गूगल का चैक-आउट

गूगल वाले, लगता है कुछ भी किए बिना नहीं छोड़ेंगे। अब पेपाल की छुट्टी करने पर तुले हुए हैं। गूगल का नया शोशा है गूगल चैक-आउट। पहली नज़र में देखने पर पता चलता है कि इंटरफेस आसान होने के कारण इसे लाखों सदस्य बनाने में देर नहीं लगेगी। खरीदारों को बस अपना जीमेल पता प्रयोग करना है, यदि आप अपना सिटी-कार्ड इस में रजिस्टर कराते हैं तो सीधे पाँच डॉलर का इनाम। विक्रेता माल बेचने के लिए ऍडवर्ड्स खाते का प्रयोग कर सकेंगे। कुछ तो दूसरों के लिए छोड़ो, यार।

मिथक – अमरीकी और भारतीय

अनूप कुमार शुक्ला फुरसतिया जी की अमरीकी और उनके मिथक बहुत रुचि के साथ पढ़ी। उन्होंने अमरीका में रह रहे भारतीय चिट्ठाकारों को इतना उकसाया कि सोचा कुछ लिखा जाए। मुझे जो कुछ कहना था, उस में से बहुत कुछ, और बहुत कुछ और,  ईस्वामी ने कह दिया। तो मैं यह प्रविष्टि दो कारणों से लिख रहा हूँ — एक, इस आरोप का उत्तर देने के लिए कि हम लोग यहाँ के बारे में बेबाकी से नहीं लिखते; दो,  रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वेक्षण ने मुंबई की शिष्टता के विषय में जो निष्कर्ष निकाला, वह क्यों निकाला।

पहले रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वेक्षण की बात की जाए। बीबीसी या रेडिफ की हेडलाइन्ज़ से निष्कर्ष निकालने की बजाय रीडर्स डाइजेस्ट के मूल लेख को पढ़ा जाए। यह तय है कि यह लेख मुम्बईवासियों के लिए नहीं लिखा गया, न ही उन को चिढ़ाने के लिए  — पूरे लेख में चर्चा न्यूयॉर्क की है, और इस बात की कि वे न्यूयॉर्क को जितना बदतमीज़ समझते थे उतना नहीं निकला। इंटरनेट में हुई चर्चाओं में कुछ लोगों ने कहा है कि दिल्ली वाले ज़्यादा अशिष्ट हैं — उन से मेरा कहना है कि इस में अन्य भारतीय शहरों की बात नहीं की गई थी, इस कारण मुम्बई सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करती है। सर्वेक्षण केवल 35 ऐसे देशों के मुख्य शहरों में किया गया जहाँ रीडर्स डाइजेस्ट छपता है। इस में केवल तीन प्रश्नों के आधार पर अंक दिए गए – एक, क्या आप अपने पीछे आने वाले व्यक्ति के लिए दरवाज़ा खोल कर रखते हैं (डोर टेस्ट); दो, आप के पास चल रहे किसी आदमी के कागज़ बिखर जाएँ तो क्या आप उन्हें उठाने में मदद करेंगे (डॉक्यूमेंट टेस्ट); तीन, जब आप कोई चीज़ खरीदते हैं तो क्या दुकानदार, या सेल्ज़-क्लर्क आप को धन्यवाद देता है (सर्विस टेस्ट)?  इस सर्वेक्षण को उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना इस का स्कोप है। 

यह तीनों प्रश्न मेरे विचार से पश्चिमी वातावरण और पश्चिमी सभ्यता से जुड़े हैं, इस कारण पूर्वी देशों के नगरों को इस सर्वेक्षण में नीचे जगह मिली है। आप यह तीनों प्रश्न स्वयं से ही पूछ लीजिए, आप का क्या उत्तर होगा?  

यहाँ सभी इमारतें, दुकानें, दफ़्तर हीटेड होने के कारण सब जगह दरवाज़े हैं, जो या तो स्वतः खुलते-बन्द होते हैं, या खोले जाने पर स्वतः बन्द होते हैं। मज़दूरी महंगी होने के कारण दरवाज़े पर दरबान नहीं होते। आबादी कम होने के कारण लोगों की लंबी रेल एक साथ नहीं चल रही होती। आप दरवाज़े से निकल रहे हैं और आप से तीन चार कदम पीछे कोई और चल रहा है, यदि आप निकल कर दरवाज़ा एकदम छोड़ देते हैं तो या तो उस के मुंह पर लगेगा, या उसे दोबारा खोलना पड़ेगा। इस कारण शिष्टतावश आप दरवाज़े से निकलते हुए देखते हैं कि आप के पीछे कोई आ तो नहीं रहा, और यदि आ रहा हो तो आप उस के आने तक दरवाज़ा पकड़ कर रुक जाते हैं। वह आप से दरवाज़े का पल्ला लेकर आप को धन्यवाद देता है और आप “वेलकम” कह कर आगे बढ़ जाते हैं। अब इसी सिचुएशन को आप मुम्बई में ऍप्लाइ कर के देखिए। भीड़ भड़क्के वाली जगह होगी तो या तो दरवाज़ा नहीं होगा, या लोगों की रेल दरवाज़े को कभी बन्द नहीं होने देगी। हाइ-फंडा जगह होगी तो दरबान खड़ा होगा। मुंबई की भीड़ में आप जान बूझ कर अपने कागज़ बिखेरेंगे तो संभावना यही है कि वे कागज़ भी कुचले जाएँगे और उसे उठाने वाला भी। कोई चीज़ खरीदने पर क्या आप को सेल्ज़ क्लर्क धन्यवाद देता है? शायद देता हो, शायद नहीं। यहाँ आप स्टोर से खरीदारी करते हुए लाइन में लग कर भुगतान करते हैं, आप की बारी आती है तो आप से पूछा जाता है कि आप कैसे हैं, जब तक क्लर्क आप का सामान स्कैन करती है, तब तक औपचारिकतावश आप से छुटपुट बात करती है — मौसम के बारे में, आप के साथ बच्चा हो, तो उस के साथ (आइ लाइक यौर शर्ट, आइ लाइक यौर हेयर), और अन्त में थैंक्स, हैव ए नाइस डे, आदि। यह उस की नौकरी, उसके प्रशिक्षण का एक हिस्सा है। यदि यह सब भारत में हमारे वातावरण का भाग नहीं है, तो इस तरह के सर्वेक्षण का हमारे लिए कोई अर्थ नहीं है।

अब इस आरोप की बात की जाए कि हम लोग यहाँ के बारे में बेबाकी से क्यों नहीं लिखते। क्या इस का अर्थ यह हुआ कि हमारे ऊपर रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में ज़ुल्म होता है, और हम उस के बारे में कुछ नहीं लिखते, या हम यहाँ के समाज की बुराइयों से त्रस्त हैं और हम उफ़ तक नहीं करते? मुझे नहीं मालूम कि बेबाकी से क्या नहीं लिखा जा रहा। अतुल ने तो “लाइफ इन…” में हर पहलू को छुआ है।

मैं सोचता हूँ कि अक्सर भारतीय जो यहाँ आते हैं, यहाँ हमेशा बसने के इरादे से नहीं आते, पर होता यूँ है कि अधिकांश लोग बस ही जाते हैं — बावजूद इस के कि उन को वीज़ा, ग्रीन-कार्ड और नागरिकता के वर्षों लम्बे चक्रव्यूह से गुज़रना पड़ता है। पूरी ज़िन्दगी वे भारतीय बने रहते हैं, भारत में जितने भारतीय थे, उस से कहीं ज़्यादा। देश में छूटे भाई-बन्धुओँ को याद करते रहते हैं — वे उन्हें याद करें या नहीं। यहाँ ऐसे काम करते हैं, जो शायद भारत में कभी नहीं करते। पर फिर भी छोड़ कर लौटने का नाम नहीं लेते।  इस का कारण क्या है? पैसा तो नहीं — कई लोगों के पास भारत में यहाँ से ज़्यादा पैसा होता है, या कमाने की क्षमता होती है। यहाँ का सामाजिक खुलापन भी नहीं — भारतीयों का समाज जितना अमरीका में खुला है, उससे कहीं अधिक भारत में है। फिर क्या कारण है? शायद यह कि यहाँ की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का “टोटल पैकेज” वहाँ से ज़्यादा आसान है। जो यहाँ आकर, पढ़कर, या नौकरी कर, लौट गए, उन को मेरा नमन। पर आम आदमी नहीं लौटता। फिर ऐसा क्या है जो हम बेबाकी से नहीं लिखते? 

जहाँ तक शिष्टता की बात है, आप को एक सादी सी मिसाल देता हूँ। श्रीनगर में कॉलेज के दिनों में कभी पिक्चर देखने जाते थे, तो टिकट लेना हिमालय पर चढ़ने जैसा होता था। लाइन क्या होती है, यह किसी को पता नहीं था — लगते ही टूट जाती थी। ऍडवान्स बुकिंग? वह किस जानवर का नाम है? यदि फिल्म नई नई लगी हो तो, आप के पास केवल दो रास्ते होते थे — या तो अपने हाथ पैर तुड़वा कर, कपड़े फड़वा कर टिकट लो, या ब्लैक में लो — वैसे भी खिड़की से दस प्रतिशत से अधिक टिकट बिकते नहीं थे (यह अलग बात है कि आज वहाँ लगभग सभी सिनेमाघर तालिबानी हुकूमत के कारण बन्द हैं – और जो लोग टिकटें ब्लैक करते थे और अमिताभ बच्चन को अपना देवता समझते थे, आज उन्ही के हाथों में बन्दूकें हैं)। आप रीडर्स डाइजेस्ट को पृथ्वी के स्वर्ग में सर्वे करने भेजिए। ख़ैर, फिर दिल्ली आ कर देखा कि कहीं कहीं लाइन की भी गरिमा होती है, बेशक साथ में कालाबाज़ारी भी चल रही हो — सिनेमा में, रेल-आरक्षण में, आदि। फिर भी, इन मामलों में पश्चिम के साथ तुलना करेंगे तो वही होगा कि हम स्वयं को सूची में नीचे नीचे पाएँगे।

जैसा मैं ने अपनी टिप्पणी में बताया, दोनों समाजों की अपनी अपनी समस्याएँ हैं, अपनी अपनी खूबियाँ हैं। हाथी और सात अन्धों वाली कहानी की तरह हाथी को रस्सी या खम्भा समझ बैठते हैं। जैसा स्वामी जी ने बताया, कुछ देर रह कर ही पूरी बात पता चलती है।

यदि ऐसा सर्वे किया जाना हो ताकि अमरीका और पश्चिम के देश सूची में नीचे आएँ तो कुछ इस तरह के प्रश्न रखने होंगे — 1. क्या काम के सिलसिले में किसी घर या दफ्तर में जाने पर आप को चाय-पानी के लिए पूछा जाता है? 2. क्या आप पार्क में खेल रहे दूसरे के बच्चे को गोद में उठा कर पुचकारते हैं? 3. आप की कंपनी में कोई दूसरे देश का व्यक्ति आ रहा है, और उस की उडान रविवार को आ रही है, क्या आप उसे हवाई अड्डे लेने जाएँगे, या उसे टेक्सी या रेंटल कार लेने को कहेंगे?

रवि ने अपनी टिप्पणी में जिस किस्से का ज़िक्र किया, वह होना बहुत आसान है — हालाँकि लगता है कि समय के साथ उस में कुछ अतिशयोक्ति जुड़ गई है। मैं टोरोंटो में नया नया आया था तो बस में मेरे साथ वाली खाली सीट पर एक बच्चा बैठा था। मैं उस से प्यार से बात करने लगा — क्या नाम है, कहाँ जा रहे हो, किस क्लास में पढ़ते हो? इतने में पिछली सीट से उस की माँ की आवाज़ आई, “पीटर, मैं ने तुम्हें क्या कहा है अजनबियों से बात करने के बारे में?” मैं समझ सकता हूँ कि माता जी के साथ भी ऐसी ही गुज़री होगी, पर मसला सुलझने में भी ज़्यादा देर नहीं लगी होगी। पुलिस वालों को घूस भी नहीं देनी पड़ी होगी, और आशा है कि जेल वाली बात चलते-चलते जुड़ गई होगी। पर क्या करें, यह नए मिज़ाज का शहर है…

इसी तरह कई विरोधाभास अमरीका में हैं, और कई अपने भारत में हैं। कितनी कहानियाँ सुनी हैं, जहाँ इस तरह के केस में किसी औरत को बच्चा-चोर समझ कर पब्लिक ने ही काम तमाम कर दिया हो। यहाँ यह देख कर अजीब लगता है कि कुत्ते-बिल्लियों को घर में पालते हैं, उन पर हज़ारों खर्च करते हैं, पर बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं।

हिन्दी ब्लॉगर ने भी कुछ प्रश्न उठाए हैं

…अमरीका में स्ट्रीट क्राइम की स्थिति भारत से बुरी है कि नहीं? जघन्य अपराधों के मामले में अमरीका को भारत से ऊपर रखा जा सकता है या नहीं? वहाँ पारिवारिक समस्याएँ भारत से ज़्यादा हैं या नहीं? अमरीका में अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई भी भारत के मुक़ाबले बड़ी है कि नहीं? एक आम अमरीकी एक आम भारतीय के मुक़ाबले ज़्यादा स्वार्थी है कि नहीं? भारत में आमतौर पर विदेशियों को (ख़ास कर गोरों को) जिस तरह इज़्ज़त दी जाती है क्या अमरीका में विदेशियों को (ख़ास कर भूरों को) उस दृष्टि से देखा जाता है?

इन सब सवालों का मेरे हिसाब से यह जवाब है — “ज़रूरी नहीं”। अन्तिम प्रश्न का कुछ उत्तर प्रश्न में ही है — कोष्ठकों में। नस्लवाद बहुत बुरा है, पर मुझे लगता है कि हम भारतीय भी किसी से कम नस्लवादी नहीं हैं। प्रश्न यह है — क्या हम गोरों की जितनी इज़्ज़त करते हैं, उतनी ही कालों की करते हैं? हमारे घर किसी नाइजीरियन के आने से क्या हमारा सीना उतना ही चौड़ा होता है जितना किसी जर्मन के आने से? यहाँ अमरीका में भारतीय लोग अक्सर आर्थिक रूप से समृद्ध हैं और स्वयं चाहे जिस रंग के हों, कोशिश यही करते हैं कि ऐसे इलाके में रहें जहाँ कालों की अपेक्षा गोरों की आबादी अधिक हो, बच्चों को ऐसे स्कूल में भेजें जहाँ कालों की तादाद कम हो। अपने भारत में ही हम क्या कम नस्लवाद बरतते हैं — चाहे वह जातिवाद के रूप में हो, या क्षेत्रवाद के रूप में? एक भारतीय के लिए शिकागो में बसना, नौकरी करना, क्या उतना मुश्किल है, जितना एक अमरीकी के लिए पटना में? क्या सिक्किम या बिहार या उत्तर प्रदेश से आए व्यक्ति को मुम्बई में काम करने आने पर एक तरह के नस्लवाद का सामना नहीं करना पड़ता? अभी न्यूज़वीक में एक फिलिपीनी महिला के अनुभव के बारे में पढ़ा (लिंक नहीं मिल रहा), जिसे अपने देश में अपने रंग और नैन-नक्श को हीन भावना से देखना पड़ता था (गोरेपन की क्रीमें, नाक को खींच कर बड़ा करने की कोशिश), पर अमरीका में आने पर उसे पता चला कि काला भी खूबसूरत हो सकता है, और चीनी नैन-नक्श वाला भी।

खुली कामुकता शायद बुरी हो, पर क्या दबी कामुकता उतनी ही बुरी नहीं है? अभी शुएब ने बताया कि दुबई में चन्द लड़कियों को देख कर कैसे पूरा जुलूस “या शबाब” का नारा लगा रहा था। भारत के स्कूलों कॉलेजों में भी ऐसे नहीं तो इस से मिलते जुलते दृष्य की कल्पना की जा सकती है। क्या आप अपनी बेटी को ऐसे माहौल में स्कूल भेजना चाहेंगे, या ऐसे में जहाँ खुलापन हो पर केवल अनुमति के साथ — जहाँ हिजाब पहन कर भी लड़की स्कूल जा सके और मिनी स्कर्ट पहन कर भी? 

मिक्स्ड-डबल्ज़ और लास्ट-नेम

मिक्स्ड डबल्ज़ का तो मैं ने नाम भी नहीं सुना था, पर डीवीडी के आवरण पर कोंकणा सेनशर्मा का नाम देख कर उठा लाया। पेज थ्री और मिस्टर ऐण्ड मिसेज़ अइयर देखने के बाद कोंकणा की एक और फिल्म देखने को मिली। कोंकणा ने नाराज़ नहीं किया।

बॉलीवुड में आजकल अलग ढ़र्रे की कई फिल्में बन रही हैं, और मिक्स्ड डबल्ज़ उन में से एक है। इस फिल्म की थीम वयस्क है, इसलिए बच्चों के साथ न देखें — हालाँकि दृष्य सारे शाकाहारी हैं। होता यूँ है कि सुनील और मालती (कोंकणा) एक आम दंपत्ति की तरह हैं, शादी के 8-10 साल हो गए हैं, एक बच्चा है, दोनों कमाऊ हैं, सब कुछ सही चल रहा है, पर उन के यौन जीवन में कोई रस नहीं है। सुनील जी इतने बोर हो गए हैं कि उन की कामुकता को जंग लग गई है, और बेचारी मालती सखियों से नुस्खे पूछती रह जाती है। इतने में कहानी मोड़ लेती है जब सुनील का एक अमरीका रिटर्न्ड दोस्त कहता है कि दो दंपतियों में अदला-बदली (वाइफ-स्वैपिंग) से रिश्ते में नयापन आ जाता है। बस सुनील जी मचल उठते हैं और ज़िद पकड़ लेते हैं कि यही इलाज है उन की बोरियत का — एक तरफ ऐसे दंपत्ति की खोज शुरू हो जाती है, जिस के साथ अदला-बदली हो सके और दूसरी ओर मालती को मनाने का काम। उस से आगे क्या होता है, यह फिल्म में ही देखें।

कोंकणा की बात चल रही है तो मैं उन को आजकल के बेहतरीन कलाकारों में मानता हूँ। साधारण दिखने वाली इस अभिनेत्री ने बहुत कम समय में अपने लिए बॉलीवुड में एक खास जगह बना ली है। सुना है कि अपना काम बहुत व्यावसायिक ढंग से करती हैं; कल खबर पढ़ी कि शूटिंग पर समय पर पहुँचने के लिए लोकल ट्रेन से गईं। क्या यह पब्लिसिटी स्टंट था? 

बाइ दी वे, कोंकणा का नाम कोंकणा सेनशर्मा है, या कोंकणा सेन शर्मा? क्या सेनगुप्ता या दासगुप्ता की तरह सेनशर्मा भी एक लास्ट-नेम है? या यह “कौल बासु” की तरह “सेन शर्मा” डबल लास्ट-नेम है? कोंकणा सेन अपर्णा सेन की पुत्री हैं, इस कारण सेन हुईं, फिर शर्मा कैसे जुड़ा? लास्ट-नेम की हिन्दी क्या है? पारिवारिक नाम? अन्तिम नाम? गोत्र? जाति? यानी कास्ट? पंजाब से बाहर भी, कलकत्ता जैसे शहर में, यदि किसी से हिन्दी में लास्ट-नेम पूछना हो तो कैसे पूछें? आप की कास्ट क्या है, सर? क्या उस का मतलब यही हुआ कि आप उन की जाति जानना चाहते हैं ताकि यह पता चले कि आप उन्हें छू सकते हैं या नहीं? वरना आप किसी से लास्ट-नेम क्यों पूछने लगे? वैसे लास्ट-नेम की हिन्दी क्या है?

चन्द्रबिन्दु (ँ) और अनुस्वार (ं) के नियम

अभी हाल में प्रतीक का पोस्ट पढ़ा सही हिन्दी (broken link) लिखने पर। बहुत ही सटीक और सामयिक लेख था, और इस विषय पर मैं भी बहुत समय से लिखना चाहता था। अब प्रतीक की बात को ही आगे बढ़ाता हूँ। हालाँकि हम सभी चिट्ठाकार हिन्दी के दीवाने हैं, हम में से अधिकांश लोगों ने हिन्दी में कोई उच्चस्तरीय शिक्षा नहीं प्राप्त की है। लगभग सभी लोग तकनीकी क्षेत्रों में हैं, और बहुत कम लोगों ने हाइ-स्कूल से आगे हिन्दी पढ़ी होगी। इस कारण हम में से कई लोग ऐसे हैं जो मात्राओं आदि का हेर-फेर करते रहते हैं। इस के अतिरिक्त हिन्दी में किसी वर्तनी-जांचक-तन्त्र की कमी के कारण हम से कई त्रुटियाँ अनदेखी हो जाती हैं। पर फिर भी हम यदि अंग्रेज़ी लिखते हुए स्पेलिंग, ग्रामर, पंक्चुएशन जाँचने के बाद ही “पोस्ट” पर क्लिक करते हैं, तो हिन्दी लिखते समय भी थोड़ा ध्यान तो दे ही सकते हैं। अंग्रेज़ी में तो शब्दकोश का सहारा लेना पड़ता है, पर हिन्दी में बस सही उच्चारण मालूम हो, कुछेक नियमों का ज्ञान हो और सही लिखने की इच्छा हो, तो सब सही हो जाता है।

मेरे विचार में चिट्ठों पर वर्तनी की अशुद्धियाँ निम्न वर्गों में बांटी जा सकती हैं (नीचे अशुद्धियों के जो उदाहरण हैं, पिछले एक-दो सप्ताह में प्रकाशित चिट्ठों से लिए गए हैं, और टेढ़े अक्षरों मे लिखे हैं। सही वर्तनी कोष्ठक में दी गई है।)

1. अनुस्वार, चन्द्रबिन्दु, आदि का ग़लत प्रयोग या अप्रयोग

हालाकि (हालाँकि), होन्गे (होंगे), बहुसन्ख्यक (बहुसंख्यक), मानदन्ड (मानदंड), साथियों (साथियो), कंही (कहीं), टन्डन (टण्डन/टंडन), पहुन्च (पहुँच), वंस (वन्स as in “once more”)

2. नुक़्ते का ग़लत प्रयोग

फ़िर (फिर), सफ़लता (सफलता), अग़र (अगर), ज़नाब (जनाब)

3. मात्राओं की ग़लतियाँ

पहेले (पहले), प्रणालि (प्रणाली), जेसे (जैसे), क्यु (क्यों), इमेल (ईमेल), यदी (यदि), आदी (आदि), जाईयेगा (जाइयेगा), क्योंकी (क्योंकि), उसकि (उसकी)

“कि” और “की” का अन्तर न समझने वाले बहुत हैं। कुछ लोग “में” और “मैं” की भी परवा नहीं करते।

4. ट्रान्सलिट्रेशन या टाइपराइटर की कमी के कारण पैदा हुई ग़लतियाँ

उल्लस (उल्लास), ड़ की नीचे वाली बिन्दी न मिलने पर से काम चला लेना, टेढ़ी मात्राओं का प्रयोग (से के स्थान पर सॆ, सो के स्थान पर सॊ) आदि।

5. व्याकरण और पंक्चुएशन की त्रुटियाँ, html की त्रुटियाँ

पूर्ण-विराम, अल्प विराम, आदि के आस पास खाली स्थान का ग़लत प्रयोग, कड़ी के अन्त में या पहले खाली स्थान छोड़ना, या दो शब्दों के बीच खाली स्थान नहीं छोड़ना।

6. अन्य त्रुटियाँ – क्षेत्रीय या त्रुटिपूर्ण उच्चारण के कारण

प्रास्त (परास्त), आन्नद (आनन्द), आदि।

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तो इस श्रेणी के पहले लेख में अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु के सही प्रयोग की बात की जाए। इन के लिए पहले तत्सम और अन्य शब्दों का अन्तर समझना पड़ेगा।

तत्सम शब्द – अनुस्वार का प्रयोग

तत्सम शब्द वे होते हैं जो संस्कृत से ज्यों के त्यों हिन्दी में लिए गए हैं, जैसे माता, पिता, बालक, अस्थि, आदि।

1. पहली बात — तत्सम शब्दों में चन्द्रबिन्दु (पँकज) का प्रयोग न करें, या तो अनुस्वार (पंकज) का प्रयोग करें, या वर्ग के अन्तिम अक्षर का आधा (पङ्कज)। वर्ग के अन्तिम अक्षर का आधा — इस का सही और नियमित प्रयोग आलोक के चिट्ठे पर देखा जा सकता है।

2. देवनागरी वर्णमाला को ध्यान से देखें। हर वर्ग के अन्त में नासिक ध्वनि के लिए क्या प्रयोग करना है, वह दिया हुआ है। जैसे,

[क ख ग घ ] अङ्गद, पङ्कज, शङ्कर या अंगद, पंकज, शंकर
[च छ ज झ ] अञ्चल, सञ्जय, सञ्चय या अंचल, संजय, संचय
[ट ठ ड ढ ] कण्टक, दण्ड, कण्ठ या कंटक, दंड, कंठ
[त थ द ध ] अन्त, मन्थन, चन्दन या अंत, मंथन, चंदन
[प फ ब भ ] कम्पन, सम्भव, चम्बल या कंपन, संभव, चंबल

जैसे आप देख रहे हैं, जहाँ पर वर्ग के चार अक्षरों के पहले अन्तिम अक्षर का आधा हो, वहाँ उस के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग हो सकता है, पर चन्द्रबिन्दु का नहीं। यानी सँजय, चँदन, आदि ग़लत हैं। तत्सम शब्दों में य र ल व श ष स ह के साथ भी अनुस्वार का ही प्रयोग होगा, जैसे संयम, अंश, संलग्न, संरक्षण, आदि। चन्द्रबिन्दु का नहीं।

3. हाँ, कई शब्दों में वर्ग के अन्तिम अक्षर के साथ स्वयं वही अक्षर, या अन्य वर्ग का अन्तिम अक्षर होता है। ऐसे शब्दों में उसे हटा कर अनुस्वार नहीं लगाया जा सकता। जैसे जन्म, अक्षुण्ण, अन्न, आदि के स्थान पर जंम, अक्षुंण, अंन, आदि नहीं लिखा जा सकता।

4. इसी प्रकार त-थ-द-ध के इलावा अन्य वर्गों के अक्षरों के साथ न् लगाना ग़लत है, जैसे अन्क, अन्डा, कान्टा, सन्जय, आदि।

तद्भव/देशज/विदेशी शब्द – चन्द्रबिन्दु का प्रयोग

1. इन शब्दों में जहाँ ऊपर बताए शब्दों वाली ही ध्वनि हो, वहाँ पर वही नियम प्रयोग करें। जैसे बन्दर/बंदर, खञ्जर/खंजर, पिञ्जरा/पिंजरा, आदि।

2. जहाँ पर ध्वनि शुद्ध नासिक हो, वहाँ पर चन्द्रबिन्दु का प्रयोग करें, जैसे वहाँ, जहाँ, हाँ, काइयाँ, इन्साँ, साँप, आदि। पर जहाँ पर ऊपर की ओर आने वाली मात्राएँ (‌ि ी ‌े ‌ै ‌ो ‌ौ) आएँ, वहाँ पर चन्द्रबिन्दु के स्थान पर अनुस्वार का ही प्रयोग करें। जैसे भाइयों, कहीं, मैं, में, नहीं, भौं-भौं, आदि। यह नियम शायद छपाई की सुविधा के लिए बनाया गया है। इस नियम के अनुसार कहीँ, केँचुआ, सैँकड़ा, आदि शब्द ग़लत हैं।

3. कई जगह पर, विशेषकर विदेशी मूल के शब्दों में अक्षरों का ऐसा मेल होता है, जो हिन्दी में प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जाता। जैसे इन्सान, वन्स (once), तन्ज़, आदि। इन शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग न करें। इंसान, वंस, तंज़ सही नहीं हैं।

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जिन लेखकों के उदाहरण मैं ने प्रयोग किए हैं, वे नाराज़ न हों। शायद इतिहास में लेखकों ने कभी वर्तनी की चिन्ता न की हो :-), पर पहले छापेखाने और प्रूफ रीडर हुआ करते थे जिन का काम ही वर्तनी सुधारना था। अब हम ही लेखक हैं, हम ही छापे वाले हैं और हम ही प्रूफ रीडर हैं, इस कारण अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यह भी ध्यान रहे कि कई लोग चिट्ठों से ही हिन्दी सीखेंगे।

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मेरा अगला लेख नुक़्ते के सही प्रयोग पर होगा। तब तक मेरा यह नियम प्रयोग करें — जहाँ पर नुक़्ते के प्रयोग के विषय में शंका हो, वहाँ नुक़्ते का प्रयोग न करें। ज़रूरत के स्थान पर जरूरत चल जाएगा, पर मजबूरी के स्थान पर मज़बूरी नहीं। कोई शक़?

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इस बीच आप की टिप्पणियों का स्वागत है। इन नियमों में कुछ ग़लत हो, कुछ और जोड़ने की आवश्यकता हो, मेरे लिखने में त्रुटियाँ हों, बताएँ।

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बीबीसी ने खबर दी है कि ज़िम्बाब्वे में एक लाख डॉलर के नोट जारी होंगे। खबर में यह भी बताया गया है कि इस नोट की कीमत अमरीकी 30 सेंट के बराबर होगी, यानी 14 रुपए से कम। हाय महंगाई, महंगाई, महंगाई..