बेचारे शुऐब परेशान हैं। दुबई से भारत जा रहे हैं, और रिश्तेदारों की माँगें हैं — यह ले कर आओ वह ले कर आओ। शुऐब कहते हैं

चंद लोग दुबई को जन्नत समझते हैं कि यहां पैसों की बारिश होती है। यहां लोग मुम्बई कि तरह रात दिन पसीना बहाते हैं तब जाकर थोडे पैसे मिलते हैं। 

इस बात पर मुझे हाल में सुनी एक रेडियो रिपोर्ट याद आई, जो बुश की भारत यात्रा के अवसर पर यहाँ NPR पर आई थी। सन्दीप रॉय, जो सैन-फ्रैंसिस्को में पत्रकार हैं, को शायद पैसे की चिन्ता न हो — पर यह चिन्ता है कि भारत लेकर जाएँ तो क्या लेकर जाएँ। वहाँ सब कुछ तो मिलता है, और शायद यहाँ से बेहतर भी और सस्ता भी। सन्दीप की रिपोर्ट उन्हीं की ज़बानी सुनिए (सन्दीप रॉय की रिपोर्ट३:५८ मिनट), काफी रोचक है।

सन्दीप रॉय की रिपोर्ट NPR के ड्राइववे-मोमेंट्स में आई है। रेडियो सुनने का मौका आम तौर पर कार में ही मिलता है — दफ़्तर से घर या घर से दफ़्तर के सफ़र में। और जब आप कोई रोचक रिपोर्ट सुनते-सुनते घर (या दफ़्तर) पहुँच जाते हैं, ड्राइववे (या पार्किंग) में गाड़ी खड़ी करते हैं, और तब तक गाड़ी से निकलने का दिल नहीं करता जब तक रिपोर्ट ख़त्म न हो। इसे कहते हैं NPR की भाषा में ड्राइववे-मोमेंट।

अपने लिए तो दोनों समस्याएँ रहती हैं — शुऐब वाली भी और सन्दीप वाली भी। इस के इलावा, अब ऐसा लगता है कि भारत में हर किसी की नज़र बड़ी हो गई है। हज़ारों की चीज़ हो तो उस की कोई बिसात ही नहीं है। और जैसा सन्दीप रॉय ने अपनी रिपोर्ट में बताया, अब न परदेसी की पहले वाली कद्र है, न परदेस की चीज़ की। हम यहाँ एक डॉलर की जो कद्र करते हैं, वह मुझे नहीं लगता भारत में पचास के नोट की होती है। यहाँ न दुकानदार एक सेंट छोड़ता है न ग्राहक, जबकि भारत में सिक्कों की तो पूछ ही नही है।

क्या इस सब को भारत की (मध्यम वर्ग की) समृद्धि का ही सूचक माना जाए?

4 Comments on परदेस का तोहफा

  1. SHUAIB says:

    यहां दुबई में सब से ज़ियादा आबादी भारत वासियों की ही है। तेल, आटा, चप्पल जूते, कपडे वगेरा वगेरा सब चीज़ें यहां भारत से आते हैं फिर भी – – – – फिर भी वहां अपने घर वालों को इंपोर्टड चीज़े चाहिये भले वो भारत में बनी हों। आज यूरोप और मिडल-ऐस्ट की कम्पनियां अपना माल चैना और भारत में बनाते हैं मगर लेबल होता है पारिस, paris और italy का का 🙂

  2. अनुनाद says:

    रमण जी “इम्पोर्टेड्” वस्तुओं के प्रति भारतीयों के सोच में यह एक सकारात्मक और मौलिक परिवर्तन आया है | मुझे याद है जब लोग छोटी-छोटी “इम्पोर्टेड्” चीजों के सामने भी अपने को हीन पाते थे |

  3. संदीप राय की रिर्पोट ही यर्थाथ है. हमारे दिलों मे भारत की वही तस्वीर रह जाती है, जब हम भारत छोड कर आये थे, मगर अब वैसा कुछ बाकी नही है यह हमें स्विकारना होगा.

    रिर्पोट सुनवाने के लिये धन्यवाद.

    समीर लाल

  4. एक बार हमारे पिताजी भी नेपाल से एक “इम्पोर्टेड” साडी लेकर आये थे, माताजी भी बडी प्रसन्न हुई , पर चुंकि में सूरत मे कई वर्ष रह चुका हुं सो मेने वो साडी पहचान ली ओर अन्दर से उसके निर्माता ओर रिंग रोड के विक्रेता का लेबल बताया तब सब लोग बहुत उस “इम्पोर्टेड” साडी के लिये बहुत हंसे थे.

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