मोहल्ले में आजकल रोज़ की तानेबाज़ी चल रहा है। लगता है मोहल्ले वालों को सकारात्मक कुछ नहीं दिखता। संगीत में विभिन्न धर्मों के लोग हैं, यह तो सदियों पुरानी बात है, इस के लिए सुदर्शन को ताना। उर्दू बोलने वालों को कोई दहशतगर्द भले न कहे, पर ताने दो और वाहवाही लूटो। अरे भाई, इस सब से ऊपर उठो, हाथ मिलाओ और चलो वतन को आगे बढ़ाते हैं।

मैं स्वयं को राइट-ऑफ-सेंटर विचारधारा वाला समझता हूँ, और अपनी विचारधारा वाले कई लोगों को जानता हूँ। फिर भी मैं ने किसी को यह नहीं कहते सुना कि हर उर्दू बोलने वाला दहशतगर्द है, या यदि इस ताने के भीतरी अर्थ को समझा जाए तो यह कि हर मुसलमान दहशतगर्द है। पर हाँ, यदि दहशतगर्द को भी दहशतगर्द कहना गुनाह है तो फिर मुँह पर टेप लगा कर बैठ जाते हैं।

यदि कुछ बेहूदा लोग यह कहते हैं कि हर मुसलमान दहशतगर्द है, तो उतने ही बेहूदा लोग यह भी कहते हैं कि हर बुतपरस्त काफिर है, या फिर पाकिस्तान ज़िन्दाबाद का नारा लगाते हैं। ऐसे बेहूदा लोगों की बातों को ले कर रोना धोना और तानेबाज़ी कहाँ तक सही है? सकारात्मक पहलू पर ज़ोर क्यों नहीं दिया जाता? फिर यदि कुछ लोग इस तरह की बदकलामी करते भी हैं, तो क्या उस का कुछ इलज़ाम उन के सर नहीं जाता जो असल में दहशतगर्द हैं और पूरी कौम को बदनाम कर रहे हैं। यह दहशतगर्दी तो पूरी दुनिया में फैली है।

इस मुल्क में हर धर्म के लोगों का हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व है। पिछले चुनावों में बहुमत से एक ईसाई धर्म की स्त्री को देश का नेतृत्व सौंपा गया। अन्त में एक सिख धर्म के व्यक्ति ने उन का स्थान लिया। उन को शपथ दिलाने वाले राष्ट्रपति इस्लाम से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें एक हिन्दूवादी कहे जाने वाले दल ने उस पद के लिए नामांकित किया था। यह सब किस देश में हो सकता है? इस सब पर गर्व करने के स्थान पर आप बेहूदा लोगों की बातों को ले कर क्यों मनमुटाव पैदा करते हैं?

हम तो उस मुल्क को जानते हैं, जहाँ हर बन्दा उर्दू बोलता है। जीवन को जिन्दगी कहता है, और स्थान को जगह। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ गुलाम अली और महदी हसन को सिर-आँखों पर बिठाया जाता है, शाहरुख खान और इरफान पठान तो हमारे लख़्ते जिगर हैं ही। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ नौजवानों के लब पर यह गाना है

है यार मेरा खुशबू की तरह
है जिस की ज़ुबाँ उर्दू की तरह

इस के बरअक्स उर्दू बोलने वालों या मौसीकीकारों का हाल अलगाव के बूते पर बने मुल्कों में क्या होता है, उस तफ़सील में मैं नहीं जाना चाहता। उन से हम अपनी तुलना क्यों करें? पर यह भी नहीं चाहता कि यहाँ भी अलगाव की आग लगाई जाए।

मेरा सकारात्मक रवैया इस के बावजूद है कि जीवन में कुछ बहुत ही कड़ुवे अनुभव भी हुए हैं। कोशिश यही की है कि अच्छे को याद रखो बुरे को दरकिनार करने की कोशिश करो। मैं अपने कुछ अनुभव बाँटना चाहता हूँ।

– चौथी या पाँचवीं जमात में पढ़ता था, उत्तर कश्मीर के एक गाँव के सरकारी स्कूल में। मैं अकेला हिन्दू बच्चा था कक्षा में। रोज़ तख्ती (जिसे हम मश्क कहते थे) लिख कर ले जानी होती थी। कुछ भी लिख कर ले जाओ, पर लिखना ज़रूरी था – उर्दू की लिखाई सुधारने के लिए। मेरे सहपाठी कई बार यह लिख कर लाते थे – सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा। अच्छा नहीं लगता था, पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। टीचर ने कभी कुछ नहीं कहा।

– मिडल स्कूल में यह आम बात थी कि टीचर या प्रिन्सिपल कक्षा में या असेंबली में हिन्दू बच्चों को खड़ा होने को कहे, ताकि उन्हें आइडेंटिफाइ किया जा सके।

– हाई स्कूल में (या उस से पहले) सुबह की प्रेयर में कभी जन-गण-मन नहीं गाया, वन्दे मातरम तो सुना ही नहीं था। हम कश्मीरी भाषा में दो प्रार्थनाएँ गाते थे; एक सेक्यूलर प्रेयर – साहिबो सथ छम मे चानी, और एक मुस्लिम प्रेयर नबी (सल्ल-लाहो-अलहे-वस्सलम) की शान में – या खुदा सारिय खुदाई आसिहे पर्दन अन्दर, आसिहे नय ज़ान ज़ुल्मातन रसूले मोहतरम। क्या एक कश्मीरी हिन्दू वही हल्ला कर सकता था जो भारत में वन्दे मातरम् के खिलाफ होता है? मैं यह नहीं मानता कि वन्दे मातरम् गाने से देश का कुछ भला होगा, पर गाने से गाने वालों का कुछ बुरा भी नहीं होगा, यह मानता हूँ। बेकार का हल्ला है।

– जब भुट्टो को दी गई फाँसी के विरोध में हमारा इंजीनियरिंग कॉलेज बन्द हुआ तो एहतिजाजी जुलूस में हमें भी शामिल होना पड़ा।

फिर वहाँ एक तूफान आया जिस के बाद हमें वहाँ सब छोड़ कर आना पड़ा। एक हिन्दू अल्पसंख्यक के रूप में जीवन कैसा था, इस की ज़्यादा तफ़सील में भी नहीं जाऊँगा। फिर भी यह लगता था कि कश्मीर में मुसलमानों की अक्सरियत है, शायद ये सही कहते हैं कश्मीर घाटी पाकिस्तान का ही भाग होना चाहिए। उस बात पर अपने विचार किसी अन्य पोस्ट में लिखूँगा।

दोस्त मेरे हमेशा मुसलमान रहे, और अब भी हैं। धर्म के अतिरिक्त हर चीज़ पर बहस होती थी – मैं ठहरा नास्तिक और उन में से किसी में खुदा को नकारने की हिम्मत नहीं थी। सातवीं से नौवीं तक मेरठ में पढ़ने का मौका मिला। वहाँ मेरा दोस्त था सलीम। वह हैरान होता था जब मैं उस को कश्मीर की (भारत विरोधी) बातें बताता था, और उस हिन्दुस्तानी मुसलमान की हैरानगी मुझे खुशी देती थी।

फिर कॉलेज के अन्तिम वर्ष में ऑल-इंडिया टूर के तहत हैदराबाद जाना हुआ। मैं और दो और कश्मीरी हिन्दू दोस्त चारमीनार देखने गए तो एक रिक्शे वाले ने पेशकश की – चलिए साहब शहर घुमा लाता हूँ। भाड़ा तय हुआ और हम चल पड़े। उस से नाम पूछा तो उस ने कुछ मुस्लिम नाम बताया, और हम से भी नाम पूछे। मेरे दोस्त को जाने क्या मज़ाक सूझा, उस ने भी तीनों के नाम मुस्लिम बताए। फिर वह खुल कर हमें वहाँ की बातें बताने लगा, यह देखिए यह सारा हमारा इलाका है यूँ समझिए पाकिस्तान है। हिन्दुओं के खिलाफ बातें बताने लगा। हम चुपचाप सुनते रहे – अपने घर से इतनी दूर भी पाकिस्तान हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह हमें एक ज़ियारत में भी ले कर गया। हम ने जैसे तैसे पीछा छुड़ाया कि कहीं हमारा झूठ न पकड़ा जाए।

यह सब अनुभव मेरे भारत के भविष्य के बारे में विश्वास को नहीं डिगाते। बल्कि मेरा विश्वास मज़बूत होता है कि इतनी नकारात्मकता के बावजूद सकारात्मकता इतनी है कि हमारा देश आगे चल रहा है – बेशक दौड़ न रहा हो, और इस में हर धर्म के लोगों का हाथ है।

मैं यह नहीं मानता कि अधिकांश मुसलमान ऐसे हैं। न यह मानता हूँ कि सभी हिन्दू अच्छा ही सोचते हैं। पर भाई इन्हीं बातों का ज़िक्र छेड़ोगे तो दोनो तरफ इन्हीं बातों का ज़िक्र होगा। यह तो कभी खत्म न होने वाली बहस है, जिस का कोई सही नतीजा नहीं निकलेगा। पर यह भी बात है, कि जो चिट्ठे यही एजेंडा ले कर शुरू हुए हैं, वे फिर क्या लिखेंगे। यह जो सांप्रदायिकता वाले चिट्ठा-पोस्टों का तांता लगा हुआ है, क्या इस का वास्तविक मकसद हंगामा खड़ा करना ही नहीं है? टिप्पणियाँ इस पोस्ट पर भी पढ़ी जा चुकीं थीं, पर एक इफेक्ट के लिए टिप्पणियों की अलग पोस्ट बनाई गई, जिस का टाइटल था – हंगामा खड़ा करना मक़सद नहीं। ठीक है, आप अपना लिखने के लिए मुक्त हैं, और हम अपना। अगर चिट्ठा जगत में अब इसी का चर्चा होना है तो इसी का सही।

मुनव्वर राना अपनी ग़ज़ल में कहते हैं

मदीने तक में हम ने मुल्क की खातिर दुआ मांगी
किसी से पूछ ले इस को वतन का दर्द कहते हैं।

वतन का दर्द वतन की औलाद को नहीं होगा तो किसे होगा। हाँ मदीने वाला या कैलाश पर्बत वाला कितनी सुनता है, यह मालूम नहीं। खासकर जिस मुल्क में कुफ्र का बोलबाला हो, उस की अल्लाह क्या सुनेगा।

PS: राना साहब की हसीन ग़ज़ल के जवाब में मैं ने उस की टिप्पणी में यह ग़ज़ल की पूँछ जोड़ी थी, जिसे राजीव जी के प्रोत्साहन (नीचे पहली टिप्पणी देखें) पर यहाँ दोहरा रहा हूँ (बहर और क़ाफ़िए की गड़बड़ के लिए माज़रत-ख़्वाह हूँ)।

करा दो तआर्रुफ़ हम से भी ज़रा उन का
जो उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं।

कब ख़त्म होगा सिलसिला यह रोते धोते रहने का
जो माज़ी को भूल बढ़े आगे उसी को मर्द कहते हैं।

तमिल बोले, तेलुगू, बंगाली, उर्दू या कश्मीरी
यहाँ सब लोग हिन्दी हैं, यही सब फ़र्द कहते हैं।

उर्दू वाला नहीं मोहाजिर वो है हिस्सा वतन का
नहीं यकीं तो देख क्या वतन के सद्र कहते हैं।

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23 Comments on कौन उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं

  1. रमण जी, आपने तो पहले ही मोहल्ले में अति सुन्दर टिप्पणी दी थी, जिसकी मैंने सराहना भी करी थी, http://mohalla.blogspot.com/20.....4331576225
    क्यों न इसे यहाँ भी उद्धृत कर दें। वह तो गागर में सागर है ही।

  2. रमन भाई मै आपकी बातों को समझ सकता हूँ, पर मुस्लिम परस्‍त लोग नही समझेगें। लगता ये लोग चुनाव का टिकट चाहते है इसलिये सस्‍ती लोक प्रियता को भुनना रहे, हिन्‍दु वादी होने पर कोई टिकट तो देगा नही इस लिये मुस्लिमियत का ढ़ोग कर रहे है। जो अपने देश धर्म को नही हुआ वो मुसिलमों का कब तक साथ देगा ।

  3. Tarun says:

    उर्दु जबान का तो पता नही लेकिन इतना मुझे पता है कि आप और मैं एक ही जबान बोलते हैं, ज्यादा तो पहले ही अपनी पोस्ट में लिख दिया है जो अभी नारद में आना बाकि है।

  4. Pankaj Bengani says:

    अविनाश जैसे सुडो सेक्युलर लोगों की वजह से ही आज देश बँटता जा रहा है। मैने भी अपनी एक पोस्ट में लिखा था कि कैसे बचपन में मैने हिन्दु होनी की सजा पाई थी…

    पर इन जैसे लोगों को सिर्फ मुसलमानों का दर्द ही दिखता है… पर यह नहीं दिखता कि दर्द वास्तव में इंसान को होता है, हिन्दु और मुसलमान को नहीं।

    पर इनका कोई कुछ नही कर सकता.

    मै तो यह भी नही कह सकता कि इनको सद्भूद्धि दे भगवान.. वो तो तब देंगे ना जब बुद्धि होगी!!!

  5. साधू.

    हम आपकी पोस्ट बजार में रखते है, बजारवालो खरीदोगे?

  6. मैंने बड़ा होकर जाना कि मेरा बचपन जिस ‘हवा पानी’ में गुजरा उसे वायु और जल कहते हैं। हाँ एक बात और आप बताएँ ‘गुजरा’ या ‘व्यवतीत’ हुआ। रमणजी क्या मैं भी दहशतगर्द हुआ?

  7. manogat says:

    बहुत सारे हिंदी बोलने वाले लोग, अगर दुसरे व्यक्ती को हिंदी नही आती तो उसे देशद्रोही ही मानते है.
    जैसे की तमिळ, मराठी, बेंगाली लोगोंको 🙁

  8. हम खुद रोजाना उर्दू गज़लें पढ़ते और सुनते हैं, अगर दहशतगर्द ही माना होता तो यह सब संभव नहीं था। हम कतई नहीं मानते कि ऊर्दू बोलने वाला दहशतगर्द होता है।
    बहुत ऊंचे विचार है आपके, इस सुन्दर लेख के लिये बधाई।

  9. बहुत बढिया लिखा ,सही लिखा । अच्छी बातें ,कडवी बातें सब साथ साथ चलती हैं ,ज़रूरत है अच्छे अनुभवों को रेखांकित करने की । मैंने भी अपने अनुभव लिखे थे अपने चिट्ठे पर ।

  10. रवि says:

    “…इस मुल्क में हर धर्म के लोगों का हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व है। पिछले चुनावों में बहुमत से एक ईसाई धर्म की स्त्री को देश का नेतृत्व सौंपा गया। अन्त में एक सिख धर्म के व्यक्ति ने उन का स्थान लिया। उन को शपथ दिलाने वाले राष्ट्रपति इस्लाम से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें एक हिन्दूवादी कहे जाने वाले दल ने उस पद के लिए नामांकित किया था। यह सब किस देश में हो सकता है? इस सब पर गर्व करने के स्थान पर आप बेहूदा लोगों की बातों को ले कर क्यों मनमुटाव पैदा करते हैं?…”

    ये लोग या तो इन बातों से अनभिज्ञ (अशिक्षित) हैं या फिर जानकर अनजान बनना चाहते हैं. वैसे, मामला कुल मिलाकर हंगामा खड़ा करने वाला ही प्रतीत होता है.

    ऐसे में एक बात में ही दम नज़र आता है जैसा कि उन्मुक्त ने कहा था – ऐसे चिट्ठों पर नज़र ही न डाली जाए.
    रवि

  11. पंकज बेंगाणी says:

    “बहुत सारे हिंदी बोलने वाले लोग, अगर दुसरे व्यक्ती को हिंदी नही आती तो उसे देशद्रोही ही मानते है. जैसे की तमिळ, मराठी, बेंगाली लोगोंको ”

    यह पहली बार सुना.. सचमुच.. हँसी आ रही है.

  12. manogat says:

    आप तो हसेंगे ही… आपके लिए प्रादेशिक भाषाए कुछ मायने रखती है क्या?
    विविधता मे एकता का घोष भूलकर पुरे राष्ट्रपर एक भाषा फोर्स करने का प्रयास किया जा रहा है!

  13. manogat says:

    1

    2

    आप यह पडेंगे तो बहुत मेहरबानी होगी. 🙂

  14. पंकज बेंगाणी says:

    आप से अनुरोध है कि आप मुझसे इमेल के द्वारा सम्पर्क करें.. यह आपको tarakash.com पर मिल जाएगा.

    क्योंकि इस मसले का इस चिट्ठे से कोई सम्बन्ध नही है, हम नाहक ही उलझे हुए हैं।

    रही बात प्रादेशिक भाषाओं के विकास की तो भैया जरा एक बात सुनो, हिन्दी और हिन्दी भाषी लोग किसी भी भाषा के विकास में बाधा क्यों डालेंगे.. यहाँ तो हिन्दी ही अपेक्षित पडी है भाई.

    अपवाद हर जगह होते हैं, पर आप तो जबरदस्ती किसी को भी किसी भी विषय से बिना मतलब जोडे जा रहे हैं…

    आपने तरकश नहीं देखी होगी, गुजराती भी प्रादेशिक भाषा ही है शायद.. आप अधिक ज्ञानी हैं, बता दीजिए. देख लीजिए हमने गुजराती चिट्ठाकारी के विकास के लिए क्या क्या किया है.

    बिना पुरी जानकारी के सार्वजनिक रूप से अनाप शनाप बोलने से पहले सोचा कीजिए.

  15. पंकज बेंगाणी says:

    उपरोक्त टिप्पणी manogat के लिए है.

  16. आपने बहुत अच्‍छा लिखा है। आपकी भाषा और अंदाज़ दोनों ही काबिलेतारीफ है। मेरी बधाई स्‍वीकारें। लेकिन मैं एक बार फिर कहूंगा, कि गज़ल मुनव्‍वर राना की है। वे आम अवाम के शायर हैं। उर्दू वाले उन्‍हें अपनी पंगत में बमुश्किल बैठने देते हैं, क्‍योंकि वे देवनागरी के दीवाने हैं। उनका मर्म समझें, गज़ल की तबीयत समझें, और अगर न भी समझें… तो भी आप ज्‍यादा सही हैं, क्‍योंकि आपके साथ ऊपर कुल जमा 15 हिंदू हैं। यही है हमारा असली समाज। बधाई हो।

  17. -रमण भाई

    बहुत सधा हुआ लेखन- आपके अनुभव तो बड़ी गहराई तक छू गये. साथ ही गज़ल भी बहुत खूबसूरत बन पड़ी है, बधाई लें. आपने समझा कर अपना काम किया, साधुवाद.

  18. कितना अच्छा लेख लिखा है । साधुवाद । ये सच है कि कश्मीर से विस्थापित हिन्दुओं की कभी बात नही की जाती और ना किसी को पता है कि वहाँ क्या क्या गुल खिलाए जाते हैं । जानकारी के लिये धन्यवाद । लेकिन देखिए अविनाश जी की टिप्पणी । उन्हे अब इसमे भी प्रॉब्लम है कि उपर १५ हिन्दुओं ने आपकी बात का समर्थन कर दिया । Shame on him…

  19. सभी की टिप्पणियों के लिए धन्यवाद।
    मनोगत जी, आप कितने हिन्दी भाषियों को जानते हैं? और उन में से कितने लोग प्रादेशिक भाषाएँ बोलने वालों को देशद्रोही कहते हैं? ऐसे बेहूदा लोग बहुत कम होंगे, यदि होंगे भी तो। ऐसे ही बेहूदा लोग असम में और यहाँ तक कि मुंबई में हिन्दी क्षेत्र के लोगों का विरोध करते हैं। मेरी भी मातृभाषा हिन्दी नहीं है, और न हिन्दी से दूर दूर तक मिलती जुलती है। यह तो स्वाभाविक है कि हिन्दी बोलने वाला क्षेत्रीय भाषाओं के बारे में कम जानता हो। जैसे अंग्रेज़ी बोलने वाले देश जर्मन नहीं जानते होंगे, पर जर्मनों को अंग्रेज़ी इसलिए सीखनी पड़ रही है कि दुनिया के साथ धन्धा करना है। जो स्टैटस अंग्रेज़ी का विश्व में है – एक लिंक लैंग्वेज का, वही हिन्दी का भारत में है, या होना चाहिए। जो सारे भारत में धन्धा करना चाहेगा, नौकरी करना चाहेगा, रहना चाहेगा, उस के लिए हिन्दी ज़रूरी है; इस में क्या बुरा है?

    जहाँ तक दक्षिण के भाषा विवाद का प्रश्न है, वहाँ जितना राजनीति से प्रेरित हिन्दी को थोपना था, उतना ही उस का विरोध। न हिन्दी को थोपना सही है, न उस का विरोध। जहाँ चेन्नइ दूरदर्शन पर हिन्दी समाचारों को रोका जाता था, वहीं बाद में केबल हिन्दी चैनल धड़ल्ले से दिखाए जा रहे थे। आजकल बॉलीवुड के ज़रिए सब हिन्दी सीख रहे हैं।

  20. manogat says:

    Thanks Raman, at least you have taken time to respond in sane manner.

    I know it is not a right forum to discuss these things. But thanks for bearing with me.

    आपका
    जो सारे भारत में धन्धा करना चाहेगा, नौकरी करना चाहेगा, रहना चाहेगा, उस के लिए हिन्दी ज़रूरी है; इस में क्या बुरा है?

    यह वाक्य मुझे बिलकुल समझा नही. अगर किसी को महाराष्ट्र मे धंदा करना है तो उसे हिंदी आना जरूरी है या मराठी. अगर किसी को बंगाल में धंदा करना जरूरी है तो उसे बंगाली आना जरूरी है या हिंदी?
    भारत और हिंदी दो अलग चीजे है.
    आप कही ऐसा तो नही समझ रहे की जिसको हिंदी आती है वही भारतीय है?

    मै स्वयम महाराष्ट्र में रहके हिंदी जानता हू. लेकिन मुंबई मे बाहरसे आये हुए हिंदी बांधव मराठी जानने की कभी कोशीश ही नही करते है. पूज्य कृपाशंकर सिंह जी महाराष्ट्र विधानसभा मे हिंदी मे भाषण करते है.

    कल के महाराष्ट्र टाईम्स की खबर आप पढेंगे तो आपको समझेगा की महाराष्ट्र पोलीस दल का गीत अभी हिंदी मे हो गया है. जिसका केवल एक ही कारन है की बहुत सारे आयपीएस अधिकारी हिंदी भाषक है.

    हमारे राज्यमेंही हमारी भाषा का ऐसा अपमान होता रहेगा तो क्या करे?

    मेरा हिंदी को बिलकुल विरोध नही है. मै स्वयं फणीश्वरनाथ रेणू और प्रेमचंदजी का फॅन हू. लेकिन कुछ लोगोंके स्थानिक भाषा न सीखने के ऍरोगन्स के कारण स्थानिक स्तर पे होनेवाले असंतोष से परेशान हू.

    होली के दिन पूना मे २८० लोग ड्रग लेते हुए पकडे गये. उसमेसे २६९ लोग मूलत: महाराष्ट्र से नही है. अभी पूना मेभी लोग यह कह रहे है की सब ‘बाहरवालोंको’ हकाल दिया जाये. २६९ मेंसे २२० लोग बीमारू राज्योंसे है.

    अगर हम स्थानीय संस्कृती मे घुलमिलके नही रह सकते ठीक है. लेकिन उसे ठेस पहूंचानेका हमे कुछ अधिकार बनता है क्या ?

  21. रमन भाई! बेहद माकूल जवाब है आपका.

  22. मै स्वयम महाराष्ट्र में रहके हिंदी जानता हू. लेकिन मुंबई मे बाहरसे आये हुए हिंदी बांधव मराठी जानने की कभी कोशीश ही नही करते है. पूज्य कृपाशंकर सिंह जी महाराष्ट्र विधानसभा मे हिंदी मे भाषण करते है

    मनोगत जी, अब मैं समझा आप का विरोध कहाँ से आ रहा है। आप मेरी बात को ग़लत समझे। आप सही कह रहे हैं कि स्थानीय स्तर पर स्थानीय भाषा सीखना आवश्यक है, विशेषकर यदि आप को स्थायी रुप से कहीं रहना हो। पर यदि कोई केन्द्रीय सरकारी कर्मचारी विभिन्न शहरों में तबदील होता रहता हो, तो वह कितनी भाषाएँ सीखे। मेरा यह कहना है कि हिन्दी अधिक राज्यों में समझी जाने वाली भाषा है, इस कारण एक लिंक लैंग्वेज का काम करती है। बंगाली तो केवल बंगाल में चलेगी, और मराठी केवल महाराष्ट्र में – इस कारण उस से पूरे भारत में तो धन्धा नहीं किया जा सकता न। यही स्थिति विश्व स्तर पर अंग्रेज़ी की है। यदि कोई विदेशी भारत आ कर विभिन्न शहरों में घूमना चाहता है, और आप से यह पूछता है कि मैं कौन सी भारतीय भाषा सीखूँ, तो आप उसे क्या सलाह देंगे? फिर कुछ व्यक्तिगत रुचि और स्वतन्त्रता का भी कुछ रोल है।

  23. Saif says:

    Bhai,
    Jab desh ke saath dil ke tukade bhi ho chuke hain, aapke vichar padh kar acha laga.
    Waqt hai na sirf haat milane ka, balaki gale lagane ka.

    Jahan aaj hum IT,BT ki baat kar rahen hai aur hamare dhurandar forbes ka itihaas badal rahen hain, wahi hamare netaoon ki gumrah aur hamare andhvishwashon se desh ki neev khokhali ho chuki hai.

    Aise waqt me aap jaison ke ye akshar ache lagte hain.

    Saare jahan se acha, Hindostan hamara|
    Hindi hain hum, watan hai Hindostan hamara||

    Jai Hind!!!

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