अनूप कुमार शुक्ला फुरसतिया जी की अमरीकी और उनके मिथक बहुत रुचि के साथ पढ़ी। उन्होंने अमरीका में रह रहे भारतीय चिट्ठाकारों को इतना उकसाया कि सोचा कुछ लिखा जाए। मुझे जो कुछ कहना था, उस में से बहुत कुछ, और बहुत कुछ और,  ईस्वामी ने कह दिया। तो मैं यह प्रविष्टि दो कारणों से लिख रहा हूँ — एक, इस आरोप का उत्तर देने के लिए कि हम लोग यहाँ के बारे में बेबाकी से नहीं लिखते; दो,  रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वेक्षण ने मुंबई की शिष्टता के विषय में जो निष्कर्ष निकाला, वह क्यों निकाला।

पहले रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वेक्षण की बात की जाए। बीबीसी या रेडिफ की हेडलाइन्ज़ से निष्कर्ष निकालने की बजाय रीडर्स डाइजेस्ट के मूल लेख को पढ़ा जाए। यह तय है कि यह लेख मुम्बईवासियों के लिए नहीं लिखा गया, न ही उन को चिढ़ाने के लिए  — पूरे लेख में चर्चा न्यूयॉर्क की है, और इस बात की कि वे न्यूयॉर्क को जितना बदतमीज़ समझते थे उतना नहीं निकला। इंटरनेट में हुई चर्चाओं में कुछ लोगों ने कहा है कि दिल्ली वाले ज़्यादा अशिष्ट हैं — उन से मेरा कहना है कि इस में अन्य भारतीय शहरों की बात नहीं की गई थी, इस कारण मुम्बई सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करती है। सर्वेक्षण केवल 35 ऐसे देशों के मुख्य शहरों में किया गया जहाँ रीडर्स डाइजेस्ट छपता है। इस में केवल तीन प्रश्नों के आधार पर अंक दिए गए – एक, क्या आप अपने पीछे आने वाले व्यक्ति के लिए दरवाज़ा खोल कर रखते हैं (डोर टेस्ट); दो, आप के पास चल रहे किसी आदमी के कागज़ बिखर जाएँ तो क्या आप उन्हें उठाने में मदद करेंगे (डॉक्यूमेंट टेस्ट); तीन, जब आप कोई चीज़ खरीदते हैं तो क्या दुकानदार, या सेल्ज़-क्लर्क आप को धन्यवाद देता है (सर्विस टेस्ट)?  इस सर्वेक्षण को उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना इस का स्कोप है। 

यह तीनों प्रश्न मेरे विचार से पश्चिमी वातावरण और पश्चिमी सभ्यता से जुड़े हैं, इस कारण पूर्वी देशों के नगरों को इस सर्वेक्षण में नीचे जगह मिली है। आप यह तीनों प्रश्न स्वयं से ही पूछ लीजिए, आप का क्या उत्तर होगा?  

यहाँ सभी इमारतें, दुकानें, दफ़्तर हीटेड होने के कारण सब जगह दरवाज़े हैं, जो या तो स्वतः खुलते-बन्द होते हैं, या खोले जाने पर स्वतः बन्द होते हैं। मज़दूरी महंगी होने के कारण दरवाज़े पर दरबान नहीं होते। आबादी कम होने के कारण लोगों की लंबी रेल एक साथ नहीं चल रही होती। आप दरवाज़े से निकल रहे हैं और आप से तीन चार कदम पीछे कोई और चल रहा है, यदि आप निकल कर दरवाज़ा एकदम छोड़ देते हैं तो या तो उस के मुंह पर लगेगा, या उसे दोबारा खोलना पड़ेगा। इस कारण शिष्टतावश आप दरवाज़े से निकलते हुए देखते हैं कि आप के पीछे कोई आ तो नहीं रहा, और यदि आ रहा हो तो आप उस के आने तक दरवाज़ा पकड़ कर रुक जाते हैं। वह आप से दरवाज़े का पल्ला लेकर आप को धन्यवाद देता है और आप “वेलकम” कह कर आगे बढ़ जाते हैं। अब इसी सिचुएशन को आप मुम्बई में ऍप्लाइ कर के देखिए। भीड़ भड़क्के वाली जगह होगी तो या तो दरवाज़ा नहीं होगा, या लोगों की रेल दरवाज़े को कभी बन्द नहीं होने देगी। हाइ-फंडा जगह होगी तो दरबान खड़ा होगा। मुंबई की भीड़ में आप जान बूझ कर अपने कागज़ बिखेरेंगे तो संभावना यही है कि वे कागज़ भी कुचले जाएँगे और उसे उठाने वाला भी। कोई चीज़ खरीदने पर क्या आप को सेल्ज़ क्लर्क धन्यवाद देता है? शायद देता हो, शायद नहीं। यहाँ आप स्टोर से खरीदारी करते हुए लाइन में लग कर भुगतान करते हैं, आप की बारी आती है तो आप से पूछा जाता है कि आप कैसे हैं, जब तक क्लर्क आप का सामान स्कैन करती है, तब तक औपचारिकतावश आप से छुटपुट बात करती है — मौसम के बारे में, आप के साथ बच्चा हो, तो उस के साथ (आइ लाइक यौर शर्ट, आइ लाइक यौर हेयर), और अन्त में थैंक्स, हैव ए नाइस डे, आदि। यह उस की नौकरी, उसके प्रशिक्षण का एक हिस्सा है। यदि यह सब भारत में हमारे वातावरण का भाग नहीं है, तो इस तरह के सर्वेक्षण का हमारे लिए कोई अर्थ नहीं है।

अब इस आरोप की बात की जाए कि हम लोग यहाँ के बारे में बेबाकी से क्यों नहीं लिखते। क्या इस का अर्थ यह हुआ कि हमारे ऊपर रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में ज़ुल्म होता है, और हम उस के बारे में कुछ नहीं लिखते, या हम यहाँ के समाज की बुराइयों से त्रस्त हैं और हम उफ़ तक नहीं करते? मुझे नहीं मालूम कि बेबाकी से क्या नहीं लिखा जा रहा। अतुल ने तो “लाइफ इन…” में हर पहलू को छुआ है।

मैं सोचता हूँ कि अक्सर भारतीय जो यहाँ आते हैं, यहाँ हमेशा बसने के इरादे से नहीं आते, पर होता यूँ है कि अधिकांश लोग बस ही जाते हैं — बावजूद इस के कि उन को वीज़ा, ग्रीन-कार्ड और नागरिकता के वर्षों लम्बे चक्रव्यूह से गुज़रना पड़ता है। पूरी ज़िन्दगी वे भारतीय बने रहते हैं, भारत में जितने भारतीय थे, उस से कहीं ज़्यादा। देश में छूटे भाई-बन्धुओँ को याद करते रहते हैं — वे उन्हें याद करें या नहीं। यहाँ ऐसे काम करते हैं, जो शायद भारत में कभी नहीं करते। पर फिर भी छोड़ कर लौटने का नाम नहीं लेते।  इस का कारण क्या है? पैसा तो नहीं — कई लोगों के पास भारत में यहाँ से ज़्यादा पैसा होता है, या कमाने की क्षमता होती है। यहाँ का सामाजिक खुलापन भी नहीं — भारतीयों का समाज जितना अमरीका में खुला है, उससे कहीं अधिक भारत में है। फिर क्या कारण है? शायद यह कि यहाँ की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का “टोटल पैकेज” वहाँ से ज़्यादा आसान है। जो यहाँ आकर, पढ़कर, या नौकरी कर, लौट गए, उन को मेरा नमन। पर आम आदमी नहीं लौटता। फिर ऐसा क्या है जो हम बेबाकी से नहीं लिखते? 

जहाँ तक शिष्टता की बात है, आप को एक सादी सी मिसाल देता हूँ। श्रीनगर में कॉलेज के दिनों में कभी पिक्चर देखने जाते थे, तो टिकट लेना हिमालय पर चढ़ने जैसा होता था। लाइन क्या होती है, यह किसी को पता नहीं था — लगते ही टूट जाती थी। ऍडवान्स बुकिंग? वह किस जानवर का नाम है? यदि फिल्म नई नई लगी हो तो, आप के पास केवल दो रास्ते होते थे — या तो अपने हाथ पैर तुड़वा कर, कपड़े फड़वा कर टिकट लो, या ब्लैक में लो — वैसे भी खिड़की से दस प्रतिशत से अधिक टिकट बिकते नहीं थे (यह अलग बात है कि आज वहाँ लगभग सभी सिनेमाघर तालिबानी हुकूमत के कारण बन्द हैं – और जो लोग टिकटें ब्लैक करते थे और अमिताभ बच्चन को अपना देवता समझते थे, आज उन्ही के हाथों में बन्दूकें हैं)। आप रीडर्स डाइजेस्ट को पृथ्वी के स्वर्ग में सर्वे करने भेजिए। ख़ैर, फिर दिल्ली आ कर देखा कि कहीं कहीं लाइन की भी गरिमा होती है, बेशक साथ में कालाबाज़ारी भी चल रही हो — सिनेमा में, रेल-आरक्षण में, आदि। फिर भी, इन मामलों में पश्चिम के साथ तुलना करेंगे तो वही होगा कि हम स्वयं को सूची में नीचे नीचे पाएँगे।

जैसा मैं ने अपनी टिप्पणी में बताया, दोनों समाजों की अपनी अपनी समस्याएँ हैं, अपनी अपनी खूबियाँ हैं। हाथी और सात अन्धों वाली कहानी की तरह हाथी को रस्सी या खम्भा समझ बैठते हैं। जैसा स्वामी जी ने बताया, कुछ देर रह कर ही पूरी बात पता चलती है।

यदि ऐसा सर्वे किया जाना हो ताकि अमरीका और पश्चिम के देश सूची में नीचे आएँ तो कुछ इस तरह के प्रश्न रखने होंगे — 1. क्या काम के सिलसिले में किसी घर या दफ्तर में जाने पर आप को चाय-पानी के लिए पूछा जाता है? 2. क्या आप पार्क में खेल रहे दूसरे के बच्चे को गोद में उठा कर पुचकारते हैं? 3. आप की कंपनी में कोई दूसरे देश का व्यक्ति आ रहा है, और उस की उडान रविवार को आ रही है, क्या आप उसे हवाई अड्डे लेने जाएँगे, या उसे टेक्सी या रेंटल कार लेने को कहेंगे?

रवि ने अपनी टिप्पणी में जिस किस्से का ज़िक्र किया, वह होना बहुत आसान है — हालाँकि लगता है कि समय के साथ उस में कुछ अतिशयोक्ति जुड़ गई है। मैं टोरोंटो में नया नया आया था तो बस में मेरे साथ वाली खाली सीट पर एक बच्चा बैठा था। मैं उस से प्यार से बात करने लगा — क्या नाम है, कहाँ जा रहे हो, किस क्लास में पढ़ते हो? इतने में पिछली सीट से उस की माँ की आवाज़ आई, “पीटर, मैं ने तुम्हें क्या कहा है अजनबियों से बात करने के बारे में?” मैं समझ सकता हूँ कि माता जी के साथ भी ऐसी ही गुज़री होगी, पर मसला सुलझने में भी ज़्यादा देर नहीं लगी होगी। पुलिस वालों को घूस भी नहीं देनी पड़ी होगी, और आशा है कि जेल वाली बात चलते-चलते जुड़ गई होगी। पर क्या करें, यह नए मिज़ाज का शहर है…

इसी तरह कई विरोधाभास अमरीका में हैं, और कई अपने भारत में हैं। कितनी कहानियाँ सुनी हैं, जहाँ इस तरह के केस में किसी औरत को बच्चा-चोर समझ कर पब्लिक ने ही काम तमाम कर दिया हो। यहाँ यह देख कर अजीब लगता है कि कुत्ते-बिल्लियों को घर में पालते हैं, उन पर हज़ारों खर्च करते हैं, पर बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं।

हिन्दी ब्लॉगर ने भी कुछ प्रश्न उठाए हैं

…अमरीका में स्ट्रीट क्राइम की स्थिति भारत से बुरी है कि नहीं? जघन्य अपराधों के मामले में अमरीका को भारत से ऊपर रखा जा सकता है या नहीं? वहाँ पारिवारिक समस्याएँ भारत से ज़्यादा हैं या नहीं? अमरीका में अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई भी भारत के मुक़ाबले बड़ी है कि नहीं? एक आम अमरीकी एक आम भारतीय के मुक़ाबले ज़्यादा स्वार्थी है कि नहीं? भारत में आमतौर पर विदेशियों को (ख़ास कर गोरों को) जिस तरह इज़्ज़त दी जाती है क्या अमरीका में विदेशियों को (ख़ास कर भूरों को) उस दृष्टि से देखा जाता है?

इन सब सवालों का मेरे हिसाब से यह जवाब है — “ज़रूरी नहीं”। अन्तिम प्रश्न का कुछ उत्तर प्रश्न में ही है — कोष्ठकों में। नस्लवाद बहुत बुरा है, पर मुझे लगता है कि हम भारतीय भी किसी से कम नस्लवादी नहीं हैं। प्रश्न यह है — क्या हम गोरों की जितनी इज़्ज़त करते हैं, उतनी ही कालों की करते हैं? हमारे घर किसी नाइजीरियन के आने से क्या हमारा सीना उतना ही चौड़ा होता है जितना किसी जर्मन के आने से? यहाँ अमरीका में भारतीय लोग अक्सर आर्थिक रूप से समृद्ध हैं और स्वयं चाहे जिस रंग के हों, कोशिश यही करते हैं कि ऐसे इलाके में रहें जहाँ कालों की अपेक्षा गोरों की आबादी अधिक हो, बच्चों को ऐसे स्कूल में भेजें जहाँ कालों की तादाद कम हो। अपने भारत में ही हम क्या कम नस्लवाद बरतते हैं — चाहे वह जातिवाद के रूप में हो, या क्षेत्रवाद के रूप में? एक भारतीय के लिए शिकागो में बसना, नौकरी करना, क्या उतना मुश्किल है, जितना एक अमरीकी के लिए पटना में? क्या सिक्किम या बिहार या उत्तर प्रदेश से आए व्यक्ति को मुम्बई में काम करने आने पर एक तरह के नस्लवाद का सामना नहीं करना पड़ता? अभी न्यूज़वीक में एक फिलिपीनी महिला के अनुभव के बारे में पढ़ा (लिंक नहीं मिल रहा), जिसे अपने देश में अपने रंग और नैन-नक्श को हीन भावना से देखना पड़ता था (गोरेपन की क्रीमें, नाक को खींच कर बड़ा करने की कोशिश), पर अमरीका में आने पर उसे पता चला कि काला भी खूबसूरत हो सकता है, और चीनी नैन-नक्श वाला भी।

खुली कामुकता शायद बुरी हो, पर क्या दबी कामुकता उतनी ही बुरी नहीं है? अभी शुएब ने बताया कि दुबई में चन्द लड़कियों को देख कर कैसे पूरा जुलूस “या शबाब” का नारा लगा रहा था। भारत के स्कूलों कॉलेजों में भी ऐसे नहीं तो इस से मिलते जुलते दृष्य की कल्पना की जा सकती है। क्या आप अपनी बेटी को ऐसे माहौल में स्कूल भेजना चाहेंगे, या ऐसे में जहाँ खुलापन हो पर केवल अनुमति के साथ — जहाँ हिजाब पहन कर भी लड़की स्कूल जा सके और मिनी स्कर्ट पहन कर भी? 

13 Comments on मिथक – अमरीकी और भारतीय

  1. यह लेख पढ़ने के पहले ही मैं अपने कुछ विचार पोस्ट कर चुका था। यह लेख बहुत अच्छा लगा। मेरे उकसाने पर आपलोगों के कीबोर्ड हरकत में आये यह सुखद अहसास है।

  2. जब बात वहाँ के बारे में लिखने की कहता हूँ तो कम से कम मेरा आशय वहाँ के समाज के बारे में जानकारी से होता है । न कि उन बातों के बारे में जिनका जिक्र यहाँ किया गया।(पैरा पाँच में)

  3. धन्यवाद, रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वे के बहाने छिड़ी बहस को आगे बढ़ाने के लिए.

    हम सभी लोगों का यही मानना है कि हर देश, हर समाज, हर व्यक्ति में विशेषताएँ और कमियाँ दोनों होती हैं. इतना ज़रूर हो सकता है कि किसी मामले में अच्छाइयाँ ज़्यादा हों और किसी में कमियाँ. किसी देश को या फिर किसी धर्म को सर्वश्रेष्ठ ठहराने का कोई भी प्रयास निरर्थक ही कहा जाएगा. बात सम्यक दृष्टि की होनी चाहिए.

    मुझे अमरीका में रहने का सौभाग्य तो नहीं मिला, लेकिन पाँच वर्षों तक भारत से दूर एक विकसित माने जाने वाले समाज में रहा हूँ- अतिथि श्रमिक के तौर पर नहीं, बल्कि स्थाई निवासी के तौर पर यानि पूरे अधिकारों के साथ(वोट देने के अधिकार समेत). इसके अलावा घुमक्कड़ी के दिनों में, जबकि बुढ़ापे के लिए बचत करने की जरा भी चिंता नहीं थी, कुल 13 यूरोपीय देशों में सप्ताह से लेकर तीन सप्ताह तक रह कर उन्हें थोड़ा-बहुत जानने का भी मौक़ा मिला है. इनमें ब्रिटेन, फ़्रांस या इटली जैसे विकसित देश, रूस या जर्मनी जैसे कड़े क़ानूनों में बंधे देश, और नीदरलैंड्स, डेनमार्क या स्वीडन जैसे उन्मुक्त देश शामिल हैं. हमें ऐसी कोई जगह नहीं दिखी जहाँ कि अपनी स्थानीय समस्याएँ नहीं हों(छोटी भी और अत्यंत गंभीर भी), या जहाँ कि स्थितियों को आदर्श मान कर उन्हें भारत में हूबहू उतारने का सपना दिखा हो.

    हर समाज के अपने-अपने आदर्श और मानदंड होते हैं. इसलिए भारत और अमरीका की नख-शिख तुलना करना ही बेमानी है.
    लेकिन ईस्वामी जी की दलीलों का क्या कहना! भावनाओं में बह कर न जाने कहाँ-कहाँ के तर्क दे बैठे. प्रस्तुत है एक नमूना- “जिस देश के लोगों ने … …, दुनिया को पीसी और इन्टरनेट जैसी चीज़ दे रखी है उसी इन्टरर्नेट पर उन्हें सीमित दायरे में जीने वाला कहा जा रहा है.”
    भइये, इसका मतलब तो ये हुआ कि इंग्लैंड ने दुनिया को टेलीविज़न दिया इसलिए टेलीविज़न पर वहाँ की ‘गंदगी’ नहीं दिखाई जाए, या चीन में काग़ज़ का आविष्कार हुआ तो पत्र-पत्रिकाओं के ज़रिए वहाँ की सेंसरशिप पर सवाल नहीं उठाए जाएँ!
    हमारे अमरीकावासी मित्र वहाँ के संविधान के पहले संशोधन को क्यों भूल जाते हैं?

  4. हर समाज मे उसकी परिस्थियों के कारण अपने मापदंड, अपनी मान्यता| इसमे कुछ अच्छी, कुछ उतनी अच्छी नहीं| शायद उन्हे एक ही मापदंड से नापना ठीक नहीं|

  5. बहुत ही अच्छा लेख है. मैने आपका यह लेख पढ कर अपना तीसरा लेख लिखने का विचार रद्द कर दिया है – अब उसकी कोई जरूरत ही नही रही. काश अपना दूसरा लेख लिखने से पहले ये पढा होता – उसमें कई बातें दूसरे शब्दो में दोबारा आ गईं हैं.

  6. […] (हिंदी चिट्ठामंडल में रीडर्स डाइजेस्ट के हालिया सर्वे से शुरू हुई एक बहस चल रही है, जो इस मुद्दे से कहीं आगे जाती है। मैं फिलहाल बस इस सर्वे के बारे में दो-चार बातें कहना चाहता था, जो टिप्पणियों के लिए बड़ी नज़र आती हैं। इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ।) […]

  7. लेख दमदार है, भावनाएँ भी हैं और तर्क भी. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.

  8. […] हिंदी ब्लागजगत में छिड़ी ताजा बहस कई दिन से पढ़ी जा रही थी, आनँद भी लिया जा रहा था। आज अपना उल्लेख देखा। लिखना बहुत दिन से टल रहा था। अपना नाम देख कर अब हाथ की खुजली और छपास की पीड़ा को रोकना अब सँभव नही। पेश है मेरा नजरिया रोजनामचा पर। […]

  9. रवि says:

    ‘इधर उधर की’ को माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया ब्लॉग पुरस्कार प्राप्त करने पर हार्दिक बधाई!

  10. प्रभावशाली लेख है।
    पुरस्कार की बधाई।

  11. मनीष says:

    काफी अच्छा लिखा है आपने ! कई नयी बातें पता लगीं ।

  12. SHUAIB says:

    पुरस्कार मिलने पर आपको बहुत बहुत बधाई।

  13. Tarun says:

    रमणजी पुरस्कार की ढेरों बधाई

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