अभी हाल में प्रतीक का पोस्ट पढ़ा सही हिन्दी लिखने पर। बहुत ही सटीक और सामयिक लेख था, और इस विषय पर मैं भी बहुत समय से लिखना चाहता था। अब प्रतीक की बात को ही आगे बढ़ाता हूँ। हालाँकि हम सभी चिट्ठाकार हिन्दी के दीवाने हैं, हम में से अधिकांश लोगों ने हिन्दी में कोई उच्चस्तरीय शिक्षा नहीं प्राप्त की है। लगभग सभी लोग तकनीकी क्षेत्रों में हैं, और बहुत कम लोगों ने हाइ-स्कूल से आगे हिन्दी पढ़ी होगी। इस कारण हम में से कई लोग ऐसे हैं जो मात्राओं आदि का हेर-फेर करते रहते हैं। इस के अतिरिक्त हिन्दी में किसी वर्तनी-जांचक-तन्त्र की कमी के कारण हम से कई त्रुटियाँ अनदेखी हो जाती हैं। पर फिर भी हम यदि अंग्रेज़ी लिखते हुए स्पेलिंग, ग्रामर, पंक्चुएशन जाँचने के बाद ही “पोस्ट” पर क्लिक करते हैं, तो हिन्दी लिखते समय भी थोड़ा ध्यान तो दे ही सकते हैं। अंग्रेज़ी में तो शब्दकोश का सहारा लेना पड़ता है, पर हिन्दी में बस सही उच्चारण मालूम हो, कुछेक नियमों का ज्ञान हो और सही लिखने की इच्छा हो, तो सब सही हो जाता है।
मेरे विचार में चिट्ठों पर वर्तनी की अशुद्धियाँ निम्न वर्गों में बांटी जा सकती हैं (नीचे अशुद्धियों के जो उदाहरण हैं, पिछले एक-दो सप्ताह में प्रकाशित चिट्ठों से लिए गए हैं, और टेढ़े अक्षरों मे लिखे हैं। सही वर्तनी कोष्ठक में दी गई है।)
1. अनुस्वार, चन्द्रबिन्दु, आदि का ग़लत प्रयोग या अप्रयोग
हालाकि (हालाँकि), होन्गे (होंगे), बहुसन्ख्यक (बहुसंख्यक), मानदन्ड (मानदंड), साथियों (साथियो), कंही (कहीं), टन्डन (टण्डन/टंडन), पहुन्च (पहुँच), वंस (वन्स as in “once more”)
2. नुक्ते का ग़लत प्रयोग
फ़िर (फिर), सफ़लता (सफलता), अग़र (अगर), ज़नाब (जनाब)
3. मात्राओं की ग़लतियाँ
पहेले (पहले), प्रणालि (प्रणाली), जेसे (जैसे), क्यु (क्यों), इमेल (ईमेल), यदी (यदि), आदी (आदि), जाईयेगा (जाइयेगा), क्योंकी (क्योंकि), उसकि (उसकी)
“कि” और “की” का अन्तर न समझने वाले बहुत हैं। कुछ लोग “में” और “मैं” की भी परवा नहीं करते।
4. ट्रान्सलिट्रेशन या टाइपराइटर की कमी के कारण पैदा हुई ग़लतियाँ
उल्लस (उल्लास), ड़ की नीचे वाली बिन्दी न मिलने पर ङ से काम चला लेना, टेढ़ी मात्राओं का प्रयोग (से के स्थान पर सॆ, सो के स्थान पर सॊ) आदि।
5. व्याकरण और पंक्चुएशन की त्रुटियाँ, html की त्रुटियाँ
पूर्ण-विराम, अल्प विराम, आदि के आस पास खाली स्थान का ग़लत प्रयोग, कड़ी के अन्त में या पहले खाली स्थान छोड़ना, या दो शब्दों के बीच खाली स्थान नहीं छोड़ना।
6. अन्य त्रुटियाँ – क्षेत्रीय या त्रुटिपूर्ण उच्चारण के कारण
प्रास्त (परास्त), आन्नद (आनन्द), आदि।
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तो इस श्रेणी के पहले लेख में अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु के सही प्रयोग की बात की जाए। इन के लिए पहले तत्सम और अन्य शब्दों का अन्तर समझना पड़ेगा।
तत्सम शब्द – अनुस्वार का प्रयोग
तत्सम शब्द वे होते हैं जो संस्कृत से ज्यों के त्यों हिन्दी में लिए गए हैं, जैसे माता, पिता, बालक, अस्थि, आदि।
1. पहली बात — तत्सम शब्दों में चन्द्रबिन्दु (पँकज) का प्रयोग न करें, या तो अनुस्वार (पंकज) का प्रयोग करें, या वर्ग के अन्तिम अक्षर का आधा (पङ्कज)। वर्ग के अन्तिम अक्षर का आधा — इस का सही और नियमित प्रयोग आलोक के चिट्ठे पर देखा जा सकता है।
2. देवनागरी वर्णमाला को ध्यान से देखें। हर वर्ग के अन्त में नासिक ध्वनि के लिए क्या प्रयोग करना है, वह दिया हुआ है। जैसे,
[क ख ग घ ङ] अङ्गद, पङ्कज, शङ्कर या अंगद, पंकज, शंकर
[च छ ज झ ञ] अञ्चल, सञ्जय, सञ्चय या अंचल, संजय, संचय
[ट ठ ड ढ ण] कण्टक, दण्ड, कण्ठ या कंटक, दंड, कंठ
[त थ द ध न] अन्त, मन्थन, चन्दन या अंत, मंथन, चंदन
[प फ ब भ म] कम्पन, सम्भव, चम्बल या कंपन, संभव, चंबल
जैसे आप देख रहे हैं, जहाँ पर वर्ग के चार अक्षरों के पहले अन्तिम अक्षर का आधा हो, वहाँ उस के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग हो सकता है, पर चन्द्रबिन्दु का नहीं। यानी सँजय, चँदन, आदि ग़लत हैं। तत्सम शब्दों में य र ल व श ष स ह के साथ भी अनुस्वार का ही प्रयोग होगा, जैसे संयम, अंश, संलग्न, संरक्षण, आदि। चन्द्रबिन्दु का नहीं।
3. हाँ, कई शब्दों में वर्ग के अन्तिम अक्षर के साथ स्वयं वही अक्षर, या अन्य वर्ग का अन्तिम अक्षर होता है। ऐसे शब्दों में उसे हटा कर अनुस्वार नहीं लगाया जा सकता। जैसे जन्म, अक्षुण्ण, अन्न, आदि के स्थान पर जंम, अक्षुंण, अंन, आदि नहीं लिखा जा सकता।
4. इसी प्रकार त-थ-द-ध के इलावा अन्य वर्गों के अक्षरों के साथ न् लगाना ग़लत है, जैसे अन्क, अन्डा, कान्टा, सन्जय, आदि।
तद्भव/देशज/विदेशी शब्द – चन्द्रबिन्दु का प्रयोग
1. इन शब्दों में जहाँ ऊपर बताए शब्दों वाली ही ध्वनि हो, वहाँ पर वही नियम प्रयोग करें। जैसे बन्दर/बंदर, खञ्जर/खंजर, पिञ्जरा/पिंजरा, आदि।
2. जहाँ पर ध्वनि शुद्ध नासिक हो, वहाँ पर चन्द्रबिन्दु का प्रयोग करें, जैसे वहाँ, जहाँ, हाँ, काइयाँ, इन्साँ, साँप, आदि। पर जहाँ पर ऊपर की ओर आने वाली मात्राएँ (ि ी े ै ो ौ) आएँ, वहाँ पर चन्द्रबिन्दु के स्थान पर अनुस्वार का ही प्रयोग करें। जैसे भाइयों, कहीं, मैं, में, नहीं, भौं-भौं, आदि। यह नियम शायद छपाई की सुविधा के लिए बनाया गया है। इस नियम के अनुसार कहीँ, केँचुआ, सैँकड़ा, आदि शब्द ग़लत हैं।
3. कई जगह पर, विशेषकर विदेशी मूल के शब्दों में अक्षरों का ऐसा मेल होता है, जो हिन्दी में प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जाता। जैसे इन्सान, वन्स (once), तन्ज़, आदि। इन शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग न करें। इंसान, वंस, तंज़ सही नहीं हैं।
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जिन लेखकों के उदाहरण मैं ने प्रयोग किए हैं, वे नाराज़ न हों। शायद इतिहास में लेखकों ने कभी वर्तनी की चिन्ता न की हो
, पर पहले छापेखाने और प्रूफ रीडर हुआ करते थे जिन का काम ही वर्तनी सुधारना था। अब हम ही लेखक हैं, हम ही छापे वाले हैं और हम ही प्रूफ रीडर हैं, इस कारण अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यह भी ध्यान रहे कि कई लोग चिट्ठों से ही हिन्दी सीखेंगे।
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मेरा अगला लेख नुक्ते के सही प्रयोग पर होगा। तब तक मेरा यह नियम प्रयोग करें — जहाँ पर नुक्ते के प्रयोग के विषय में शंका हो, वहाँ नुक्ते का प्रयोग न करें। ज़रूरत के स्थान पर जरूरत चल जाएगा, पर मजबूरी के स्थान पर मज़बूरी नहीं। कोई शक?
इस बीच आप की टिप्पणियों का स्वागत है। इन नियमों में कुछ ग़लत हो, कुछ और जोड़ने की आवश्यकता हो, मेरे लिखने में त्रुटियाँ हों, बताएँ।
अत्यंत सही विषय है.
वर्तनी तो भले ही मेरी ठीक ठाक रहती हो, परंतु विचारों का प्रवाह और टाइपिंग में सामंजस्य न बैठ पाने के कारण मेरे लिखे में अकसर व्याकरण की गंभीर अशुद्धियाँ रह जाती हैं.
अब ध्यान रखने की कोशिश करूंगा.
रमण भाई,
ये लेख मेरे लिये काफी लाभदायक होगा।
मै अक्सर इ और ई, उ और ऊ के बिच मे परेशान रहता हूं ।
वाह रमण भाई,
मजा आ गया, आपने तो पूरी पूरी क्लास ले ली।
मै अपनी बात बताता हूँ, सबसे ज्यादा गलतियाँ मेरे से होती है।(अब इस टिप्पणी मे भी हुई ही होंगी।)
आपके इस लेख से हमे काफी मार्गदर्शन मिलेगा।बहुत बहुत धन्यवाद।
अब आप अपने नये गृह मे प्रवेश कर चुके होंगे तो अब आप सर्वज्ञ की जिम्मेदारी सम्भालिए। परिचर्चा मे भी आपका इन्तज़ार हो रहा है, गज़ल और उर्दू की बारीकिया सिखानी है आपने। कब आ रहे है?
लेख के लिए साधुवाद.
आपके अगले लेख की प्रतिक्षा रहेगी.
कई बार न चाहते हुए भी वर्तनि सम्बन्धी भुले रह जाती हैं. इसका खेद भी होता हैं, इधर पूर्ण वर्तनि-जांचक भी उपलब्ध नहीं हैं. आपकी लेख-माला सभी हिन्दी प्रेमियों तथा हिन्दी लिखने वालो के लिए उपयोगी रहेगी. कि तथा की का भेद भी यथा- सम्भव जल्दी बताएं.
मेरे विचार में इस प्रकार कि पुरी लेखमाला अंत में ई-बुक के रूप में नारद पर उपलब्ध करवानी चाहिए.
ग़लती-
विचारों का प्रवाह नहीं विचारों के प्रवाह !
मुझे तो कोई भी नियम याद नहीं रहते केवल उच्चारण से लिखता हूं पर यह सब बताने के लिये धन्यवाद|
मै यह तो समझता था कि अनुस्वार की हर जगह पर चन्द्रबिन्दु, नहीं प्रयोग की जा सकती है जैसा कि आप की पोस्ट से पता चलता है मैं ऐसा सोचता हूं कि चन्द्रबिन्दु की जगह अनुस्वार हमेशा प्रयोग किया जा सकता है यानि कि चन्द्रबिन्दु को छोड़ा जा सकता है| क्या यह सही है?
अगर हिन्दी चिट्ठा संसार में सबसे ज़्यादा किसी पोस्ट की ज़रूरत थी तो इसकी
। शुक्रिया और साधुवाद। इस लेख के बारे में मैं एक और टिप्पणी में लिखूँगा। अभी बस यह -
जो लोग वाक़ई अपनी अशुद्धियाँ ठीक करने को उत्सुक हैं, उनके लिए मेरे कुछ सुझाव ये हैं :
* पढ़ें। अच्छे लेखकों को पढ़ें। शब्द आँखों में उतर जाते हैं – यह कविता नहीं, सच है।
* सुनें। हिन्दी ध्वन्यात्मक भाषा है, इसका फ़ायदा उठाएँ। और कुछ नहीं तो फ़िल्में देखते समय अच्छे उच्चारण वाले अभिनेताओं को सुनें।
* रमण जी जैसे ब्लॉगर जो शुद्ध लिखने का प्रयास करते हैं, उनके चिट्ठे पढ़ें।
* पूछें। अक्सर ऐसा होता है कि वर्तनी या व्याकरण की ग़लतियाँ बताने पर लोग नाराज़-से हो जाते हैं। बेहतर है कि आप ख़ुद अनुरोध करें कि कोई आपको ग़लतियाँ बताए। आप हर पोस्ट में ऐसा कर सकते हैं। परिचर्चा समूह को विशेषतः इसके लिए काम में लिया जा सकता है।
* जानें। एक अच्छा शब्दकोश ख़रीद कर अपने घर पर रखें और उसे संदर्भित करते रहें। सीखने की इच्छा अधिकतर कठिनाइयों को दूर कर देगी।
हमेशा ध्यान रखें कि नेट जैसे माध्यम पर आप जो और जैसे लिखते हैं वही आपका व्यक्तित्व है। अगर आप चाहते हैं कि लोग आपके लिखे को गंभीरता से लें तो पहले ज़रूरी है कि आप अपने लिखे को गंभीरता से लें।
विनय जी
क्या अंग्रेजी से हिन्दी का और हिन्दी का अच्छा शब्दकोश बतायेंगे|
कुछ लोकप्रिय व प्रामाणिक शब्दकोषों की सूची दे रहा हूँ. सब मैंने नहीं देखें हैं, इसलिए अपनी ओर से जाँच-पड़ताल भी कर लें.
अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोषों में:
* हरदेव बाहरी संपादित
* बद्रीनाथ कपूर संपादित
* ऑक्सफ़ोर्ड प्रकाशित
* भार्गव प्रकाशित
हिंदी-अंग्रेज़ी:
* रामचन्द्र वर्मा संपादित
* हरदेव बाहरी संपादित
* आर एस मॅकग्रेगॉर संपादित (ऑक्सफ़ोर्ड प्रकाशित)
ऑनलाइन श्रोतों में सबसे बेहतर प्लैट्स का कोष है – http://dsal.uchicago.edu/dictionaries/platts/. यह पुराना है, पर प्रामाणिक है. हाँ, खोज सुविधा और अन्तरपटल इतने अच्छे नहीं हैं. shabdakosh.com (shabdkosh.com – ed.)उपयोगी है पर इसके प्रामाणिक होने में मुझे संदेह है. क्योंकि यह प्रयोक्ताओं द्वारा निर्मित है, न कि किसी शोध के आधार पर. तुरत परिभाषा के लिए चल सकता है, पर अंतिम संदर्भ नहीं माना जा सकता.
हिंदी-हिंदी:
* ११ खण्डों का शब्दसागर
* अरविंद कुमार का समांतर कोष (पर्यायवाची शब्दों का कोष है)
आशा है इनसे खोज की शुरूआत तो हो पाएगी.
क्षमा करें , मानक भाषा के अनुसार हिंदी लिखना चाहिए ना कि हिन्दी।
सभी की टिप्पणियों के लिए धन्यवाद।
उन्मुक्त जी, शायद आप सही कह रहे हैं। अनुस्वार की हर जगह पर चन्द्रबिन्दु, नहीं प्रयोग की जा सकती है पर चन्द्रबिन्दु की जगह अनुस्वार हमेशा प्रयोग किया जा सकता है। पर यदि शब्द तत्सम नहीं है, और ऊपर की मात्रा नहीं है तो मैं चन्द्रबिन्दु ही प्रयोग करता हूँ। मेरे विचार में आप के नाम में अनुस्वार का प्रयोग सही नहीं है — “उन्मुक्त” लिखें (ऊपर तत्सम शब्दों का नियम 3 देखें)।
प्रेमलता जी, मुझे इस मानक का ज्ञान नहीं है। कृपया मानक का सन्दर्भ दें। और कोई त्रुटि यहाँ या मेरे लेखन में मिले तो अवश्य बताएँ। सीखने का इस से बेहतर क्या तरीका हो सकता है?
चन्द्रबिन्दु और अनुस्वार के प्रयोग पर एक गाँठ की बात (या रूल ऑफ़ थम्ब):
चन्द्रबिन्दु या अनुनासिक का उच्चारण स्वरों के साथ होता है. जैसे अँधेरा, कहाँ, उँगली, जाऊँ. पर जिन स्वरों की मात्राएँ शिरोरेखा के ऊपर जाती हैं, वहाँ इसकी जगह अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है, जैसे – नहीं, कहें, हैं, हों, औंधा. अगर आप सीख रहे हैं और आपको समझने में आसानी रहती है तो आप बेशक ऐसे स्वरों पर भी चन्द्रबिन्दु का ही प्रयोग करें, जैसे – नहीँ, कहेँ, हैँ, होँ, औँधा. यह तकनीकी रूप से ग़लत नहीं है. धीरे-धीरे प्रवीण होने पर आप वापस ऐसी मात्राओं में अनुस्वार के प्रयोग पर लौट सकते हैं (क्योंकि यह देखने में सुन्दर और बेहतर लगता है और प्रचलित है).
बिंदु या अनुस्वार का उच्चारण स्वरों के बाद होता है. इसे आप चाहें तो बस पंचमाक्षरों के लघु-चिह्न के रूप में भी याद रख सकते हैं. जैसे रंग, पंचम, डंडा, मंदिर, अंबर. इन शब्दों को क्रमशः रङ्ग, पञ्चम, डण्डा, मन्दिर, अम्बर भी लिखा जा सकता है (हालाँकि राजभाषा समिति के लिपि मानकीकरण अनुमोदनों में अनुस्वार रूप प्रयोग करने की अनुशंसा है).
इसके बारे में अतिरिक्त चर्चा देखें.
धन्यवाद विनय, आप के द्वारा दी गई कड़ियाँ बहुत उपयोगी है।
धन्यवाद प्रेमलता जी, विनय द्वारा दी गई राजभाषा समिति वाली कड़ी से आप की बात का समर्थन होता है।
जैसा मैं ने बताया दोनों ही वर्तनियाँ (हिन्दी – हिंदी) सही हैं, पर कंप्यूटर के चलते मानकीकरण की आवश्कता अब पहले से कहीं अधिक है। हम सब को अब मानक वर्तनी को ही अपनाना चाहिए।
धन्यवाद, मैने पहले अपने चिठ्ठे का नाम Unmukt रखा था फिर नारद जी के कहने पर उंमुक्त कर दिया| जैसा कि मैने बताया मै व्याकरण नहीं जानता हूं केवल उच्चारण से लिखता हूं तब उस समय उंमुक्त गलत नहीं लगा इसलिये लिख दिया था अब ठीक कर दिया|
गीतायन जाने पर नियम १४ देखने मे half open औ के बारे मे पता चला मैने पहले कभी ॅ का प्रयोग होते नहीं देखा था मै हमेशा औ ही प्रयोग करता था
मै आम व्यक्ति हूं इसलिये उन्ही की तरह सोचता हूं इतना सब पढ़ने के बाद यह सारे नियम मुश्किल लगे| इन्हे कम देना चाहिये| शायद यह हिन्दी के लिये ठीक नहीं| पर यह केवल मत है|
रमन जी आपकी टैग-लाईन पर ‘रोड़ा ‘ लिखा है क्या ठीक है क्या रोड़ा नहीं होना चाहिये|
रवी जी
‘विचारों का प्रवाह नहीं विचारों के प्रवाह’ तो ठीक है पर सुनने मे ‘विचारों का बेलगाम प्रवाह… ‘ भी सही लगता है| मालुम नहीं क्या ठीक है
आपने फिर एक सार्थक और महत्वपूर्ण विषय हाथ मे लिया है | साधुवाद | इस पर बहस भी बहुत सार्थक चल रही है |
मेरे सामने एक अन्य प्रकार की वर्तनी की समस्या कभी-कभी आती रहती है, ‘व’ तथा ‘ब’ में कौन ? शादय यह वर्तनी की क्षेत्रीय समस्या है |
दूसरा ये कि मैं जानबूझकर अल्पविराम और पूर्णविराम के पूर्व तथा पश्चात स्थान छोडता हूँ | मेरी कुछ ऐसी सोच है कि इससे लिखावट अधिक स्पष्ट (सुपाठ्य) हो जाती है | क्या इसके विषय में भी कुछ मानक बनाये गये हैं कि स्थान नहीं छोडना चाहिये ?
अनुनाद जी, आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद। अल्पविराम, पूर्णविराम, प्रश्नचिह्ल के बाद स्थान छोडना चाहिये, पहले नहीं। यह गत वाक्य का भाग होता है।
आप पूर्णविराम के लिए जो चिह्न प्रयोग करते हैं, वह सही नहीं है। सही पूर्णविराम थोड़ा छोटा होता है।
रमण जी,
मैं हिन्दी लिखने के लिये हिन्दिनी (HUG) के प्रयोग का अभ्यस्त हूँ और उसमें पूर्ण विराम (खडी पाई) के लिये शायद कुछ नहीं है| अत: पूर्ण विराम के लिये मैं पाइप चिन्ह का प्रयोग करता हूँ | पूर्ण विराम के पहले स्थान न छोडने के बारे में मेरा एक और भय है | (उदाहरणार्थ) मुझे डर लगता है कि तुरन्त पूर्ण विराम लगाने से कहीं “है”, “हौ” न बन जाय (या, पढा जाय) |
ड के नीचे बिन्दु लगाने के लिये भी शायद कुछ नही है| लगता है अपना सम्पादित्र बदलने के लिये पर्याप्त कारण विद्यमान हैं|
अनुनाद जी, पूर्ण विराम से पहले स्थान छोड़ने या न छोड़ने के लिए प्रतिष्ठित, प्रकाशित पुस्तकों को देखें। अंग्रेजी में क्या प्रथा है, यह भी देखें। आप इसी संदेश में देख सकते हैं कि पिछले वाक्य का अन्तिम शब्द “देखों” नहीं लग रहा। यह भी देखें कि आप की टिप्पणी में जहाँ वाक्य का अन्तिम शब्द पंक्ति के अन्त में आता है, वहाँ पूर्ण विराम अगली पंक्ति में चला जाता है, जो वांछनीय नहीं है।
अनुनाद जी
मेरे विचार से रमण जी ठीक कहते हैं, अल्पविराम, पूर्णविराम, प्रश्नचिह्ल के बाद स्थान छोडना चाहिये, पहले नहीं| मेरे विचार से अंग्रेजी में भी यही प्रथा है|
मै लिनेक्स पर काम करता हूं| इसमे भी मुझे पूर्ण विराम (खडी पाई) के लिये कुछ नहीं मिला| मै भी पाइप चिन्ह का प्रयोग करता हूँ, पर है हौ नहीं लगता| देखिये ‘है|’
लिनेक्स मे हिन्दी मे ड़ भी है और अलग से नीचे का बिन्दु ़ भी है जिसे आप जहां चाहे लगा सकते हैं फेदोरा मे SCIM के अन्दर आप हिन्दी मे टाईप कर सकते हैं
विनय जी
मै कल बजार गया और वहां शब्द कोश को देखा| मुझे The Modern English-Hindi Dictionary by I.N. Anand सबसे अचछी लगी|
मैं फईनमेन के ऊपर एक लिख रहा था उस समय comedian कि हिन्दी नहीं मिली थी फिर राजीव जी ने बतायी| बज़ार मे सारे शब्द कोशों मे केवल इसी मे इसकी ठीक हिन्दी ‘विदूषक’ मिली|
आधुनिकतम कम्प्यूटर विज्ञान में unique spelling के अनुरूप “झंझट” गलत है और “झञ्झट” ही एकमात्र शुद्ध रूप है। भले ही भारत सरकार की मानक वर्तनी के अनुसार ‘झंझट’ लिखना सही है। मानक वर्तनी लगभग 1965 में निर्धारित हुई थी, इसके बाद से इसका संशोधन नहीं हुआ है। इसका संशोधन नितान्त आवश्यक है। 1950-60 के दौरान जब हिन्दी टाइपराइटर का (अंग्रेजी टाइपराइटर
की 48 कुंजियों पर येन-केन प्रकारेण हिन्दी के अक्षरों को पैबन्द की तरह चिपका कर) आविष्कार करना पड़ा तो हिन्दी के कुछ अक्षरों (जैसे ञ) को हटाना पड़ा, कइयों को टुकड़े टुकड़े करके एडजस्ट करना पड़ा। तब मैनुअल हिन्दी टाइपराइटर पर टाइपिंग की सरलता के लिए 5 वर्गों के 5वें व्यंजन (ङ, ञ, ण, न, म) के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग करके काम चलाना पड़ा था। भाषा-विज्ञान तथा ध्वनि-विज्ञान की दृष्टि से यह पूर्णतया गलत है।
देवनागरी लिपि के क्रम-विकास का अध्ययन बताता है कि अनुस्वार की व्युत्पत्ति ‘ङ’ से हुई है। लिखने की सुविधा हेतु ‘ङ’ की संक्षिप्ति करते हुए सिर्फ इसकी बिन्दी रखी गई। ‘अङ्क’ (मूल रूप में ङ के नीचे क लिखा हुआ संयुक्त व्यंजन रूप) को ‘अंक’ लिखना भाषा-विज्ञान की दृष्टि से सही है।
अनुस्वार का प्रयोग निम्न स्थानों पर सही है।
अंक (क के पूर्व)
शंख(ख के पूर्व)
गंगा(ग के पूर्व)
संघ (घ के पूर्व)
इसी प्रकार वर्गेतर व्यंजनों के साथ(पूर्व) सही है।
संयम(य के पूर्व),
संरचना (र के पूर्व),
संलयन(ल के पूर्व),
संवृत्त (व के पूर्व),
संशय(श के पूर्व),
(ष के पूर्व कोई उदाहरण उपलब्ध नहीं है)
संसद (स के पूर्व),
संहार (ह के पूर्व)
किन्तु निम्न स्थानों पर गलत है
चंचल गलत(शुद्ध ‘चञ्चल’ है)
पंछी गलत (शुद्ध ‘पञ्छी’ है)
पंजा गलत (शुद्ध ‘पञ्जा’ है)
झंझट गलत (शुद्ध ‘झञ्झट’ है)
अंटी गलत (शुद्ध ‘अण्टी’ है)
कंठ गलत (शुद्ध ‘कण्ठ’ है)
डंडा गलत (शुद्ध ‘डण्डा’ है)
ढूंढ गलत (शुद्ध ‘ढूण्ढ’ है)
अंत गलत (शुद्ध ‘अन्त’ है)
मंथन गलत (शुद्ध ‘मन्थन’ है)
मंद गलत (शुद्ध ‘मन्द’ है)
अंधा गलत (शुद्ध ‘अन्धा’ है)
चंपा गलत (शुद्ध ‘चम्पा’ है)
गुंफ गलत (शुद्ध ‘गुम्फ’ है)
खंबा गलत (शुद्ध ‘खम्बा’ है)
स्तंभ गलत (शुद्ध ‘स्तम्भ’ है)
हालांकि 1991 में ISCII कूटों के परिशोधित मानकों में भी पाँचों वर्गों के पंचम व्यंजन के स्थान पर अनुस्वार के प्रयोग के स्वीकार किया गया है, किन्तु इससे अनेक जटिल समस्याएँ उपजी है। उदाहरण के लिए उपर्युक्त जैसे अनुस्वारयुक्त शब्दों को शब्दकोश में दो दो बार (दो स्थानों पर देना पड़ा है) उदाहरण के लिए एक स्थान पर (झ के आरम्भ में) ‘झंझट’, तो फिर दूसरे स्थान पर (झझरी के बाद)
‘झण्झट’ रूप में। कितनी विडम्बना की बात है यह।
और फिर पंचमाक्षरों के बदले अनुस्वार का प्रयोग करने पर पंचमाक्षर को वर्णमाला से पूर्णतया तो हटाया जा ही नहीं सका। उनका स्वतन्त्र अस्तित्व बरकरार रखना ही पड़ा। जैसे -
‘वाङ्मय’ के स्थान पर कोई ‘वांमय’ लिखे तो अनर्थ होगा।
‘साम्य’ के स्थान पर कोई ‘सांय’ लिखे को अनर्थ होगा।
‘घञ’ के स्थान पर कोई ‘घं’ लिखे तो अनर्थ होगा।
‘षण्मुख’ के स्थान पर कोई ‘षंमुख’ लिखे तो अनर्थ होगा।
‘सम्मान’ के स्थान पर कोई ‘संमान’ लिखे तो अनर्थ होगा।
महेश्वर शिवसूत्राणि के वर्णनानुसार भगवान शिव के डमरू की ध्वनि से उत्पन्न ये वर्ण सम्पूर्णतः ध्वनि-विज्ञान की कसौटी पर कसे हुए हैं। देवनागरी का हर अक्षर किसी न किसी देवी-देवता का बीजमन्त्र है। मन्त्रों के गलत उच्चारण से तो भयंकर विपदा आ सकती है।
लेकिन आज यूनीकोड व ओपेन टाइप फोंट्स में सम्पूर्ण विस्तृत देवनागरी लिपि समस्त अक्षरों व संयुक्ताक्षरों के साथ उपलब्ध है। अतः आज भी पिछले विकासशील दशकों के ढर्रे के गलत प्रयोग करने पर शब्दकोश विज्ञान के नियमों के तहत डैटाबेस प्रोसेसिंग, सॉर्टिंग, इण्डेक्सिंग और प्राकृतिक भाषा संसाधन (NLP), बोली से लिपि, और लिपि से बोली जैसे उन्नत विशेष प्रयोगों में अनेक अनन्त व लाइलाज समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।
हरिराम पंसारी
रमण जी और दूसरे सभी साथियों का बहुत बहुत शुक्रिया। मेरी बहुत अच्छी कलास चल रही है और उम्मीद है बहुत जल्द इसी विष पर आपका अगला लेख पढने को मिलेगा। बहुत बहुत धन्यवाद ^
इस पोस्ट की कड़ी को बचा कर रखूँगा. आगे संदर्भ के लिए काम आएगा. धन्यवाद इतनी विद्वत बहस के लिए.
रमण जी
शायद इन सारी टिप्पणियों को समन्वित करते हुये पुन: एक लेख लिखना अच्छा होगा
http://cmwiki.sarai.net/index.php/SpellCheck
पर एक मुक्त स्रोत हिन्दी वर्तनी शोधक सॉफ्टवेयर के विकास हेतु प्रयास चल रहा है। यहाँ अपने सुझाव दें।
मैंने कुछ सुझाव
http://cmwiki.sarai.net/index.php/AspellPansari
पर दिए हैं। कृपया पढ़ें और अपने विचार व्यक्त करें।
EXCELLENT
सभी साथियों का बहुत बहुत शुक्रिया।
महोदय,
सामग्री बहुत ही ज्ञानवर्धक व सार्थक रही है। मेहनत के लिए बहुत बहुत साधुवाद। पृष्ठ की ई-मेल करने के लिए कोई लिंक नहीं मिला, होता तो लिंक भेजने में सुविधा रहती।
धन्यवाद
mujhe tatsam ka arth bataye!
i want examples of these two words
you should write the examples and should define them you should not write
the history
माननीय श्री ,
सविनय निवेदन है कि
मैने कहीं हिन्दी व्याकरण में पढ़ा है कि अँगरेज़ी से जो अनुनासिक ध्वनियाँ हिन्दी में आई हैं,उन सभी के लिए हिन्दी के त वर्ग का “न” वर्ण प्रयुक्त किया जाना चाहिए/जैसे कि-पेंट ,केंट आदि के स्थान पर पेन्ट,केन्ट आदि /इसलिए मेरे हिसाब से “न” का प्रयोग उपयुक्त रहेगा/ उदाहरण के तौर पर फेंटा के स्थान पर फेन्टा ,टंडन के स्थान पर टन्डन//
शुक्रिया,
“जयेश”/
जयेश जी, क्या आप इस व्याकरण की पुस्तक के विषय में और अधिक बता सकते हैं? यह जानकारी पाठकों के लिए रुचिकर होगी। मैं ऐसे स्थानों पर अनुस्वार का ही प्रयोग करता हूँ।