काफी समय से चिट्ठा नहीं लिख पाया हूँ। भारत-यात्रा बहुत समय से प्रतीक्षित थी, इस बार साढ़े तीन साल बाद आया हूँ। इस कारण कुछ समय उस की तैयारी में व्यस्त रहा — फिर यात्रा में। पिछले दो सप्ताह से, जब से भारत पहुँचा हूँ, लगातार यात्रा पर हूँ। हर सुबह, हर शाम अलग जगह पर गुज़री है। यात्रा में कई अनुभव हुए, कई चीज़ें देखीं, और उन चीज़ों की सूची में जिन पर लिखा जा सकता है, पर कभी लिखा नहीं जाता, दरजनों और चीज़ें जुड़ गईं। लगभग जहाँ गया, इंटरनेट सुविधा घर में उपलब्ध थी। जहाँ नहीं थी अपना लैपटाप आसानी से इंटरनेट से जुड़ गया। फिर भी लिखने का समय और समाँ नहीं बना। अभी लगभग दो सप्ताह और यहाँ हूँ। परिवार साथ नहीं है, और यहाँ होने की खुशी से ज़्यादा घर की याद सता रही है।

आने का जहाज़ का सफ़र बड़ी सेंज़िटिव तारीख पर था। स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व-सन्ध्या पर दिल्ली पहुँचना था। द्रव्य विस्फोटकों का भय ज़ोरों पर था। जहाज़ के केबिन में टूथपेस्ट ले जाना भी वर्जित था। पर फिर भी यात्रा, सुरक्षा-जाँच आदि बहुत ही सुगम रही, सिवाय इस के कि चौदह घंटे की लंबी उड़ान के बाद सब की साँसें दुर्गन्धपूर्ण थीं। वापसी की उड़ान भी सेंज़िटिव तारीख पर है – ११ सितंबर को न्यूयॉर्क पहुँच रहा हूँ।

इस बीच ऍम्सटर्डम प्रकरण पर यहाँ की खबरिया चैनलों को, अखबारों को एक ही राग अलापते देखा — “यह नस्लभेद का मामला है’, “डच सरकार से हरजाना वसूलना चाहिए”, “डच राजदूत तलब”, आदि। यह किसी ने नहीं कहा कि जिन लोगों ने स्पष्ट निर्देशों के बावजूद उड़ान के नियमों की अवहेलना की, और स्वयं सहित डेढ़ सौ यात्रियों को मुश्किल में डाला, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। पिछले पाँच वर्षों से जो हवाई सुरक्षा के मामले में छाछ को भी फूँक-फूँक कर पीने की प्रवृति अपनानी पड़ी है, उस माहौल में इस तरह की लापरवाही कहाँ की अक्लमन्दी है? यदि यह सही है कि वे बार बार कहे जाने पर भी नियमों की अवहेलना कर रहे थे, तो पाइलट ने जहाज़ को वापस मोड़ कर बिल्कुल सही किया और लाखों यात्रियों को एक सबक भी दिया और विश्वास भी। आज के टाइम्ज़ आफ इंडिया में मुख्य सम्पादकीय है “हवा में रंगभेद”। संपादकीय में इस बात की ओर इशारा किया गया है कि शायद यात्रियों का बरताव समझ के फेर के कारण था, एयरलाइन्ज़ को ऐसी उड़ानों में एशियाई स्टाफ रखना चाहिए, एशियाई भाषाओं में एनाउन्समेंट करने चाहिएँ, पहली बार यात्रा कर रहे लोगों की सहायता करनी चाहिए, आदि। अब यह बात तो पचाने योग्य नहीं लग रही कि जो यात्री संभ्रान्त व्यापारी परिवारों से थे, लैपटाप-मोबाइलों से खेल रहे थे, वे पहली बार यात्रा कर रहे हों या अंग्रेज़ी में की गई एनाउन्समेंट को न समझ पा रहे हों। वैसे मेरे विचार में हर भारत आने वाली या भारत से चलने वाली उड़ान में, चाहे किसी एयरलाइन की हो, हिन्दी में एनाउन्समेंट होती है। कांटिनेंटल एयर की जिस उड़ान में मैं आया, उस में खान-पान सूची (मेन्यू) भी हिन्दी में थी। पर आम तौर पर ऐसी घोषणाएँ नियमों की पूर्ति के लिए ही होती हैं, यात्री पढ़ते भी अंग्रेज़ी हैं, और सुनते भी अंग्रेज़ी हैं। टाइम्ज़ वालों को यह हम आप से ज़्यादा पता है — उन का धन्धा ही इसी बात पर टिका है।

संपादकीय कहता है कि कोई भी प्रशिक्षित आतंकवादी इस तरह का काम नहीं करेगा जिस से वह अलग दिखाई दे। यह तर्क यदि मान्य हो तो शायद रिचर्ड रीड जैसे आतंकवादी भी नहीं पकड़े जाते। सुरक्षा कर्मियों को तो यही नीति अपनानी पड़ेगी, यह ज़िम्मेदारी यात्रियों पर है कि वे अपने बर्ताव को सन्देह से ऊपर रखे। यदि अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों में किसी प्रकार की रेशियल प्रोफाइलिंग होती है तो उस की ज़िम्मेदारी मुस्लिम समुदाय को भी लेनी पड़ेगी। आजकल विश्व भर में जितनी ऐसी घटनाएँ होती हैं, उन में मुस्लिम आतंकवादी ही मुलव्विस होते हैं, और मुस्लिम समाज इन लोगों को समाज से निष्कासित करने की बजाय इन्हें हीरो की पदवी देता है या मज़लूम की। साथ में पिसता है बाकी का शान्तिप्रिय मुसलिम समुदाय, और यहाँ तक कि हम जैसा गैर-मुसलमान जो उन्हीं जैसा दिखता है और कई बार शक के दायरे में आ जाता है, या इसी आधार पर नस्लभेद का शिकार होता है। सुरक्षा कर्मियों को हम सब पर शक करने के इलावा क्या चारा है — अमरीका या इसराइल ने मुसलमानों पर जो “सितम” ढ़ाए हैं, उन का ज़िम्मेदार एक आम यात्री तो नहीं।

ऐसे में शेख़चिल्ली जी ने डंके की चोट पर बात कही है, पर शेख़ जी ज़रा IBN7 को भी समझाइए न।

पुनश्च : यह प्रविष्टि २८ अगस्त को लिखी गई, पर आज ३० अगस्त को पोस्ट की गई।

5 Comments on हवा में रंगभेद?

  1. SHUAIB says:

    धन्यवाद रमण जीः आप आए तो बहार आई 🙂 हिन्दी ब्लॉग जगत मे आपकी कमी शुद्दत से मेहसूस की।

  2. जीतू says:

    रमण भाई, स्वागत है। आशा है आपकी यात्रा अच्छी चल रही होगी।
    आप सही कह रहे है। टीवी पर जब देखा तो बहुत गुस्सा आया, इन लोगो ने भारत का नाम खराब किया है। लेकिन मेरे पास पूरी सूचनाए नही थी, बिना पूरा मामला समझे, सिर्फ़ अफ़वाहो पर पोस्ट लिखना मुझे नही सुहाया, इसलिए चुप रहा। अब आपने दोबारा ध्यान आकर्षित किया है तो लिखने का मन बनाता हूँ।

  3. SHUAIB says:

    अरे मैं तो भूल ही गयाः
    खुशआमदीद रमण जी 🙂

  4. suru25 says:

    आपने बिल्कुल सही कहा है. यह रंगभेद का मामला कम अनुशासनहीनता का मामला ज्यादा है. वैसे भी नियम निर्देशों का पालन करना हम शान के खिलाफ समझते हैं और हमेशा अपने को नियमों से ऊपर समझते हैं. ऐसे में इस हादसे से सबक तो मिलता ही है.

  5. इधर लोगों में — खासकर नव धनाढ्य लोगों मे ‘ सिविक सेंस ‘ , अनुशासन, नियमों की पाबंदी जैसे गुण दुर्लभ होते जा रहे हैं . उन्हें लगता है कि वे कुछ भी करें उनका कुछ भी नहीं होगा . आखिर इस देश में ले-दे कर मामला रफ़ादफ़ा करने की परम्परा है. पर जब ऐसी स्थिति में और कहीं फस जाते हैं तब आटे-दाल का भाव पता चलता है .

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