेमें में दौड़धाम मच गई?

    मैं जानता हूँ आप सब कहेंगे कि आप मोस्ट सेन्टी या अजीब सेन्टी जीव हो, पर हाँ में स्वीकार करता हूँ कि मैं मोस्ट सेंटी हूँ पर नारद जिस पर एक साल गुजारा है उस पर इस तरह का दंगल देखने की मुझमें हिम्मत नहीं है|
    यह इस विषय पर मेरी अंतिम टिप्पणी अब सचमुच का अलविदा। 🙂

  5. मैं आपकी बातों से पूरी तरह से सहमत हूं और आपका समर्थन करता हूं। अपनी पोस्टों पर मोहल्ले या इस तरह के चिट्ठों को हाइपरलिंक से जोड़ने से भी बचा जाए। वे इतने (कु)ख्यात हो चुके हैं कि आप मो…भी लिख देंगे तो समझने वाले समझ जाएंगे।

    सुनो नारद पर शायद कुछ साथियों ने इसी तरह का भाव व्यक्त किया है, लेकिन उससे कोई समाधान शायद ही निकले। क्योंकि-

    1. मोहल्ला अपने ट्रैफिक के लिए पूरी तरह नारद पर निर्भर नहीं है। यदि फिलहाल उन्हें नारद से काफी हद तक ट्रैफिक मिलता भी है तो वे ज्यादा समय तक नारद पर निर्भर रहने वाले नहीं हैं।
    2. नारद की एडवाइजरी टीम का विस्तार किया जाना जरूरी है, अभी वह दो सदस्यीय है। इस तरह का पैनल विषमसंख्यक होना चाहिए, ताकि जरूरी होने पर बहुमत से फैसले लिए जा सकें। नारद के प्रबंधन से मैं इस पैनल में रमण कौल जी को शामिल किए जाने का अनुरोध करता हूं।
    3. मोहल्ले ने अब जो हरकत की है, वह नारद के क्षेत्राधिकार के दायरे में बहुत कम आता है। वह आता है भारत के संविधान और क़ानून के दायरे में और उसपर स्पष्ट रूप से संज्ञेय अपराध का मुकदमा बनता है, इस पोस्ट के लिए। यदि कोई मुकदमा करना चाहे तो मैं आवश्यक क़ानूनी सलाह और मदद का प्रबंध कर सकता हूं। लेकिन ऐसा करने से उसे अनावश्यक प्रचार मिलेगा, यह भी ध्यान रखें।
    4. बेहतर यही है कि हम मोहल्ले की पोस्टों को पढ़ना और उनपर टिपियाना बंद कर दें। नारद या किसी अन्य एग्रीगेटर अथवा अपनी फीड से उसे हटा दें।
    5. कुछ लोग हममें से अवश्य होंगे जो ‘दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त’ में यक़ीन रखते होंगे, ऐसे लोगों को भी नमस्कार करना चाहिए।

  6. आप सब की टिप्पणियों के लिए धन्यवाद। आइए मिल कर इस कैन्सर को isolate करें। कल के पोस्ट में जो जान बूझ कर अविनाश ने हिन्दुओं के खिलाफ वाक्य लिखे हैं, उस से उन लोगों के ज़ेहन का पता चलता है जो मन्दिर के बाहर मरी गाय छोड़ देते हैं, या मस्जिद के बाहर मरा सूअर। यह एक जानी मानी साज़िश लग रही है आग लगाने की। हमें इसे सफल नहीं होने देना है। नारद से हटाए जाने पर ये लोग शहादत का कफ़न ओढ़ लेंगे। इस लिए मैं नारद से हटाए जाने के पक्ष में नहीं हूँ, पर कुछ ऐसा होना चाहिए कि रोज़ उठ कर इन की पोस्ट न देखनी पड़े। साम्प्रदायिक झगड़ों का अलग टैब हो ताकि जिस की उस में रुचि हो वही वहाँ जाए।

  7. रमणजी ,
    मुझे लगता है कि समुदाय(नारद) को एक अदद पाठक समझना मोहल्ले के पत्रकारों की भूल है । समुदाय मे हर तरह के लोग हैं । पूरे समुदाय(नारद) को एक रंग से रंगना एक सोची-समझी तिकड़म हो सकती है।
    आप सबको पता है कि मैं एक राजनैतिक कार्यकर्ता हूँ और संघ के राष्ट्रवाद को राष्ट्र-तोड़क मानता हूँ। मैं यह नहीं मानता कि साम्प्रदायिकता-विरोधी होने के लिए नास्तिक होना जरूरी है। इस सोच ने साम्प्रदायिकता-विरोध को नुकसान ही पहुँचाया है।
    मेरे मुसलमान साथियों का मानना है कि यदि मुसलिम कट्टरता पर भी हम चोट नहीं करते तो समुदाय के भीतर उदार धारा को मजबूत करने की उनकी कोशिशों को हम लाचार बनाते हैं । आज मैं मोहल्ले पर टिप्पणी करने वाले एक पाठक की कड़ी के जरिये एक चिट्ठे पर पहुँचा जहाँ हनीफ़ लाकड़ावाला साहब मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिकता के विरोध में लिख रहे थे।
    किसीका लड़कपन या कच्चापन कैन्सर जैसा लाइलाज मर्ज नहीं है।सृजन शिल्पी के ‘समाधान’ संख्या ५ की बाबत यह कहना जरूरी है कि मैं मोहल्ला को दुश्मन का दुश्मन नहीं मानता हूँ फिर भी उसके किसी एग्रीगेटर से हटाने के पक्ष में मैं नहीं हूँ। सृजन शिल्पी से तो तकरीबन रोज नमस्कार होती है।

  8. जिगर मुरादाबादी कह गए हैं-
    उनका जो फ़र्ज़ है अरबाबे सियासत जाने
    मेरा पैग़ाम मोहब्बत है, जहां तक पहुंचे.

    शुरू से ही मैंने उस तरह के ‘हंस’विवेकी चिट्ठों से परहेज़ रखा है. कुछ कथा मासिक और पत्रिकाओं मे ऐसे लेखों की भरमार होती है. अभद्र शब्द, आग-लगाऊ कुतर्क, धर्म विशेष पर आक्षेप!! इनका अस्तित्व ही इस तरह के लेखों पर टिका हुआ है. एक पक्ष जब तक क्रिया न करें तब तक यह प्रतिक्रिया कैसे करेंगे. कई दफ़ा क्रिया इधर तो प्रतिक्रिया उधर से ही आती है. यानी बहोत सूक्ष्म में इनका वजूद कट्टरवादियों के दूसरे धड़े के अस्तित्व पर अवलंबित है. मौलिकता के नाम पर क्या है ये तो पढ़ने के बाद ही पता चल गया था. तभी मैंने ‘हंसविवेकी’ कथाओं का ज़िक्र किया है.

    धर्मनिरपेक्षता का यह मतलब बिलकुल नहीं कि ख़ास क़ौम ही निशाने पर रखा जाए. इस हद तक हमले किए जाएं कि बात ग़ैरक़ानूनी कृत्य तक पहुंच जाए. अब ऐसा ही हो रहा है तो मुझे समझ आ रहा है कि सेकुलरिज़्म को नुक़सान पहुंचाने वालों में सांप्रदायिक तत्वों के साथ-साथ ऐसे सेकुलरवादियों का भी कम योगदान नहीं है.

    आदरणीय, आपके विचारो से मेरे विचार शून्य से सौ फ़ीसद न भी मिले किंतु इस आधार पर मैं आपका अपमान करने का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता. ऐसा ही सौम्य व्यवहार मेरे साथ होना चाहिए. अपनी लाइन बड़ी करने के लिए दूसरों की लाइन छोटी करना घटियापने की निशानी है.

  9. masijeevi says:

    भले ही उपेक्षा करना और सक्रिय उदासीनता भी प्रतिरोध के ही प्रकार हैं किंतु ये एक प्रकार का पलायन भी है। मोहल्‍ला के सरोकारों और उनके तेवर से हमें भी शिकायत है, इसलिए नहीं कि वे किसी हिंदुत्‍व को गलियाते हैं…गलियाया करें वरन इसलिए कि वे संवाद के नाम पर टकराव पैदा करना चाहते हैं। लेकिन यकीन मानिए बहिष्‍कार..बैन, ये ब्‍लॉगिंग की दुनिया की अवधारणाएं नहीं हैं नहीं होनी चाहिए। हिंदी चिट्ठाजगत प्‍लेट में सजाकर पेश न कर दें।

    ओर हॉं दुश्‍मन के दुश्‍मन वाली थीसिस ….यहॉं लागू नहीं होती।

  10. आपकी बात सर्वथा सत्‍य है।

  11. मेरा उद्देश्य बहस से दूर भागना नहीं है। समस्या यह है कि वे बहस नहीं करना चाहते। एकतरफा संवाद में लगे हुए हैं, जिस से किसी का भला नहीं हो रहा।

  12. उन के ब्लॉग पर टिप्पणी करना बन्द कर दें। अपने चिट्ठों पर भी इस विभाजक विषय पर लिखना बन्द कर दें। यह मैं पहले ही कर चुका हूं! अविनाश के पास अपनी हर बात को सही ठहराने के तर्क हैं। किसी की बात का कोई जवाब नहीं है। उनको लगता है कि उन लोगों के अलावा बाकी सारे लोग मुस्लिम विरोधी, दलित विरोधी और स्त्री विरोधी हैं। इसी चश्में से वे अपने खिलाफ़ मत रखने वाले को समझते हैं। हमको जितने भी ब्लागर दोस्त मिलते हैं उनमें से अधिकतर लोग भी यही महसूस करते हैं। दो दिन पहले मैंने कमेंट लिखा था उसपर भी कुछ दोस्तों का कहना था कि मुझे उनके ब्लाग पर टिप्पणी करने के बजाय अपने ब्लाग पर पोस्ट लिखना चाहिये था- बिना मोहल्ले की कोई लिंक दिये। अविनाश की ब्लाग के बारे में जानकारी का अन्दाज उनके कथादेश में छपे लेख से पता चलता है जिसमें वे लिखते हैं – ब्लाग एक डाट काम होता है। इसके बाद केवल अजदक सीरीज में रवीश कुमार का जिक्र करके बात खतम। बहरहाल यह उनका सोचना है। वे जो सही समझते हैं, करें। लेकिन यह बात सही है कि उनके यहां छपे लेख इतने भड़काऊ नहीं होते जितनी उनके परिचयात्मक लेख। नेट जैसे नितान्त स्वतंत्र माध्यम में हम ऐसी चीजों से बचने के लिये इतना ही कर सकते हैं कि अगर इसको कीचड़ समझते हैं तौ उससे दूर रहें । अगर उनको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो हमें भी अपना मनचाहा पढ़ने और लिखने की आजादी है!

  13. अनुनाद says:

    रमण जी , आपने बहुत सही दवा सुझाया है। गन्दगी की उपेक्षा करना एक अचूक दवा है। हिन्दी चिट्ठाजगत को बहुत सारे काम करने हैं। इन घिसी-पिटी अनर्गल बातो में उलझाकर हिन्दी चिट्ठाजगत को पटरी उतारने की नकारात्मक कोशिश हो रही है।

    नकारात्मक कार्य आजकल अपना टी.आर.पी. बढ़ाने का सबसे कारगर तरीका बना दिया गया है; कोई शराब पीकर दस-पन्द्रह के उपर अपनी कार चढ़ा देता है, कोई निरीह वन्य प्राणियों का शिकार करता है, कोई ए.के-४७ रखकर तो की अत्महत्या की कोशिश करके प्रसिद्धि पाने की कोशिश कर रहा है।

  14. “मोहल्ला हिन्दी चिट्ठा जगत में एक कैन्सर बन कर उभर रहा है — ऐसा कैन्सर जिस का कोई इलाज नहीं लग रहा। इस चिट्ठे का और इस से जुड़े कुछ और चिट्ठों का एक ही मकसद है – हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों को हिन्दू मुस्लिम झगड़े में उलझाना।”

    रमण जी,

    मैं आपकी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। मोहल्ला का उद्देश्य हिन्दुओं-मुसलमानों को उलझाना नहीं है, बल्कि अपनी लोकप्रियता को बढ़ाना है। आप देख रहे होंगे कि जब से वो आये हैं, अब रचनात्मक लेखन करने वाले चिट्ठाकार भी अपना लेखन छोड़कर मोहल्ले की गलियाँ हो गये हैं। मैं पिछले १ महीने से गौर कर रहा हूँ कि दिन भर के ५०-६० चिट्ठों में कम से कम १० चिट्ठे तो मोहल्ला को समर्पित होते हैं। यह उनकी सफलता ही है कि हम सभी को बेवकूफ बनाया है। जब हर कोई उन्हीं के बारे में लिखेगा तो अंततः फायदा उनलोगों का ही होगा। मैंने देखा कि अभी तक अखबारों में हिन्दी-चिट्ठाकारी पर जितने भी आलेख छपे हैं,सभी में आप जैसे दिग्गज़ों का नाम तो है मगर आप जैसे लोगों के चिट्ठों की ज़िक्र की जगह मोहल्ला का ज़िक्र है। आज का मसिजीवी नामक जीव का लेख पढ़िए। एक जगह आप कहते हो कि उन्हें टिप्पणी मत करों और नारद पर रोज़ाना उन्हें अधिकतम हिट्स मिलते हैं, अंतर क्या है, जो वो चाहते हैं, वो हुआ कि नहीं।

    हाँ, सृजनशिल्पी जी का भी कहना ठीक है कि अब वो मात्र नारद पर आधारित नहीं हैं क्योंकि बहुत से स्थाई पाठक हो चुके हैं और चूँकि वे मीडिया से हैं अतः वे आगे के लिए अखबारों में मोहल्ला पर आलेख भी प्रायोजित कर सकते हैं।

    अब पछतात होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!

  15. हैरानी की बात है कि वो तड़प तड़प कर बार बार कहता है कि कोई अपनी चरन रज मोहल्ला पर छोड़ कर नहीं जाता और जिस किसी के पैरों के निशान वहां देख लेता है उसी को अपना निशाना बना लेता है।

    यह कॊइ स्वस्थ मानसिकता नहीं है।

    टिप्पणी करना तो लगभग सभी ने बंद कर दिया लगता है, मगर नारद पर जब तब पोस्ट आती रहेगी और वो मनमाने तरीके से किसी के भी खिलाफ कुछ भी लिखेगा तो यह कब तक चलेगा?

  16. vishal says:

    मुहल्ले की रोज़-रोज़ की चक-चक से आजीज़ हो चुका हूँ, ये लोग ढोंग करते हैं की भारत में धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की रक्षा यही लोग कर सकेंगे और इनकी हर बात में हाँ न मिलाने वाला हर आदमी दकियानूसी दलित-विरोधी स्त्री-विरोधी (और भी बहुत से जुमले आरक्षित हैं ) है अपनी बातों को तार्किक कहते हैं लेकिन दूसरों के तर्कों को सांप्रदायिक ख़ाके की उपज बता कर जवाब देने से इनकार कर देते हैं ख़ैर जिस तरह से ये तर्क नामक विषय की बलि देते हैं वह ज़रूर दिलचस्प है
    भारत में सांप्रदायिकता को हिंदू-मुस्लिम कट्टरपंथियों की तुलना में इनसे ज़्यादा मदद मिलती है

  17. Vivie Gupta says:

    Raman Ji
    Bilkul theek kaha…bevkoofo ke comments pad kar khud ka khoon khaulane me kaha ki buddhimani hai?
    Unhe Bhookne dijiye aur aap log apna kaam kijiye.
    Mai bloger nahi hoon par aapke saath hoon pathak ke roop me…aur aapke sathiyo ke saath hoon.
    Ye communist-hindu virodhi jitni bhi chhati peet le, inke faase me aane vale logo ki tadad kam hoti ja rahi hai.
    Avinash se poochha jana chahiye ki hindu devi-devtao pa tippani kar ke vah jinda bacha hua hai to sirf isliye ki hindu Udaar hain (ya shayad Kaayar) par bure to bilkul nahi.

  18. जीतू says:

    मेरे विचार से लोग उसको महत्व देकर उसे और उभार रहे है। आप किसी भी ब्लॉग पर लिखे से सहमत अथवा असहमत हो सकते है। मत पढिए, मत जाइए, वैसे भी इत्ते ब्लॉग है, सभी पर तो लोग जाते नही। मत देखिए उसका ब्लॉग, बात खत्म।

    नारद पर रहना अथवा ना रहना, नियमों के अनुसार है, जो नियम तोड़ेगा, हटा दिया जाएगा। हमारे यहाँ वार्निंग देकर सधारने का मौका नही है। मोहल्ले के खिलाफ़ बहुत सारी शिकाएतें मिली है, हम नियमानुसार कार्यवाही करेंगे। जरुरत पड़ेगी तो हटा भी सकते है, लेकिन जो भी होगा, सार्वजनिक रुप से बताया जाएगा।

  19. जीतू जी,
    मै बाकी सब से सहमत हूं.. आप की बात से भी आधा सहमत हू‍ कि मत पढिए, मत जाइए ऐसे ब्लाग पर… मगर इसकी तो हैडिग ही ऐसी होती है कि दिल दुख जाता है इनकी मानसिकता देख कर… जो इनसान नही.. वो हिन्दु या मुसलमान भी नहीं…

    इसलिये इस गन्दगी को साफ़ करने का एक उपाय इसे नारद से हटाना भी है

  20. अरे, मोहिन्द्रजी नारद से हटाया तो और भी कई चिट्ठाकार अपना ब्लोग हटाने के लिए कहेंगे. मोहल्ला आखिर महान चिट्ठा है. इसे नहीं हटाया जाना चाहिए. संयम रखे. कूल….

  21. अतुल says:

    यार बहुत कनफ्यूजन हो रहा है। भाटिया जी अभी कुछ दिन पहले मोहल्ला हटाने पर आप आईना हटाने की धमकी दे रहे थे? अब आज कह रहे हैं “यह कब तक चलेगा?” यार कुछ दिन पहले एक नकली जीतू कमेंटियाता फिर रहा था अभी कोई आपका नामभाई तो नही है यह? 🙂 🙂

  22. मेरी प्रतिक्रिया यहां देखें :

    http://samakaal.wordpress.com

  23. संजय भाई और अतुल जी,

    ऊपर वाली टिप्प्णी मेरी ही है और असली है।
    अब मुझे और शर्मिंदा न किया जाये। 🙂
    असली जगदीश भाटिया

  24. गलत स्माईले लग गया असल में 🙁 होना चाहिये।

  25. @ऊपर वाली टिप्प्णी मेरी ही है और असली है।
    अब मुझे और शर्मिंदा न किया जाये।
    असली जगदीश भाटिया

    इस असली जगदीश भाटिया पर मुझे शक है। इसकी तहक़ीकात की जाए।

  26. शैलेश जी, जगदीश जी से ऑफलाइन संपर्क किया गया और उन का उत्तर यह है।
    ——
    रमन जी टिप्पणी मैंने ही की है।
    बहस मोहल्ला पर ही केंद्रित रहे तो अच्छा है। मैंने जब मोहल्ला को नारद से न हटाने की बात की थी उसके बाद गंगा में बहुत सा पानी बह चुका है।
    शुरू में मोहल्ला पर छपे कुछ लेखों ने मुझे आकर्षित जरूर किया था मगर जिस दिन अविनाश ने “कितने मुस्लमान मारे” वाली टिप्पणी की उस के बाद से मेरा माथा ठनका। धीरे धीरे सब कुछ अपने आप स्पष्ट होता चला गया।
    आज मैं यह बात खुल कर इस लिये कह रहा हूं कि मोहल्ला को नारद से हटाने की मांग का समर्थन कुछ लोग शायद यह सोच कर न कर रहें हों कि शायद फिर मेरे जैसा कोई इसका विरोध न करने लग जाये। आज मैं मोहल्ला को नारद से हटाये जाने का विरोध नहीं कर रहा हूं। मुझे उम्मीद है कि सब लोग मुझे अपनी राय बदल पाने का हक देंगे। आप चाहें तो मेरी इस मेल को भी एक टिप्पणी के रूप में छाप सकते हैं।

  27. “उन के ब्लॉग पर टिप्पणी करना बन्द कर दें। अपने चिट्ठों पर भी इस विभाजक विषय पर लिखना बन्द कर दें।”

    यही तो मैं कब से सब को समझाना चाहता हूँ। मैंने बहुत पहले ही उधर टिप्पणी करनी बंद कर दी थी। फिर जाना भी छोड़ दिया अब कभी कभार कोई संदर्भ देखना हो तो जाता हूँ। सच कहूँ तो हम लोग खुद ही उनको बढ़ावा दे रहे हैं उनकी घटिया पोस्टों पर टिप्पणी करके। मेरा यकीन मानिए सब लोग उन्हें पढ़ना छोड़ दें तो वे खुद बखुद हतोत्साहित हो जाएंगे।

    बाकी एक बार मैंने एक पोस्ट लिखी उनकी एक पोस्ट का जवाब देने को लेकिन पब्लिश करने से पहले मुझे समझ आया कि यही तो उनका मकसद है कि हम सब इस झगड़े में पढ़कर उनका प्रचार करें। मैंने उसी वक्त निश्चय किया कि न उनकी पोस्टें पढूँगा न ही कोई जवाब दूँगा।

    ऊपर सागर भाई, सृजन-शिल्पी और शैलेष भाई से सहमत हूँ।

  28. जानकर खुशी हुई कि जगदीश जी भी हमारे स्वर से अपना स्वर मिलाने लगे हैं। वैसे अभी भी प्रतीक पांडेय जी की प्रतिक्रिया प्रतीक्षित है, क्योंकि नारद के साथ-साथ हिन्दी-ब्लॉग्स से भी गंदगी की उपेक्षा आवश्यक है।

  29. निश्चित रूप से पाठकों की टिप्पणियों का ही कमाल है कि आज उन्हें हर कोई जानता है। हालाँकि उन्होंने पूरे प्रयास किए हैं ख्याति के लिए और वे सफल भी हुए हैं। उन लोगों का कथन है कि वे मुसलमानों, दलितों और स्त्रियों के मुद्दे उठाते हैं। शायद ही कोई इन मुद्दों से मुँह मोड़ता है। परंतु जब कोई इनसे तर्कपूर्ण बात करता है तो वे सामने वाले को हिंसक कहने लगते हैं। वे स्वयं कहते हैं कि लोग उनके मोहल्ले पर चुपके से टहल जाते हैं, तो रमणजी और अन्य के समान ही मैंने भी उधर टहल बंद कर दी है। नारद पर ज़रूर पोस्ट दिखाई देती है, परंतु अब शीर्षक कुछ भी हो उधर नहीं जाता हूँ।

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