एक नास्तिक हिन्दू

(Update: यह लेख 14 अप्रैल 2006 को अनुगूंज शृंखला के अन्तर्गत लिखा गया था। इस शृंखला में सभी चिट्ठाकार एक ही विषय पर लेख लिखते थे। इस लेख में दी गई कई कड़ियाँ अब काम नहीं कर रही हैं।)

बहुत ही टेढ़ा विषय दिया है संजय ने – मेरे जीवन में धर्म का महत्व। जितना इस विषय पर विवाद होने का डर रहता है, उतना शायद ही किसी और विषय पर रहता हो। अभी तक इसीलिए इस तरह के विषय हिन्दी चिट्ठाजगत में नहीं उठाए जा रहे थे। पर यह प्रसन्नता की ही बात है कि अब हिन्दी चिट्ठाजगत भी वयस्क हो रहा है, और हर तरह के मुद्दे उठाए जा रहे हैं और ज़िम्मेदारी के साथ उन पर बात होती है।

Akshargram Anugunjतो फिर शुरू करता हूँ धर्म के विषय में अपने विचारों से। क्या धर्म और ईश्वर में आस्था का परस्पर कोई सम्बन्ध है? मैं नहीं मानता। कम से कम हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में तो मैं नहीं मानता। मैं पूर्ण रूप से नास्तिक हूँ। पूर्ण रूप से, मतलब इस में किसी तरह की रियायत की गुंजाइश नहीं है। फिर भी स्वयं को हिन्दू कहने से मैं गुरेज़ नहीं करता। इस विरोधाभास को मैं आगे समझाने का प्रयत्न करूँगा।

हाँ, तो मैं यह नहीं मानता कि ईश्वर जैसी कोई चीज़ है। मैं यह भी नहीं मानता कि सभी धर्म अच्छी चीज़ें सिखाते हैं, या यह कि ये सब “ईश्वर-रूपी सत्य” को पाने के अलग अलग रास्ते हैं। मैं यह भी नहीं मानता कि ज़िन्दगी में सही आचरण के लिए धर्म की आवश्यकता है। यह भी नहीं कि मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। हो सकता है कि यह बातें कहने के लिए मुझे तनखाइया करार दिया जाए, और मेरा हुक्का पानी बन्द किया जाए, पर जब शुऐब ने पर्दा उठा ही दिया है, और रवि कामदार ने भी अपना काम कर दिया है, और जब संजय ने क्लॉज़ेट से बाहर निकलने का न्यौता दे ही दिया है तो फिर चुप रहने से क्या लाभ? इसलिए अपनी विचारधारा के इस पहलू को थोड़ा और विस्तार देने की कोशिश करूँगा।

ईश्वर क्यों नहीं है, यह साबित करने की ज़रूरत नहीं है। यह साबित करने की ज़रूरत है कि ईश्वर क्यों है। और ऐसा कोई सबूत अभी तक मुझे नहीं दिखा है। और शायद किसी ने कोशिश भी नहीं की है साबित करने की। आस्तिक लोग यह कहते हैं कि यह तो अपनी आस्था की बात है — इसे प्रमाणित करने की आवश्कता नहीं है। ठीक है, फिर सब की अलग अलग आस्था है, पर सत्य तो एक ही होता है न? यदि यह मान लिया जाए कि इन सब में से ही एक सत्य है, तो बाकी सब तो झूठे हुए न? फिर ये सब “ईश्वर-रूपी सत्य” को पाने के अलग अलग रास्ते कैसे हुए? एक ही तथ्य का यदि सत्य रूप बताना हो तो उस का एक ही तरीका होता है, पर उसी तथ्य का यदि असत्य रूप बताना हो तो उस के सैंकड़ों तरीके हो सकते हैं। यदि मैं आप से पूछता हूँ कि यह जो वाक्य आप पढ़ रहे हैं उस के फाँट का रंग कैसा है। पहले सच बताइए, फिर झूठ। सच बताएँगे तो सब का उत्तर होगा काला, पर झूठ बोलेंगे तो सब का जवाब अलग अलग होगा — लाल, पीला, हरा, नारंगी, इत्यादि। इसी तरह तथाकथित ईश्वर के बारे में हज़ारों धारणाओं के होने का अर्थ है कि वे सब असत्य हैं। हो सकता है कि मेरा सोचना भी ग़लत हो, पर वह भी इन हज़ारों झूठों में से एक झूठ होगा। सच क्या है, यह तो किसी को भी पता नहीं। यदि यह भी मान लिया जाए कि किसी तरह की कोई वाह्य महाशक्ति है, तब भी यह तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि यह (भूत या वर्तमान के) किसी मानव को नहीं मालूम कि वह “महाशक्ति” क्या चाहती है, या कैसे काम करती है। क्या वह वाह्य महाशक्ति हम से अपनी पूजा करवाना चाहती है? क्या वह अच्छा काम करने वाले को इनाम देती है? क्या वह बुरा काम करने वाले को सज़ा देती है? क्या वह मदीना, हरिद्वार, ननकाना साहिब या वैटिकन जाने वाले को किसी तरह का इन्सेन्टिव देती है? इन और ऐसे हज़ारों और सवालों का जवाब है, “नहीं!” और सबूत हम सब अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में देखते हैं। और अगर हमें पक्का नहीं मालूम कि भगवान क्या है और क्या चाहता है, तो हम क्यों अपनी ऊर्जा एक असत्य या कदाचित् सत्य की तलाश में व्यर्थ करते हैं?

आप कहेंगे, ठीक है भगवान है या नहीं है, यदि इस से मन में शान्ति मिलती है तो बुरा क्या है? मैं आप से सहमत हूँ। यदि आस्था उसी स्तर पर रहे — व्यक्तिगत स्तर पर शान्ति प्राप्त करने का यन्त्र, स्वार्थपूर्ण ही सही — तो ठीक है। पर इस आस्था के विभिन्न रूपों ने दुनिया में फायदा कम और नुक्सान ज़्यादा किया है। नास्तिकता का कोई नुक्सान ध्यान में नहीं आ रहा, पर आस्तिकता के मैं हज़ारों नुक्सान गिना सकता हूँ। कुछ पर नज़र डाली जाए

  • संसार में जितने फसादात चल रहे हैं, आज और हज़ारों सालों से, उन की जड़ यही है — खुदा, भगवान, गॉड। तीन दिन पहले ईराक में किसी सुन्नी ने एक शिया मस्जिद में ख़ुद को उड़ा दिया और साथ में ७० और लोगों के परखचे उड़ा दिए — यह अमरीका के खिलाफ लड़ाई तो नहीं थी। रोज़ ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं। इतिहास का कोई पन्ना और भूगोल का कोई भाग इस बीमारी से बचा नहीं है।
  • हाल में मैं ने १७वीं शताब्दी फ्राँस के भौतिक विज्ञानी पास्कल का कथन पढ़ा,

    Men never do evil so completely and cheerfully as when they do it from a religious conviction.

    और यह बात मुझे बिल्कुल सही लगी। जब आदमी बुरा काम यह सोच कर करता है कि यह धर्म का काम है, खुदा का काम है, तो वह खुशी से भी करता है, और बिना किसी अपराध बोध के भी। चाहे वह वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में जहाज़ घुसाना हो या ग्राहम स्टेन्ज़ का कत्ल। कोई चोर-डाकू जब बैंक लूट रहा हो तो उसे कम से कम यह तो ख्याल होता है कि मैं ग़लत काम कर रहा हूँ। सीऍनऍन का कल जारी यह विडियो देखिए, जिस में संवाददाता बता रही है कि ९-११ की एक फ्लाइट में किस प्रकार आतंकवादी अल्लाह का नाम ले ले कर अपना काम पूरा कर रहे थे (Update: यह वीडियो अब उपलब्ध नहीं है, इस कारण अब इससे जुड़े लेख की कड़ी दे दी है)। और आज की रिपोर्ट पढ़िए, कि ज़कारियास मुसावी कैसे यह सब सुन कर खुश हो रहा है। न, न, यह मत कहिए कि मज़हब यह सब नहीं सिखाता। मज़हब यही सब सिखाता है, मुसावी कुरानेशरीफ़ में से उद्धरण दे कर अपना बयान दे रहा था। यदि ऐसा नहीं है तो कार्टूनिस्टों के खिलाफ़ फतवा जारी करने वाले लोग मुसावी के खिलाफ़ फतवा क्यों नहीं जारी करते? उसे पूरा यकीन है कि उसे जन्नत में जगह मिलेगी, और ७२ हूरें भी।

  • संसार में कितना धन, समय और ऊर्जा धार्मिक कामों और इमारतों पर खर्च होते हैं? यही संसाधन यदि किसी और तरीके से प्रयोग किए जाते तो संसार में कितना सकारात्मक परिवर्तन आता, इस का हिसाब लगाना कठिन है।
  • धार्मिक पुस्तक यदि एक ग़लत बात सिखाए तो मेरे हिसाब से वह बेकार है, पर यहाँ तो धार्मिक पुस्तकें इतनी उल्टी सीधी बातें सिखाती हैं कि समझ में नहीं आता हज़ारों साल तक करोड़ों लोग कैसे बेवक़ूफ़ बने रहते हैं। अब आप ही बताइए, हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह धोबी के कहने पर पत्नी को त्यागें, या उन के पिता की तरह तीन पत्नियाँ रखें। सत्यमूर्ति युधिष्ठिर की तरह पत्नी समेत सब कुछ जुए में हारें, या भगवान शंकर की तरह अपने बेटे का ही सिर काट दें। ईसा का सन्देश फैलाने के लिए क्रुसेड करें, या मुहम्मद का पैग़ाम पहुँचाने के लिए जिहाद।
  • मैं कितने ही लोगों को जानता हूँ जिन्होंने ईश्वरोपासना को अपने जीवन का उद्देश्य मानकर उन कार्यों, उन लोगों की उपेक्षा की, जिन की उन के ऊपर ज़िम्मेवारी थी। यदि कोई भगवान बुद्ध की तरह बीवी बच्चों को सोता छोड़ कर निर्वाण की खोज में निकल पड़े तो उसे आप क्या कहेंगे? मैं तो उसे ग़ैर-ज़िम्मेदार और खुदगर्ज़ कहूँगा, खासकर यदि वह गौतम की तरह धनी राजकुमार न हो। कितने ही लोग हैं जो गृहस्थ में तो रहते हैं, पर धर्म के ढ़ोंग में इतने विलीन रहते हैं, कि आसपास के मानवों की भावनाओं की अनदेखी करते हैं।
  • धर्म का वास्ता दे कर कई लोग ऐसे निश्चय नहीं ले पाते जो अन्यथा नैतिक या व्यावहारिक रूप से सही हों। कुछ लोगों को रक्तदान से परहेज़ होता है, और कुछ लोगों को नसबन्दी से। उदाहरण के तौर पर मैंने अपने ड्राइविंग लाइसेंस पर लिखवा रखा है कि मेरे मरने पर मेरे शरीर का कोई भी भाग या पूरा शरीर किसी को दान दिया जाए या विज्ञान के लिए प्रयोग हो। यह कोई बड़ा काम नहीं है, क्योंकि जो चीज़ मेरे काम की नहीं है, मुझे क्या फ़र्क पड़ता है उस के साथ क्या हो — वरना मूल रूप से तो मैं भी स्वार्थ का ही पुजारी हूँ। परन्तु यदि मैं धार्मिक प्रवृत्ति का होता तो यह सोचता कि मेरा शरीर जलाया ही जाए और अस्थियाँ गंगा के प्रदूषण के लिए प्रयोग की जाएँ।
  • धर्म के कारण विज्ञान की बहुत अनदेखी होती है। बेचारे गैलिलियो को कितनी यातनाएँ सहनी पड़ीं, यह कहने के लिए कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। डार्विन को तो अभी भी मज़हबियों की गालियाँ पड़ती हैं।
  • धर्म के कारण लोग देश द्रोह के लिए भी उतारू हो जाते हैं। अब कितना कहूँ, बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी।

खैर, इस लिस्ट का तो कोई अन्त नहीं है। धर्म को मानने वाले कहते हैं कि यदि धर्म न हो तो लोगों को जीवन की राह कैसे मिलेगी, सत्य-असत्य, सुकर्म-कुकर्म का अन्तर कैसे समझ में आएगा? यदि यह तर्क मान्य होता तो संसार के सारे नास्तिक झूठे, कुकर्मी, और अपराधी होते। बल्कि है इस का उलट। लगभग सब उल्टे-सीधे काम करने वाले ईश्वर में आस्था रखते हैं। नास्तिक विचारधारा एक सोच-समझ कर चुनी हुई विचारधारा होती है; एक नास्तिक को न तो यह डर होता है कि बुरा काम करने पर भगवान सज़ा देगा, न यह सांत्वना कि प्रसाद चढ़ाने पर माफ कर देगा। हो गया बराबर। फिर कैसे चलाएँ काम? वैसे ही जैसे भले लोग हमेशा चलाते रहे हैं — देश-काल के कानून से और समाज के नियमों से, जो समय और स्थान के हिसाब से बने होते हैं, और बदलते रहते हैं।

फिर यह दूसरे पैरे में स्वयं को हिन्दू कहने की क्या बात लिखी है? बताता हूँ। अगर उस के बाद आप मुझे पाखंडी कहें तो भी कोई बात नहीं। देखो भई, मैं नहीं मानता कि हिन्दुत्व एक मज़हब की परिभाषा पर खरा उतरता है। सब धर्मों की तरह हिन्दुत्व में भी बुराइयाँ तो हैं, पर हमें जो अच्छा लगता है, उसे अपनाएँ, जो बुरा लगता है, उसे ठुकराएँ। कोई ज़रूरी नहीं है कि मैं राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानूँ। मैं करोड़ों देवी देवताओं की पूजा करूँ, एक ईश्वर को मानूँ, या एक को भी न मानूँ, मुझे कोई यह नहीं कह सकता कि तुम हिन्दू नहीं रहे। न मुझे नास्तिक होते हुए भी शुऐब की तरह यह लिखने की ज़रूरत है कि मैं मुसलमान क्यों नहीं। मैं यह मानता हूँ कि धर्म मानव ने शुरू किए अपने अपने समय और स्थान के उपलब्ध ज्ञान के अनुसार। जब उसी धर्म को हज़ारों साल बाद, हज़ारों मील दूर रह रहे लोगों पर बिना बदले लागू करने की कोशिश हो, तब गड़बड़ होती है — वही मज़हब हो जाता है। मैं अपने परिवार की खुशी के लिए पूजा-पाठ में भी भाग ले लेता हूँ, और होली-दीवाली में जो आनन्द मिलता है, उसे तो भोगता ही हूँ — पर किसी भी तरह के अन्धविश्वास से दूर रहता हूँ। भारत में हिन्दू कहीं से भी आए हों, पर हिन्दुत्व पनपा तो भारत में ही है। मुझे लगता है कि हमारे त्यौहार भी कुछ सामाजिक, आर्थिक, व्यावहारिक कारणों से बने, और धीरे धीरे देवी देवताओं के साथ जोड़े गए। इन का हमारी ऋतुओं, फसलों की कटाई-बुवाई, व्यापारिक लेखे जोखे के साथ गहरा नाता है। फिर, इस में समय, स्थान के अनुरूप परिवर्तन होते रहे हैं। बंगाल में जो त्यौहार और रस्मोरिवाज हैं वे राजस्थान में नहीं, और कश्मीर में जो हैं, वे केरल में नहीं। आज से सौ साल पहले जो रस्मोरिवाज थे, वे आज नहीं हैं। हिन्दुत्व का यही अव्यवस्थित ग़ैरमज़हबीपन मुझे भाता है। ऐसा नहीं है कि हम में बुराइयाँ नहीं हैं, पर हम ने न बदलने की भी नहीं ठानी है।

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गूगल कैलेंडर

आ गया, आ गया, जिस का इन्तज़ार था। याहू में काफी पहले से कैलेंडर था, बाद में MSN ने भी जोड़ दिया था। पर जब से हम ने याहू और MSN में खोजना बन्द कर दिया था, और माइ-याहू और माइ-MSN पर नियमित रूप से जाना छोड़ दिया था तब से गूगल में कैलेंडर की कमी बड़ी खल रही थी। मालूम था कि जब आ जाएगा तो छा जाएगा, और आज पहले दिन थोड़ा सा प्रयोग करने पर लगता है कि मेरी इन उम्मीदों पर खरा उतरेगा। इस में एक Quick add फीचर है। मैं शनिवार को नए घर में जा रहा हूँ, इसलिए सोचा मुहूर्त इसी के साथ किया जाए। Quick add में मैं ने लिखा “pooja at sat 8:30am” और अपने आप सही जगह पर कैलेंडर एँट्री हो गई। बाद में जो बदलना है, बदलते रहिए — बहुत ही आसान है। नीचे फोटो देखिए (यहाँ फिट करने के लिए विंडो बहुत छोटी करनी पड़ी)। मेरा नया होस्टेड ईमेल मेरा लॉग-इन दिखा रहा है। आप भी हाथ आज़मा कर देखें।

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