(Update: यह लेख 14 अप्रैल 2006 को अनुगूंज शृंखला के अन्तर्गत लिखा गया था। इस शृंखला में सभी चिट्ठाकार एक ही विषय पर लेख लिखते थे। इस लेख में दी गई कई कड़ियाँ अब काम नहीं कर रही हैं।)

बहुत ही टेढ़ा विषय दिया है संजय ने – मेरे जीवन में धर्म का महत्व। जितना इस विषय पर विवाद होने का डर रहता है, उतना शायद ही किसी और विषय पर रहता हो। अभी तक इसीलिए इस तरह के विषय हिन्दी चिट्ठाजगत में नहीं उठाए जा रहे थे। पर यह प्रसन्नता की ही बात है कि अब हिन्दी चिट्ठाजगत भी वयस्क हो रहा है, और हर तरह के मुद्दे उठाए जा रहे हैं और ज़िम्मेदारी के साथ उन पर बात होती है।

Akshargram Anugunjतो फिर शुरू करता हूँ धर्म के विषय में अपने विचारों से। क्या धर्म और ईश्वर में आस्था का परस्पर कोई सम्बन्ध है? मैं नहीं मानता। कम से कम हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में तो मैं नहीं मानता। मैं पूर्ण रूप से नास्तिक हूँ। पूर्ण रूप से, मतलब इस में किसी तरह की रियायत की गुंजाइश नहीं है। फिर भी स्वयं को हिन्दू कहने से मैं गुरेज़ नहीं करता। इस विरोधाभास को मैं आगे समझाने का प्रयत्न करूँगा।

हाँ, तो मैं यह नहीं मानता कि ईश्वर जैसी कोई चीज़ है। मैं यह भी नहीं मानता कि सभी धर्म अच्छी चीज़ें सिखाते हैं, या यह कि ये सब “ईश्वर-रूपी सत्य” को पाने के अलग अलग रास्ते हैं। मैं यह भी नहीं मानता कि ज़िन्दगी में सही आचरण के लिए धर्म की आवश्यकता है। यह भी नहीं कि मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। हो सकता है कि यह बातें कहने के लिए मुझे तनखाइया करार दिया जाए, और मेरा हुक्का पानी बन्द किया जाए, पर जब शुऐब ने पर्दा उठा ही दिया है, और रवि कामदार ने भी अपना काम कर दिया है, और जब संजय ने क्लॉज़ेट से बाहर निकलने का न्यौता दे ही दिया है तो फिर चुप रहने से क्या लाभ? इसलिए अपनी विचारधारा के इस पहलू को थोड़ा और विस्तार देने की कोशिश करूँगा।

ईश्वर क्यों नहीं है, यह साबित करने की ज़रूरत नहीं है। यह साबित करने की ज़रूरत है कि ईश्वर क्यों है। और ऐसा कोई सबूत अभी तक मुझे नहीं दिखा है। और शायद किसी ने कोशिश भी नहीं की है साबित करने की। आस्तिक लोग यह कहते हैं कि यह तो अपनी आस्था की बात है — इसे प्रमाणित करने की आवश्कता नहीं है। ठीक है, फिर सब की अलग अलग आस्था है, पर सत्य तो एक ही होता है न? यदि यह मान लिया जाए कि इन सब में से ही एक सत्य है, तो बाकी सब तो झूठे हुए न? फिर ये सब “ईश्वर-रूपी सत्य” को पाने के अलग अलग रास्ते कैसे हुए? एक ही तथ्य का यदि सत्य रूप बताना हो तो उस का एक ही तरीका होता है, पर उसी तथ्य का यदि असत्य रूप बताना हो तो उस के सैंकड़ों तरीके हो सकते हैं। यदि मैं आप से पूछता हूँ कि यह जो वाक्य आप पढ़ रहे हैं उस के फाँट का रंग कैसा है। पहले सच बताइए, फिर झूठ। सच बताएँगे तो सब का उत्तर होगा काला, पर झूठ बोलेंगे तो सब का जवाब अलग अलग होगा — लाल, पीला, हरा, नारंगी, इत्यादि। इसी तरह तथाकथित ईश्वर के बारे में हज़ारों धारणाओं के होने का अर्थ है कि वे सब असत्य हैं। हो सकता है कि मेरा सोचना भी ग़लत हो, पर वह भी इन हज़ारों झूठों में से एक झूठ होगा। सच क्या है, यह तो किसी को भी पता नहीं। यदि यह भी मान लिया जाए कि किसी तरह की कोई वाह्य महाशक्ति है, तब भी यह तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि यह (भूत या वर्तमान के) किसी मानव को नहीं मालूम कि वह “महाशक्ति” क्या चाहती है, या कैसे काम करती है। क्या वह वाह्य महाशक्ति हम से अपनी पूजा करवाना चाहती है? क्या वह अच्छा काम करने वाले को इनाम देती है? क्या वह बुरा काम करने वाले को सज़ा देती है? क्या वह मदीना, हरिद्वार, ननकाना साहिब या वैटिकन जाने वाले को किसी तरह का इन्सेन्टिव देती है? इन और ऐसे हज़ारों और सवालों का जवाब है, “नहीं!” और सबूत हम सब अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में देखते हैं। और अगर हमें पक्का नहीं मालूम कि भगवान क्या है और क्या चाहता है, तो हम क्यों अपनी ऊर्जा एक असत्य या कदाचित् सत्य की तलाश में व्यर्थ करते हैं?

आप कहेंगे, ठीक है भगवान है या नहीं है, यदि इस से मन में शान्ति मिलती है तो बुरा क्या है? मैं आप से सहमत हूँ। यदि आस्था उसी स्तर पर रहे — व्यक्तिगत स्तर पर शान्ति प्राप्त करने का यन्त्र, स्वार्थपूर्ण ही सही — तो ठीक है। पर इस आस्था के विभिन्न रूपों ने दुनिया में फायदा कम और नुक्सान ज़्यादा किया है। नास्तिकता का कोई नुक्सान ध्यान में नहीं आ रहा, पर आस्तिकता के मैं हज़ारों नुक्सान गिना सकता हूँ। कुछ पर नज़र डाली जाए

  • संसार में जितने फसादात चल रहे हैं, आज और हज़ारों सालों से, उन की जड़ यही है — खुदा, भगवान, गॉड। तीन दिन पहले ईराक में किसी सुन्नी ने एक शिया मस्जिद में ख़ुद को उड़ा दिया और साथ में ७० और लोगों के परखचे उड़ा दिए — यह अमरीका के खिलाफ लड़ाई तो नहीं थी। रोज़ ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं। इतिहास का कोई पन्ना और भूगोल का कोई भाग इस बीमारी से बचा नहीं है।
  • हाल में मैं ने १७वीं शताब्दी फ्राँस के भौतिक विज्ञानी पास्कल का कथन पढ़ा,

    Men never do evil so completely and cheerfully as when they do it from a religious conviction.

    और यह बात मुझे बिल्कुल सही लगी। जब आदमी बुरा काम यह सोच कर करता है कि यह धर्म का काम है, खुदा का काम है, तो वह खुशी से भी करता है, और बिना किसी अपराध बोध के भी। चाहे वह वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में जहाज़ घुसाना हो या ग्राहम स्टेन्ज़ का कत्ल। कोई चोर-डाकू जब बैंक लूट रहा हो तो उसे कम से कम यह तो ख्याल होता है कि मैं ग़लत काम कर रहा हूँ। सीऍनऍन का कल जारी यह विडियो देखिए, जिस में संवाददाता बता रही है कि ९-११ की एक फ्लाइट में किस प्रकार आतंकवादी अल्लाह का नाम ले ले कर अपना काम पूरा कर रहे थे (Update: यह वीडियो अब उपलब्ध नहीं है, इस कारण अब इससे जुड़े लेख की कड़ी दे दी है)। और आज की रिपोर्ट पढ़िए, कि ज़कारियास मुसावी कैसे यह सब सुन कर खुश हो रहा है। न, न, यह मत कहिए कि मज़हब यह सब नहीं सिखाता। मज़हब यही सब सिखाता है, मुसावी कुरानेशरीफ़ में से उद्धरण दे कर अपना बयान दे रहा था। यदि ऐसा नहीं है तो कार्टूनिस्टों के खिलाफ़ फतवा जारी करने वाले लोग मुसावी के खिलाफ़ फतवा क्यों नहीं जारी करते? उसे पूरा यकीन है कि उसे जन्नत में जगह मिलेगी, और ७२ हूरें भी।

  • संसार में कितना धन, समय और ऊर्जा धार्मिक कामों और इमारतों पर खर्च होते हैं? यही संसाधन यदि किसी और तरीके से प्रयोग किए जाते तो संसार में कितना सकारात्मक परिवर्तन आता, इस का हिसाब लगाना कठिन है।
  • धार्मिक पुस्तक यदि एक ग़लत बात सिखाए तो मेरे हिसाब से वह बेकार है, पर यहाँ तो धार्मिक पुस्तकें इतनी उल्टी सीधी बातें सिखाती हैं कि समझ में नहीं आता हज़ारों साल तक करोड़ों लोग कैसे बेवक़ूफ़ बने रहते हैं। अब आप ही बताइए, हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह धोबी के कहने पर पत्नी को त्यागें, या उन के पिता की तरह तीन पत्नियाँ रखें। सत्यमूर्ति युधिष्ठिर की तरह पत्नी समेत सब कुछ जुए में हारें, या भगवान शंकर की तरह अपने बेटे का ही सिर काट दें। ईसा का सन्देश फैलाने के लिए क्रुसेड करें, या मुहम्मद का पैग़ाम पहुँचाने के लिए जिहाद।
  • मैं कितने ही लोगों को जानता हूँ जिन्होंने ईश्वरोपासना को अपने जीवन का उद्देश्य मानकर उन कार्यों, उन लोगों की उपेक्षा की, जिन की उन के ऊपर ज़िम्मेवारी थी। यदि कोई भगवान बुद्ध की तरह बीवी बच्चों को सोता छोड़ कर निर्वाण की खोज में निकल पड़े तो उसे आप क्या कहेंगे? मैं तो उसे ग़ैर-ज़िम्मेदार और खुदगर्ज़ कहूँगा, खासकर यदि वह गौतम की तरह धनी राजकुमार न हो। कितने ही लोग हैं जो गृहस्थ में तो रहते हैं, पर धर्म के ढ़ोंग में इतने विलीन रहते हैं, कि आसपास के मानवों की भावनाओं की अनदेखी करते हैं।
  • धर्म का वास्ता दे कर कई लोग ऐसे निश्चय नहीं ले पाते जो अन्यथा नैतिक या व्यावहारिक रूप से सही हों। कुछ लोगों को रक्तदान से परहेज़ होता है, और कुछ लोगों को नसबन्दी से। उदाहरण के तौर पर मैंने अपने ड्राइविंग लाइसेंस पर लिखवा रखा है कि मेरे मरने पर मेरे शरीर का कोई भी भाग या पूरा शरीर किसी को दान दिया जाए या विज्ञान के लिए प्रयोग हो। यह कोई बड़ा काम नहीं है, क्योंकि जो चीज़ मेरे काम की नहीं है, मुझे क्या फ़र्क पड़ता है उस के साथ क्या हो — वरना मूल रूप से तो मैं भी स्वार्थ का ही पुजारी हूँ। परन्तु यदि मैं धार्मिक प्रवृत्ति का होता तो यह सोचता कि मेरा शरीर जलाया ही जाए और अस्थियाँ गंगा के प्रदूषण के लिए प्रयोग की जाएँ।
  • धर्म के कारण विज्ञान की बहुत अनदेखी होती है। बेचारे गैलिलियो को कितनी यातनाएँ सहनी पड़ीं, यह कहने के लिए कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। डार्विन को तो अभी भी मज़हबियों की गालियाँ पड़ती हैं।
  • धर्म के कारण लोग देश द्रोह के लिए भी उतारू हो जाते हैं। अब कितना कहूँ, बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी।

खैर, इस लिस्ट का तो कोई अन्त नहीं है। धर्म को मानने वाले कहते हैं कि यदि धर्म न हो तो लोगों को जीवन की राह कैसे मिलेगी, सत्य-असत्य, सुकर्म-कुकर्म का अन्तर कैसे समझ में आएगा? यदि यह तर्क मान्य होता तो संसार के सारे नास्तिक झूठे, कुकर्मी, और अपराधी होते। बल्कि है इस का उलट। लगभग सब उल्टे-सीधे काम करने वाले ईश्वर में आस्था रखते हैं। नास्तिक विचारधारा एक सोच-समझ कर चुनी हुई विचारधारा होती है; एक नास्तिक को न तो यह डर होता है कि बुरा काम करने पर भगवान सज़ा देगा, न यह सांत्वना कि प्रसाद चढ़ाने पर माफ कर देगा। हो गया बराबर। फिर कैसे चलाएँ काम? वैसे ही जैसे भले लोग हमेशा चलाते रहे हैं — देश-काल के कानून से और समाज के नियमों से, जो समय और स्थान के हिसाब से बने होते हैं, और बदलते रहते हैं।

फिर यह दूसरे पैरे में स्वयं को हिन्दू कहने की क्या बात लिखी है? बताता हूँ। अगर उस के बाद आप मुझे पाखंडी कहें तो भी कोई बात नहीं। देखो भई, मैं नहीं मानता कि हिन्दुत्व एक मज़हब की परिभाषा पर खरा उतरता है। सब धर्मों की तरह हिन्दुत्व में भी बुराइयाँ तो हैं, पर हमें जो अच्छा लगता है, उसे अपनाएँ, जो बुरा लगता है, उसे ठुकराएँ। कोई ज़रूरी नहीं है कि मैं राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानूँ। मैं करोड़ों देवी देवताओं की पूजा करूँ, एक ईश्वर को मानूँ, या एक को भी न मानूँ, मुझे कोई यह नहीं कह सकता कि तुम हिन्दू नहीं रहे। न मुझे नास्तिक होते हुए भी शुऐब की तरह यह लिखने की ज़रूरत है कि मैं मुसलमान क्यों नहीं। मैं यह मानता हूँ कि धर्म मानव ने शुरू किए अपने अपने समय और स्थान के उपलब्ध ज्ञान के अनुसार। जब उसी धर्म को हज़ारों साल बाद, हज़ारों मील दूर रह रहे लोगों पर बिना बदले लागू करने की कोशिश हो, तब गड़बड़ होती है — वही मज़हब हो जाता है। मैं अपने परिवार की खुशी के लिए पूजा-पाठ में भी भाग ले लेता हूँ, और होली-दीवाली में जो आनन्द मिलता है, उसे तो भोगता ही हूँ — पर किसी भी तरह के अन्धविश्वास से दूर रहता हूँ। भारत में हिन्दू कहीं से भी आए हों, पर हिन्दुत्व पनपा तो भारत में ही है। मुझे लगता है कि हमारे त्यौहार भी कुछ सामाजिक, आर्थिक, व्यावहारिक कारणों से बने, और धीरे धीरे देवी देवताओं के साथ जोड़े गए। इन का हमारी ऋतुओं, फसलों की कटाई-बुवाई, व्यापारिक लेखे जोखे के साथ गहरा नाता है। फिर, इस में समय, स्थान के अनुरूप परिवर्तन होते रहे हैं। बंगाल में जो त्यौहार और रस्मोरिवाज हैं वे राजस्थान में नहीं, और कश्मीर में जो हैं, वे केरल में नहीं। आज से सौ साल पहले जो रस्मोरिवाज थे, वे आज नहीं हैं। हिन्दुत्व का यही अव्यवस्थित ग़ैरमज़हबीपन मुझे भाता है। ऐसा नहीं है कि हम में बुराइयाँ नहीं हैं, पर हम ने न बदलने की भी नहीं ठानी है।

कैसा लगा आप को एक नास्तिक हिन्दू से मिल कर? लिखिए आप की गालियों के लिए ही तो टिप्पणियों का डिब्बा रखा है।

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44 Comments on एक नास्तिक हिन्दू

  1. भाई आप गालियों के नहीं शाबासी के पात्र हैं. मैं आपको अपनी तरफ सें 10 में से 10 अंक दे सकता हुं. काफी अच्छा लिखा हैं आपने, लगा अपने- आप का लिखा ही पढ रहा हुं.

  2. जीतू says:

    बहुत सुन्दर रमण भाई, इससे अच्छा लेख, इस विषय पर तो और कोई हो ही नही सकता। आपके विचारों ने धर्म को देखने का दूसरा नजरिया दे दिया है। इस विषय पर आपकी समझ मुझसे कंही बेहतर है, अच्छा लगा। आपने तर्क सहित सारे विचारों को हमारे सामने रखा है।

    एक छोटी सी रिक्वेस्ट है, फ़ोन्ट साइज थोड़ा बड़ा कर दीजिये, मुझे ब्राउजर से बड़ा करके पढना पड़ता है, ये नजर का फेर है या बुढापे की निशानी?

  3. “ये नजर का फेर है या बुढापे की निशानी?”
    जीतू भाई आँखो के नम्बर उतरवाने के लिए ‘समन्दर किनारे वाला ईलाज’, कारगर नहीं हुआ लगता हैं.

  4. “लगा अपने- आप का लिखा ही पढ रहा हुं”
    यहां मैं सिर्फ इतना कहना चाह रहा था कि आपके विचारों से मेरे विचार एकदम मेल खाते हैं.

  5. संजय, जीतू, पढ़ने और टिप्पणी देने के लिए धन्यवाद। जीतू भाई, फॉण्ट साईज़ तो ब्लिक्स के सेबास्शियन श्मीग ने चुना है। डिज़ाइनिंग में अपना हाथ तंग है, फॉण्ट बदलूँगा तो जाने क्या क्या बदलना पड़े। लगता है, बाइफोकल्ज़ का समय आ गया है। 😉

  6. […] अनुगूंज 18 के लिए इन्होने लिखा हैं : दुनियाँ मेरी नजर से (अमित) (30 मार्च) जोगलिखी (संजय बेंगाणी) दिनांक 1 अप्रैल दस्तक (सागर चन्द नाहर ) दिनांक 2 अप्रैल खाली-पीली (आशीष श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निठल्ला चिंतन (तरूण) दिनांक 4 अप्रैल छींटे और बौछारें (रविशंकर श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निनाद गाथा (अभिनव) दिनांक 5 अप्रैल मेरा पन्ना (जितेन्द्र चौधरी) दिनांक 5 अप्रैल बीच-बजार (परग कुमार मण्डले) दिनांक 5 अप्रैल उन्मुक्त (उन्मुक्त) दिनांक 9 अप्रैल झरोखा (शालिनी नारंग) दिनांक 10 अप्रैल उडन तश्तरी (समीरलाल) दिनांक 11 अप्रैल फ़ुरसतिया (अनूप शुक्ला) दिनांक 12 अप्रैल मन की बात (प्रेमलता पाण्डे) दिनांक 12 अप्रैल (ई-स्वामी) दिनांक 14 अप्रैल मेरा चिट्ठा (आशीष) दिनांक 14 अप्रैल इधर उधर की (रमण ) दिनांक 14 अप्रैल […]

  7. बात पते की है और मेरी सहमति भी है। लेकिन धर्मनिन्‍दकों के प्रति हिन्‍दुत्‍व को ज्‍यादा सहृदय बताना ‘अपने’ र्ध्‍म को रोमांटिसाइज करना ही है। अपन तो नास्तिक हैं क्‍योंकि वह हैं और जैसा आपने कहा इसका एक भी नुकसान मुझे तो अब तक दिखा नहीं। भगवान तेरा भला हो।

  8. मेरी राय में सर्वश्रेष्ठ रचना।

  9. सुनील says:

    प्रिय रमण,
    इतने प्रेम से बात कहना ताकि मेरी भावनाओं को ठेस न लगे, इसके लिए बहुत धन्यवाद!
    जिसे तुम टाइपोस कहते हो, असलियत में वह सब बुढ़ापे का कमाल है. एक ही संदेश में कभी देवाशीष लिखता हूँ कभी देवाषीश, पर अगर कोई पूछे तो मुझे समझ में नहीं आता कि कौन सा ठीक है. यही गलती विशेष और विषेश में करता हूँ.
    ढ़ और ढ का अंतर भी मैं भूल गया हूँ. तुम्हारा संदेश देख कर शब्दकोष उठा लाया, उसमें लिखा है ढ़ूँढना. पर बिंदी वाले ढ़ और बिना बिंदी वाले ढ के स्वरों में क्या फर्क होता है यह नहीं याद आ रहा.

    मेरा तो ख्याल है कि अगर मेरे लिखे की त्रुटियाँ ढ़ूँढने लगो तो तुम्हारा काम बहुत बढ़ जायेगा, पर लिखने का चस्का लग गया है बिना लिखे भी नहीं जाता.
    सस्नेह,
    सुनील

  10. […] ” मेरा चिट्ठा वाले आशीषभाई ने लम्बा-चौडा नहीं लिखा पर अपनी बात कहने के लिए थोङे शब्द ही बहुत होते हैं, देखिये “धर्म एक तरह का ज़हर है, लोगों के मन में अलगाव के बीज डालता है, इस दुनिया में आदमी पहले आया था न कि धर्म, और इसलिये अगर कोई धर्म जैसी चीज़ है तो वो है  इंसानियत न कि हिन्दू या मुसलमान या ईसाई।“ इस तरह आशीषजी भी मानवता (इंसानियत) को धर्म से परे और कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं.  नास्तिक हिन्दू रमणजी ने इधर-उधर कि नही बलकी बहुत ही लाजवाब और तर्क-संगत तरीके से धर्म पर बात की हैं,एक सशक्त लेख.  वे स्वीकारते हैं “मैं पूर्ण रूप से नास्तिक हूँ। पूर्ण रूप से, मतलब इस में किसी तरह की रियायत की गुंजाइश नहीं है। फिर भी स्वयं को हिन्दू कहने से मैं गुरेज़ नहीं करता।“ क्योंकि “हिन्दुत्व का अव्यवस्थित ग़ैरमज़हबीपन मुझे भाता है।“ ईश्वर के बारे में- “अगर हमें पक्का नहीं मालूम कि भगवान क्या है और क्या चाहता है, तो हम क्यों अपनी ऊर्जा एक असत्य या कदाचित् सत्य की तलाश में व्यर्थ करते हैं?” क्या धर्म ईश्वर को पाने के मार्ग हैं? “ईश्वर-रूपी सत्य” को पाने के अलग अलग रास्ते कैसे हुए? एक ही तथ्य का यदि सत्य रूप बताना हो तो उस का एक ही तरीका होता है” आस्तिकता और नास्तिकता पर उनके विचार भी जानिये-  “धर्म को मानने वाले कहते हैं कि यदि धर्म न हो तो लोगों को जीवन की राह कैसे मिलेगी, सत्य-असत्य, सुकर्म-कुकर्म का अन्तर कैसे समझ में आएगा? यदि यह तर्क मान्य होता तो संसार के सारे नास्तिक झूठे, कुकर्मी, और अपराधी होते। बल्कि है इस का उलट। लगभग सब उल्टे-सीधे काम करने वाले ईश्वर में आस्था रखते हैं।“ विज्ञान और धर्म पर-  “धर्म के कारण विज्ञान की बहुत अनदेखी होती है। बेचारे गैलिलियो को कितनी यातनाएँ सहनी पड़ीं, यह कहने के लिए कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। डार्विन को तो अभी भी मज़हबियों की गालियाँ पड़ती हैं।“ मेरे विचार से यह अंतहीन बहस तब तक चलती रहेगी जब तक पृथ्वी पर धर्म का अस्तित्व बना रहेगा. एक सच जरूर उभर कर आया हैं कि कोई भी धर्म मानवता का विकल्प तब तक नहीं बन सकता जब तक कि वह मानव-मानव के बीच दीवार बनता रहेगा. वैसे भी धर्म आस्था और श्रद्धा का मामला हैं तथा जहां श्रद्धा हैं वहां तर्क नहीं और जहां तर्क हैं वहां श्रद्धा नहीं. […]

  11. आशीष says:

    रमण भाई,

    ये लेख मैने थोडी देर से पढा ! अच्छा लगा ! मै आपसे पूरी तरह सहमत तो नही लेकिन आपकी यह पंक्ति मेरे लिये भी सही है

    हिन्दुत्व का यही अव्यवस्थित ग़ैरमज़हबीपन मुझे भाता है।

    यूनान, मिस्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से
    अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशां हमारा,
    कुछ बात है की हस्ती, मिटती नहीं हमारी
    सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा

    आशीष

  12. Upendra says:

    हिन्‍दुत्‍व अथवा हिन्‍दू धर्म
    हिन्‍दुत्‍व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको परम लक्ष्‍य मानकर व्‍यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसि‍क, एवं आध्‍यात्मिक उन्‍नति के अवसर प्रदान करता है।आज हम जिस संस्‍कृति को हिन्‍दू संस्‍कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्‍वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्‍त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं।
    अधिक

  13. रमण भाई,
    मै आपकी बात से पूर्ण्तया सहमत हूँ,जो बातें मै अक्सर शुएब के साथ बाँट लेता हूँ वह आपने अपने ब्लाग मे खुलकर लिख दी , मेरा मानना आरम्भ से ही यही रहा कि यह घिसा पिटा डायलाग , “मजहब नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना” एक निहायद वाहियाद है। प्रत्यक्ष रुप से भले ही कोई धर्म यह बात न सिखाता हो लेकिन एक धर्म के मानने वाले अक्सर कट्टरठी निकल जाते हैं।

  14. बहुत ही बेबाक राय, मगर सौ फी सदी सच्ची। मेरा धर्म मेरे दिल से निकली आवाज़ है। अहम् ब्रम्हास्मि।

  15. अरुण says:

    सही है भाई मै नास्तिक नही पर हिदू जन्मा दू तो मरुगा भी हिन्दू ही पर हू तुम्हारी तरह ही हू मै ,मुझे कोई नास्तिक कहे ये भी मंजूर नही किसी भी धर्म से मुझे कोई चीढ तब तक नही जब तक वो मुझे मेरा धर्म पढाने की कोशिश ना करे जो मुझे बढिया लगेगा मै उसको पूज लूगा नही लगेगा तो गालिया भी नही दूगा पर अपनाउगा नही यही हिन्दु धर्म है अपनी तरह जियो किसी को हक नही कि तुम्हे यहा से बाहर कर दे पर मेरे धर्म मे कितनी बुराई हो मै तुम्हे हक नही देता कि तुम मेरे धर्म को बिना नागा गालिया दो

  16. Praveen says:

    इतिहास हमेशा युध जीतने वाले के पक्ष मे लिखा जाता है| महभारत मे पाडवों ने कोरवों से ज्यादा गलत काम किये है पर युध पाडवों ने जीता था इसलिये इतिहास उनके पक्ष मे लिखा गया|क्य आप महभारत, रामायन वेदों उप्निष्दों में हुए गलत कार्यों के बारे में बताने का कष्ट करेगे|
    please

  17. ranjit giri says:

    you are rong u don” know hindu and hindu religion

  18. praveen says:

    To Mr. Ranjit,

    Do you know about Hindu religion?
    I spend more then 1 year to know about Hindu.
    if you have spend more then this time only in search of god then talk to me other wise you r not supposed to write only one line that he is wrong

    Thanks
    Praveen

  19. आज नास्तिक तलाशते हुए यहाँ पहुंचा हूँ। बहुत सुंदर आलेख है इसे दुबारा प्रकाशित होना चाहिए।

  20. sanjay manav says:

    world Human Organization New Light True Pledger Philosophic Country-India

    http://www.satyayugkaaagman.blogspot.com

  21. Manish says:

    जानकर अच्छा लगा कि दुनिया में कुछ खुद की तरह विचार रखने वाले इनसान भी हैं।
    ऐसे आपको कब एहसास हुआ कि ईश्वर जैसी कोई चीज़ असलियत मे नहीं हैं?

  22. Manish says:

    मुझे पता है कि मैं नास्तिक हूँ, पर कभी-कभी लगता है कि मैं ऐसा कहकर खुद को स्वार्थी साबित करता हूँ।

  23. अच्छा लगा। विचार संतुलित हैं।

  24. वाकई मेरे नजरिये से मिलती-जुलती बात लिखी है आपने। आगे बढ़िए मैं आपके साथ हूँ।

  25. Mera mat hai ki jo aap ke vichar hai ki iswar nahi hai yah bhi galat ho sakata hai . yah bhi bahut tark sangt hai kyo ki har chij ki ek sambhavna hoti hai is liye isvar ke hone ki bhi ek sambhavna hai.kyo ki isvar nahi hai science abi tak ise shiddh nahi kar paya hai.tab aap kaise kah sakate hai ki mai purn roop nastik hoo isme koi riyaayat nahi hai .aap purn roop se nastik nahi hai kyoki aap khood bhi maante hai ki mai galat ho sakata hoo

  26. Charles darvin ne krmik vikash ke bare me bataya tha ush hishab se yah bhi ho sakta hai ki manav se pahle kishi isvar ka karmik vikash huva ho aur usane jivo ke karamik vikash ki prtikriya jari rakhi hogi aisa manne vala bhi purn roop se nastik nahi ho sakataa

  27. Pradeep says:

    kya ap purn nastik ho is par apne kbhi vichar kiya hi nahi ap k vichar vastvikta me srahniy hai jra sochiye ap 500 fit uperr se gir gye or ap jinda bachate ho to kya sochenge : shayad ye ki kismat acchi thi lekin kismat b to ishvar me vishvas hi to hai hva pani ye man liya jye ki accident ser bne he lekin urja k bare me ap kya khenge me uske bare me kya khu uski paribhasha hi ye hai “apribhashit ”
    vho hii gurutvakarshan hai vahi khhta hai tbi pal ghat ta hai haa ye dharm shi hai ya galat ye me nahi kh skta us pr vishvash krne lg jao vo sukh or dukh dono me sath deta hai

    • admin says:

      प्रदीप, जी नहीं यदि मैं 500 फुट से नीचे गिर कर बचा तो मैं यह नहीं कहूँगा कि किस्मत अच्छी थी; न ही यह कहूँगा कि मुझे ईश्वर ने बचाया। मैं probability और chance को मानता हूँ, किस्मत को नहीं। एक त्सुनामी आने पर हज़ारों बचते हैं, और हज़ारों मर जाते हैं। हर हादसे में भी ऐसा ही होता है। यह चान्स की बात है, ईश्वर की नहीं। बाकी विश्व की कई चीज़ों को मैं अभी तक नहीं समझ पाया हूँ, पर उनमें से किसी का उत्तर ईश्वर नहीं है। यह कहना काफी है कि मुझे नहीं मालूम। इतना समझना आसान है कि ईश्वर जैसे कोई चीज़ नहीं है। उससे आगे तलाश जारी है। (आपकी लिखी हिंदी पढ़ने में मुश्किल लग रही है। देवनागरी में लिखने का प्रयत्न करें।)

  28. Rupesh Verma says:

    Isse jyada sundar lekh mene kabi nai padha.. .
    me 200% atheist hu…. aur religion god ek bhadda mazak se jyada kuch nai…. jo aadikal vaale kar gaye…. aur bhugat puri duniya rahi hai….. humanity se bada religion koi nai…. mujhe khusi hogi yadi facebook pe aap sab se jud saku…. mail kar de apni facebook id rupeshvermah@gmail.com
    vakt mile to ye jarur padhe..
    http://www.marxists.org/hindi/.....n-hoon.htm

  29. Rupesh Verma says:

    mere vichar me nastik wo hote hai jo jaan jate hai ki ” mai ,mai kyu hu” aur astik jinki budhdhi itne tez hi nai hoti ki o samjh sake ki Wo akhir wo kyu hai aur yahi unhe bhagwan pe visvas ho jata hai ki Wo ,wo isliye hai kyuki bhagwan ne unhe banaya….
    sach to ye hai ki duniya bahot complex hai . sadharan manav ke liye samjhna asaan nai hai ki duniya itni complex bina banaye ho hi nai sakti….. dekhne k liye ankhe ,rahne ke liye earth, sun, water, kam krne k liye ankh….. ye kyo hai…. kyu? kyuki bhagwan na banaya…. ye apne aap to ban hi nai sakti…. lekin ye sach nai …. earth par jivan sirf ek sanyog hai…. sadharan taur par soche to itna jabardast sanyog to ho hi nai sakta…. lekin bramhand ke level par soche to ye aap bat hai …..
    jindagi khud apna rasta banati hai koi mazhabi religion nai banati…….
    sharm ati h jab log mujhe hindu ya khud ko muslim kehte hai……
    Insan hu insaniyat mera dharm hai….
    pura bramhand mera ghar hai…. wo chutiya nai hu jo jamin par lakir khinch kar Ladta hai….. wo nai hu jo dharm ke liye ladta hai……

  30. Akaula says:

    It is obvious to me that the author does not understand different between the Astika and a theist. The two terms/categories are so disparate and different as a these could be.
    First of all Astika comes from Asti, that is an affirmation of existence. Within VedAs Astika is used for those who believe that there dis a fundamental existence, that may or my not be visible. Those who affirm this principle are Astikas. The nAstika on the other hand implies that there is no such existence. So when this author claims that he is nAstika, he is saying that he does not believe that there dis this fundament existent, instead he believes that there is no such fundamental existence. The fact he wrote this article about his belief, tells us that the author believes that he exists fundamental, hence contradicting his stand.
    Theist on the other hand implies one who is a believer in a God, who is self aware hence can sit in judgment over his creation that he creates, but does not partake of it. That is is materially different from it. This aspect is stated in terms of a God who is instrumental cause but not a material cause. The belief in such a creator is called atheist. The one who doe snot believe in such an entity is atheist.

    For example Advaitins are Askas, but they are not theists. In fact within Dharma tradition the prakruti that is ever existing, is the source of of all that you see as it transforms in these things. It is Prakruti (calle d Maya) that is dynamic. The Brahman in Advaita is just a Saxshi. So where does the theism and atheism arise fro.

    So this write up is the out come of the ignorance of our author. I hope, next time he write he checks the meaning of the terms he agrees opr disagrees with. And before attribution it to Dharma, should also understand what Dharma implies. Dharma does not imply religion. Dhaarnat iti Dharma:. Dharmo Raxshati raxshata:, Hato Dharma, hanti eva. One can not make these statements about religion!

  31. arun negi says:

    Main bhi ghor nastik hun.aur apka lekh acha laga

  32. Veeru says:

    बहूत अच्छा लिखा ह,मुहजे लगता ह कि भगवान व् धर्म की उत्तपत्ति की थी मानव को एक साथ मिलकर रहने के लिए सुख दुःख में एक दूसरे का साथ देने के लिए लेकिन कुछ ही % लोगो ने इस व्यवस्था का कितना फायदा होता ह ये खोज निकाला और उन लोगो को जो मजा इसमे आया वो कहीँ नही मिलसकता इस लिए इसको कम्पलसरी कर दिया और सभी को आस्था के साथ जोड़ दिया।

  33. मनोज मलिक says:

    पूर्णतः सहमत.।नास्तिकता पर इससे जबरदस्त लेख सिर्फ भगत सिंह का लेख ही हो सकता है.आपकी सोच से मुझ जैसे संघी(RSS) को काफी सहारा मिला।धन्यवाद

  34. Harjot singh says:

    Nicely written… Everything true..
    Who love this please also read an article by Bhagat Singh -“why i am an athiest”.
    We all can become true human beings..

  35. Rounak says:

    AKULA. ,,,भाई ज्यादा दिमाग लगा लिया आपने,,, आस्तिक को ही आँग्लभाषा में theist कहते हैं,,,,
    और लेख की जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है,,,,

  36. अभिलाष पांडेय says:

    मै आपके हर एक वाक्य हर एक शब्द से सहमत हु
    भगवान् को मानने वाले उलटे सीधे तर्क देते है

  37. अनिल says:

    लेख अच्छा लगा । मै हिन्दू हूँ क्योकि मुझे इन्ही रीति रिवाजो में जन्म से पला बड़ा हुआ हूँ मै कुछ वर्षो से नास्तिक विचारधारा से जुड़ा हूँ और जो भी व्यक्ति तार्किक होता है वो वास्तव में नास्तिक होना चाहिए ।

  38. chandrajeet yadav says:

    Achchha laga ye jaan kar ki hamari vichar dhara me vridhi ho rahi hai

  39. anup lakra says:

    my v hu maha nastik my ap logo se dosti krna chahta hu bahut acha lekh h apka

  40. कुन्दन says:

    आपके लेख ने मन मोह लिया मुझे भी बार -बार ऐसा लग रहा था ।

  41. कुन्दन says:

    जैसे मेरे ही विचारों को किसी ने लेख का रूप दे दिया हो। पर इतनी अच्छी तरह से में नहीं लिख सकता !

  42. ASTIK KUMAR says:

    मेरे विचार भी विल्कुल आप जैसे हैं। और मेरा नाम आस्तिक है

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