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	<title>Comments on: हिन्दी जाल जगत &#8211; आगे क्या?</title>
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	<description>इधर की ईंट उधर का रोड़ा</description>
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		<title>By: Pradeep Mishra</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-1104</link>
		<dc:creator>Pradeep Mishra</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 04 Jan 2010 17:16:41 +0000</pubDate>
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		<description>बढ़िया विचार&#124; बहुत बहुत बधाई।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढ़िया विचार| बहुत बहुत बधाई।</p>
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		<title>By: पाठकों की प्रतीक्षा में</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-1093</link>
		<dc:creator>पाठकों की प्रतीक्षा में</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 04 Jan 2010 02:48:36 +0000</pubDate>
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		<description>[...] एक स्वप्न लगती थी। सितंबर 2005 में लिखा यह लेख उस स्वप्न को दर्शाता [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] एक स्वप्न लगती थी। सितंबर 2005 में लिखा यह लेख उस स्वप्न को दर्शाता [...]</p>
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		<title>By: sanjay tiwari</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-740</link>
		<dc:creator>sanjay tiwari</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Jun 2008 19:24:34 +0000</pubDate>
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		<description>कोई ढाई साल में ही अधिकांश चिंताए इतिहास नजर आती है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कोई ढाई साल में ही अधिकांश चिंताए इतिहास नजर आती है.</p>
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		<title>By: हिमांशु</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-150</link>
		<dc:creator>हिमांशु</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 27 Nov 2005 18:12:58 +0000</pubDate>
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		<description>एक बात तो मैं कहना भूल ही गया ...

मेरे पास हिन्दी मेन्यू वाला क्लर स्क्रीन सैमसंग मोबाईल है और मैं हिन्दी में ही इसका प्रयोग करता हूँ.

यह बात अलग है की मुझी यह जानने मे कुछ महीने लग गये की मेरा मोबाईल हिन्दी भी सपोर्ट करता है :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक बात तो मैं कहना भूल ही गया &#8230;</p>
<p>मेरे पास हिन्दी मेन्यू वाला क्लर स्क्रीन सैमसंग मोबाईल है और मैं हिन्दी में ही इसका प्रयोग करता हूँ.</p>
<p>यह बात अलग है की मुझी यह जानने मे कुछ महीने लग गये की मेरा मोबाईल हिन्दी भी सपोर्ट करता है <img src='http://kaulonline.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>By: हिमांशु</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-149</link>
		<dc:creator>हिमांशु</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 27 Nov 2005 18:06:34 +0000</pubDate>
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		<description>हे हे, आप लोगों के मन मे यह विचार कैसे आ गया की हिन्दी लोग हिन्दी में लिखते पढ्ते नहीं ??

भारत में हिन्दी अखबार पढने वालों की संख्या करोङों में है. एक सर्वेक्षन के अनुसार अंग्रेजी समाचार पत्र की संख्या हिन्दी पत्रों से काफी कम है. सबसे ज्यादा बिकने वाले &quot;एक&quot; हिन्दी समाचार पत्र की संख्या भारत के &quot;सारे&quot; अंग्रेजी समाचार पत्रों से कहीं ज्यादा थी.

कभी देखा है की कैसे यहाँ पर हिन्दी सिनेमा का भूत सर पर चढ कर बोलता है ???? :)

आलम ये है की, प्रादेसिक भाशा वाले हिन्दी की प्रसिद्धी से परेशान हैं :)

इंट्रनेट पर हिन्दी क्यों ज्यादा नहीं दिखती, इसका कारण सब जानते है: Microsoft.

इस बेवकूफों को विन 2000 से पहले भारतीय भाषाओं के बरे में ख्याल ही नहीं आया.

और हिन्दी में लिखने के लिये IME बस हाल ही उपलब्ध हुए हैं. और बिना IME के, यूनीकोड सपोर्ट होते हुए भी, कोइ हिन्दी कैसे लिखता ?

याने की, सही ट्ल के निकले हुए अभी साल भर भी नही हुए की आप लोग चाहते हैं की हर चीज हिन्दी में मिले ??

थोङा ठंङ रखो मेरे भाईयों !!!! अभी तो बस शुरुआत है.

जब हिन्दी सिनेमा उपलब्ध रह्ता है तो किसी पङी रह्ती है हालीवुड की फिल्में देखने की ?

उसी प्रकार, जब इंटरनेट पर हिन्दी में वेब पेज मिलेंगे तो कोई उसे कोइ क्यों नहीं पढ़ना चाहेगा ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हे हे, आप लोगों के मन मे यह विचार कैसे आ गया की हिन्दी लोग हिन्दी में लिखते पढ्ते नहीं ??</p>
<p>भारत में हिन्दी अखबार पढने वालों की संख्या करोङों में है. एक सर्वेक्षन के अनुसार अंग्रेजी समाचार पत्र की संख्या हिन्दी पत्रों से काफी कम है. सबसे ज्यादा बिकने वाले &#8220;एक&#8221; हिन्दी समाचार पत्र की संख्या भारत के &#8220;सारे&#8221; अंग्रेजी समाचार पत्रों से कहीं ज्यादा थी.</p>
<p>कभी देखा है की कैसे यहाँ पर हिन्दी सिनेमा का भूत सर पर चढ कर बोलता है ???? <img src='http://kaulonline.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>आलम ये है की, प्रादेसिक भाशा वाले हिन्दी की प्रसिद्धी से परेशान हैं <img src='http://kaulonline.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>इंट्रनेट पर हिन्दी क्यों ज्यादा नहीं दिखती, इसका कारण सब जानते है: Microsoft.</p>
<p>इस बेवकूफों को विन 2000 से पहले भारतीय भाषाओं के बरे में ख्याल ही नहीं आया.</p>
<p>और हिन्दी में लिखने के लिये IME बस हाल ही उपलब्ध हुए हैं. और बिना IME के, यूनीकोड सपोर्ट होते हुए भी, कोइ हिन्दी कैसे लिखता ?</p>
<p>याने की, सही ट्ल के निकले हुए अभी साल भर भी नही हुए की आप लोग चाहते हैं की हर चीज हिन्दी में मिले ??</p>
<p>थोङा ठंङ रखो मेरे भाईयों !!!! अभी तो बस शुरुआत है.</p>
<p>जब हिन्दी सिनेमा उपलब्ध रह्ता है तो किसी पङी रह्ती है हालीवुड की फिल्में देखने की ?</p>
<p>उसी प्रकार, जब इंटरनेट पर हिन्दी में वेब पेज मिलेंगे तो कोई उसे कोइ क्यों नहीं पढ़ना चाहेगा ?</p>
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		<title>By: प्रमोद</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-148</link>
		<dc:creator>प्रमोद</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Nov 2005 07:08:38 +0000</pubDate>
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		<description>भाई,
आज जो कुछ भी आप लोग हिन्दी में कर रहे हैं यह बहुत ही सराहनिय है। आज कम से कम हम हिन्दी में लिख पड़ तो पा रहे है, और मुक्षे लगता है, यह काम आब दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ती रहेगी।

धन्यबाद

प्रमोद</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई,<br />
आज जो कुछ भी आप लोग हिन्दी में कर रहे हैं यह बहुत ही सराहनिय है। आज कम से कम हम हिन्दी में लिख पड़ तो पा रहे है, और मुक्षे लगता है, यह काम आब दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ती रहेगी।</p>
<p>धन्यबाद</p>
<p>प्रमोद</p>
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		<title>By: रजनीश मंगला</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-147</link>
		<dc:creator>रजनीश मंगला</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Oct 2005 21:22:24 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://www.kaulonline.com/chittha/?p=61#comment-147</guid>
		<description>रमण भाई, ये भी सही कहा कि इससे पहले कितने लोग हिन्दी पढ़ते या लिखते थे। मैंने हिन्दी दोबारा एक दो महीना पहले ही शुरू की जब अभिव्यक्ति का वेबसाईट देखा। लिखना यानि ब्लागरी तो दस दिन पहले ही शुरू की है। अब हिन्दी को नई ऊंचाईयों पर पहुंचाने का प्रयास रहेगा।

हिन्दी को व्यव्सायिक बनाने की खास चर्चा होनी चाहिए। कैसे लोग हिन्दी से पेट पाल सकते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रमण भाई, ये भी सही कहा कि इससे पहले कितने लोग हिन्दी पढ़ते या लिखते थे। मैंने हिन्दी दोबारा एक दो महीना पहले ही शुरू की जब अभिव्यक्ति का वेबसाईट देखा। लिखना यानि ब्लागरी तो दस दिन पहले ही शुरू की है। अब हिन्दी को नई ऊंचाईयों पर पहुंचाने का प्रयास रहेगा।</p>
<p>हिन्दी को व्यव्सायिक बनाने की खास चर्चा होनी चाहिए। कैसे लोग हिन्दी से पेट पाल सकते हैं।</p>
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		<title>By: रजनीश मंगला</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-146</link>
		<dc:creator>रजनीश मंगला</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Oct 2005 15:16:39 +0000</pubDate>
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		<description>हेलो रमण, मैंने अभी तुम्हारी पिछली कई सारी प्रविष्टियां पढ़ी हैं। बहुत अच्छी हैं। हिन्दी के लिए हम जैसे बाहर बैठे लोग क्या कर सकते हैं? मैं नारद तथा हिन्दी लिखने के लिए टूल्ज़ का पता तो लोगों को ईमेल्ज़ से भेजता रहता हूं। और क्या किया जा सकता है। एक पत्रिका बनाने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन समझ में नहीं आता उसमें क्या डालूं। शायद एक हिन्दी पुस्तकालय बनाना अच्छा रहेगा। लेकिन तुम्हारा काम बहुत ही सराहनीय है। तुन्हें बहुत बहुत बधाई।
रजनीश</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हेलो रमण, मैंने अभी तुम्हारी पिछली कई सारी प्रविष्टियां पढ़ी हैं। बहुत अच्छी हैं। हिन्दी के लिए हम जैसे बाहर बैठे लोग क्या कर सकते हैं? मैं नारद तथा हिन्दी लिखने के लिए टूल्ज़ का पता तो लोगों को ईमेल्ज़ से भेजता रहता हूं। और क्या किया जा सकता है। एक पत्रिका बनाने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन समझ में नहीं आता उसमें क्या डालूं। शायद एक हिन्दी पुस्तकालय बनाना अच्छा रहेगा। लेकिन तुम्हारा काम बहुत ही सराहनीय है। तुन्हें बहुत बहुत बधाई।<br />
रजनीश</p>
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	<item>
		<title>By: अक्षरग्राम &#187; Blog Archive &#187; अनुगूँज 14: हिन्दी जाल जगत: आगे क</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-145</link>
		<dc:creator>अक्षरग्राम &#187; Blog Archive &#187; अनुगूँज 14: हिन्दी जाल जगत: आगे क</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Oct 2005 13:01:27 +0000</pubDate>
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		<description>[...] 1 2  3 4 5 6 [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] 1 2  3 4 5 6 [...]</p>
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	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://kaulonline.com/chittha/2005/09/hindi-jaal-jagat-aage-kya/comment-page-1/#comment-144</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Sep 2005 02:37:18 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://www.kaulonline.com/chittha/?p=61#comment-144</guid>
		<description>विचार बढ़िया लगे आपके।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>विचार बढ़िया लगे आपके।</p>
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