admin on February 27, 2005

अगर तुम आ जाते एक बार काँटे फिर न पीड़ा देते आँसू भी मोती बन जाते तेरी बाहें जो बन जाती मेरे गले का हार अगर तुम आ जाते एक बार जीवन का सच अतिसय सुन्दर पा जाते हम दोनों मिलकर उजड़े दिलों में छा जाती मदमाती नई बहार अगर तुम आ जाते एक बार […]

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“मेरा चमत्कारी अनुभव” – मैंने अनुगूंज का यह विषय चुन कर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। स्वयं का कोई ढ़ंग का अनुभव है नहीं, लिखूँ तो क्या लिखूँ? यही होता है जब नौसिखियों को कोई ज़िम्मेवारी का काम दिया जाता है। समस्या यह है कि जब तक मैं स्वयं न लिखूँ तब तक […]

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admin on February 21, 2005

आज हम भी “ब्लैक” देख कर आए, और सोचा पहले आशीष जी को धन्यवाद दें — फिल्म को सुझाने के लिए, और इस सुझाव के लिए कि फिल्म को सिनेमा हॉल में ही देखें। हमारा भी यही सुझाव है कि फिल्म को बिलकुल मिस न किया जाए। नाम को देख कर तो लग रहा था […]

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admin on February 18, 2005

इस खेल की कड़ी मेरे पास मेरे मित्र राज कौशिक ने सिडनी से भेजी। यदि आप ने यह खेल पहले नहीं देखा हो तो थोड़ी देर के लिए सिर चकरा देता है। यदि आप ने ईमानदारी से इसका रहस्य स्वयं पता किया हो तो आप को बधाई। लेकिन राज़ को राज़ ही रहने दो, वरना […]

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[१९९० के आरंभ तक उत्तर कश्मीर के कलूसा गाँव के जिस घर में मेरा परिवार दशकों से रहा, उस में तब से या तो हिज़्बुल-मुजाहिदीन का डेरा रहा है या राष्ट्रीय राइफ्ल्ज़ का, जिस का जिस समय वर्चस्व रहा। वह क्षेत्र “शान्त” क्षेत्रों में से है, क्योंकि वहाँ अभी भी गिनती के दो-चार हिन्दू बचे […]

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admin on February 6, 2005

आज “पेज थ्री” देखी। फिल्म देखने के लिए बैठ रहा था तो ज़्यादा उम्मीदें नहीं थीं, सोचा शायद कुछ देर बाद उठ जाऊँगा और परिवार के बाकी लोग देख लेंगे, जैसा घर में आई अक्सर फिल्मों के साथ होता है। शुरू में कुछ धीमी भी लगी पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई, उसका आकर्षण […]

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