हिन्दी ब्लॉगमंडल और बाबा भारती

हम में से शायद सभी ने बचपन में सुदर्शन की कहानी हार की जीत पढ़ी होगी। यह कहानी उन चन्द कहानियों में से है, जिन्होंने मेरे मन पर, मेरी सोच पर गहरा प्रभाव छोड़ा। (जिन्होंने यह कहानी न पढ़ी हो, उन के लिए एक अलग प्रविष्टि के रूप में मैं ने वह कहानी उपलब्ध की है।) बाबा भारती की तरह ही मैं लोगों पर विश्वास करता हूँ और करते रहना चाहता हूँ, जब तक मुझे किसी पर अविश्वास करने का कारण न मिले। इस के विपरीत मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूँ जो हर नए व्यक्ति को शक की निगाह से देखते हैं, जब तक वह व्यक्ति स्वयं को उन के विश्वास के योग्य न प्रमाणित करे। ऐसी प्रवृति भी लाभदायक रहती है, क्योंकि धोखा खाने की संभावना कम हो जाती है। शायद मेरी प्रवृति मेरे आलस्य का भी सूचक है — विश्वास करने में छानबीन करने के मुकाबले कम मेहनत लगती है। पर मेरा यह भी मानना है कि दुनिया विश्वास के बल पर ही चलती है।    

हिन्दी ब्लॉगरों का समाज भी इसी विश्वास के बल पर चलता है। हम लोग एक दूसरे का लेखन नियमित रूप से पढ़ कर एक दूसरे को जानने-पहचानने से लगते हैं। यही कारण है कि लोग बेखटके एक दूसरे से मिलते हैं, कभी फिलाडेल्फिया में तो कभी कानपुर में, कभी बोलोनिया में तो कभी पुणे में, कभी हैदराबाद में तो कभी न्यू जर्सी में। मुझे गर्व है कि मैं ऐसे पहले चिट्ठाकार मिलन का हिस्सेदार था। इस के अतिरिक्त मैंने अनेकों चिट्ठाकारों से फोन के द्वारा बात की है — भारत, अमरीका, कैनाडा, कुवैत। अगला हिन्दी में लिखने की ज़हमत लेता है, यही अपने लिए उस के नेक इरादों का सबूत है।

ऐसे में हाल में कुछ ऐसा हुआ जिससे मेरा यह विश्वास थोड़ा सा डगमगाया। चिट्ठाजगत के ही किसी सदस्य ने ऐसा खेल खेला कि मुझे लग रहा है, “ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।” हुआ यूँ कि एक परिचित चिट्ठाकार ने मुझे दफ्तर फोन कर के बताया कि उन के सेलफोन पर किसी “अज्ञात” व्यक्ति ने फोन किया, और वह भी आवाज़ बदल कर और स्वयं को दूसरा चिट्ठाकार बता कर। कमाल यह कि उन के कॉलर-ID में मेरे घर का नंबर आया — जिस के पीछे कोई जालसाज़ी थी। यही नहीं, यह वार्तालाप रिकॉर्ड भी किया गया और इंटरनेट पर भी डाला गया — साथ में छद्म नामों से कुछ रहस्यमयी टिप्पणियाँ की गईं, और ऐसे ईमेल कुछ लोगों के पास गए। यह खेल खेलने वाला कोई चिट्ठाकार ही था, और उसे न सिर्फ मेरे घर का फोन नंबर मालूम था, बल्कि मेरी फोन कंपनी कौन सी है, यह भी मालूम था। इस सब में वह चिट्ठाकार कुछ ऐसे सुराग छोड़ गया कि  उस की शिनाख्त करना खास मुश्किल नहीं है। आखिरकार इतनी सारी सूचना तो गिने हुए लोगों के पास ही है।

अब या तो यह सब एक मज़ाक था, या एक गहरी साज़िश। कहीं यह गहरी साज़िश न हो, और मुझे फोन नंबर या कंपनी बदलने की ज़रूरत न हो, इसलिए मैं अपनी फोन कंपनी से कई दिनों से लड़ रहा हूँ कि यह कैसे संभव हो पाया — यदि यह संभव है तो कल मेरी सूचना का ऐसा दुष्प्रयोग भी हो सकता है, जिससे मुझे हानि हो। पर उन का कहना है कि उन के संयन्त्र में कोई सुरक्षा-संबन्धी गड़बड़ नहीं है। इस के इलावा भी कई कॉल्ज़ कर चुका हूँ — अन्य चिट्ठाकारों को — मामले की तह तक पहुँचने के लिए। अब मुझे उम्मीद है कि यह सब एक मज़ाक था, पर इसी बात की प्रतीक्षा में हूँ कि मज़ाक करने वाला यह बात कहे।  मैं वचन देता हूँ कि बात वहीं समाप्त हो जाएगी, और आगे नहीं बढ़ेगी। पर यदि यह गुत्थी नहीं सुलझती तो मुझे ही नहीं, हम सब को भविष्य में सावधानी बरतनी होगी। 

खड़क सिंह, मेरे सुल्तान को वापस नहीं करते हो, न सही, पर अपना नकाब तो हटा दो ताकि चिट्ठाजगत में परस्पर विश्वास बना रहे।

हार की जीत

सुदर्शन लिखित हार की जीत मेरी सर्वाधिक प्रिय कहानियों में से है। किस कारणवश आज इस कहानी की याद आ गई, यह अगली पोस्ट में बताऊँगा। अभी प्रस्तुत है यह कहानी, सधन्यवाद भारत दर्शन*, जहाँ यह कहानी शुषा मुद्रलिपि में मिली, और रजनीश मंगला जिनके चमत्कारी टूल ने इसे यूनिकोड में परिवर्तित किया।
* अपडेट 27 दिसंबर 2009 – यह कड़ी अब काम नहीं कर रही। यह रही नई कड़ी, जहाँ अब यह कहानी अब यूनिकोड में उपलब्ध है।

हार की जीत

– सुदर्शन

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रूपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। “मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा”, उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, “ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।” जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।

खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, “खडगसिंह, क्या हाल है?”

खडगसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”

“कहो, इधर कैसे आ गए?”

“सुलतान की चाह खींच लाई।”

“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”

“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”

“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”

“कहते हैं देखने में भी बहुत सुँदर है।”

“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”

“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”

बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से। उसने सैंकड़ो घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”

दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायु-वेग से उडने लगा। उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”

बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रति क्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”

आवाज़ में करूणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”

अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”

“वहाँ तुम्हारा कौन है?”

“दुगार्दत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”

बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था।बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”

खड़गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”

“परंतु एक बात सुनते जाओ।” खड़गसिंह ठहर गया।

बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड़गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”

“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल घोड़ा न दूँगा।”

“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”

खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?”

सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।” यह कहते-कहते उन्होंने सुल्तान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।

बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दे। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।

रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन भर का भारी बना दिया। वे वहीं रूक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठपर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। फिर वे संतोष से बोले, “अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।”

एकल विद्यालय एवं एकल सुर सन्ध्या

मैं एकल विद्यालय संगठन के विषय में जो कहने जा रहा हूँ, उस का आजकल चल रही आरक्षण संबन्धी बहस से भी गहरा सरोकार है। हमारे हिन्दी ब्लॉगमंडल में जितने लोगों ने भी आरक्षण के विषय पर अपना मत प्रकट किया, विशेषकर आरक्षण के विरोध में लिखने वालों ने, लगभग सब ने यह कहा कि समस्या का समाधान है पिछड़ी जातियों और जनजातियों को शिक्षित करना। उन्हें शिक्षित होने के सही अवसर प्रदान करना ताकि वे बाकी सब के साथ कदम मिला कर चल सकें। अब सरकार से इस सब की उम्मीद रखना कितना उचित है, यह हम सब को मालूम है। राजनीतिज्ञों को तो अपने वोटबैंकों को सुदृढ़ करने से ही फुर्सत नहीं है, देश चाहे भाड़ में जाए। इसलिए इस के लिए पहल नागरिकों को ही करनी होगी। इस में आम नागरिक, अप्रवासी भारतीय एवं गैर-सरकारी संगठन बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हाल में मुझे मालूम हुआ एक ऐसे संगठन “एकल विद्यालय” के विषय में, और वह भी एक संगीतमयी सन्ध्या के साथ। संगीत के विषय में अभी बताता हूँ, पहले इस संगठन के बारे में। एकल विद्यालय ने बीड़ा उठाया है 2011 तक भारत की ग्रामीण व जनजातीय जनसंख्या से निरक्षरता-उन्मूलन का। यह किस तरह से किया जाएगा, यह यहाँ पढ़ें — इस चिट्ठे पर अधिक लिखने से लाभ नहीं। पर इस तरह का प्रकल्प तभी सफल होगा, जब इस में हम आप जैसे लोग जुड़ें – तन से, मन से और धन से।

यहाँ अमरीका में  आजकल एकल विद्यालय संगठन का एक फंड-रेज़िंग कार्यक्रम चल रहा है। उसी उपलक्ष में हाल में मेरी भेंट एकल विद्यालय की वाशिंगटन डीसी शाखा की अध्यक्षा सुश्री शशि श्रीवास्तव से हुई। उन्होंने मुझे बुलाया एकल सुर सन्ध्या में, जो पिछले सप्ताहान्त वाशिंगटन डीसी के पास आयोजित हुई। गायक कुमार सुनील मुंगी (जो हमारे कई चिट्ठाकार बन्धुओं की तरह मालवा वासी हैं) और उन के साथ के तबला-वादक हेमेन्द्र महावर और नवयुवक सितार-वादक इन्द्रजीत राय चौधरी ने ऐसा समाँ बान्धा कि घंटों तक क्षेत्र के ग़ज़ल-गीत-भजन प्रेमी झूमते रहे। साथ में एकल विद्यालय के विषय में संक्षिप्त जानकारी दी गई और फलस्वरूप कई लोगों ने कई विद्यालयों को चलाने के लिए धन दिया। एकल विद्यालय संगठन का दावा है कि एक व्यक्ति यदि एक दिन एक डॉलर दे तो उस से एक विद्यालय चलाया जा सकता है।

मुझे यह प्रविष्टि लिखने में काफी देर हो गई, और इस बीच सुनील जी की टीम कई और अमरीकी शहर घूम चुकी है। एकल सुर सन्ध्या का पूरा कार्यक्रम यहाँ पर है। अभी जून में जहाँ कार्यक्रम होने हैं, वे हैं कैलिफोर्निया में बे-एरिया (2-जून) और सैक्रेमैंटो (3-जून), ओहायो में कोलम्बिया (9-जून) और सिनसिनाटी (10-जून), इंडियाना में इंडियानापोलिस (11-जून), इलिनोइ में शिकागो (17-जून), उत्तरी कैरोलाइना में राले (23-जून) और शार्लट (24-जून)। जुलाई में दक्षिण कैलिफोर्निया, ह्यूस्टन और डलस में, अगस्त में न्यू जर्सी और रोड आइलैंड में, और सितंबर में पिट्सबर्ग, हैरिसबर्ग और फिलाडेल्फिया में कार्यक्रम होंगे। इन सब क्षेत्रों के पाठक व चिट्ठाकार ध्यान दें, भाग लें और इस कार्यक्रम की सूचना लोगों तक पहुँचाएँ।

Ekal Sur Sandhya at Lanham, MD

यह चित्र वाशिंगटन डीसी के पास लैनहैम, मेरीलैंड में हुई संगीत सन्ध्या का है। श्रोताओं में बैठ कर स्टेज के फोटो मुझ से सही नहीं खींचे जाते। इस कारण चित्र बढ़िया नहीं आया। इस बारे में अनुभवी लोगों की सलाह दरकार है।

पैट्रोल के दामों के विषय में चेन मेल

आजकल पैट्रोल के दामों के विषय में एक चेन मेल शुरू हुई है, जिस में कहा गया है कि 22 मई (या 22 सितम्बर?) को पैट्रोल का प्रयोग न करें, ताकि पैट्रोल कंपनियों को होश आ जाए। अपने अंग्रेज़ी चिट्ठे में मैं ने इस पर किए हुए शोध के परिणाम दिए हैं। आप भी पढ़ें और इस चेन को तोड़ें। 

टाइम्ज़ ऑफ इंडिया के पॉप-अप

बचपन से टाइम्ज़ ऑफ इंडिया मेरा प्रिय अखबार रहा है। कम से कम दो दशक तक हर सुबह एक कप चाय और टाइम्ज़ ऑफ इंडिया  से शुरू होती थी। यहाँ, देश से दूर इस अखबार की वेबसाइट ही इसे पढ़ने का एकमात्र साधन है। पर हद से ज़्यादा पॉप-अप विज्ञापनों के चलते इसे पढ़ना सज़ा हो जाता है। अपने पर्सनलाइज़्ड गूगल होमपेज में मैं ने  टाइम्ज़ ऑफ इंडिया  की फीड डाली हुई है, पर किसी कड़ी को क्लिक करने पर स्वयं को कोसता हूँ कि क्यों क्लिक किया। एक के बाद एक चार पॉप-अप विज्ञापन खुलते हैं, जिन्हें किसी तरह बन्द कर के अपने काम का पृष्ठ खोज निकालना पड़ता है — इन में से दो तो स्मैश-हिट्स के होते हैं जो कि बहुत ही ढ़ीठ किस्म का पॉप-अप है। फिर स्पाइवेयर का भी डर रहता है। मैं जान बूझ कर इन में से किसी का भी लिंक नहीं दे रहा हूँ, क्योंकि पॉप-अप विज्ञापनों से मुझे बड़ी कोफ़्त होती है। घर के कंप्यूटर पर तो गूगल टूलबार सारे पॉप-अप रोक देता है, पर दफ़्तर के पॉप-अप ब्लॉकर को टाइम्ज़ पछाड़ देता है।

यह समझ नहीं आ रहा कि टाइम्ज़ ऑफ इंडिया वाले इतना लालच क्यों करते हैं। शायद उन्होंने इस बात की गणना की होगी कि पॉप-अप विज्ञापनों से खीझ कर भाग जाने वाले पाठकों की अपेक्षा उन विज्ञापनों पर क्लिक करने वालों से या उन विज्ञापनों के मालिकों से ज़्यादा कमाई होती है। मैं यह मानता हूँ कि आखिरकार बात “बॉटम-लाइन” की ही होती है। पर फिर भी टाइम्ज़ ऑफ इंडिया  के स्तर की कंपनी का कुछ तो उत्तरदायित्व बनता है अपने पाठकों के प्रति।

रेडिफ से लेकर हिन्दुस्तान टाइम्ज़ सभी पॉप-अप विज्ञापनों का प्रयोग करते हैं पर मेरे अनुभव से टाइम्ज़ ऑफ इंडिया  के पॉप-अप सब से ज़्यादा हैं। ऐसे में मैं इन अखबारों के ई-पेपर पर ज़्यादा निर्भर करता हूँ, क्योंकि वहाँ पॉप-अप नहीं आते। इस के इलावा हिन्दी के अखबारों में भी कम पॉप-अप आते हैं।

हाल में कुछ ब्लॉगर बन्धुओं ने भी जाने अनजाने पॉप-अप विज्ञापन डालने शुरू कर दिए हैं। उन से भी निवेदन करूँगा कि यदि विज्ञापन डालने ही हैं तो ऐसे डालें कि वे पृष्ठ को पढ़ने में बाधक न बनें।