यह शीर्षक तो बढ़िया बन गया — एक एक अक्षर वाले नौ शब्द।
पिछले कुछ महीनों से मेरे यहाँ देसी टीवी लौट आया है, और साथ ही लौट आया है मेरा मनपसन्द कार्यक्रम सा रे गा मा पा, जिसे मैं सोनू निगम के समय से नियमित रूप से देखता आया हूँ। इस सीज़न में चल रहा है लिट्ल चैंप्स का मुकाबला, और सीज़न के अन्त में बचे हैं तीन फाइनलिस्ट – दिल्ली का दिवाकर, मुंबई का समीर और कोलकाता की संचिता।

मुकाबले में इस से पहले के दौर में कई बढ़िया बाल कलाकार बाहर हो गए। शुक्र है कि एक उत्कृष्ट गायिका अभी भी बची हुई है – संचिता। समीर और दिवाकर भी बहुत अच्छे गायक हैं, पर संचिता एक अलग ही श्रेणी में है। यदि आप इस कार्यक्रम को देखते हैं और मेरे साथ सहमत हैं तो आज ही संचिता के लिए अपना वोट दें, या फिर अपने मनपसन्द गायक के लिए वोट दें।
इस रविवार शनिवार (28-अक्तूबर) को इस शो का फाइनल दिखाया जाएगा। इस सीज़न की कुछ यादें रहेंगी। आभ्रकान्ति (क्या हिज्जे सही हैं?) का, श्रद्धा का बेहतरीन गायन। समीर, दिवाकर, का बेपनाह उत्साह। गुरप्रीत का कम उम्र होने के बावजूद कॉन्फिडन्स। बच्चों के परिवारों का रोल। श्रद्धा जब प्रतियोगिता से बाहर हुई तो कुछ जज लोगों का रोल कुछ मज़ेदार नहीं रहा। जगजीत सिंह अतिथि जज थे, और उन्होंने श्रद्धा का गाना सुन कर उस के गाने की तारीफ तो की, पर उसे अपना वज़न कम करने के लिए कहा, जो कि बहुत ही असंवेदनशील बात थी। फिर दर्शकों के वोटों के आधार पर वह बाहर हुई तो जज अभिजीत नाराज़ हो कर बोले, “लोगों को आँखें बन्द कर के वोट देने चाहिएँ, न कि शक्ल देख कर”। यह भी उतना ही असंवेदनशील था। अभिजीत और अल्का याग्नीक की जो लगातार नोंक झोंक है, वह अमेरिकन आइडल के साइमन कॉवेल और पॉला अब्दुल की नोंक झोंक की नकल है, और कभी कभी बहुत अखरती है।
यदि आप भारत में या भारत से बाहर ज़ी टी वी देखते हैं, तो यह शो ज़रूर देखते होंगे, यदि नहीं तो यू-ट्यूब पर इस शो के कई गीत उपलब्ध हैं। यहाँ क्लिक करें।
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अपडेट 28-अक्तूबर 2:00pm
मैं इस समय कार्यक्रम का सीधा प्रसारण देख रहा हूँ, और संचिता को लिट्ल चैंप्स चैंपियन घोषित कर दिया गया है। लगभग साढ़े तीन घंटे के शो का हर पल देखने सुनने लायक था।
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यह शो देखता रहा हूँ, जहाँ नन्हे गायको को सुनना काफी अच्छा लगता हैं, वहीं झुठी नौक-झौंक तथा अभिजीत का लहरी से विवाद मन को खट्टा करता रहा हैं. जजो में पक्षपात भी देखने को मिला.
ऐसे शो में वोटींग कमाई का माध्यम हैं जो विजेताओं के चयन को बुरी तरह से प्रभावित करता हैं. कई अच्छे गायक बाहर हो गए तो कुछ उतने अच्छे न होते हुए भी बने हुए हैं. हालमें संचिता जीत की हक्कदार हैं पर निर्णय वोट से होना हैं.
आपने सही विश्लेष्ण किया है। परन्तु संचिता कहीं से भी मुझे बाल कलाकारों की श्रेणी में नहीं लगती है।
सा रे गा मा मेरा भी पसंदीदा कार्यक्रम है । २००५ में हिमानी, विनीत, देबजीत और हेमचन्द्र के गाये गीतों का बहुत लुत्फ उठाया था हम सब ने ।
http://indianspirit.blogspot.c.....-2005.html
हालांकि बच्चों वाला सिलसिला मुझे २००५ के शो की तुलना में काफी फीका लगा ।
रही बात जजों की नौटंकी की तो रियाल्टी शो के नाम पर ये लोग संगीत सुनने का मजा बिगाड़ देते हैं और भाग लेने वालों के साथ जो होता है उसकी बानगी तो आपने बखूबी पेश की ही है । सन २००५ के सा रे गा मा के विजेता के चुनाव के पहले देबजीत को असम से मिलने वाले वोटों का नाटकीय ढंग से दिखा कर सनसनी पैदा करना हो या इंडियन आइडल – I में पंजाब के एक प्रतिभागी की वेश भूषा को ले कर की गई फराह खान की तल्ख टिप्पणी हो ये भोंडापन संगीत प्रतिस्पर्धाओं का अभिन्न अंग बनता जा रहा है। इस बारे में गुस्से में आकर ये पोस्ट लिखी थी
http://indianspirit.blogspot.c.....on_25.html
रमण जी
आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. मेरा भी प्रिय कार्यक्रम है यह. वैसे फईनल में सेलेक्शन का पेटर्न बदलना चाहिये, इसका आभास विनित देबोजित के वक्त से ही हो रहा है. पर इसमें कोई मत नहीं, नई प्रतिभाओं को बहुत बेहतरीन मंच मिल रहा है.
मेरे पास सिर्फ ज़ी टीवी SMILE आता है और मैं ने आज ही सुबह को “आजतक” खबरी चैनल पर दिल्ली के दिवाकर को सुना, उसकी आवाज़ बहुत पसंद आई तो मैं ने उसी को वोट दिया क्योंकि दूसरों को मैं ने अब तक नही सुना अलबत्ता हमारे एक गुजराती मित्र जय शुक्ला ने मुंबई के समीर को वोट दिया है जो कि उसकी आवाज़ पर बहुत फिदा हैं। अपने और दो मित्रों ने जिनके पास पास ज़ी टीवी है, ने कोलकाता की संचिता को वोट दिया है।
आवाज़ें सबकी अच्छी ही होंगी पर मेरी शुभकामनाएँ दिल्ली के दिवाकर के लिए ज़्यादा हैं। आखिर मे मैं ये भी कहना चाहूंगा कि ये सब शो (दिखावा है) वोटिंग से कोई मतलब नहीं।
इस कार्यक्रम के स्तर में पिछले कुछ समय से गिरावट आई है
” फिर दर्शकों के वोटों के आधार पर वह बाहर हुई तो जज अभिजीत नाराज़ हो कर बोले, “लोगों को आँखें बन्द कर के वोट देने चाहिएँ, न कि शक्ल देख कर”। यह भी उतना ही असंवेदनशील था। ”
आपकी इस बात से कतई सहमत नहीं हूँ क्योंकि किसी के गायन का मूल्यांकन उसको सुनकर किया जाता है पर जब हम उसे देखते हैं तो हम उसके व्यक्तित्व वेश-भूषा आदि से भी प्रभावित होते हैं जिससे कलाकार की गायन प्रतिभा का मूल्यांकन सहे ढंग से नहीं हो पाता। मेरे मत से अभिजीत का कथन बिल्कुल सही है
बधाई, आपका वोट काम का सिद्ध हुआ और संचिता को जिता ले गया. Well Deserved.
sach mein “sanchita” ney bahut mehnat ki hogi is jeet key liye.
Uski Koshish Kamyab hui aur woh awal aayi.
सभी टिप्पणियों के लिए धन्यवाद। भुवनेश जी, मैं भी मूलतः अभिजीत के कथन से सहमत हूँ, पर वहाँ उन के कहने का यह अर्थ निकल रहा था कि दर्शकों ने उन के मोटापे को देख कर वोट नहीं दिए। इस से पहले जगजीत सिंह के कमेंट को देखते हुए यह ठीक नहीं था।
समीर और दिवाकर भी बहुत अच्छे गायक हैं, पर संचिता एक अलग ही श्रेणी में है।
संचिता का अलग श्रेणी में होने की एक वजह ये भी है कि वो लिटिल चैंपस से ऊपर वाली श्रेणी में फीट बैठती सी लगती है। लेकिन जो भी हैं सब एक से बढ़कर एक थे मैं दिवाकर के हक में था लिटिल चैंपस के लिये। लेकिन बच्चों के बारे में आपने सही लिखा है।
बधाई हो रमणजी आपका वोट काम आया
रमण जी
मैं आपसे सहमत हुँ मुझे भी यह कार्यक्रम बहुत अच्छा लगता है, लेकिन जब से आब्रोकान्ति तथा पावनी बाहर हुय है मैंने यह कार्यक्रम देखना बन्द कर दिया था। क्योकि मेरे मतानुसार आब्रो सब बच्चों में श्रेष्ठ था। उसके बाद मैनें केवल फाइनल देखा था तथा यह देखकर खुशी हूई कि जजों ने भी उसे सर्वश्रेष्ठ माना।
जहाँ तक SMS के जरिये कमाई का प्रश्न है तो यह तो कार्यक्रम की पैकेजिग देखकर ही आभास हो जाता है कि यह सोने का अंड़ा देने वाली मुर्गी है।
hi,
all tv showup thankas tim jo aap ke is tv program
se bahut logo ko gindagi me kuchha bane ke maoke milte hai ,we apne aap ko sabit kar sa ke ki unme bhi kuchha hai jo des ke unati ko badhane me madat kare
aur jo a.r.rahman ki tarah askar ki der sare aword dila se, thanks