अभी तक हिन्दी ब्लॉगजगत में हम लोग कोशिश करते रहे हैं कि विवादास्पद विषयों से दूर रहें। पर जैसे जैसे ब्लॉगरों की संख्या बढ़ रही है, विषयों का क्षितिज भी बढ़ रहा है। ऐसे में शुऐब ने अपनी मज़हब से बेज़ारगी ज़ाहिर कर के काफ़ी साहस का परिचय दिया। उन्होंने यह भी बताया कि अपने उर्दू ब्लॉग पर उन्हें काफ़ी बुरा भला सुनना पड़ा है, इसलिए मैं उन का उर्दू ब्लॉग पढ़ने लगा और वहाँ की गई टिप्पणियाँ। कड़ी से कड़ी मिली और टिप्पणी-लेखकों के भी चिट्ठे देखे। वहाँ एक नई ही दुनिया देखी, जिस का एक छोटा सा नमूना यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

कार्टून विवाद के विषय पर शुऐब की एक प्रविष्टि जज़बात से छेड़छाड़ से नाराज़ हो कर परदेसी भाई ने एक प्रविष्टि लिखी है, शुऐब का ब्लॉग और उस के नज़रियात। इस तरह की प्रविष्टि के लिए उन्होंने एक अलग श्रेणी बनाई है, “कैसे मुसलमान”। परदेसी लिखते हैं

मोहतरम दोस्तो, अभी अभी अपने एडिटर पर मैं ने शुऐब की तरफ़ से की गई एक पुरानी ख़बर का हवाला, जो कि हुज़ूर सुल्ल अलहि वआलिहि वसल्लम की शान में इन्तहाई गुस्ताख़ी में शामिल है, को तहरीर होते देखा है, जो कि शुऐब ने जान बूझ कर तहरीर किया है। शुऐब के इस्लाम के मुतअलिक़ ख़यालात और इफ़कार इन्तहाई गुस्ताख़ाना हैं। उस के ब्लॉग पर जा-ब-जा इस का सबूत मौजूद है। मैं अपने तमाम मोहतरम दोस्तों से यह गुज़ारिश करता हूँ कि शुऐब को उर्दू की महफ़िल से निकाल दिया जाए और इस की उर्दू सयारा पर तहरीरों को आने से रोक दिया जाए।

शुऐब की उस प्रविष्टि और उस पर की गई टिप्पणियों से लगता है कि शायद उन्होंने उस प्रविष्टि में कार्टूनों की ख़बर देते हुए कार्टून भी छाप दिए थे और बाद में हटा दिए थे। ऐसे तनाव भरे माहौल में यह शायद अक्ल का काम न रहा हो। पर यह तब की बात है जब बाकी दुनिया शायद कार्टूनों के बारे में जानती भी नहीं थी। खैर, जबकि बाकी टिप्पणीकारों ने भी शुऐब के खिलाफ़ लिखा है, दानियाल ने उन का साथ दिया है। वे परदेसी के फतवे का जवाब यूँ देते हैं

मैं आप की तहरीर से बिल्कुल इत्तफ़ाक़ नहीं करता। पहली बात तो यह है कि शुऐब ने अपनी पोस्ट में कोई गुस्ताख़ी नहीं की, बल्कि एक ख़बर सुनाई है। दूसरी बात उर्दू प्लैनेट और उर्दू सयारा पर इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान का कानून नाफ़िज़ नहीं होता। आप को ऐसी फ़रमाइश करते हुए मोहतात रहना चाहिए क्योंकि उर्दू वेब अभी नया है, और हम शुरू में ही ऐसे लोग नहीं देखना चाहेंगे जो आज़ादी-ए-इज़हार पर क़दग़न लगाने की बातें करते हों। अगर आप को अपने नेक ख़यालात के इज़हार करने की इजाज़त है तो शुऐब को भी अपने इफ़क़ारो-ख़यालात के इज़हार की पूरी आज़ादी है। मुझे अफ़सोस है कि मैंने आप की यह शर्मनाक पोस्ट पढ़ी और उस से भी ज़्यादा अफ़सोस इस बात पर है कि मुझे इस पोस्ट पर कमेंट भी करना पड़ा।

ग्रीन ब्रिगेड के एक और सदस्य हैं उर्दूदाँ, हाल में लिखी उन की एक प्रविष्टि है अहानते-रसूल। वे लिखते हैं

अहानत के पसपर्दा कारफ़र्मा ज़ेहनियत [अपमान के पीछे छिपी मानसिकता]
हज़रत इब्राहिम की दो औलादों में से हज़रत इसमाइल जिन की वालिदा बीबी हाजिरा थीं, इसी सिलसिले से हज़रत मुहम्मद सलअम [?] हैं। लेकिन हज़रात मूसा व ईसा का हज़रत इसाक़ के सिलसिले से था जिन की वालिदा सारा हैं। यही एक वजह नज़र आती है कि यहूद व नसरा [?] में इत्तफ़ाक़ (यहूदियों के हाथों हज़रत ईसा के क़त्ल के बावजूद) पाया जाता है। लिहाज़ा यह उन के भेदभाव की एक जीती जागती मिसाल है। अगला पैग़म्बर उन्हीं की “आला” (कमज़र्फ़) नस्ल से आना था, जो उन की सिर्फ़ ख़ाम ख़याली ही नहीं है, बल्कि यह उन की इजारादाराना [monopolistic] ज़ेहनियत की निशानदेही करता है।

ईसाइयों ने हमेशा अपनी गन्दी ज़ेहनियत का मुज़ाहिरा किया है
* जब रश्दी ने अपने हरामज़ादा होने का सबूत पेश किया तो वह उन की आँखों का तारा बन गया। चे मानी दारद? किस ग़लती का बदला लिया गया था? मुसलमानों ने क्या किया था उन के “ख़ुदाज़ाद ख़ुदा” की शान में? और किस मुसलमान को हम ने उन के इस ख़ुदा की ख़ुदाई पर उंगली उठाने पर दाद दी थी?
* रूस पर कभी जम्हूरियत की ख़ातिर चढ़ाई नहीं की गई। वाह क्या भाईचारगी है! जम्हूरियत ईसाइयत के सामने दुम दबा कर रह गई।

और दोग़लेपन ने तो लाजवाब कर दिया
सवाल यह उठ रहा है कि “निस्फ़ फ़ी हज़ार” एहतिजाजी मुज़ाहिरीन मुश्तअल क्यों हुए [0.05% प्रदर्शनकर्त्ता हिंसक क्यों हुए]?

हालाँकि सवाल यह होने चाहिएँ कि
कार्टून क्यों बने?
क्यों छापे गए? (गलती का इमकान नहीं , बुश के आगे ग़लती से सही लफ़्ज़ “दहशतगर्द” क्यों नहीं लग जाता!)
फ़ौरन माफ़ी क्यों नहीं माँगी गई? (मक़सद तमाशा बनाना था, और यह भी देखना था कि बेदाम ग़ुलामात कैसी हिमायत करते हैं)
अगर माफ़ी नहीं तो सज़ा क्यों नहीं दी गई? (सोची समझी साज़िश थी, ईसाई हरामज़ादों की जो बड़े चिकने बने फिरते हैं, अपने ग़ुलामों में।)
अगर सज़ा नहीं तो पश्तपनाही का मतलब साफ़ है।

और तो और
यह कहा गया कि “हम ने तो अपने पैग़म्बर के ऐसे कितने ही ख़ाके बरदाश्त किए हैं”
* बनाने और बरदाश्त करने वाले भी तुम। हम तो कभी ऐसी ओछी हरकत की न करवाई।
* तुम तो अपने गिरजाओं में बुतपरस्ती करते हो, हम नहीं करते।
* तुम अगर कुत्ते को अपना बाप बनाते हो तो उस का यह मतलब नहीं हो जाता कि तुम मेरे बाप को कुत्ता कहो।

सच है, जिस तरह मशरिक वाले सिर्फ़ जूते की ज़बान समझते हैं और जो अब्बा सलाम करते हैं, उसी तरह मग़रिब वाले सिर्फ़ पैसे की।

अन्त में शुऐब की एक प्रविष्टि दावते-इफ़्तार और समन्दर का छोटा सा अंश। इस पर भी काफ़ी नाराज़गी ज़ाहिर हुई है।

आज बरोज़ मंगल यहाँ रमज़ान का पहला दिन है, सुबह आफिस में दाखिल होते ही सब एक दूसरे को सवालिया नज़रों से देख रहे थे जैसे पूछ रहे हों, रोज़े में हो? अभी अपनी चेयर पर बैठे कंप्यूटर ऑन किया, एक हिन्दू साथी ने आकर मुबारकबाद दी, “Happy Ramadan”. इस के बाद सब एक दूसरे को रमज़ान की मुबारकबादियाँ देना शुरू कर दीं। तकरीबन आधा घंटा यूँ ही रमज़ान की टाइमिंग और अहकामात पर डिस्कस शुरू हो गया कि अचानक बॉस नमूदार हुआ तो सब ख़ामोशी से मामूल के कामोकाज में जुट गए। सुबह के ग्यारह बजते ही मेरे पेट में चूहे दौड़ना शुरू हो गए। ऑफिस में मौजूद दोनों किचन छान मारा, न चाय, न कोल्ड ड्रिंक्स। बाहर आया तो होटल रेस्टोरंट्स सब बन्द थे। पता नहीं आज क्यों इतनी भूख लग रही थी, जैसे दो दिन से कुछ खाया नहीं।

अब मैं टाइप करते करते थक गया हूँ। शुऐब की हिन्दी प्रविष्टि की टिप्पणियों में ज़िक्र हुआ था किसी ऐसे सॉफ्टवेयर की ज़रूरत का जो उर्दू से हिन्दी में लिप्यान्तरण कर सके। दरअसल ऐसे सॉफ्टवेयर का विकास चल रहा था, पर लगता है बीच रास्ते रुक गया। यह चर्चा देखें। रावत जी से संपर्क करने की कोशिश की पर सफल नहीं हुआ। किसी और को इस विषय में अधिक सूचना हो तो बताएँ।

5 Comments on उर्दू ब्लॉगजगत की एक बानगी

  1. क्या ही बढ़िया काम किया है आपने. बहुत-बहुत धन्यवाद! आगे भी उर्दू ब्लॉग जगत की जानकारी हम हिंदी पाठकों तक पहुँचाते रहें. बहुत आभारी रहूँगा.

  2. SHUAIB says:

    रमण जीः
    ये पाकिस्तानी ब्लॉगर भारत के खिलाफ बहुत ज़हर उगलते हैं हालंकि वो कुछ कर नहीं सकते, फिर भी मेरी खवाहिश है के भारती उनके उर्दू ब्लॉग भी पढें और मुं तोड जवाब दें। मुझे प्रोग्रामिंग नहीं आती, और हमारे भारत में हिन्दी ब्लॉगर्स में भी बहुत सारे ऐसे प्रोग्रामर्स हैं जो ये काम कर सकते हैं बस दिलचस्पी चाहिये।

    अभी परसों रात का एक किस्सा सुनें
    एक होटल में खाना खा रहा था वहां चार पाकिस्तानियों से मेरी बहस होगई, मुझ से पूछने लगे किया तुम मुसलिम हो? मैं ने कहा हां। फिर कहने लगे यार भारत में हिन्दू लोग तुम मुस्लमानों का जीना हराम कर दिया है और तुम हो के सिर्फ मार खाते नहीं थकते। मैं ने जवाब दिया तुम लोग अपने अखबारों में सिर्फ हिन्दुस्तान का फसाद पढते हो वहां का भाई चारा के बारे में नहीं जानते। अब मैं उन से उलझ गया सवाल पे सवाल मारेः हमारे भारत में हिन्दू-मुसलिम फसाद आम सी बात है मगर तुम बताऔ, तुमहारे मुल्क में भार से ज़ियादा फसाद होता है, तुम शिया की मसजिद में धमाका करते हो और वो सून्नी मुसलमानों की मसजिद में। वहां कोई हिन्दू तुमहें नहीं मारता तुम खुद आपस में एक-दूसरे के दुशमन हो। मैं ने अदाकारी करते होवे कहाः हमारे भारत में हिन्दू मुसलिम लडते है और मुझे बहुत शर्म आती है के तुम मुसलमान ही आपस में लड कर मर रहे हो। वहां अरब लोग आपस में लड कर मर रहे हैं, पाकिस्तान और अफघानिसतान में तम मुसलमान-मुसलमान एक दूसरे के लिये खून के पियासे। मेरा जवाब सुन कर चारों पाकिसतानी थनडे पड गऐ।

  3. धन्यवाद हिन्दी ब्लॉगर और शुऐब। शुऐब, आप उन को यह भी बता सकते हैं कि हमारे यहाँ दफ़्तर के बाबू और फ़ौज के अफ़्सर से लेकर तक मुख्य मन्त्री और राष्ट्रपति तक मुसलमान हैं और रहे हैं — यहाँ तक कि अंडरवर्ल्ड के डॉन भी। पाकिस्तान में तो अल्पसंख्कों को मतदान का भी पूरा अधिकार नहीं है। आप की जगह कोई साम्प्रदायिक मुसलमान होता तो यह भी कह सकता था कि फिक्र न करो हम उन्हें बराबर की टक्कर देते हैं।

  4. SHUAIB says:

    पहले तो शुक्रिया के मेरी पहली गडबड वाली टिप्पणि को संवार दिया। उर्दू ब्लॉगरों नें मुझ से ये भी पूछा के अगर उर्दू भाषा एक “बाज़ारी ज़ुबान” है तो फिर हिन्दू लोग इसे क्यों नहीं आपनाते और उर्दू के लिये क्यों कुछ नहीं करते? मैं ने ऐसा जवाब दिया के उन पूछने वालों की बोलती बंद होगई, अगर फुरसत मेले तो ज़रूर पढीयेगा। ये रहा इसका लिंकः http://shuaibday.blogspot.com/.....34555.html

  5. anunad says:

    रमण जी, इतने सूचनापरक कार्य के लिये बधाई | मैं ऐसे साफ्टवेयर की तलाश कर रहा हूँ जो उर्दू को देवनागरी में परिवर्तित कर सके या सीधे ही देवनागरी में दिखा सके | ऐसे साफ्टवेयर के अनुपलब्ध रहने की स्थिति में आपके इस तरह के पोस्ट अत्यन्त उपयोगी होंगे |

Leave a Reply