बुरक़ा बिकीनी

कल बीबीसी की साइट पर समाचार पढ़ा बुरक़ीनी के बारे में। बीबीसी और एनडीटीवी के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में मुसलमान लड़कियों के लिए समुद्र तट पर स्नान करने के लिए बिकीनी का विकल्प तैयार किया गया है और इसे नाम दिया गया है बुरक़ीनी, यानी बुरक़ा और बिकीनी का मेल। बताया गया है कि अब मुस्लिम लड़कियाँ बीच और सार्वजनिक स्विमिंग पूल पर तैरने जा पाएँगी और लाइफ-गार्ड का भी काम कर पाएँगी।

बीबीसी की अंग्रेज़ी साइट पर इस के बारे में एक वीडियो रिपोर्ट भी है। बेवाच के शौकीन क्लिक करने की ज़हमत न उठाएँ।

आहीदा ज़नेती, जो बुरक़ीना की डिज़ाइनर हैं, कहती हैं, “केवल मुसलमान ही पर्दा नहीं करते। और भी शर्मदार लड़कियाँ होती हैं, जो बीच पर जाना चाहती हैं, पर बिकीनी नहीं पहनना चाहतीं… और फिर यह स्विमसूट केवल हया के लिए ही नहीं, यह आप की त्वचा को धूप, रेत, आदि से भी बचाता है।” आप का क्या कहना है? क्या शर्मसार ग़ैर-मुस्लिम महिलाएँ बुर्क़ीनी को आज़माएँगी, या इसे बुरक़े का ही एक रूप समझ कर इस से पर्दा करेंगी। वैसे, भारतीय समेत कई समाजों की ग़ैर-मुस्लिम महिलाओं को स्विमिंग पूल या बीच पर बिकिनी पहनने से परहेज़ होता है, और कई बार वे कपड़े पहन कर पूल में उतरने से भी मज़ाक का कारण बनती हैं।

Burqini. Picture courtesy ahiida.comशर्मो-हया की अपनी कीमत भी है। डिज़ाइनर आहेदा की वेबसाइट पर बुरक़ीनी दो स्टाइलों में मिलती है। एक स्लिम-फिट वर्जन जो कि 170 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (5900 रुपए) में मिलती है, और एक ऍक्सट्रा लज्जा फिट जो 190 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (6600 रुपए) की है (मुद्रा दर सौजन्य xe.com)। लगता है ऍक्सट्रा लज्जा फिट को नारी के आकार को छिपाने के लिए ढीला-ढ़ाला बनाया गया होगा, और उस के लिए लगे ज़्यादा कपड़े से इस में 20 डॉलर जुड़ गए। पर क्या बीचों पर अब अधिक रंगीनी की जगह अधिक रंग मिलेगा? या यह इस्लाम के अनुयाइयों और उस के विरोधियों में एक और बहस का कारण बन जाएगा? क्या इस के खिलाफ भी कोई फतवा तैयार होगा? आखिरकार औरत की जगह बीच पर तो नहीं है न?

खैर बीच पर जो भी हो, इस बीच ब्लॉगर पब्लियस पंडित इस विषय पर कहते हैं कि थोपी गई शर्मो हया वास्तव में शर्मो हया नहीं है। उन का कहना है,

(महिला उत्पीडन) इस्लामी तानाशाही का एक और रूप है, और किसी भी तरह की बुरक़ीनी से उस का इलाज नहीं होने वाला।

अब यह सोचने वाली बात है कि क्या मुस्लिम स्त्रियों को ज़बरदस्ती पर्दे में रखा जाता है या वे मर्ज़ी से पर्दा करती हैं। मेरे विचार में दोनों ही तरह के लोग हैं। मैं ने पश्चिम में कई पढ़ी लिखी मुस्लिम महिलाओं को देखा है जो हिजाब को अपनाती भी हैं और अपने हिजाब के अधिकार के लिए लड़ती भी हैं। मेरी तो समझ में नहीं आता।

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8 Comments

  1. क्या धांसू बात अंत में डाल दी रमन भाई,
    मैने भी यह……..पड़ा.। जमाने के बदलते
    ढ़ंग हमें किस ओट की ओर ले जाएँगे पता
    नहीं…विकल्पों के लिये दुनियाँ तैयार है…
    चहे शर्म छोड़े या लड़े…।

  2. पश्चिम में महिलाओं के पास चुनने का हक़ है कि वे बुर्क़ा पहनें या न पहनें, लेकिन ज़्यादातर इस्लामी देशों में बुर्क़ा पहनने के सिवा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है और यह दमन का ही दूसरा रूप है। साथ ही पश्चिम में कुछ महिलाएँ अपनी मुस्लिम identity को बनाए रखने के लिए हिजाब वगैरह पहनती हैं, लेकिन इस्लामी देशों में identity की कोई समस्या स्त्रियों के सामने पेश नहीं आएगी। इसलिए अगर इस्लामी देशों में इस प्रकार की ज़ोर-ज़बरदस्ती ख़त्म हो जाए, तो वहाँ शायद ही कोई म‍हिला बुर्क़ा पहने नज़र आएगी।

    कश्मीर भी इसी तरह के दमन का एक उदाहरण हैं। वहाँ पहले बुर्क़ा प्रचलित नहीं था, लेकिन कट्टर मुस्लिम संगठनों द्वारा जारी किए गए फ़तवों की महरबानी से अब वहाँ भी बुर्क़ा तेज़ी से चलन में आता जा रहा है।

  3. बुरकिनी के बहाने ही सही थोडी ताजी हवा , थोडी आजादी तो मिल जायेगी !
    कुछ ना होने से कुछ तो अच्छा है।

  4. बुरखा बिकनी की ये न्यूज मैने भी देखी थी, ड्रैस तो नयी नही है हाँ नाम जरूर नया दे दिया है। लेकिन इतना तो तय है इन बुरखाधारियों के लिये कपडों की आजादी अभी दूर की बात है।

  5. यह बुर्क़िनी कोई नई चीज़ तो ना लागे है। यह तो बस ऐसा लागे है कि महिलाओं ने ट्रैक-सूट पहन लिए और तरणताल में बाल गीले होने से बचाने वाली जनाना टोपी पहन ली। अब कोई पागल ही होगी जो इसके इत्ते पैसे(मतबल डॉलर) देगी!!!

  6. वाह,

    इन लोगों को तो पैदा होते समय भी बुर्का पहन के पैदा होना चाहिये था. 🙂

    खैर, ऐसे मूर्खों की परवाह कौन करता है …

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