श्रीश जी धन्यवाद एक आलसी चिट्ठाकार को जगाने के लिए। देर के लिए क्षमा.. पर अब बिना समय गवाँए, यह रहे मेरे जवाब।

१. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?

कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग की खोज तो तब से ही थी, जब से कंप्यूटर से सब से पहले पाला पड़ा। वह ज़माना विंडोज़, वर्ड और इंटरनेट के चलन से पहले का था। मैं ने जब पीसी पर काम करना सीखा (1989-90 में) तो एम.एस.डॉस, वर्डस्टार, लोटस 1-2-3 आदि प्रोग्राम अधिक प्रचलित थे। उन दिनों एक हिन्दी का वर्ड-प्रोसेसर भी मिला था, जो वर्डस्टार जैसा ही था और एम.एस. डॉस पर चलता था। जहाँ तक मुझे याद है, उस का नाम अक्षर था। आज खोजा तो कुछ सूचना इस पते पर मिली। पर उस पर टाइपिंग नाममात्र ही की। फिर विंडोज़ आया, फिर इंटरनेट आया, वी.एस.एन.एल. के मुफ्त सर्वर पर पहली वेबसाइट बनाई और तब सीडैक के आइ-लीप का प्रयोग किया। 1999 में वी.एस.एन.एल. की स्टार्टर सीडी के साथ आइ-लीप का सीमित परीक्षण संस्करण मुफ़्त था। इस सीड़ी को प्राप्त करने के लिए नई दिल्ली में वी.एस.एन.एल. के दफ्तर में लाइन में लगना पड़ा था। आइलीप को फुल वर्जन में परिवर्तित करने के लिए 500 रुपए का चैक भेजना पड़ा था सीडैक को। उस की रसीद, क्रियान्वयन कूट वाली ईमेल, और वह सीडी मेरे पास अभी भी मौजूद है – यह मेरा पहला खरीदा हुआ सॉफ्टवेयर भी था। उन दिनों गिनी चुनी हिन्दी साइटें थीं, और मेरी उन में से एक थी। ब्लॉगिंग का नाम तब नहीं सुना था, पर हमारी साइटें कुछ कुछ ब्लॉग जैसी ही थीं। फिर यहाँ, यू.एस. आया तो इंटरनेट और कंप्यूटर का प्रयोग अपेक्षाकृत काफी सुलभ हो गया। हिन्दी के सॉफ्टवेयरों की खोज जारी रही, और फिर शुषा का प्रयोग भी कुछ समय के लिए किया – शुषा में सब से बड़ा फायदा यह था कि आप को टाइपिंग के लिए किसी बाहरी टूल की आवश्यकता नहीं थी। हिन्दी के याहू-समूहों में सक्रिय रहा। अभिव्यक्ति भी नियमित पढ़ता रहा। फिर 2002 में यूनिकोड मिला तो वारे न्यारे हो गए। यूनिकोड में सब से पहले टाइपिंग छहरी से की। यूनिपैड का भी प्रयोग किया, फिर यूनिनागरी बनाया तो उसे काफी समय तक प्रयोग किया। , और अन्त में आइ.एम.ई. पर आ कर रुका।

२. आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?

हिन्दी के लिए अन्तर्जाल को खंगालते रहना तो पहले से चल ही रहा था। फिर चिट्ठे दिखे तो पढ़ने लगा। मैं जब 2004 के अन्त में चिट्ठाकारी की दुनिया में आया तो करीब 15-16 चिट्ठाकार थे। सब से पहले कौन सा पढ़ा, ठीक से याद नहीं – फुरसतिया, नौ दो ग्यारह, नुक्ताचीनी, हाँ भाई (जो अब मिर्चीसेठ बन गया है), मेरा पन्ना या रोजनामचा। या शायद सभी एक ही दिन मिले। अक्षरग्राम का आरंभ कुछ माह पहले हो चुका था। अक्षरग्राम पर, या किसी भी ब्लाग पर मेरी पहली टिप्पणी शायद यह थी। फिर मेरे प्रिय विषय कश्मीर का ज़िक्र आया तो अक्षरग्राम पर यह टिप्पणी की, जिस के जवाब में जीतू ने अपना चिट्ठा लिखने को उकसाया (मेरी हर टिप्पणी में वर्तनी की मीन मेख निकालने की भी बीमारी मिलेगी आप को, ..यह अलग बात है कि कई बार मुँह की भी खाई है)। बस फिर क्या था, कुछ ही दिनों में ब्लॉगस्पॉट पर चिट्ठा शुरू किया, जिसे बाद में वर्डप्रेस द्वारा अपने सर्वर पर डाल दिया।

३. चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये ;-) क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है ?

मेरे लिए तो छपास पीड़ा शान्त करना ही है। स्वयं के सुख के लिए तो लिखता ही हूँ, साथ में दूसरों को भी दुख हो तो क्या कहने ;-)। साल भर पहले तक इतने कम चिट्ठे थे कि हर चिट्ठाकार हर चिट्ठा पढ़ता ही था। इस कारण अपराध बोध होता था कि कितने लोगों को दुखी कर रहा हूँ अपने सुख के लिए। अब इतने चिट्ठे हो गए हैं, सब को अपने भले बुरे का चुनाव करने की स्वतन्त्रता है; ऐसे में भी यदि कोई मेरे चिट्ठे पर आता है, तो अपने रिस्क पर आता है, इस लिए मैं अब उन के दुख के लिए स्वयं को उत्तरदायी नहीं मानता। पर यह कहना बेईमानी होगी कि मैं केवल अपने लिए लिखता हूँ, कोई पढ़े या न पढ़े। लिखता इसी उम्मीद में हूँ कि लोगों को अच्छा लगे, लोग पढ़ें, टिप्पणी करें। पिछली दो प्रविष्टियों पर कोई टिप्पणी नहीं हुई, ऐसा लगता है मोहल्ले के शोर में खो गईं, जब कि मैं सोच रहा था कि ये विषय एक गर्म बहस का भी हिस्सा हैं, और राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भी। अंग्रेज़ी में लिखा तो विरोध ही सही, पर प्रतिक्रिया तो मिली। वह कहते हैं न

कत’आ कीजे न त’आल्लुक हम से,
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही।

(कत’आ = समाप्त करना, त’आल्लुक = सम्बन्ध, अदावत = शत्रुता)

व्यक्तित्व में कितना परिवर्तन आया, कहना कठिन है – निखार कहना और भी कठिन है। हाँ दिनचर्या में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया है। पहले ही वेब सर्फिंग में काफी समय निकल जाता था, अब चिट्ठे पढ़ने-लिखने में भी काफी समय चला जाता है। दूसरों के चिट्ठे पढ़ता ही हूँ, स्वयं लिखने का बहुत समय नहीं मिलता, पर बिना लिखे भी टिप्पणियों और हिट्स का इन्तज़ार रहता है। इसे vanity ही कहा जा सकता है – शब्दकोश के हिसाब से हल्कापन। वेब सर्फिंग यदि उपयोगी न हो तो समय की बरबादी ही है, और यदि यह दफ्तर में की जाए तो बेईमानी भी है। हिन्दी चिट्ठाकारी के चलते वेब सर्फिंग दुगनी हो गई है, और लत इतनी तेज़ है कि दफ्तर के समय का भी अच्छा खासा समय इसी में निकल जाता है, जिसे रोकने की कोशिश करता हूँ पर असफल रहता हूँ। कई बार ऐसा लगता है कि हम एक वर्चुअल दुनिया में रह रहे हैं, एक वर्चुअल ज़िन्दगी जी रहे हैं, और असली ज़िन्दगी पीछे छूट रही है। बेटी को बुखार है, दवाई लेने जाना है, पर यह प्रविष्टि पहले खत्म कर लूँ। मिश्रा जी के यहाँ पार्टी चल रही है – आप का कंप्यूटर तो चल रहा है न मिश्रा जी, मैं ज़रा ईमेल चैक कर लूँ।

४. अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।

अब मुश्किल सवाल पर ला खड़ा किया है। इस पर तो एक अनुगूँज हो सकती है। इतना लिख पाते तो फुरसतिया न होते। अरे याद आया इस पर पहले एक प्रविष्टि लिखी थी, फिलहाल उसे पढ़ लीजिए। :-)

५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी ?

यह और भी मुश्किल प्रश्न है। इतनी सारी चीज़ें मन में आती हैं, कि किसी एक चीज़ पर उंगली रखना मुश्किल है। मेरे विचार में सब से बड़ी तीन चीज़े जिन से भारत को पीछा छुड़ाने की आवश्यकता है, वे हैं – जनसंख्या विस्फोट, घूसखोरी और आतंकवाद। फिलहाल तो यही चाहूँगा कि आतंकवाद का नाश हो क्योंकि इस में भारत को बहुत शीघ्र नष्ट करने की क्षमता है, यदि आतंकवाद नहीं थमा तो सारी प्रगति धरी रह जाएगी।

उम्मीद है, परीक्षा में उत्तीर्ण होने लायक अंक मिल जाएँगे।

अब मुझे जगाया गया है, तो मैं भी कुछ सोये हुए चिट्ठाकारों को जगाने का प्रयत्न करता हूँ। चिट्ठाजगत में घूम रहा हूँ, जहाँ से खर्राटों की आवाज़ आ रही है, वहीं नाम नोट कर रहा हूँ। मैं ऐसे चिट्ठाकारों को टैग कर रहा हूँ जो पिछले एक वर्ष या अधिक समय से सोए हुए हैं। यदि एक को भी जगा पाया तो अपने प्रयत्न को सफल समझूँगा। तो कुंभकर्ण सूची यह रही –

1. रमन बी, जिन्हें अपनी बात कहे अरसा गुज़र गया
2. राजेश कुमार सिंह, आप का अब क्या अभिप्राय है
3. अरुण कुलकर्णी जी, अब तो कुछ उवाचिए
4. बेदिल भगत, मियाँ अब इतने बेदिल भी न बनिए
5. पद्मजा जी, अब कुछ और कहिए तो कही अनकही जीवित हो

बस आप लोगों को करना यह है कि अपने चिट्ठों के पासवर्ड ढूँढ ढाँढ कर एक प्रविष्टि लिखनी है, जिस में पाँच प्रश्नों के उत्तर देने हैं। प्रश्न पत्र वही है जो मुझे दिया गया था। यानी

१. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?

२. आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?

३. चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये ;-) क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है ?

४. अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।

५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी?

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9 Comments on टैगिंग की उत्तर-पुस्तिका

  1. रमण जी!
    मैंने तो चिट्ठाकारी को जवान होते देखा है मगर आज जान पाया आप इसके जन्मदातों में से एक हैं।
    आपलोगों ने देवनागरी में टंकण करने के लिए कितना संघर्ष किया और हम आपद्वारा यूनिनागरी नामक बनी-बनाई खिचड़ी का स्वाद ले रहे हैं।
    जहाँ तक टिप्पणियों का प्रश्न है, आजकल चिट्ठाकार जिस अनुपात में बढ़े हैं शायद पाठक उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं। हम सोचते हैं कि अधिक से अधिक को पढ़ लो और विशेषकर रूप से नये चिट्ठाकारों को। विश्वास रखिए। आपका चिट्ठा बहुत लोग पढ़ते है।

  2. शैलेश जी, ईमेल द्वारा प्राप्त आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद, और यह बताने के लिए भी कि मेरे चिट्ठे पर टिप्पणी बक्सा काम नहीं कर रहा था। लगता है, नए टेंपलेट में कुछ समस्या है। उसे जब तक ठीक करूँ, तब तक पुराना टेंपलेट फिर लगा दिया है। एक बार फिर धन्यवाद।

  3. शुक्र है आपके चिट्ठे पर कमेन्ट होने लगी। मैं पिछले दो दिन से कोशिश कर रहा था। इस बारे में मेल भी करने वाला था।

    मेरे पहले दो मनपसंद सवालों के पुराने चिट्ठाकारों से खूब अच्छे जवाब मिल रहे हैं, मेरा टैग करना सार्थक हो रहा है। अब बस आलोक जी और देवाशीष दादा का जवाब नहीं आया।

    इस पोस्ट से आपके दिए हुए पिछले कुछ लिंक पर गया और पोस्टें पढ़ी। खूब रुचिकर रहीं। तसल्ली से सब पढ़नी होंगी।

    शुषा में सब से बड़ा फायदा यह था कि आप को टाइपिंग के लिए किसी बाहरी टूल की आवश्यकता नहीं थी।

    यह वाली बात जरा समझा सकते हैं क्या, मैं शुषा को फॉन्ट समझता था, क्या वो एक टाइपिंग सॉफ्टवेयर/टूल है ?

  4. यह वाली बात जरा समझा सकते हैं क्या, मैं शुषा को फॉन्ट समझता था, क्या वो एक टाइपिंग सॉफ्टवेयर/टूल है ?

    श्रीश, शुषा है तो फॉण्ट ही। पर वह यूनिकोड नहीं है। यूनिकोड में विश्व की हर लिपि के अक्षरों के लिए अलग कूट बनाए गए हैं, जब कि शुषा में अंग्रेज़ी के ही अक्षरों को ले कर उन्हें बदल कर देवनागरी के अक्षर बनाए गए हैं। इस का अर्थ यह है, कि आप वर्ड या कोई भी वर्ड प्रोसेसर खोल कर लिखना शुरू कीजिए – ihMdI लिखिए, फॉण्ट शुषा चुनिए तो वह हिंदी हो जाएगा। समस्या यह थी कि यदि आप फॉण्ट को वापस Arial कर दें तो वह फिर ihMdI में बदल जाएगा। जिस को आप भेज रहे हैं, उस के पास भी शुषा होना चाहिए।

  5. यह तो जानता था कि शुषा यूनीकोड नहीं है पर यह आज समझा कि वह इतना प्रचलित क्यों हुआ था, वह फोनेटिक फॉन्ट था।

    यह वैसे ही है जैसे बारहा डायरेक्ट का ANSI फॉन्ट होता है। फॉन्ट चुनकर तो हिन्दी में लिखा जा सकता है लेकिन फॉन्ट बदलने पर इंग्लिश हो जाता है और जिसे भेज रहे हैं उसके पास भी वह फॉन्ट होना चाहिए। पर ग्राफिक्स प्रोग्रामों के लिए उपयोगी है

    अच्छा पुराने समय (बल्कि अब भी) कृतिदेव रेमिंगटन फॉन्ट भी बहुत चलता था। वह क्यों इतना प्रचलित हुआ होगा ?

  6. अच्छा पुराने समय (बल्कि अब भी) कृतिदेव रेमिंगटन फॉन्ट भी बहुत चलता था। वह क्यों इतना प्रचलित हुआ होगा ?

    पक्का तो नहीं मालूम, पर शायद रेमिंगटन टाइपराइटर का लेआउट हिन्दी टाइपिस्टों को सिखाया जाता रहा होगा, जिस के कारण इसे एक तरह का मानक माना जाता रहा। फिर भारत सरकार ने इन्स्क्रिप्ट द्वारा मानकीकरण किया, जिस का कंप्यूटर पर अधिक चलन रहा। पर टाइपराइटर से कंप्यूटर पर आने वाले लोग रेमिंगटन के आदी रहे। यह मेरा अनुमान है, यदि कोई अधिक प्रकाश डाल सकें को अच्छा होगा। रवि रतलामी शायद इस बारे में अधिक जानते होंगे।

  7. [...] बारिश होगई जैसे हमारे हरदिल अज़ीज़ रमणजी। उत्तरों का मेला है और एक दूसरे को टैग [...]

  8. होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं रमण जी। :P

    कल शुषा फॉन्ट इस्तेमाल कर देखा। फोनेटिक तो नहीं है लेकिन कुछ कुछ उसके जैसी चीज है कीबोर्ड याद करना ज्यादा मुश्किल नहीं। पुराने समय में फोनेटिक टूल नहीं थे इसलिए उस वक्त के लिहाज से इसका कीबोर्ड बहुत सरल है।

    अब तो इसका और कोई फायदा मुझे लगता नहीं सिवाय कि नॉन यूनिकोड ग्राफिक्स प्रोग्रामों के लिए ठीक है। कीबोर्ड मैप ‘अभिव्यक्ति’ की साइट पर फोन्ट और कीबोर्ड मैप दिया गया है, देख देखकर टाइप किया जा सकता है।

  9. रमणजी़, इस पोस्ट से कम्प्यूटर पर हिन्दी के प्रयोग के विकास की जानकारी मिली साथ ही हिन्दी चिट्ठों की शुरुआत के बारे में भी जाना। अभी चल रहे इस टैगिंग प्रकरण के कारण आप जैसे चिट्ठा जगत के अग्रज के बारे में भी जानने को मिला।

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