Asylum at Bergenसफर शुरू हुए दो घंटे हो चुके थे। मैं ने किताब से नज़र हटा कर खिड़की से बाहर देखा। शाम होने को थी, बादल थे, पर अभी उजाला था — मुझे मालूम था आधी रात टलने तक ऐसा ही रहना है। बाहर देहात तीव्र गति से गुज़र रहा था — चीड़ और शंकुवृक्ष नीची पहाड़ियों को घेरे थे, नॉर्वे की ग्रीष्म ऋतु की ठंडी धूप से नहाए हुए से। जैसे जैसे रेलगाड़ी ऊँचाई को जाने लगी, पहाड़ी दीवारों से चिपके बर्फ के पैबन्द भी दिखने लगे – गहरे हरे रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद चमकते हुए। मैं कुछ मिनट ऐसे ही देखता रहा, फिर वह कर्कष सौन्दर्य अखरने लगा; मैं ने जैकेट को ज़ोर से लपेटा और दोबारा किताब पढ़ने लगा।

‘माफ कीजिए आप वह ब्रेन सर्जन हैं क्या?’

मेरे सामने वाली सीट पर बैठा आदमी अधेड़, गंजा और थोड़ा सा मोटा था। मैं ने मुस्करा कर जवाब दिया –

‘हाँ’

‘मैंने आप के बारे में सुना है – अखबार पर ट्रान्सप्लांट के बारे में जो खबर थी उस में। ओ, आप भारत से हैं, हैं न?’

मेरी मुस्कान चौड़ी हुई। मुझे इस बात की आदत हो गई थी कि मेरे काम से ज़्यादा रुचि मेरी नस्ल में जताई जाती हो, कई बार तो मेरे सहकर्मियों द्वारा भी। मैं ने हाँ में सिर हिलाया और फिर किताब की ओर लौट कर अपना पन्ना खोजने लगा।

***

यह शुरुआत है उस साइ-फाइ कहानी की जिस के लिए आदित्य सुदर्शन को साइंटिफिक इंडियन द्वारा आयोजित विज्ञान फंतासी कथा लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था। मैं ने इस कहानी का निरन्तर के नवीनतम अंक के लिए हिन्दी अनुवाद किया है। यदि आप ने पहले से नहीं पढ़ी तो, निरन्तर की साइट पर इसे अवश्य पढ़ें; बहुत ही रोमांचकारी कहानी लिखी है आदित्य ने। मूल अंग्रेज़ी कहानी यहाँ पर है।

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2 Comments on बर्गन का वह पागलखाना

  1. divyabh says:

    देखता हुँ रमण भाई…अच्छी जनकारी उपलब्ध कराई…

  2. मनीष says:

    अच्छी शुरुआत थी…….

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