हम में से शायद सभी ने बचपन में सुदर्शन की कहानी हार की जीत पढ़ी होगी। यह कहानी उन चन्द कहानियों में से है, जिन्होंने मेरे मन पर, मेरी सोच पर गहरा प्रभाव छोड़ा। (जिन्होंने यह कहानी न पढ़ी हो, उन के लिए एक अलग प्रविष्टि के रूप में मैं ने वह कहानी उपलब्ध की है।) बाबा भारती की तरह ही मैं लोगों पर विश्वास करता हूँ और करते रहना चाहता हूँ, जब तक मुझे किसी पर अविश्वास करने का कारण न मिले। इस के विपरीत मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूँ जो हर नए व्यक्ति को शक की निगाह से देखते हैं, जब तक वह व्यक्ति स्वयं को उन के विश्वास के योग्य न प्रमाणित करे। ऐसी प्रवृति भी लाभदायक रहती है, क्योंकि धोखा खाने की संभावना कम हो जाती है। शायद मेरी प्रवृति मेरे आलस्य का भी सूचक है — विश्वास करने में छानबीन करने के मुकाबले कम मेहनत लगती है। पर मेरा यह भी मानना है कि दुनिया विश्वास के बल पर ही चलती है।    

हिन्दी ब्लॉगरों का समाज भी इसी विश्वास के बल पर चलता है। हम लोग एक दूसरे का लेखन नियमित रूप से पढ़ कर एक दूसरे को जानने-पहचानने से लगते हैं। यही कारण है कि लोग बेखटके एक दूसरे से मिलते हैं, कभी फिलाडेल्फिया में तो कभी कानपुर में, कभी बोलोनिया में तो कभी पुणे में, कभी हैदराबाद में तो कभी न्यू जर्सी में। मुझे गर्व है कि मैं ऐसे पहले चिट्ठाकार मिलन का हिस्सेदार था। इस के अतिरिक्त मैंने अनेकों चिट्ठाकारों से फोन के द्वारा बात की है — भारत, अमरीका, कैनाडा, कुवैत। अगला हिन्दी में लिखने की ज़हमत लेता है, यही अपने लिए उस के नेक इरादों का सबूत है।

ऐसे में हाल में कुछ ऐसा हुआ जिससे मेरा यह विश्वास थोड़ा सा डगमगाया। चिट्ठाजगत के ही किसी सदस्य ने ऐसा खेल खेला कि मुझे लग रहा है, “ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।” हुआ यूँ कि एक परिचित चिट्ठाकार ने मुझे दफ्तर फोन कर के बताया कि उन के सेलफोन पर किसी “अज्ञात” व्यक्ति ने फोन किया, और वह भी आवाज़ बदल कर और स्वयं को दूसरा चिट्ठाकार बता कर। कमाल यह कि उन के कॉलर-ID में मेरे घर का नंबर आया — जिस के पीछे कोई जालसाज़ी थी। यही नहीं, यह वार्तालाप रिकॉर्ड भी किया गया और इंटरनेट पर भी डाला गया — साथ में छद्म नामों से कुछ रहस्यमयी टिप्पणियाँ की गईं, और ऐसे ईमेल कुछ लोगों के पास गए। यह खेल खेलने वाला कोई चिट्ठाकार ही था, और उसे न सिर्फ मेरे घर का फोन नंबर मालूम था, बल्कि मेरी फोन कंपनी कौन सी है, यह भी मालूम था। इस सब में वह चिट्ठाकार कुछ ऐसे सुराग छोड़ गया कि  उस की शिनाख्त करना खास मुश्किल नहीं है। आखिरकार इतनी सारी सूचना तो गिने हुए लोगों के पास ही है।

अब या तो यह सब एक मज़ाक था, या एक गहरी साज़िश। कहीं यह गहरी साज़िश न हो, और मुझे फोन नंबर या कंपनी बदलने की ज़रूरत न हो, इसलिए मैं अपनी फोन कंपनी से कई दिनों से लड़ रहा हूँ कि यह कैसे संभव हो पाया — यदि यह संभव है तो कल मेरी सूचना का ऐसा दुष्प्रयोग भी हो सकता है, जिससे मुझे हानि हो। पर उन का कहना है कि उन के संयन्त्र में कोई सुरक्षा-संबन्धी गड़बड़ नहीं है। इस के इलावा भी कई कॉल्ज़ कर चुका हूँ — अन्य चिट्ठाकारों को — मामले की तह तक पहुँचने के लिए। अब मुझे उम्मीद है कि यह सब एक मज़ाक था, पर इसी बात की प्रतीक्षा में हूँ कि मज़ाक करने वाला यह बात कहे।  मैं वचन देता हूँ कि बात वहीं समाप्त हो जाएगी, और आगे नहीं बढ़ेगी। पर यदि यह गुत्थी नहीं सुलझती तो मुझे ही नहीं, हम सब को भविष्य में सावधानी बरतनी होगी। 

खड़क सिंह, मेरे सुल्तान को वापस नहीं करते हो, न सही, पर अपना नकाब तो हटा दो ताकि चिट्ठाजगत में परस्पर विश्वास बना रहे।

5 Comments on हिन्दी ब्लॉगमंडल और बाबा भारती

  1. पता नहीं कि खड्गसिंह में हिम्मत बची भी है कि वे चादर तान के सो रहे हैं।

  2. रवि says:

    … साथ में छद्म नामों से कुछ रहस्यमयी टिप्पणियाँ की गईं, और ऐसे ईमेल कुछ लोगों के पास गए। यह खेल खेलने वाला कोई चिट्ठाकार ही था, और उसे न सिर्फ मेरे घर का फोन नंबर मालूम था, बल्कि मेरी फोन कंपनी कौन सी है, यह भी मालूम था। इस सब में वह चिट्ठाकार कुछ ऐसे सुराग छोड़ गया कि उस की शिनाख्त करना खास मुश्किल नहीं है। आखिरकार इतनी सारी सूचना तो गिने हुए लोगों के पास ही है।..

    उसकी शिनाख्ती का इंतजार तो हमें भी है… आख़िर कौन ऐसा हिन्दी चिट्ठाकार बंदा है जो अपनी तकनीकी कुशलता को ऐसे बेहूदा कामों में लगाता है…

  3. आशीष says:

    कालर आईडी बदल कर फोन करना संभव है, बिलकुल उसी तरह से जिस तरह आप जावा मेल का प्रयोग कर किसी और के मेल पते से किसी को भी मेल भेज सकते है ! लेकिन मेल आपके पास सुरक्षित होता है और आप उसके हेडर से मेल सर्वर और मेल भेजने वाले कम्प्युटर का आई पी मालूम कर सकते है।
    उदाहरण के लिये आप a@yahoo.com मेल आई डी का प्रयोग कर xyz मेल सर्वर से मेल भेज रहे है. याहू के सर्वर को तो कुछ पता ही नही की उस सर्वर के नाम से किसी और ने मेल भेज दिया।मेले प्राप्त करने वाले को मेल आई डी a@yahoo.com दिखाई देगा, जबकी वह xyz सर्वर से आया है लेकिन मेल का हेडर पोल खोल देगा।
    इसी तरह की तकनिक फोन के लिये भी उपलब्ध है। अंतरजाल पर उपलब्ध लगभग सभी फोन कार्ड इसका प्रयोग करते है। फोम कीसी और नम्बर से किया जाता है लेकिन नम्बर कोई और दिखाई देता है । कालर आई डी बदलने के लिये आपको सिर्फ काल हेडर मे किसी और का फोन नंबर भेजना होगा। इसे पकडने के लिये फोन प्राप्त करने वाले का एक्सचेंज मदत कर सकता है। उसके पास उस काल के असली कालर का विवरण जरूर होगा ।
    आपकी फोन कम्पनी वाले सही कह रहे है, उनकी सुरक्षा मे खामी नही है क्योंकि उन्हे कुछ मालुम ही नही है। उनके एक्सचेण्ज से फोन नही किया गया होगा।

  4. जीतू says:

    बहरहाल जिसने भी यह मजाक किया है, वह निहायत ही भद्दा मजाक है।मुझे भी काफ़ी बुरा लगा। अब तो किसी हिन्दी ब्लॉगर को फोन करने से पहले या रिसीव करने से पहले काफ़ी सोचना पड़ेगा।

    रही बात इस बन्दे की ढूंढ तो हम लेंगे ही, हमने काफ़ी जानकारी इकट्ठा कर ली है।

  5. […] किस कारणवश आज इस कहानी की याद आ गई, यह अगली पोस्ट में बताऊँगा। अभी प्रस्तुत है यह […]

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