क्या आप ने इंडिया ग्लोब नामक अखबार का नाम सुना है? मैं ने भी नहीं। पर इंडिया ग्लोब नामक अखबार के पत्रकार श्री रघुबीर गोयल व्हाइट हाउस की हर प्रेस ब्रीफिंग में सामने की पंक्तियों में बैठते हैं और मौका मिलते ही सवाल दाग़ते हैं अमरीका की भारत नीति पर, या पाकिस्तान के बारे में, या फिर ऐसे किसी भी मुद्दे के बारे में जो आम भारतीयों के दिमाग़ को तो कचोटते हैं पर अमरीकियों के लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखते, खासकर जब कार्ल रोव या ईराक युद्ध जैसे मुद्दे चल रहे हों । कहने वाले कहते हैं कि इंडिया ग्लोब कोई चार पन्नों का अखबार है जिसे शायद गोयल साहब ही लिखते हैं, वही छापते हैं, और शायद वही पढ़ते हैं। उन्हें सही जवाब मिलते हैं या नहीं? यह पता नहीं। उन्हें गंभीरता से लिया जाता है या नहीं? शायद नहीं। पर पिछले कुछ दिनों से रघुवीर गोयल चिट्ठासंसार में मशहूर हो गए हैं

पिछले हफ्ते दफ्तर से घर जाते हुए मैं एक गैस स्टेशन पर रुक कर अपनी गाड़ी में गैस (पैट्रोल) ड़ाल रहा था, कि गाड़ी के अन्दर से रेड़ियो पर खालिस देसी अंग्रेज़ी सुनाई दी। जल्दी से निबट कर गाड़ी में बैठा और रिपोर्ट सुनी। रिपोर्ट थी रघुबीर गोयल, यानी “गोयल द फोयल” के बारे में। फोयल (foil) उन को इसलिए कहा जाता है कि उन का इस्तेमाल उन के सवालों का जवाब देने के बदले औरों के सवालों को foil करने (टालने) के लिए किया जाता है। होता यूँ है कि जब स्काट मैक-क्लेलन, जो व्हाइट हाउस के प्रेस सेक्रेटरी हैं प्रेस कान्फ्रेन्स दे रहे होते हैं और किसी पेचीदा मसले पर उन की धुनाई हो रही होती है, तो वे गोयल साहब को आमन्त्रित करते हैं सवाल पूछने के लिए, “Go ahead, Goyal.” गोयल साहब कुछ इस तरह का सवाल पूछते हैं, “ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में बैठा हुआ है। इस के बारे में सरकार क्या कर रही है?”, या फिर, “The question is that — what are we expecting on Monday Prime Minister of India Dr. Manmohan Singh comes here to the White House, guest of the President? Can you lay it down a little bit?” इस का मुझ से अनुवाद नहीं हो पाया, पर स्कॉट शायद समझ जाते हैं, और एक लम्बा सा जवाब देते हैं, कम से कम कार्ल रोव का मुद्दा तो टल गया।

ऐसी बात नहीं है कि प्रेस सेक्रेटरी को बचाने वाले केवल अपने गोयल साहब ही हैं, वाशिंगटन पोस्ट की जनवरी २००२ की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे कम से कम चार पाँच पत्रकार और हैं जिन का प्रयोग इस संवाददाता सम्मेलनों में टालमटोल के लिए होता है। और यह प्रथा चली आ रही है क्लिंटन के प्रेस सेक्रेटरी माइक मैक-करी के समय से। और गोयल साहब लगता है तब से लगे हुए हैं।

1 Comment on रघुबीर “टालमटोल” गोयल

  1. […] हम तो निहाल हो गये अपनी तारीफ अपने पीठ पीछे सात समुँदर पार होने की खबरिया सुनकर। गुरुदेव आपकी जय हो, सारिका जी की भी जय । और हाँ जीतू जब मिले तो एक खबर उनको चहकाने के लिए सुना दीजिएगा। रमन भाई की तरह हमारे एक और मित्र भी जो संयोग से कनपुरिया है पर दुर्योग से ब्लागर नही है कार मे रेडियो , Mp3 player,podcast और न जाने क्या क्या सुनने के शौकीन हैं। एक दिन जनाब अपने प्लेयर पर पाडकास्ट सुनने का लुत्फ उठा रहे थे। अब यह पाडकास्ट के बारे मे डिटेल में शायद स्वामी जी ज्यादा बता सकते हैं। तो जनाब हुआ यह कि उन्हे अचानक अपने पाडकास्ट वाले प्लेयर पर शारफत अली की बेसुरी आवाज सुनायी दी। उन्हे यकीन नही हुआ कि आवाज शराफत अली की है। उनकी अपनी बीबी से शर्त लग गई कि यह हमारी ही आवाज है। फिर उन्होने जीतू भाई कि “कोई यह कैसे कहे” वाली सुरीली गजल सुनी। अब हमारे यह मित्र अपनी उत्सुकता रोक न सके और आ गये पड़ताल करने कि क्या हमने कोई छद्म नाम रखकर किसी देशी रेडियो स्टेशन में नौकरी कर ली है। फिलहाल हमने उन्हे बता दिया है कि वह कुछ टेस्टिंग वगैरह का सैंपल था। पर मुझे अभी भी नही पता कि यह ब्लागनाद का नाद पाडकास्ट के जरिए उनकी कार पर कैसे हो गया? स्वामी जी , जीतू या रमन शायद कुछ रोशनी डाल सकें? […]

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