सातवीं अनुगूँज – बचपन के मेरे मीत

बचपन के मीत — बड़ा ही भावुक और दिल के करीब का विषय है यह। जैसे ही विषय की घोषणा हुई, मैंने सोचा कि अपनी प्रविष्टि तो निश्चित है। पर अलाली का आलम यह है कि कोई बात तब तक नहीं होती जब तक उस की अन्तिम तिथि न आ जाए। अंकल सैम से टैक्स रिफंड के रूप में पैसे भी वापस लेने हों, तो उसकी कार्रवाई भी १५ अप्रैल से पहले नहीं होती।

खैर, मुद्दे की बात की जाए। सब की तरह बचपन के कई मीत बने, बिछड़े, और अब कभी कभार ही मिलना हो पाता है। फिर भी यादें जीवन भर साथ रहती हैं। कुछ दोस्तों के बारे में कहना चाहूँगा, पर नाम ज़रूरी नहीं हैं उन के असली प्रयोग करूँ।

एक दोस्त था मेरा सुरेश। वह मेरा दोस्त कैसे बना इस की कहानी दिलचस्प है। हम कालेज में नए नए थे और मैं किराये का कमरा लेकर श्रीनगर में रहता था। गाँव से नए नए आए थे, खास मिलना जुलना था नहीं। Akshargram Anugunj 7मेरे सामने वाली खिड़की में जो चान्द का टुकड़ा रहता था, वह हम से तो उखड़ा उखड़ा रहता था, पर बाद में पता चला कि मेरा सहपाठी सुरेश उन की गुड बुक्स में था। सुरेश पास के मोहल्ले में रहता था, पर जब उसे पता चला कि मैं कहाँ रहता हूँ तो उसका मेरे यहाँ आना जाना बढ़ गया। देखते देखते खिड़की के आर पार आँखें चार हुईं और मुहब्बत पनपी। वह कहते हैं न, प्रेम ग्रन्थ के पन्नों पर अपनी तकदीर तो ज़ीरो है, अपना वही हाल था। पर दूसरों की तकदीरें खूब बनाई हैं। सिर्फ मिलवाया ही नहीं, कितने ही दोस्तों के हम प्रेम पत्र लेखक थे। यह उन दिनों की बात है जब ईमेल और आइ-एम का ज़माना नहीं था और लिफाफा, काग़ज़, कलम, सियाही, लिखावट और तदबीर बहुत माने रखती थीं। खैर सुरेश और हमारी पड़ौसन का प्रेम प्रसंग पनपा भी और समाप्त भी हो गया पर अपनी दोस्ती कालेज के बाद भी बनी रही और पुराने दोस्तों में से यही एक है जिससे अभी भी मेरा संपर्क है।

स्कूल-कालेज के जितने भी दोस्त थे, प्रायः सभी बड़ी कम्पनियों में या सरकार में अच्छे पदों पर हैं। काफी समय के बाद किसी की ख़बर मिलती है तो दिल खुश ही होता है। पर कुछ लोगों के बारे में हमेशा अच्छी खबर नहीं मिलती। थॉमस के बारे में सुना उसकी रेल दुर्घटना में मौत हो गई। सुहैल जब कालेज में था तो हमेशा पाकिस्तान के गुण गाता था — हमारी अक्सर इन्हीं बातों पर बहस होती थी। बाद में उससे कुछ संपर्क रहा, राज्य सरकार में अच्छे पद पर था। फिर काफी सालों तक ख़बर नहीं मिली। बाद में अखबार मे पहले पन्ने पर उसका नाम पढ़ा — पता चला एक पृथकतावादी आतंकी गुट के कई सदस्यों के साथ उसे भी धर लिया गया। रुबय्या सईद के अपहरण के सन्दर्भ में उसका नाम आया था। जाने अब कहाँ है।

गाँव में, स्कूल के समय जो सब से करीबी मित्र था, उसका नाम था जावेद। दोनों के सामाजिक माहौल में कुछ असहिष्नुता होने के बावजूद हम ने कई दीवारें तोड़ीं। उस माहौल में जहाँ दूसरे धर्म के अनुयायी के घर में खाने को भी बुरी नज़र से देखा जाता था, हम ने कई लोगों को नाराज़ भी किया। बाद में हम एक दूसरे के घर के क्या मोहल्ले के सदस्य हो गए थे। १९८४ से मैं नौकरी के सिलसिले में फरीदाबाद में रहने लगा, पर कश्मीर नियमित रूप से जाता रहता था और दोस्तों से मुलाकात होती रहती थी। १९८९-९० की घटनाओं में हमारे परिवार और समुदाय को वहाँ से सब छोड़ छाड़ कर भागना पड़ा और हमारा कश्मीर जाना ही बन्द हो गया, इसलिए फिर सालों तक मुलाकात नहीं हुई।

एक बार बस किसी से पता चला कि जावेद अब श्रीनगर में रहता है और वहाँ के एक कॉलेज में जन्तु-विज्ञान पढ़ाता है। जिस मकान में रहता था उस के मकान मालिक का फोन नंबर भी मिला। एकाध बार बात करने की कोशिश की पर हो नहीं पाई। वे दिन घाटी में काफी तनाव के थे।

खैर १९९९ के ग्रीष्म में, अमेरिका आने से पहले, मैंने सोचा यदि अपनी मातृभूमि को एक बार फिर देखने का मौका मिल सकता है तो वह है अमरनाथ यात्रा के ज़रिये। यह वह समय है जब हज़ारों की संख्या में लोग जाते हैं, और खतरे की संभावना कम रहती है। तीन अन्य फरीदाबादी मित्रों के साथ कार्यक्रम बना अमरनाथ यात्रा का। यात्रा के बाद हम ने हिम्मत की श्रीनगर जाने की। डल लेक के पास एक होटल में डेरा डाला और सब से पहले फरीदाबाद फोन किया। श्रीमती जी को बताया कि श्रीनगर में हूँ तो बरस पड़ीं। ख़ैर मैंने अपने मित्रों से कहा कि मुझे अपने पुराने दोस्त से मिल कर आना है। उन्होंने पहले रोकने की कोशिश की, फिर यही कहा कि भइया पता लिख जाओ ताकि कुछ गड़बड़ हो तो तुम्हें ढूँढ सकें।

जो फोन नंबर था उस पर फोन किया तो पता चला जावेद साहब ने मकान बदल लिया है। उन्होंने नई जगह का पता भी बताया। पता था “हुर्रियत के दफ्तर के पास”। पता सुन कर ही हमारी हट गई (“आल पार्टीज़ हुर्रियत कान्फ्रेन्स” सभी पृथकतावादी गुटों का संयुक्त राजनैतिक मुखौटा है)। फिर सोचा, यहाँ इतने बड़े शहर में मुझे कौन जानता है। गाँव जाता तो कोई न कोई पहचान लेता। वैसे भी मैं उन दिनों दाढ़ी रखता था, लोकल भाषा बोलता ही था, इसलिए लोकल ही लगता था। आटो वाले को पता बताया और पहुँच गया। उसके घर पहुँचा तो मेरा दोस्त घर पर नहीं था। उस की पत्नी थी, बच्चे थे, जिनसे मैं पहली बार मिल रहा था। बोलीं पता नहीं कब आएँगे। मेरे बारे में पूछा तो मैंने कहा गाँव से आया हूँ। सही परिचय बताने से डर रहा था। वह इलाका ही मुझे डरावना लग रहा था। आटो में बैठ कर वापस होटल का रुख किया। मोहल्ले की तंग गलियों से आटो धीरे धीरे रेंग रहा था, तो सामने नज़र पड़ी जावेद चल कर आ रहा था — दस साल में बहुत ज़्यादा नहीं बदला था वह। आटो रोक कर मैं उतरा और हम देर तक गले मिले। उसी आटो में होटल गए, साथियों को अपने दोस्त से मिलाया, फिर वापस दोस्त के साथ गया। उस दिन रात भर पिछले दस साल में क्या क्या हुआ इसी की बातें होती रहीं।

वैसे कुछ भाग्य ने भी साथ दिया उस बार। उस से अगले वर्ष यात्रियों पर हमला कर के ४८ लोग मारे थे आतंकियों ने।

उसके कुछ समय बाद एक बार वह सपरिवार फरीदाबाद आया। पर अब फिर संपर्क टूट गया है। उसके बाद २००३ में जब हालात काफी बेहतर थे, मैं यहाँ से भारत गया था, तो एक बार फिर कश्मीर गया — इस बार सपरिवार, और गाँव भी हो आया, पर जावेद से नहीं मिल पाया। वह किस्सा फिर कभी।

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1 Comment

  1. आपकी मित्र-गाथा मे एक अजीब सा दर्द छिपा है । मेरे कमजोर मन दुखी मत हो । दिन फ़िरेंगे ।

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