रविवार को आसिम मलिक के यहाँ पार्टी थी – उपलक्ष्य था ईद और दीवाली, और साथ में छोटे बेटे ज़ेवन का तीसरा जन्मदिन। जान पहचान के सभी देसी लोग आमन्त्रित थे।

मैं आसिम मलिक से यही कोई आठ महीने पहले मिला – एक मित्र के यहाँ हुई पार्टी में। मूलतः लाहौर के निवासी, और अब यहाँ बाल्टिमोर में आइटी मैनेजर के रूप में कार्यरत। उम्र में मुझ से २-३ साल छोटे आसिम, और उन की पत्नी, का शुमार आसानी से मेरी जान पहचान के लोगों में सब से ज़िन्दा-दिल युगलों में था — “था” इसलिए कि अब यह दोस्ती खत्म हो गई। हुआ क्या, यह बताने से पहले मैं आसिम के बारे में कुछ और बताना चाहता हूँ।

नहीं … उन के बारे में कुछ भी बताने में “था” शब्द का प्रयोग करना पड़ रहा है, इस लिए पहले मुद्दे की ही बात की जाए। रविवार को पार्टी की तैयारी में आसिम की पत्नी रसोई में पकवान बना रही थीं, पड़ौस की एक महिला मदद कर रही थीं। मेहमान आने वाले थे, इसलिए पूरी तरह सजी सँवरी थीं। आसिम ऊपर की मंज़िल पर गए थे तैयार होने के लिए। थोड़ी देर में बेटा जिस का तीसरा जन्मदिन था, नीचे आया और पूछने लगा कि “पापा ऊपर बाथरूम के बाहर फर्श पर क्यों लेटे हैं?” दोनों औरतें ऊपर दौड़ीं तो देखा आसिम साँस के लिए छटपटा रहे थे — उन को दिल का दौरा पड़ा था। फौरन ९११ कॉल किया, सीपीआर देने की कोशिश की गई। ऍमरजेन्सी क्रू पाँच मिनट में आ गया था, पर पहले ही बहुत देर हो चुकी थी। आसिम को जिलाया नहीं जा सका।

हम लोग पार्टी में देर से जाने वाले थे। ग्रेटर बाल्टिमोर मन्दिर में दीवाली के उपलक्ष्य में सांस्कृतिक कार्यक्रम था, और मेरी बेटी उस में भरतनाट्यम नृत्य कर रही थी, इसलिए वहाँ पहले जाना था। हम मन्दिर जाने की तैयारी में थे कि फोन आया। आसिम के बारे में सुन कर विश्वास नहीं हुआ। किसी तरह से बच्चों को किसी और के साथ मन्दिर भेज कर हम आसिम के घर की ओर निकले – आधे घंटे का ड्राइव था। वहाँ पहुँच कर दिल दहल गया। आसिम का नवनिर्मित आलीशान मकान पूरी तरह से सजा हुआ था, घर के बाहर मोम के दिए जलाने को तैयार, जो मेहमान आ रहे थे वे पार्टी के लिए आ रहे थे – तोहफे और पकवान ले कर। मेज़ पर बर्थडे केक था। ऊपर की मंज़िल पर मृत शरीर के पास औरतें बिलख रही थीं। मैं भी आँसू नहीं रोक पाया। छोटा बेटा ज़िद पकड़े था कि मेरा केक क्यों नहीं कट रहा। चार साल का बेटा ट्राइसिकल चला रहा था, और छोटे भाई से हस्बेमामूल लड़ रहा था। थोड़ी देर बाद कुछ महिलाएँ छोटे बेटे को नीचे ले गईं जहाँ उस का केक काटा गया, और बाक़ाइदा हैपी बर्थडे गाया गया। पार्टी में देर से आने वाले कुछ लोग आते थे, गर्मजोशी के साथ मिलते थे, और बताए जाने पर उन का मुँह उतर जाता था।

उन के घर में हो रही हर बात दिल को छू लेने वाली थी, पर शायद यह कहानियाँ हर मौत के साथ जुड़ी होती हैं। बड़ी बेटी जो नौ साल की थी, माँ और अन्य बिलखती औरतों से कहने लगी, “मुझे पापा की आवाज़ सुनाई दे रही है, वे कह रहे हैं इन्हें कहो न रोएँ।” फिर बैठ कर पिता के मृत शरीर के बाल सहलाने लगी।

पुलिस की गाड़ी बाहर खड़ी थी और ४-५ पुलिस वाले फ्यूनरल होम की गाड़ी के इन्तज़ार में खड़े थे। यहाँ आप मृत शरीर को एक रात भी घर में नहीं रख सकते। उसे फ्यूनरल होम में रखना पड़ता है और वहीं से अन्तिम संस्कार के लिए ले जाया जाता है। कल सोमवार को आसिम के शरीर को दफ़्नाया गया। पर पूरी मित्र मंडली अभी इस सदमे से नहीं उभर पा रही है। रह रह कर इस ज़िन्दादिल शख्स की बातें याद आ रही हैं।

आसिम को कोई बुरी आदतें नहीं थीं – शराब नहीं पीते थे, सिगरेट नहीं पीते थे। हाँ खाना शौक से खाते थे। फैमिली पार्टीज़ और ऍक्टिविटीज़ आयोजित करने में आगे आगे रहते थे। एक पार्टी से आना और दूसरी में जाना। जिस पार्टी में वे मौजूद हों रात के दो बजे से पहले नहीं समाप्त हो सकती थी, यह उन का उसूल था। उन के दोस्तों में अधिकतर भारतीय परिवार ही थे, इसलिए अन्ताक्षरी, फिल्मी गीत, आदि चलते रहते थे। लम्बे थे, पर मोटे बहुत थे, और यही मोटापा शायद उनको ले ड़ूबा। पार्टीबाज़ी के चक्कर में शायद ड़ाक्टर के पास जितना जल्दी जाना चाहिए था, नहीं जा सके। पिछले हफ्ते भर से ही सीने में दर्द की शिकायत कर रहे थे।

जुलाई में हम पाँच छः परिवार मिल कर एक लेक रिज़ॉर्ट पर गये। हम जेट-स्की (पानी का स्कूटर) करने गए तो आसिम ने कहा, मैं आप के पीछे बैठूँगा। मैं ठहरा पतला-दुबला, जैसे ही वे पीछे बैठे, जैट-स्की उलट गई और हम दोनों पानी में। वे घबराए, पर तैरना न आने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी। बोले, “नहीं, लेट्स कंटिन्यू”। खैर जैसे तैसे पानी से निकले, और मैं ने जैट-स्की स्टार्ट किया। आधे घंटे तक झील में घूमते रहे, और वापस आ कर जब किनारे के पास आए तो गति धीमी होने पर फिर सन्तुलन बिगड़ गया। नाव उल्टी हो गई और इस बार ज़्यादा गहरे पानी में गिरे। इस बार लाइफगार्ड्स की ज़रूरत पड़ी और तीन चार लोगों ने मिल कर उन्हें पानी से बाहर खींच निकाला। खैर बात आई गई हो गई और पूरे ट्रिप में यह “हादसा” हम लोगों में मज़ाक का विषय बना रहा।

आसिम की मौत ने हम सब को झकझोर कर रख दिया है। हम सब तो कुछ दिनों में अपनी दिनचर्या में लग जाएँगे, पर भाभी और बच्चों के लिए इस समय जीवन दिशाहीन लग रहा होगा। फिर भी सब लोग यही सोच रहे हैं कि होनी तो हो कर रहती है, पर हम लोगों को इस तरह के हादसे टालने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। शरीर से मिले किसी वार्निंग सिग्नल की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। मौत को नज़दीक जान कर अपनी वसीयत बना लेनी चाहिए। परिवार जनों से हर संभव “सिनैरियो” की चर्चा कर लेनी चाहिए।

दो तीन महीने पहले हुई एक पार्टी में आसिम ने सब से एक खेल खेलाया। सब को एक प्रिंट किया हुआ पन्ना पकड़ाया, जो हरेक को पढ़ना था। देखना यह था कि कौन इसे पूरी ऍक्टिंग के साथ, पूरी इमोशन के साथ पढ़ता है। पन्ने पर अंग्रेज़ी में कुछ ऐसा लिखा था, “ज़िन्दगी हमें इस लिए नहीं मिली है कि हम आ कर चुपचाप चले जाएँ, बल्कि जब श्मशान भूमि या कब्र में जाएँ तो हंसते खेलते जाएँ, एक हाथ में जाम (या रूह अफ्ज़ा) हो, दूसरे हाथ में गेन्द, दोस्तों से घिरे हों….” वग़ैरा वग़ैरा। यानी… रोते हुए आते हैं सब, हंसता हुआ जो जाएगा, वो मुकद्दर का सिकन्दर कहलाएगा।

5 Comments on हंसता हुआ जो जाएगा

  1. बड़ा दुख तथा अफसोस हो रहा है सुनकर। उनके परिवार तक हमारी संवेदनायें पहुंचायें।

  2. जीतू says:

    आसिम भाई के इन्तकाल का हमे भी बहुत अफ़सोस है। ऐसे जिन्दादिल इन्सान हमेशा हमारे जहन और दिलो दिमाग मे, अपनी यादों के सहारे जिन्दा रहेंगे।अल्लाह उन्हे जन्नत मे जगह दे।

    उनके परिवार के प्रति हमारी और से हार्दिक संवेदनायें।

  3. भाई साहब
    आज एक साल के बाद यह लेख पढ़ कर टिप्पणी कर रहा हूँ कि आसिम भाई साहब के निधन की यह घटना पढ़ कर आँख से आँसू आ गये अभी कुछ ही दिनों पहले मेरी भी एक रेश्तेदार की मौत हुई है, मैं आपके मन के दर्द को समझ सकता हूँ।
    http://nahar.wordpress.com/2006/09/26/nisha/
    http://nahar.wordpress.com/200.....tsevapasi/

  4. NIK says:

    HELLO ASIM BHAI I AM VERY SEAD WHEN U R DETH I VERY MISS U ASIM BHAI.

  5. NIK says:

    I MISS U ASIM BHAI

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