Akshargram Anugunj“मेरा चमत्कारी अनुभव” – मैंने अनुगूंज का यह विषय चुन कर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। स्वयं का कोई ढ़ंग का अनुभव है नहीं, लिखूँ तो क्या लिखूँ? यही होता है जब नौसिखियों को कोई ज़िम्मेवारी का काम दिया जाता है। समस्या यह है कि जब तक मैं स्वयं न लिखूँ तब तक न तो जीतेन्द्र और आशीष को “राजा बेटा वाली शाबासी” दे सकता हूँ, न औरों को अनुगूँज के एक नए आयोजक की लाज रखने की गुहार कर सकता हूँ। इसलिए, चलिए कोशिश करता हूँ थोड़ा कुछ कहने की। पते की बात कुछ छोटी है इसलिए घुमा फिरा कर कहूँगा।

चमत्कारी अनुभव तो इसे नहीं कह सकता पर मौत को सामने देखने का एक अनुभव हुआ है, वह सुनाता हूँ। छठी कक्षा में था। वह समय कश्मीर में शान्ति का था, हालाँकि अशान्ति का बीज तो भीतर ही भीतर हमेशा से ही पनप रहा था। मुझे याद है हम लोग तख्ती लिखा करते थे और एक मुस्लिम छात्र तख्ती पर बड़ी सुन्दर लिखाई में उर्दू में लिख कर लाया था, “सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा”। ख़ैर यह किस्सा उस बारे में नहीं है, बस माहौल को वर्णित कर रहा था। हमारे घर के सामने एक नदी बहती थी — गंगा, जमुना, वितस्ता जैसी बड़ी नदी नहीं, यही कोई पन्द्रह-बीस फुट चौड़ी, छोटी नदी जो पत्थरों पर कल-कल करती बहती थी। हमारे घर के आसपास उस की गहराई थी कोई डेढ़-दो फुट, पर बहाव वहुत तेज़ था। नदी हरमुख की पहाड़ियों में उत्पन्न होती थी और हमारे गाँव से गुज़र कर कोई १५ किलोमीटर बाद वुलर झील में मिलती थी, जो एशिया की सब से बड़ी मीठे पानी की झील मानी जाती है। खैर हमारी यह नदी जो “द्वद क्वल” (दूध की नदी) कहलाती थी, हमारी ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। पानी एकदम पारदर्शी, साफ; उसी में हम नहाते थे, उसी का पानी पीते थे, और उसी में घर के बर्तन, कपड़े आदि धुलते थे।

रोज़ का नहाना तो उसी डेढ़-दो फुट के पानी में होता था, घड़े की सहायता से, पर जब छुट्टी होती थी, मस्ती होती थी, तो एक-आधा किलोमीटर दूर जा कर ऐसी जगह नहाना होता था जहाँ नदी की गहराई और चौड़ाई थोड़ी ज़्यादा होती थी और बहाव धीमा। वहाँ छोटा सा घाट सा बना होता था और हम तैरने और गोते खाने का शौक पूरा करते थे। ख़ैर इस वातावरण के लिए कोई विशेष तैराकी निपुणता की आवश्यकता नहीं होती थी, सो हम भी उतने ही निपुण थे, जितनी ज़रूरत थी।

हुआ यूँ कि गर्मियों की दो हफ्ते की छुट्टी में हमें मौसी के घर भेजा गया, ३० किलोमीटर दूर सोपोर में। सोपोर वुलर झील के दूसरे सिरे पर स्थित एक कस्बा है जहाँ सेब का कारोबार खूब चलता है, और पिछले १५ साल से बन्दूक का भी खूब चला है। झेलम (वितस्ता) नदी दक्षिण कश्मीर से उत्पन्न हो कर वुलर झील में आ मिलती है और फिर निकल कर सोपोर, बारामुल्ला होते हुए पाकिस्तान जाती है। ख़ैर हमारी मौसी का घर वितस्ता के एकदम किनारे था। वहाँ मेरे मौसेरे भाई बहन सभी तैराक थे, और न सिर्फ वितस्ता में तैरते थे, बल्कि उस आधा किलोमीटर चौड़ी नदी के आर पार कई चक्कर लगाते थे। मैं भी रोज़ उन के साथ जाता, पर अपनी औकात में रहता। घाट की कौन सी सीढ़ी तक मैं जा सकता था, यह मैंने रट रखा था। पानी गर्दन तक आता था, और वहीं तक मैं “तैरता” था।

Jhelumउस दिन मुझे याद नहीं बाकी लोग कहाँ गए थे, पर मैं अकेला तैरने गया। अगले दिन वापस घर जाना था, इसलिए बड़ी नदी में नहाने का इस मौसम का आखिरी मज़ा लेना चाहता था। बारिश हुई थी, पानी का स्तर भी अधिक था और बहाव भी। मैं अपनी अकलमन्दी में अपनी रटी हुई सीढ़ी तक ही गया। और मिनट भर में पानी मुझे और नीचे धकेल रहा था। मैं अपनी पतली सी सींकिया काया को रोक नहीं पाया और बह निकला। मैं बहता चला गया, मदद के लिए चिल्ला भी नहीं पाया, केवल हाथ पाँव चला रहा था कि किसी तरह से डूबूँ नहीं। ऐसा ही पता नहीं कितनी देर तक चलता रहा, मुझे मौत सामने दिख रही थी और बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी। तीन दशक बीत गए हैं, पर वह दृश्य अभी भी मेरी आँखों के सामने है। चारों तरफ उफनती नदी का शोर था, और बारिश से मटमैले हुए पानी के सिवा कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी, बाहें थक गई थीं, और मैं हैरान था कि मैं तैर कैसे रहा हूँ। तैर तो क्या रहा था, हाथ पाँव मार रहा था। शायद मैं आधा बेहोश था, जब मुझे लगा कि मुझे किसी बला ने पकड़ लिया है। पहले लगा कि कोई बड़ी मछली है, धीरे धीरे आभास हुआ कि मैं बचाया जा रहा हूँ। किनारे पर पहुँचाया गया तो भीड़ जमा हो चुकी थी। सब ने मुझे घेर लिया। मेरी मौसी आ चुकी थीं, सिर पीट रही थीं कि भगवान ने लाज रख ली वरना मैं अपनी दीदी को क्या मुँह दिखाती।

मेरे पेट को मटके पर रख कर मुझे उल्टा लिटाया गया, ताकि अन्दर गया पानी मैं उगल दूँ। काफी पानी बाहर आया। ख़ैर जान बची लाखों पाए।

बाद में पता चला कि किनारे बैठी एक लड़की ने मुझे डूबते देख कर शोर मचाया था, और मेरे मौसा जी के भाई ने मुझे डूबने से बचाया था। मैं नदी के बीचों बीच पहुँच चुका था, और बहाव की दिशा में भी काफी नीचे चला गया था।

घर में हवन आदि हुआ। उस दिन के बाद घर पहुँच कर मैं अपनी “द्वद क्वल” तक ही सीमित रहा, और झेलम से दूर रहने की ठान ली। अब ज़रूर स्विमिंग पूल के सुरक्षित वातावरण में तैरता हूँ, पर ट्रेनिंग उसी दिन की काम आ रही है।

रही चमत्कार की बात और नमक मिर्च की बात, वह अब आने जा रही है। पर यकीन मानिए, नमक मिर्च इस में ज़रा भी नहीं है। वह लड़की जिसने मुझे बचाने के लिए शोर मचाया, अब रोज़ मुझ से झगड़ती है, कि ग्रोसरी कब जाओगे, ब्लाग पर ही बैठे रहोगे या बच्चों को भी पढ़ाओगे। हालात वहाँ से यहाँ तक कैसे पहुँचे, यह तो शायद पिछली अनुगूँज में कहना चाहिए था पर..

दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामने
नाम आएगा तुम्हारा यह कहानी फिर सही।

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4 Comments on अनुगूंज ६ : मेरा चमत्कारी अनुभव

  1. जाते जाते क्या किस्सा छेड़ गए मालिक। कभी इस पर तफसील से लिखिएगा कि जान बचाते बचाते वो जान कैसे बन गए।

  2. Atul says:

    क्या घुमाव है घटना में| ईसे कहते हैं जोर का झटका धीरे से लगे|

  3. जीतू says:

    आपका किस्सा पढकर,मजा आ गया,
    लेकिन भइया, आधा किस्सा तो आपके ऊपर उधार रहा,
    बिना उसके हम आपको छोड़ेंगे नही, और वक्त भी सही है खुलकर कह दीजिये,
    जाने कब भाभीजी लौट आयें.

  4. […] न होते। अरे याद आया इस पर पहले एक प्रविष्टि लिखी थी, फिलहाल उसे पढ़ […]

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