बंटी और बबली फिल्म में एक गाना है

छोटे छोटे शहरों से, खाली भोर दुपहरों से, हम तो झोला उठा के चले।
बारिश कम कम लगती है, नदिया मद्धम लगती है, हम समन्दर के अन्दर चले।

पिछले दिनों लगता है बड़ा शहर मुम्बई वास्तव में समन्दर के अन्दर चला गया। मुम्बई और आसपास के इलाकों में ४३० ५०० से अधिक लोग मर चुके हैं। २६ जुलाई की रात को सारा यातायात बन्द होने के कारण जो जहाँ जाना चाहता था, वह वहाँ न पहुँच सका। इन हालात में एक पत्रकार ने हीरो के साथ गुज़ारी बरसात की रात, और एक महिला पत्रकार रात भर चलती रहीं। बहुत ही रोचक संस्मरण हैं। पढें।

4 Comments on हम समन्दर के अन्दर चले

  1. anunad says:

    सही तो ये है कि समन्दर ही धरती का सैर करने मुम्बई आ गया था ।

  2. मत्सु says:

    वाह, ख़ूब मज़ा आया.
    …तो आगे ऐसा गाएँ…
    “रात-दिन पानी में जीना वीना ईज़ी नहीं…”

    मगर…मुंबई की ख़बरें देखके कुछ हमदर्दी-सी लगती हैं, जिस लिए कि पिछले गरमी के मौसम में यहाँ जापान के कई इलाक़े भी उसी तरह पानी के नीछे डूबकर प्रकृति के क़हर से बहुत प्रभावित हुए.
    आशा है वहाँ के लोगों को आम ज़िंदगी जल्दी वापस आ जाए.

  3. कई दिनों बाद अन्तरताने पर हिन्दी की सेवा करने का मौक़ा मिला है और उससे भी बडी ख़ुशकिस्मती ये कि सालभर बाद अभिव्यक्ति का माध्यम मिला है. बाक़ी आप देख लीजिएगा.. और हां नया – नया मुर्ग़ा हूं , ज़रा ज़ोर से बांग दूं तो माफ़ कर दीजिएगा. ये मेरा ब्लाग है.

  4. Raman ji,

    bahut hii romanchkaari varNaN hai. mumbai kii sahii spirit bhii is satya kahaanii me.N ubharatii hai. mere chiTThe par comment daalane ke liye dhanyawaad.

    laxminarayan

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