मित्रो, मैं आज बहुत समय बाद लिख रहा हूँ और आशा है कि आगे से नियमित लिखूँगा।

ऊपर लिखे इस वाक्य में आप को कुछ अटपटा लगा? मुझे यकीन है कि कुछ लोगों को “मित्रो” शब्द आम भाषा से विपरीत लगा होगा, क्योंकि उन्हें संबोधन में भी “मित्रों” लिखने कहने की आदत है। दरअसल यह लेख इसी प्रश्न का उत्तर देने की एक कोशिश है कि संबोधन बहुवचन में “मित्रो” कहा जाना चाहिए या “मित्रों”, “भाइयो-बहनो” कहा जाना चाहिए या “भाइयों-बहनों”। हाल में इस विषय पर बर्ग वार्ता के अनुराग जी से फेसबुक पर लंबा संवाद हुआ, और अपने इस लेख में उन्होंने अपनी बात को विस्तार पूर्वक भी रखा। फेसबुक के मुकाबले ब्लॉग पर लेख रखना अच्छा है, और इसके लिए मैं उनको धन्यवाद देना चाहता हूँ। फेसबुक पर लिखा हुआ आम तौर पर कुछ दिनों में खो जाता है, और हमारी पहुँच से तो क्या, गूगल की पहुँच से भी बाहर हो जाता है। इसके अतिरिक्त ब्लॉग पर links और images देने में भी अधिक स्वतंत्रता रहती है।

तो सब से पहले मैं इस विषय पर अपने मत को स्पष्ट कर दूँ, फिर अनुराग जी के कुछ प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश करूँगा। बहुवचन संबोधन कारक (vocative case) में अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता, यह हिंदी व्याकरण का नियम है। यह आग्रह नहीं है, नियम है। यदि लोगों का एक बहुत बड़ा समूह इस नियम को नहीं समझता या इसका पालन नहीं करता, उसका यह अर्थ नहीं कि नियम नहीं है या ग़लत है। शायद धीरे धीरे इस नियम का उल्लंघन औपचारिक भाषा में स्वीकृत भी हो जाए और शायद व्याकरण से इस नियम को निकाल भी दिया जाए, पर आज यह नियम व्याकरण में है। यह नियम किसी भी रूप में भाषा के विरुद्ध नहीं है, और न ही किसी ने किसी पर कृत्रिम रूप से थोपा है। यह नियम भाषा से व्याकरण में गया है, न कि व्याकरण से भाषा में थोपने की कोशिश की गई है। पर हाँ, जैसे अन्य कई नियम आम भाषा में अनदेखे होने पर कोई प्रलय नहीं आ जाती, वैसे ही इस नियम के पालन न होने से कोई प्रलय नहीं आएगी। कुछ शुद्धतावादियों को इस नियम का उल्लंघन खलता हो तो खले।

ध्यान रहे, जब तृतीय पुरुष बहुवचन का प्रयोग संबोधन के बिना होता है, तो अनुस्वार का प्रयोग होता है। अनुस्वार का प्रयोग केवल तब नहीं होता जब संबोधन के रूप में बहुवचन का प्रयोग हो। उदाहरणतः

बच्चो, इन दोनों बच्चों को भी अपने साथ खेलने दो।
दोस्तो, मुझे तुम सब दोस्तों से कुछ कहना है
लोगो, हम लोगों की बात भी तो सुनो

इसे अनुस्वार को हटाने की प्रक्रिया न समझें, अपितु शब्द का संबोधन रूप समझें।

अब अनुराग जी के कुछ तर्कों का उत्तर देना चाहूँगा।

1) 19 वीं शताब्दी की हिन्दी और हिन्दुस्तानी व्याकरण की कुछ पुस्तकों में बहुवचन सम्बोधन के अनुस्वाररहित होने की बात कही गई है। मतलब यह कि किसी को सम्बोधित करते समय लोगों की जगह लोगो, माँओं की जगह माँओ, कूपों की जगह कूपो, देवों की जगह देवो के प्रयोग का आग्रह है।

मेरे विचार में यह नियम इक्कीसवीं शताब्दी में भी उतना ही सही है जितना 19वीं शताब्दी में था। यह नियम केवल पुरानी पुस्तकों में नहीं है, पर आज भी इसका उतना ही पालन होता है। इसके लिए मैंने गूगल बुक्स पर “संबोधन कारक” की खोज की। कुछ नवीनतम व्याकरण पुस्तकों के उदाहरण देखिए।

नवीन हिंदी व्यावहारिक व्याकरण तथा रचना, भाग 8, पृष्ठ 66: इस पृष्ठ पर दी गई तालिकाओं में बहुवचन के अंतर्गत संबोधन रूप को देखें।

नवशती हिंदी व्याकरण, पृष्ठ 201 – दूसरा अभ्यास, प्रश्न 15 का उत्तर देखें

आदर्श हिंदी व्याकरण, पृष्ठ 117 – पृष्ठ के निचले भाग में संबोधन कारक के अंतर्गत बच्चो का प्रयोग देखें

सरल हिंदी व्याकरण, पृष्ठ 27 – इस पुस्तक की स्कैनिंग और OCR सही नहीं हुई है, पर नियम का विवरण स्पष्ट है

विशेष हिंदी व्याकरण, 7, पृष्ठ 93 – पृष्ठ 94 और 95 को भी देखें, नियम स्पष्ट है।

व्याकरण प्रदीप, पृष्ठ 62 – बहुवचन के अंतर्गत 1) 2) और 3) के नियमों को पढ़ें। वैसे इस पुस्तक में अन्यत्र कई जगह इसी नियम का उल्लंघन किया गया है।

कहना यह है कि किसी भी व्याकरण की पुस्तक को देखें तो नियम स्पष्ट है। हाँ कई जगह पर नियम का पालन नहीं हुआ है। यह नियम है, आग्रह नहीं। व्याकरण में आग्रह नहीं किए जाते। गूगल बुक्स पर संबोधन कारक पर खोज करेंगे तो ऐसी और कई पुस्तकें मिल जाएँगी। ये केवल कुछ ही उदाहरण हैं, एक search term के आधार पर। दुर्भाग्यवश कुछ पुस्तकों के केवल चयनित पृष्ठ उपलब्ध हैं, इस कारण चुनाव सीमित हो जाता है।

2) कुछ आधुनिक पुस्तकों और पत्रों में भी यह आग्रह (या नियम) इसके उद्गम, कारण, प्रचलन या परंपरा की पड़ताल किए बिना यथावत दोहरा दिया गया है।

व्याकरण के इसी नियम के उद्रगम और कारण के ऊपर प्रश्न क्यों उठ रहा है? हम अन्य नियमों के उद्गम और कारण तो नहीं पूछते। हम यह तो नहीं पूछते के “मुझे” क्यों सही है और “मेरे को” क्यों नहीं, या “आप क्या खाएँगे” क्यों सही है और “आप क्या खाओगे” क्यों नहीं — जबकि इन दोनों उदाहरणों में करोड़ों लोग “मेरे को” और “आप क्या खाओगे” का प्रयोग करते हैं। व्याकरण के किसी भी नियम के कारण और उद्गम का अध्ययन एक अलग विषय है और यह आम पुस्तकों और व्याकरण की पुस्तकों की परिधि में नहीं आता। जहाँ तक प्रचलन और परंपरा का प्रश्न है, अनुराग जी का अनुमान है कि यह नियम सर्वमान्य नहीं है, या इस नियम को न मानने वाले बहुलता में है। इससे मैं सहमत नहीं हूँ। मैंने इस नियम को लोगों से सुन कर ही सीखा है, न कि व्याकरण में पढ़ कर। सुनने में मैंने हमेशा ध्यान नहीं दिया कि कुछ लोग संबोधन में अनुस्वार का प्रयोग कर इस नियम का पालन नहीं करते इसलिए किसी का उच्चारण अखरा नहीं है, पर हाँ लिखने में कई बार दिख जाता है जिसे मैं लेखक की अनभिज्ञता समझता रहा हूँ। अब यह मानता हूँ कि इसे एक वैकल्पिक प्रयोग के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। पर मूल नियम पर ही प्रश्न उठाया जाए, इससे मैं कदापि सहमत नहीं हूँ।

3) हिन्दी व्याकरण की अधिसंख्य पुस्तकों में ऐसे किसी नियम का ज़िक्र नहीं है अर्थात बहुवचन के सामान्य स्वरूप (अनुस्वार सहित) का प्रयोग स्वीकार्य है।

इस बिंदु का उत्तर ऊपर 1) के अंतर्गत दिए गए उदाहरणों से दिया गया है। जिस भी व्याकरण की पुस्तक में बहुवचन संबोधन के रूप को समझाया गया है, वहाँ इस नियम को बताया गया है। कुछ जगह (अल्पसंख्य पुस्तकों) में अनुस्वार सहित संबोधन का प्रयोग हुआ है, पर कहीं पर भी नियम के रूप में यह नहीं बताया गया है कि अनुस्वार स्वीकार्य है या अनिवार्य है। यह नियम कई जगह स्पष्ट किया गया है कि संबोधन में अनुस्वार प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।

4) जिन पुस्तकों में इस नियम का आग्रह है, वे भी इसके उद्गम, कारण और लाभ के बारे में मूक है।

ऊपर 2) के अंतर्गत उत्तर देखें। इन पुस्तकों में किसी भी नियम के उद्गम, कारण और लाभ नहीं बताए गए हैं। फिर इस नियम के ही उद्गम, कारण और लाभ क्यों बताए जाने की अपेक्षा है? अपने पूर्वाग्रह के कारण आप को लगता है कि इस नियम को विशेष रूप से जस्टिफाइ किए जाने की आवश्यकता है। पर यह नियम अन्य नियमों जैसा ही है। इसके अतरिक्त उपन्यासों, कहानियों की पुस्तकों में अधिकतर नियमानुसार प्रयोग मिलता है। किसी ऐसी पुस्तक में नियम का उद्गम, कारण या लाभ बताया जाए, यह तर्कसंगत नहीं है।

5) भारत सरकार के राजभाषा विभाग सहित अधिकांश प्रकाशन ऐसे किसी नियम या आग्रह का ज़िक्र नहीं करते हैं।

राजभाषा विभाग के प्रकाशनों में आम तौर पर व्याकरण के मूल नियमों का ज़िक्र नहीं होता। जब और नियमों का ज़िक्र नहीं तो इस नियम का क्यों? जहाँ विस्तृत व्याकरण की पुस्तक दिखे, और शब्दों के रूपों की तालिका विशेष रूप से दी गई हो, वहाँ वहुवचन संबोधन कारक का यही रूप समझाया गया होगा।

यहाँ से आगे मैं मूल लेख के बिंदुओं के क्रम और विवरण को कुछ कुछ अनदेखा कर रहा हूँ, पर उनके तर्क को नहीं।

6) 7) 8) 9) गीतों के विषय में…

मैं इस से काफी हद तक सहमत हूँ कि गीतों के उच्चारण कई बार ठीक नहीं सुनाई देते और विभिन्न गायक अलग अलग तरह से गाते हैं। मुझे यह भी लगता है कि हम गीतों में वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं, पर फिर भी मुझे अधिकांश गीतों में नियमानुसार (बिना अनुस्वार के) ही संबोधन का उच्चारण सुनाई दिया है, चाहे वह लता का “ऐ मेरे वतन के लोगो हो..“, आशा का “लोगो, न मारो इसे..” हो, रफ़ी का “कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो..” हो, अमिताभ का “मेरे पास आओ मेरे दोस्तो..” हो, अमित कुमार का “मेरी आवाज़ के दोस्तो..” हो, या उदित नारायण और चित्रा का “यारो सुन लो ज़रा..” हो। इसी तरह लता का “बहारो, मेरा जीवन भी सँवारो..” या रफ़ी का “बहारो फूल बरसाओ..” सुनें। सोच कर अनुस्वार रहित सुनने की कोशिश करें। गीत में अनुस्वार रहित, नियमानुसार उच्चारण सुनाई देगा। दरअसल कुछ गीतों में अनुस्वार आ जाएगा तो तुकबंदी (rhyme) भी समाप्त हो जाएगी। जैसे,

मेरे पास आ
मेरे दोस्तो
एक किस्सा सुनो
(यह केवल side observation है, नियम के पक्ष में तर्क नहीं)

“ऐ मेरे वतन के लोगो” यदि गूगल बुक्स में खोजेंगे तो छपी पुस्तकों में व्याकरणानुसार प्रयोग के अधिक उदाहरण मिलेंगे। अन्यथा वेब पर अनौपचारिक लेखन वाले लोग ज़्यादा हैं, जिनके लेखन की कोई गुणवत्ता नहीं परखता। छपी पुस्तकों में ऐसा नहीं है।

10) अनुस्वार हटाने से बने अवांछित परिणामों के कुछ उदाहरण

लोगो (logo) शब्द का अंग्रेजी में अलग अर्थ आता है, यह कोई कारण नहीं है कि हम व्याकरण के एक नियम को निरस्त कर दें। हिंदी भाषा के कम से कम दर्जनों ऐसे शब्द होंगे जिनके अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में अलग अर्थ होंगे, उदाहरणतः काम (calm), कौन (con), बाल (bawl, ball), आदि। क्या हम इन शब्दों का प्रयोग भी छोड़ दें, या इन का रूप बदल दें? इस आधार पर किसी भाषा की शब्दावाली या व्याकरण में परिवर्तन नहीं किया जाता कि उस शब्द का अन्य भाषाओं में क्या अर्थ है।

ऐसे ही एक भाषा में भी एक शब्द के दो या तीन अर्थ हो सकते हैं। संदर्भ से सब समझ में आता है। नदी कल भी कल कल कर रही थी और कल भी कल कल करेगी। बताइए इसमें से कौन सा “कल” आपको असमंजस में डाल रहा है? इसी तरह “लोटो, यहाँ मत लोटो” जैसे वाक्यों से भी कोई कन्फ्यूजन नहीं होगा। एक शब्द के विभिन्न अर्थ होना आम बात है, और यह शब्दालंकार की श्रेणी में आता है। इससे वाक्य को समझने में कोई अंतर नहीं पड़ता। बल्कि जिसे इस नियम की आदत हो, उसे “लोटों..” कहना अटपटा लगेगा।

11) हाँ भारत सरकार की डाक टिकट पर “लोगों” लिखा होना एक बहुत बड़ी बात है, और यह बात यह दर्शाती है कि इस नियम का उल्लंघन मेरे अनुमान से कहीं अधिक होता है, जिस में न केवल आम हिंदी भाषी हैं, बल्कि सरकारी निज़ाम के लोग भी हैं। वैसे इस टिकट का जो ग्राफिक इंटरनेट पर उपलब्ध है, वह कुछ आधिकारिक नहीं लगता, कुछ philately साइट्स द्वारा बनाया लगता है। भारतीय डाक की वेबसाइट खोजने की कोशिश की तो वहाँ वही हाथ लगा जो सरकारी साइटों पर हाथ लगता है। अंडा

13) इस नियम के औचित्य पर कई सवाल उठाते हैं, यथा, “ऐ दिले नादां …” और “दिले नादां तुझे हुआ क्या है” जैसी रचनाओं में एकवचन में भी अनुस्वार हटाया नहीं जाता तो फिर जिस बहुवचन में अनुस्वार सदा होता है उससे हटाने का आग्रह क्योंकर हो?

नादां नादान शब्द का वैकल्पिक रूप है और फारसी से आया है। हर भाषा के अपने नियम होते हैं और इसका हिंदी व्याकरण से कोई संबंध नहीं है। आप यह मानकर क्यों चल रहे हैं कि हिंदी व्याकरण में बहुवचन का अनुस्वार “हटाया” जा रहा है? बात अनुस्वार हटाने की नहीं है, बल्कि संबोधन और संबोधन-रहित प्रयोग में शब्द के भिन्न रूप प्रयोग करने की बात है, जिस में कोई विस्मय की बात ही नहीं है। हिंदी की जननी संस्कृत में किसी भी शब्द के रूपों की तालिका को देख लीजिए (इस पृष्ठ पर), संबोधन कारक का अलग रूप होता है। नियम का औचित्य जानना होगा तो हर नियम का औचित्य जानना होगा।

14) अनुस्वार हटाकर बहुवचन का एक नया रूप बनाने के आग्रह को मैं हिन्दी के अथाह सागर का एक क्षेत्रीय रूपांतर मानता हूँ और अन्य अनेक स्थानीय व क्षेत्रीय रूपांतरों की तरह इसके आधार पर अन्य/भिन्न प्रचलित परम्पराओं को गलत ठहराए जाने का विरोधी हूँ।

एक उदाहरण देखा जाए तो आकारांत शब्द लोटा (या लड़का) का बहुवचन लोटों नहीं है। उसका बहुवचन लोटे है। जब साधारण कर्ता के रूप में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है तो लिखा जाता है – लोटे लोट रहे हैं। क्या यह सही है? लोटे कब लोटे हैं? क्या यह सही है? इस में तो शब्द के repetition से कोई समस्या नहीं आई न?

जब इसी बहुवचन को oblique subject के रूप में प्रयोग किया जाता है तो उसमें ए के स्थान पर ओं की मात्रा जोड़ी जाती है। लोटों में पानी भरो।

जब इसी बहुवचन को संबोधन के रूप में प्रयोग किया जाता है तो उसमें ए के स्थान पर ओ की मात्रा जोड़ी जाती है। लोटो, तुम खाली कैसे हो गए?

संबोधन और oblique subject के लिए एक ही शब्द प्रयोग करने के आग्रह का भी तो कोई मूल होना चाहिए। हाँ, अंग्रेज़ी में इन तीनों के लिए एक ही शब्द का प्रयोग होगा। पर संस्कृत में संबोधन के लिए अलग रूप प्रयुक्त होता है। आप हिंदी व्याकरण की तुलना अंग्रेजी ग्रैमर से करना चाहेंगे, या संस्कृत व्याकरण से?

आप यदि इसे क्षेत्रीय रूपांतर मानते हैं तो आपकी इच्छा, पर यह नियम मुख्य धारा की हिंदी के व्याकरण का अंग है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता।

अंत में यही कहना चाहूँगा कि यह नियम नियम है। न यह हानिकारक है, न औचित्य रहित, और न ही अल्प-प्रयुक्त। हाँ, भाषा स्थिर नहीं है, परिवर्तित होती रहती है, इस कारण यदि यह नियम धीरे धीरे समाप्त हो जाता है तो हो जाए। यदि अनुस्वार का प्रयोग आधिकारिक रूप से मान्य होता है तो हो जाए। पर लोगों की बहुत बड़ी संख्या का एक विशिष्ट प्रयोग व्याकरण के नियम को निरस्त नहीं करता। अंग्रेजी या हिंदी को मातृभाषा के रूप में प्रयोग करने वालों की यदि व्याकरण की परीक्षा ली जाए तो अधिकांश लोग ऊँचे अंकों से उत्तीर्ण नहीं होंगे। मातृभाषा बोलना एक बात है, और व्याकरण का पालन दूसरी। यदि बोलचाल की भाषा के आधार पर व्याकरण में परिवर्तन किए जाएँ तो हर साल नया व्याकरण लिखना पड़ेगा।

मूल अंग्रेज़ी लेख7 Things to Consider Before Choosing Sides in the Middle East Conflict
लेखकअली अमजद रिज़वी, अनुवादक – रमण कौल


[इसराइल-फ़लस्तीन मुद्दे पर हम सभी अपना अपना पाला चुनते हैं। इस मुद्दे पर संतुलित विचार बहुत कम मिलते हैं। अली रिज़वी, जो एक पाकिस्तानी मूल के कनैडियन लेखक-डॉक्टर-संगीतज्ञ हैं, का यह लेख इस कमी को बहुत हद तक पूरा करता है। लेखक की अनुमति से मैंने मूल लेख को यहाँ अनूदित किया है।]


आप “इसराइल समर्थक” हैं या “फ़लस्तीन समर्थक”? आज अभी दोपहर भी नहीं हुई है और मुझ पर दोनों होने के आरोप लग चुके हैं।

इस तरह के लेबल मुझे बहुत परेशान करते हैं क्योंकि वे सीधे इसराइल फ़लस्तीनी संघर्ष की हठधर्मी कबीलावादी प्रकृति की ओर इशारा करते हैं। अन्य देशों के बारे में तो इस तरह से बात नहीं की जाती। फिर इन्हीं देशों के बारे में क्यों? इसराइल और फ़लस्तीन दोनों के मुद्दे जटिल हैं, दोनों के इतिहास और संस्कृतियाँ विविधता से भरी हैं, और दोनों के मज़हबों में बहुत सी समानताएँ हैं, भले ही ग़ज़ब के विभाजन हों। इस मुद्दे पर दोनों में से एक पक्ष का समर्थन करना मुझे तर्कसंगत नहीं लगता।

ग़ौरतलब है कि विश्व भर में अधिकतर मुसलमान फ़लस्तीनियों का समर्थन करते हैं, और अधिकतर यहूदी इसराइल का। यूँ तो यह बात कुदरती है — पर इसमें एक समस्या भी है। इसका अर्थ यह हुआ कि मुद्दा यह नहीं है कि कौन सही है और कौन ग़लत, बल्कि यह कि आप की वफादारी किस कबीले या देश की ओर है। यानी जो फ़लस्तीनी समर्थक है वह यदि इसराइली या यहूदी परिवार में जन्मा होता तो इतनी ही शिद्दत से इसराइल का समर्थन करता, और उसके उलट भी ऐसा ही होता। मतलब, जिन सिद्धांतों के आधार पर लोग इस झगड़े पर अपनी राय बनाते हैं वे सिद्धांत अधिकतर जन्म के संयोग पर आधारित हैं। और हम मध्य पूर्व के इस पचड़े के विभिन्न पहलुओं पर कितना भी दिमाग़ लगाएँ, कितना भी विश्लेषण करें, आखिरकार यह एक मूलतः कबाइली संघर्ष ही रहेगा।

पारिभाषिक रूप से, कबाइली संघर्ष तभी फलते फूलते हैं जब लोग पक्ष या पाले चुनते हैं। लोगों का पाले चुनना इस तरह के झगड़ों में आग में घी की तरह काम करता है और ध्रुवीकरण को और गहरा करता है। सब से बुरी बात यह है कि आप के पाले चुनने से आपके हाथ खून में रंग जाते हैं।

इसलिए इसराइल-फ़लस्तीन के इस नवीनतम संघर्ष में पाला चुनने से पहले इन सात प्रश्नों पर ध्यान दीजिए

***

1. यहूदियों का नाम आते ही मसला और क्यों बिगड़ जाता है?

यह लेख लिखे जाने के समय ग़ज़ा में 700 से ज़्यादा लोग मर चुके हैं। दुनिया के मुसलमान जाग उठे हैं। पर क्या ऐसा वास्तव में मृतकों की संख्या के कारण हुआ है?

बशर-अल-असद ने दो साल में 1,80,000 से अधिक सीरियाइयों को मौत के घाट उतारा है, जिन में से अधिकतर मुसलमान थे। यह संख्या फ़लस्तीन में पिछले दो दशकों में मारे गए लोगों से अधिक है। आइसिस (ISIS) ने ईराक और सीरिया में पिछले दो महीनों में हज़ारों मुसलमानों को मारा है। तालिबान के हाथों भी दसियों हज़ार लोग मरे हैं। सूडान में अरब मुसलमानों ने पाँच लाख अश्वेत मुसलमानों को मौत की नींद सुलाया है। इस सूची का कोई अंत नहीं।

पर ग़ज़ा की बात हो तो दुनिया भर के मुसलमान, चाहे वह सुन्नी हों या शिया, ऐसे बोल पड़ते हैं जैसे वे अन्य मुद्दों पर नहीं बोलते। उनकी सोशल मीडिया टाइमलाइनों पर हर रोज़ ताज़ातरीन मौतों की गिनतियों और गज़ा के बच्चों की लाशों की भयावह तस्वीरों की बाढ़ लग जाती है। यदि यह बात लाशों की गिनती की ही होती, तो क्या ग़ज़ा के इलावा दूसरे तनाज़ों पर अधिक ध्यान नहीं होता? फिर यह बात है तो किस चीज़ की है?

सोचिए यदि असद और आइसिस (ISIS) यहूदी होते तो उनको किस तरह के विरोध का सामना होता?

हैरानी की बात यह है कि इंटरनेट पर प्रसारित हो रही मृत बच्चों की कई तस्वीरें जो इसराइली बमबारी के शिकार बच्चों की बताई जाती हैं, असल में सीरिया की तस्वीरें होती हैं — ऐसा बीबीसी की इस रिपोर्ट में कहा गया है। जिन बच्चों की आप तस्वीरें देखते हैं, उनमें से कई का कातिल असद है, जिसे ईरान का समर्थन हासिल है — वही ईरान जो हिज़बुल्ला और हमास को भी पैसा देता है। मृत बच्चों का इससे ज़्यादा शोषण क्या होगा कि आप अपने समर्थकों द्वारा मारे गए मासूम बच्चों की तस्वीरों का ठीकरा अपने दुश्मन पर फोड़ रहे हों, केवल इसलिए कि जब आपके अपने आपके अपनों को मार रहे थे तो आप पूरा ध्यान नहीं दे रहे थे?

इस सब के बावजूद इसराइली फौज की गुंडागर्दी, लापरवाही, और कभी कभी सरासर क्रूरता, को बख्शा नहीं जा सकता। पर यह बात इस संभवता की ओर इशारा करती है कि अहले इस्लाम का इसराइल विरोध केवल मृत लोगों की संख्या के कारण नहीं है।

मेरी तरह जो लोग मध्य पूर्व या अन्य मुस्लिम-बहुल देशों में बड़े हुए हैं, उन से एक सवाल है — यदि इसराइल अपने कब्ज़े वाले क्षेत्रों से कल एक झटके में फौजें हटा ले और 1967 की सीमाओं पर वापस चला जाए और फ़लस्तीनियों को पूर्व येरूशलम भी दे दे तो क्या आपको ईमानदारी से लगता है कि हमास झगड़ा करने के लिए कुछ और नहीं खोज निकालेगा? क्या आप ईमानदारी से यह सोचते हैं कि इसका वास्ता उनके यहूदी होने से बिल्कुल नहीं है? क्या आपको याद है कि फ़लस्तीन, सऊदी अरब या मिस्र में बड़े होते हुए आपने सरकारी टीवी पर क्या क्या देखा है और क्या क्या सुना है?

हाँ, कब्ज़ा अन्यायपूर्ण भी है और ग़ैरक़ानूनी भी। और हाँ, मानवीय अधिकारों के हनन की तो अति है। पर यह भी सही है कि दूसरी ओर की अधिकांश शत्रुता यहूदी-विरोध का नतीजा है। जो व्यक्ति अरब/मुस्लिम दुनिया में कुछ साल भी रहा हो, उसे यह बात मालूम है। चॉम्स्की और ग्रीनवाल्ड जैसे लेखक जो किसी एक तरफ पर इलज़ाम लगाते हैं, वैसा भी नहीं है। ग़लती दोनों तरफ है।

2. सब लोग यह क्यों कहते हैं कि यह मज़हबी संघर्ष नहीं है?

मध्य पूर्व तनाज़े की “जड़ों” के बारे में तीन व्यापक मिथकों का खूब प्रसारण हो रहा है
मिथक 1 – यहूदी धर्म का यहूदीवाद (ज़ायनिज़्म) से कोई वास्ता नहीं है
मिथक 2 – इस्लाम का आतंकवाद और यहूदी-विरोध से कोई वास्ता नहीं है
मिथक 3 – इस झगड़े का मज़हब से कोई वास्ता नहीं है

जो पहले मिथक के समर्थक हैं और कहते हैं कि “मुझे ज़ायनिज़्म से शिकायत है यहूदी धर्म से नहीं”, मैं उनसे यह पूछना चाहता हूँ कि क्या यह महज़ संयोग है कि बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट की यह पंक्तियाँ आजकल के घटनाक्रम का यथार्थ ब्यौरा देती हैं?

“मैं तुम्हारी सीमाएँ लाल सागर से भूमध्य सागर तक और मरुस्थल से फ़रात नदी तक स्थापित करूँगा। उस भूमि पर रहने वाले लोग तुम्हारे हवाले करूँगा और तुम आने से पहले उन्हें खदेड़ दोगे। उनके साथ और उनके खुदाओं के साथ कोई समझौता मत करना।” – एक्सोडस 23:31-32

या फिर यह?

“देखो मैंने तुम्हें यह भूमि दी है। जाओ और उस भूमि पर कब्ज़ा करो जो मालिक ने तुम्हारे पूर्वजों — इब्राहिम, इसहाक और याकूब — और उनके बाद उनके वंशजों को देने की कसम खाई थी।” – ड्यूटरोनॉमी 1:8

और भी है। जेनेसिस 15:18-21 और नंबर्स रब्बा 34 में सीमाओं के और विवरण दिए गए हैं। ज़ायनिज़्म यहूदी धर्म का “राजनीतिकरण” या उसकी “विकृति” नहीं है, बल्कि उसका पुनर्जीवन है।

और जो दूसरे मिथक के समर्थक हैं और कहते हैं कि “मसला इस्लाम का नहीं, सियासत का है”, वे यह बताएँ कि क्या कुरआन की यह आयत बेमतलब है?

“ओ विश्वास करने वालो, यहूदियों और ईसाइयों को साथी मत बनाना। वे [दरअसल] एक दूसरे के साथी हैं। और तुम में से जो उनका साथी बनेगा वह बेशक उन्हीं में से [एक] हो जाएगा। बेशक, अल्लाह ग़लती करने वालों का पथप्रदर्शन नहीं करता।” – क़ुरआन, 5:51

हमास के घोषणापत्र में जो बहुत सी आयतों और हदीसों का उद्धरण है, उनका क्या? और ग़रक़द वृक्ष की वह प्रसिद्ध हदीस जिसमें मुसलमानों को हुक्म हुआ है यहूदियों को मारने का?

मुझे यह बताएँ — इसराइल के निर्माण और फ़लस्तीन के कब्ज़े के सैंकड़ों-हज़ारों साल पहले लिखे इन वचनों के चलते — कोई यह कैसे कह सकता है कि मज़हब इस सब की जड़ नहीं है, या कम से कम इसकी मुख्य प्रेरक शक्ति नहीं है। आप शायद इन आयतों को नज़र अंदाज़ करें, पर इस युद्ध के दोनों ही तरफ के कई योद्धा इन्हें बहुत गंभीरता से लेते हैं। क्या उन के अस्तित्व को माना नहीं जाना चाहिए या उनकी बात का उत्तर नहीं दिया जाना चाहिए? ऐसा कब हुआ है आपने वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के फैलाव के समर्थन में कोई तर्कसंगत और धर्मनिरपेक्ष बहस सुनी हो?

मज़हब की भूमिका से इनकार करने का उद्देश्य यह लगता है कि लोगों की भावनाओं को “ठेस” पहुँचाने के डर से उनके ऐसे विश्वासों का “क्षमा याचना सहित आदर” भी किया जाए और साथ ही सियासत की आलोचना भी की जाए। पर इन अमानवीय विचारों का क्षमा याचना सहित आदर करने की क़ीमत क्या इतने लोगों की ज़िंदगियों की क़ीमत से बढ़ कर है?

लोगों के तो दुनिया भर के विश्वास होते हैं — कोई ज़मीन को चपटी मानता है तो कोई कहता है हिटलर ने यहूदियों को नहीं मारा। आप उन लोगों के ऐसे विचार रखने के अधिकार का आदर कर सकते हैं, पर उनके विचारों का आदर करने की आपको कोई मजबूरी नहीं हैं। साल 2014 है, और मज़हबों को किसी भी राजनीतिक विचारधारा या दार्शनिक विचार प्रणाली से अधिक आदर देने की कोई ज़रूरत नहीं है। मनुष्यों के अधिकार होते हैं। विचारों के नहीं। इब्राहमी मज़हबों में राजनीति और मज़हब के जिस विभाजन की आम तौर पर दुहाई दी जाती है वह झूठी और भ्रामक है। सारे ही इब्राहमी मज़हब मूलतः राजनीतिक हैं।

***

3. इसराइल जान बूझ कर नागरिकों (सिविलियन्स) को क्यों मारना चाहेगा?

यह मुद्दा सबसे ज़्यादा लोगों का पारा चढ़ा देता है, और चढ़ाना भी चाहिए।

निर्दोष गज़ा-वासियों के मारे जाने का कोई औचित्य नहीं है। और ग़ज़ा के एक बीच पर चार बच्चों की हत्या जैसी घटनाओं में इसराइल की लापरवाही के लिए भी कोई बहाना नहीं चलेगा। पर एक मिनट पीछे हट कर इस बारे में सोचा जाए।

इसराइल जान बूझ कर सिविलियन्स को भला क्यों मारना चाहेगा?
जब आम नागरिक मरते हैं तो इसराइल एक दानव सा दिखता है। उसे अपने करीबी समर्थकों का भी गुस्सा झेलना पड़ता है। घायलों और निर्दोष मृतकों की भयावह तस्वीरों की मीडिया में बाढ़ आ जाती है। नॉर्वे से न्यू यॉर्क तक हर जगह इसराइल विरोधी प्रदर्शन होते हैं। और इसराइली घायलों और मृतकों की अपेक्षाकृत कम संख्या (उस पर अभी बात करेंगे) बार बार इसराइल के द्वारा अपेक्षाकृत अधिक बल प्रयोग के आरोपों को जन्म देती है। सबसे बड़ी बात यह है कि आम नागरिकों की मौतों से हमास को बहुत मदद मिलती है। यह सब इसराइल के पक्ष में कैसे हो सकता है भला?

यदि इसराइल आम नागरिकों को मारना चाहता है, तो वह इस खेल में अनाड़ी है। जितने नागरिक इसराइल ने दो सप्ताह में मारे, आइसिस (ISIS) ने दो दिन में उस से ज़्यादा (700 से ऊपर) मारे। कल्पना कीजिए यदि आइसिस या हमास के पास इसराइल जितने हथियार होते, उतनी फौज होती, उतनी वायुसेना होती, अमरीकी समर्थन होता, और परमाणु शस्त्रागार होता, तो उनके दुश्मनों का बरसों पहले नाश हो गया होता। यदि इसराइल वास्तव में ग़ज़ा को नष्ट करना चाहता, तो उसे ऐसा करने में एक दिन नहीं लगता, वह भी बिना ज़मीन पर उतरे। ऐसा कष्टदायक, खर्चीला ज़मीनी हमला क्यों करना जिससे उसके अपने फौजियों की जानें खतरे में पड़ती हों?

***

4. क्या हमास वास्तव में अपने नागरिकों को ढाल की तरह इस्तेमाल करता है

फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से ही पूछ लीजिए कि वह हमास के दाँव-पेचों के बारे में क्या सोचते हैं।

“रॉकेट दाग कर तुम लोग क्या हासिल करने की कोशिश कर रहे हो?” वे पूछते हैं। “मुझे फ़लस्तीनी खून का सौदा करना अच्छा नहीं लगता।”
हमास अपने नागरिकों को जंग में आगे करता है, यह अब केवल अंदेशा लगाने की बात नहीं है।

हमास के वक्ता समी अबू ज़ुहरी ने ग़ज़ा के राष्ट्रीय टीवी पर साफ कबूला कि मानव-ढाल रणनीति “बहुत प्रभावी” सिद्ध हुई है।

संयुक्त राष्ट्र की राहत संस्था UNRWA ने पिछले हफ्ते एक नहीं, दो बाल विद्यालयों में छिपाए गए रॉकेट पाए जाने पर हमास की पुरज़ोर निंदा की

हमास इसराइल में हज़ारों रॉकेट दागता है, जिससे मुश्किल से ही कोई नागरिक मरता है या गहरा नुक्सान होता है। हमास इन रॉकेटों को घनी आबादी वाले क्षेत्रों से दागता है, जिस में अस्पताल और विद्यालय शामिल हैं।

ये रॉकेट ऐसे क्यों दागते हैं जिनसे दूसरे पक्ष को तो कुछ ज़्यादा नुक्सान नहीं होता, पर अपने लोगों पर नुक्सान की दावत दी जाती है? और फिर जब उन रॉकेटों का जवाब आता है तो वे अपने नागरिकों को बीच में डाल देते हैं। जब IDF नागरिकों को हमले से पहले घर छोड़ने की चेतावनी देता है, तो हमास उन्हें डटे रहने के लिए क्यों कहता है?

क्योंकि हमास को मालूम है कि जब ग़ज़ावासी मरते हैं तो उनका अपना पलड़ा भारी हो जाता है। यदि कोई एक चीज़ हमास को सबसे ज़्यादा मदद करती है — एक चीज़ जो उन्हें कुछ वैधता प्रदान करती है — वह है आम नागरिकों की मौत। स्कूलों में रॉकेट? हमास अपने बच्चों की मौत को इस्तेमाल करता है दुनिया की हमदर्दी हासिल करने के लिए। वह उन्हें हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है।

हमास से नफ़रत करने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि आप इसराइल को पसंद करें। देखा जाए तो इसराइल और फतह नैतिक रूप से लगभग बराबर हैं। दोनों के हक में कुछ सही बाते हैं। पर हमास की बात करें तो उनके हक में तिनके बराबर भी अच्छाई नहीं है।

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5. लोग इसराइल से ग़ज़ा का “कब्ज़ा” खत्म करने की माँग क्यों करते हैं?

क्योंकि उनकी याददाश्त कमज़ोर है।

2005 में इसराइल ने ग़ज़ा का कब्ज़ा समाप्त किया था। उन्होंने हर आखिरी इसराइली फौजी को वापस बुला लिया था। हर आखिरी बस्ती को हटा दिया था। कई इसराइली बस्तीवाले, जिन्होंने छोड़कर जाने से मना किया, चीखते चिल्लाते बलपूर्वक घरों से खदेड़े गए थे।

यह इसराइल द्वारा एक एकपक्षीय कदम था — इसराइलियों और फ़लस्तीनियों के बीच का टकराव कम करने की एक युद्धविराम मुहिम का हिस्सा। पूरी आज़ादी तो नहीं थी — ग़ज़ा की थल सीमा, जल सीमा, हवाई क्षेत्र पर अभी भी इसराइल का नियंत्रण था — पर इस इलाके के इतिहास को देखते हुए यह एक अच्छी खासी पहल थी।

फौजों की वापसी के बाद इसराइल ने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सीमा चौकियाँ खोली। फ़लस्तीनियों को 3000 ग्रीनहाउस दिए गए जो पहले ही कई सालों से निर्यात के लिए फल और फूल उपजा रहे थे।

पर हमास ने स्कूल, व्यवसाय, या अन्य बुनियादी ढाँचे स्थापित करने में निवेश न करने का निर्णय लिया। बल्कि, उन्होंने सुरंगों का एक बहुत पेचीदा जाल बनाया जिस में हज़ारों हज़ार रॉकेट और अन्य हथियार रखे, जिन में ईरान और सीरिया से हासिल किेए गए नए और जटिल हथियार भी थे। सभी ग्रीनहाउस नष्ट कर दिए गए।

हमास ने अपने लोगों के लिए बम आश्रयस्थल नहीं बनाए। हाँ अपने नेताओं के लिए कुछ बम आश्रयस्थल बनाए ताकि वे हवाई हमलों में उनमें छिप सकें। आम नागरिकों को इन आश्रयस्थलों में जाने की अनुमति नहीं है, बिल्कुल उसी कारण से जिस से हमास उन्हें बमबारी के समय घरों में रहने के लिए कहता है।

2005 में ग़ज़ा को एक बहुत बड़ा सुअवसर मिला था जिसे हमास ने इसे एक इसराइल विरोधी शस्त्रागार में बदल कर गवाँ दिया, बजाय इसके कि इसे एक संपन्न फ़लस्तीनी देश में बदला जाता, जो समय के साथ वेस्ट बैंक के भविष्य के लिए भी एक उदाहरण बन सकता था। यदि फतह को हमास से नफरत करने का एक और कारण चाहिए था, तो उन्हें वह मिल गया।

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6. ग़ज़ा में इसराइल से इतनी ज़्यादा जनहानि क्यों होती है?

इसराइल के नागरिक कम संख्या में मरते हैं इसका कारण यह नहीं है कि उनके ऊपर कम रॉकेट बरसते हैं। यह इसलिए है कि उनकी सरकार उनकी बेहतर सुरक्षा करती है।

जब हमास के प्रक्षेपास्त्र इसराइल की ओर बढ़ते हैं तो साइरन बजने शुरू हो जाते हैं, लौह छतरी (आइरन डोम) प्रभावशाली हो जाती है, और नागरिकों को बम आश्रयस्थलों में दौड़ाया जाता है। जब इसराइली प्रक्षेपास्त्र ग़ज़ा की ओर बढ़ते हैं तो हमास नागरिकों को घरों में रह कर उनका सामना करने को कहता है।

जब इसराइल की सरकार अपने नागरिकों को उनको निशाना बनाकर फेंके गए रॉकेटों से बच निकलने को कहती है, ग़ज़ा की सरकार अपने नागरिकों को उन मिज़ाइलों का सामना करने को कहती है जो उनको निशाना बनाकर नहीं फेंके गए होते।

इसका आम तौर पर यह स्पष्टीकरण दिया जाता है कि हमास के पास धन नहीं है और इसराइल की तरह उसके पास अपने लोगों की सुरक्षा के लिए संसाधन नहीं हैं। परंतु, लगता है कि वास्तविक कारण का वास्ता संसाधनों का कमी से न हो कर उनकी अव्यवस्थित प्राथमिकताओं से है (#5 देखें)। बात इच्छाशक्ति की है, सामर्थ्य की नहीं। वे सारे रॉकेट, मिज़ाइल, और सुरंगें बनानी या हासिल करनी सस्ती तो नहीं है। पर वे उनकी प्राथमिकता है। ऐसा भी नहीं है कि फ़लस्तीन के पास तेल वाले अमीर पडौसियों की कमी है जो उनकी मदद कर सकते थे जैसे अमरीका इसराइल की करता है।

समस्या यह है कि यदि ग़ज़ा में नागरिक हताहतों की संख्या गिरती है तो हमास अपने असरदार प्रचार प्रसार में काम आने वाला इकलौता हथियार खो देता है। इसराइल के राष्ट्रीय हित में है कि वह अपने नागरिकों को बचाए और ग़ज़ा में होनो वाली मौतों को कम से कम रखे। हमास के हित में यह है कि वह दोनों मुद्दों पर इस से ठीक उलट करे।

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7. यदि हमास इतना ही बुरा है तो इस संघर्ष में सभी इसराइल समर्थक क्यों नहीं हैं?

क्योंकि इसराइल की जो बुराइयाँ हैं, वह संख्या में कम भले ही हों, प्रभाव में व्यापक हैं।

ऐसा लगता है कि कई इसराइलियों की वही कबाइली मनोवृत्ति है जो उनके फ़लस्तीनी पडौसियों की है। वे ग़ज़ा की बमबारी पर वैसे ही खुशियाँ मनाते हैं जैसे कई अरबों ने 9/11 के समय मनाई थीं। हाल की एक संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पाया गया कि इसराइली फौजियों ने फ़लस्तीनी बच्चों को यातनाएँ दीं और उन्हें मानव-ढाल की तरह इस्तेमाल किया। उन्होंने नवयुवकों को पीटा। हवाई हमलों में वे आम तौर पर लापरवाही बरतते हैं। उनके उस्ताद उन्हें बताते हैं कि कैसे बलात्कार को वे दुश्मन के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। और कई तो बेदर्दी से और सब के सामने निर्दोष फ़लस्तीनी बच्चों की मौतों का ढोल पीटते हैं

सच कहा जाए तो इस तरह की चीज़ें दोनों तरफ होती हैं। 65 से ज़्यादा सालों से जब लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी एक दूसरे से नफरत करना सिखाया जाता हो तो ऐसा होना स्वाभाविक है। इसराइल से एक ऊँचे मानक की उम्मीद करने का अर्थ है फ़लस्तीनियों से कम की उम्मीद करना, जो एक तरह से नस्लवादी सोच है।

परंतु यदि इसराइल स्वयं को एक ऊँचे मानक पर रखता है, जैसे कि वह दावा करता है, तो उसे इसका बेहतर सबूत देना पड़ेगा कि वह अपने बुरे से बुरे पडौसियों जैसा नहीं है।

इसराइल स्वयं को दो बातों की वजह से बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय अलगाव और राष्ट्रीय आत्महत्या की ओर ओर ले जा रहा है — 1. फ़लस्तीनी इलाकों पर कब्ज़ा, और 2. यहूदी बस्तियों का विस्तार।

बस्तियों का विस्तार एकदम समझ से परे है। इसका मतलब किसी की समझ में नहीं आता। सच पूछो तो हर अमरीकी सरकार — निक्सन से बुश से ओबामा — ने इसका स्पष्ट रूप से विरोध किया है। बाइबल के आदेश (#2 देखें) के अतिरिक्त इसका कोई औचित्य नहीं है, जिसके कारण इसराइल के इरादों को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष समझना थोड़ा और मुश्किल हो जाता है।

फ़लस्तीनी इलाकों पर कब्ज़ा और भी पेचीदा है। दिवंगत क्रिस्टोफर हिचन्स ने सही कहा था, जब उन्होंने फ़लस्तीनी क्षेत्रों पर इसराइली कब्ज़े के बारे में यह बयान दिया था

“यदि इसराइल को मज़हबी बर्बरता, धर्मशास्त्री, या शायद थर्मो-परमाणु-धर्मशास्त्री, या परमाणु-धर्मशास्त्री, जो भी आप कहना चाहते हैं, उसके विरोधी संगठन का हिस्सा बनना है तो उसे कब्ज़े को छोड़ना पड़ेगा। बात सीधी सी है।

इसराइल चाहे तो यूरोपीय, पश्चिमी पद्धति का राष्ट्र बन सकता है, पर वह दूसरे लोगों पर उनकी मर्जी के खिलाफ हुकूमत नहीं कर सकता। वह आए दिन उन की ज़मीनें नहीं चुरा सकता। और इसराइल के लिए यह निहायत ही गैरज़्म्मेदाराना है कि वह अमरीका और उसके दुनिया भर के साथियों की स्थिति को जानते हुए भी इस तरह का अनुचित व्यवहार करे। माफ कीजिेए मुझे इस संघर्ष के इतिहास के विषय में इतना ज़्यादा मालूम है कि मैं इसराइल को भूखे भेड़ियों के समंदर से घिरा हुआ एक छोटा सा द्वीप नहीं मान सकता। मेरा मतलब है कि मुझे काफी कुछ मालूम है कि इस राष्ट्र की स्थापना कैसे हुई, और उसके साथ कितनी हिंसा और छीना झपटी हुई। मैं उस इल्म का कैदी हूँ। मैं जान कर अनजान नहीं हो सकता।”

जैसा 2005 में ग़ज़ा में देखा गया, एकतरफा युद्धविराम की बात करना आसान है पर वास्तव में निभाना मुश्किल। पर यदि इसराइल एक द्विराष्ट्रीय (या शायद हमास की बदौलत त्रिराष्ट्रीय) हल की तरफ और मेहनत से काम नहीं करता तो आखिर उसे चुनना पड़ेगा कि वह एक यहूदी बहुल राष्ट्र रहना चाहता है या एक प्रजातंत्र।

इसराइल को अभी एक रंगभेदी राष्ट्र कहना जल्दबाज़ी होगी, पर जब जॉन केरी ने कहा कि इसराइल भविष्य में शायद एक रंगभेदी राष्ट्र कहलाया जा सकता है तो वह पूरी तरह ग़लत भी नहीं थे। हिसाब सीधा है। गैर यहूदी अक्सरियत के साथ इसराइल अपनी यहूदी पहचान बनाए रखे इसके तरीके सीमित हैं। और उन तरीकों में से कोई भी भला नहीं है।

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इस बात से रूबरू होना ज़रूरी है कि भूमि अब दोनों की है। 1940 के दशक में ब्रिटेन की मदद से यहूदियों के लिए इसराइल फ़लस्तीन से उसी तरह काट कर बनाया गया, जैसे मुसलमानों के लिए मेरा जन्मस्थान पाकिस्तान उन्हीं दिनों भारत से काट कर बनाया गया। दोनों प्रक्रियाएँ पीडादायक थीं और दोनों ने लाखों लोगों को विस्थापित किया। पर अब लगभग 70 साल गुज़र चुके हैं। अब दो या तीन पीढ़ियाँ इस भूमि पर जन्मी हैं और पली बढ़ी हैं, जिनके लिए यह घर है, और जिनको अक्सर ऐसे ऐतिहासिक अत्याचारों का खमियाज़ा भुगतना पड़ता है जिनमें उनकी कोई ग़लती नहीं थी। उन्हें “दूसरों” का विरोध करना वैसे ही सिखाया जाता है जैसे फ़लस्तीनी बच्चों को। मूलतः यह एक कबाइली मज़हबी झगड़ा है, जो तब तक नहीं सुलझ सकता जब तक लोग पाले चुनना नहीं छोड़ते।

इसलिए आपको “इसराइल समर्थक” और “फ़लस्तीन समर्थक” के बीच चुनाव करने की कोई ज़रूरत नहीं है। यदि आप धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, और द्विराष्ट्रीय हल का समर्थन करते हैं — और हमास, बस्ती विस्तार, और कब्ज़े का विरोध करते हैं — तो आप दोनों ही हो सकते है।

उसके बाद भी अगर आपको एक पाला चुनने के लिए कहा जाए, तो कह दीजिए मैं हम्मस (चने से बना एक अरबी व्यंजन) के पाले में हूँ।

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admin on December 14, 2013

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बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ।

1861 में अंग्रेज़ों की बनाई IPC धारा 377 के अनुसार आदमी-आदमी के प्यार को अपराध करार दिया गया था। आज डेढ़ सौ साल बाद हम इस धारा को हटाने के प्रयासों में असफल हो गए हैं। मेरे हर दोस्त का इस बारे में कुछ कहना है, और बहुत कम लोगों को सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ग़लत लगा है। मुझसे पहले की पीढ़ी के लोगों के ऐसे विचार हों, ऐसा स्वाभाविक है, पर मेरी पीढ़ी और कुछ मुझ से अगली पीढ़ी के कुछ लोगों के भी इस मामले पर विचार कुछ पुराने हैं। स्वयं को इस शोर में अकेला तो पा रहा हूँ, पर एक खुशी है कि यह चर्चा अब बंद नहीं होने जा रही, और जितनी चर्चा होगी, उतनी लोगों को सूचना मिलेगी और उतनी लोगों की आँखें खुलेंगी। ऐसी मेरी उम्मीद है। मैं स्वयं भी पहले समलैंगिकता के विषय पर पूरी तरह निष्पक्ष नहीं था, इस कारण मैं किसी को पूरी तरह दोषी भी नहीं ठहराता। पर जैसे जैसे और जानकारी हासिल की, मेरे विचार बदले। आशा करता हूँ कि और लोग भी आँखें खुली रखेंगे, जानकारी हासिल करेंगे, और फिर निर्णय लेंगे।

भारतीय टीवी चैनलों पर चल रही बहसों को तो इन दिनों नहीं देखा है, पर मित्रों की टिप्पणियाँ देख कर लगता है कि वहाँ 377 के विरोधियों को अपनी बात कहने का कुछ मौका मिला है। हालाँकि फेसबुक को देख कर तो लगता है कि 377 के समर्थकों का ही बोलबाला है। या शायद मेरी संगत ही परंपरा समर्थक लोगों से अधिक है। लोगों की बहुत सारी अवधारणाएँ, पूर्वाग्रह और पक्षपातपूर्ण रवैये इस बीच में सामने आए हैं। लगभग सभी अवधारणाओं वाले लोग बहुत पढ़े लिखे हैं, और विज्ञान का अच्छा ज्ञान रखते हैं, इस कारण अच्छे तर्क को ठुकराएँगे नहीं, ऐसी आशा है।

यहाँ मैं समलैंगिकता के विषय में लोगों के 7 मुख्य पूर्वाग्रहों पर बात करना चाहूँगा।

1. समलैंगिकता से एड्स होता है
यह ग़लत है कि समलैंगिकता से एड्स होता है। जो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। एड्स एच-आइ-वी वाइरस के संक्रमण से होता है जिस के फैलने के कई साधनों में से एक है असुरक्षित और अनेक लोगों (एड्स रोगियों) से सेक्स , वह चाहे विषमलैंगिक हो या समलैंगिक। हाँ, जहाँ तक मेरी जानकारी है anal सेक्स से यह रोग फैलने की संभावना बढ़ जाती है, चाहे वह स्त्री-पुरुष के बीच हो या पुरुष-पुरुष के बीच। इस कारण एड़स के रोगियों में MSM का प्रतिशत अधिक है। पर यदि एक स्वस्थ, समलैंगिक युगल है, परस्पर वचनबद्ध है और उन्हें वाइरस के संपर्क में आने का कोई कारण नहीं है, तो हमारे-आपकी तरह ही उन्हें कभी एड्स नहीं हो सकता। इस कारण यदि आपकी मुख्य चिंता एड्स का प्रसार है तो असुरक्षित सैक्स पर रोक लगाने की बात कीजिए, समलैंगिकता पर नहीं। समलैंगिक संबंधों की परस्पर वचनबद्धता को स्वीकार कीजिए, उनके अपराधीकरण को नहीं।

2. समलैंगिकता एक मानसिक बीमारी है
अमेरिकन मनोचिकित्सक संगठन (APA) कहता है कि ऐसा नहीं है। यह संगठन कोई पाश्चात्य संस्कृति का क्लब नहीं है, पढ़े लिखे मनोचिकित्सकों का संगठन है जो रिसर्च के आधार पर ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा है। आजसे 40 वर्ष पहले यानी 1973 में APA ने अपने DSM (Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders जिसे विश्व के मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक एक मानक के रूप में मानते हैं) में मानसिक विकारों की सूची से समलैंगिकता को हटा दिया था। यदि आप के मन से अभी नहीं हटा तो अब हटा लीजिए। भारतीय मनोचिकित्सक संगठन की साइट पर भी इस विषय पर कुछ रोचक लेख हैं, जो सब इस ओर इंगित करते हैं कि न तो समलैंगिक कोई मर्ज़ी से बनता है, न ही इस “बीमारी” का कोई इलाज है। किसको अच्छा लगेगा समाज में प्रताडित होना?

3. समलैंगकता अप्राकृतिक है
अप्राकृतिक से आपका अर्थ क्या है? यदि आप ईश्वर में विश्वास करते हैं तो यह समझिए कि ईश्वर ने उन्हें ऐसा ही बनाया है और उन्हें समाज का अंग न मानने का आपको कोई अधिकार नहीं है। और ईश्वर की बनाई हुई 1500 पशु जातियाँ समलैंगिक कृत्य करती हैं। यदि आपको लगता है कि उससे बच्चे नहीं होते इसलिए ग़लत है तो यह बताएँ कि क्या सेक्स का मूल उद्देश्य परस्पर प्रेम और आनंद है या बच्चे पैदा करना। आपके द्वारा किए गए कितने यौन कृत्यों का उद्देश्य प्रजनन था? और फिर हर रिश्ता केवल सैक्स पर आधारित नहीं होता। समलैंगिक युगलों का पारस्परिक प्रेम उसी तरह बहुआयामी है, जैसे विषमलैंगिक युगलों का। और यदि आप ईश्वर पर विश्वास नहीं करते तो शायद इस तरह के पूर्वाग्रहों से आप पहले ही मुक्त होंगे। यदि नहीं तो नीचे टिप्पणी करें।

4. समलैंगिकता एक पाश्चात्य बीमारी है, हमारी संस्कृति के विरुद्ध है
मैं तो यह कहूँगा कि धारा 377 पश्चिम की देन है, समलैंगिकता नहीं। यह धारा अंग्रेजों ने 1861 में लागू की थी और इसका मूल स्रोत पश्चिमी पूर्वाग्रह रहे होंगे, न कि भारतीय संस्कृति। अंग्रेज़ चले गए, अपने कानून छोड़ गए। अपने यहाँ जाकर तो उन्होंने बदल दिए पर हम अभी भी उन्हीं से चिपके हुए हैं। हिंदुत्व में समलैंगिकता को उतना स्पष्ट रूप से नहीं नकारा गया है जितना इस्लाम और ईसाई धर्म में। हिन्दू धर्म की पुस्तकों में जहाँ अर्धनारीश्वर की बात है, वहीं शिखंडी का वर्णन है। खजुराहो और अन्य स्थानों पर जो मूर्तियाँ हैं उनमें से कई समलैंगिक संबंधो को दर्शाती हैं (इस पृष्ठ को देखें)। कहना यह है कि भारत की प्राचीन संस्कृति में पुरुष-स्त्री सैक्शुएलिटी के कई आयाम संभव थे। इसके विपरीत मुस्लिम देशों में समलैंगिकता की बात करना भी जुर्म है। पश्चिम के देशों में हालाँकि समलैंगिकों को काफी बराबरी दी जा रही है, पर संस्कृति के पहरेदार वहाँ भी विलाप ही करते रहते हैं। हम यहाँ किन लोगों का अनुसरण करना चाहते हैं — मुस्लिम देशों का या ईसाई कट्टरपंथियों का? बात पश्चिम की नकल की नहीं है, बात है अपने कानूनों को रूढिवाद से दूर रखने की। और फिर, यदि संस्कृति की ही बात करनी है, तो सती प्रथा हमारी संस्कृति थी, जातिवाद और छुआछूत हमारी संस्कृति थी, विधवाओं का शोषण हमारी संस्कृति थी। क्या इन सब को हम निकाल बाहर करने की कोशिश नहीं कर रहे? फिर समलैंगिकों के शोषण को क्यों न निकाल बाहर करें?

5. समलैंगिक लोगों की संख्या नहीं के बराबर है
इस तर्क का प्रयोग इसलिए किया जाता है ताकि यह कहा जाए कि इन लोगों की संख्या इतनी कम है कि इन्हें संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। यह तर्क कई स्तरों पर त्रुटिपूर्ण है। क्या आप लंगड़े, बहरे, अंधे, या वामहस्त लोगों के खिलाफ कानून बनाएँगे क्योंकि उनकी संख्या कम है? दूसरी बात, इन की संख्या नहीं के बराबर इसलिए दिखती है क्योंकि समाज में इन्हें छिपे रहना पड़ता है। यह बात तो मान्य है कि इनकी संख्या विषमलैंगिकों से बहुत बहुत कम है, पर इतनी कम भी नहीं जैसे अहमदीनिजाद के अनुसार ईरान में है। आपके स्कूल में, दफ्तर में, ट्रेन में, आप ऐसे लोगों को देखते होंगे जिनकी लैंगिकता सपष्ट नहीं है, पर वे समाज के डर से सामने नहीं आते। चलिए समलैंगिक लोगों को छोड़िए, हिजड़ों की बात कीजिए। हमारा समाज उन्हें अलग रहने पर और लगभग भीख मांगने पर क्यों मजबूर करता है? वे क्यों नहीं दफ्तरों, स्कूलों में काम कर सकते? क्या वे अपने हालात के लिए खुद ज़िम्मेदार हैं? L, G, B या T कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं होता, न ही वह चाह कर अपनी सैक्शुअलिटी को बदल सकता है। यह सोचिए कि यदि ईश्वर ने आपको या मुझे इस हाल में रखा होता तो क्या होता?

6. सेम सैक्स विवाह से विवाह के पावन रिश्ते पर असर पड़ता है
यह तर्क अभी भारत में अधिक नहीं सुनाई दे रहा क्योंकि भारत में अभी हम समलैंगिक संबंधों के अपराधीकरण में ही अटके हुए हैं। विवाह की बात तो दूर की है। पर पश्चिम में जैसे जैसे सेम-सेक्स विवाह संबंधी कानून बन रहे हैं, ईसाई कट्टरपंथी कहते हैं कि इस से विवाह की परिभाषा बदल जाती है। अरे भाई, तुम्हें कोई थोड़े ही बलपूर्वक गे-मैरिज करा रहा है। तुम्हें जो मर्ज़ी है तुम वह करो। औरों को जो मर्ज़ी है, उनको वह करने दो। बल्कि यदि आप एक समलैंगिक को एक विषमलैंगिक रिश्ते में बांध देंगे तो दोनों का जीवन नर्कमय हो जाएगा — जाने हमारे आपके आसपास ऐसे कितने युगल होंगे। दूसरों के हक को छीनने का हमें क्या हक है, खासकर जब उनके हक से हमें कोई हानि नहीं होती।

7. यदि आप समलैंगिकता की अनुमति देते हैं तो आगे क्या – पशुओं के साथ सेक्स?
कई लोग कहते हैं कि यदि समलैंगिकता की अनुमति दी जाती है तो फिर क्या भाई बहनों के बीच या पशुओं के साथ सेक्स भी सही करार देना पड़ेगा। यह तर्क भी कुतर्क ही है। सबसे बड़ी बात है कि यहाँ बात पारस्परिक सहमति की है, जो पशुओं के साथ नहीं हो सकती। दरअसल कानून केवल ज़बरदस्ती के बारे में होने चाहिएँ न कि सेक्स कैसे करें, किस से करें, इस के बारे में। इसका कोई कारण नहीं है कि यदि आप एक ही लिंग के व्यक्तियों के परस्पर प्रेम को मान्यता देंगे तो उससे यह सब नई मांगें उत्पन्न हो जाएँगी। बल्कि आप यदि धार्मिक रूढिताओं के आधार पर कानून बनाएँगे, को कल और कानून ऐसे बन सकते हैं जो हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आड़े आएँगे।

खैर, तर्कों-वितर्कों का कोई अंत नहीं है। मेरा कहना यह है कि जो लोग समलैंगिकों के अधिकारों के विरुद्ध हैं, वे समय के साथ नहीं हैं। आने वाली पीढ़ियाँ इस कानून से लड़ेंगी और कभी न कभी इस का अंत होगा, वैसे ही जैसे सती प्रथा का अंत हुआ है, अस्पृश्यता का अंत हुआ है (?)। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि उच्चतम न्यायालय ने मूल रूप से कानून को सही नहीं ठहराया पर यह कहा कि इसे बदलने का अधिकार केवल संसद को है। यह बात तकनीकी रूप से सही है, पर यहाँ संसद से कोई उम्मीद रखना बेकार है। उच्चतम न्यायालय के पास एक मौका था इस ऐतिहासिक गलती को सुधारने का और उन्होंने यह मौका गवाँ दिया।

यह बात कुछ हद तक संतोषजनक है कि भारत में इस तरह के कानूनों का उतनी सख्ती से कार्यान्वयन नहीं होता जितना मुस्लिम देशों में। पर फिर भी पुलिस को घूस खाने और लोगों को तंग करने का एक बहाना कम हो सकता था, वह नहीं हुआ। और फिर इससे जुड़ी बहुत सी और समस्याएँ हैं जो इस कानून के चलते नहीं सुलझ सकतीं — LGBT लोगों को मकान, नौकरी, आदि मिलने की मुश्किलें, नौकरियों में समलैंगिकों के विरुद्ध पक्षपात, विवाह न कर पाने, बच्चे गोद ले पाने की मुश्किल, आदि।

इस आशा के साथ कि भविष्य में विश्व के सभी LGBT लोगों को पूरे अधिकार मिलेंगे, आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत करता हूँ।

वैसे एक और बात देखी जाए। हालाँकि धारा 377 को मुख्यतः सेक्शुअल अल्पसंख्यकों के विरुद्ध माना जाता है, पर यह वह काम भी पूरी तरह अंजाम नहीं देता। धारा 377 केवल anal सेक्स को मुजरिमाना करार देती है। इस तरह से स्त्री-स्त्री संबंधों पर तो कोई रोक नहीं होनी चाहिए। और anal सेक्स विवाहित स्त्री-पुरुष के बीच भी मुजरिमाना है — दस साल की सज़ा। इसलिए बात केवल इस वाहियात कानून को निरस्त करने भर की नहीं है, बात है कुल मिला कर अपने समाज में सेक्शुअल अल्पसंख्यकों के विरोध को समाप्त करने की। हाँ, हमारे समाज में PDA कुछ लोगों को uncomfortable कर देता है, इस कारण दोनों, तीनों, सब तरह के युगलों को अपनी सेक्शुअल डिस्पले बेडरूम में छोड़ आनी चाहिए। एक पारंपरिक समाज के साथ इतना तो समझौता करना ही पड़ेगा।

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admin on January 15, 2011

वाशिंगटन-बॉस्टन असेला एक्सप्रेस पर मेरे सामने की सीट पर जो खिड़की के साथ महिला बैठी हैं, वह पिछले पौने घंटे से फोन पर बात करने में लगी हुई हैं। उनकी सीट की पीठ मेरी ओर है, इस कारण मुझे दिख नहीं रहीं, पर ऐसा लगता है कि अपने दफ्तर का कोई मसला हल कर रही हैं। उन्हें अपने बॉस से शिकायत है, और इस बारे में या तो अपने सहकर्मी से या अपने बॉस के सहकर्मी से बात कर रही हैं। लगातार बोले जा रही हैं। कुछ महिलाएँ कितना बोल सकती हैं। आधा घंटा पहले उनके साथ जो दूसरी महिला बैठी हुई थीं, वह अपना लैपटॉप, कोट और बैग लेकर झुंझलाती हुई उठीं और आगे की किसी सीट पर चली गईं। एक मिनट बाद पी.ए. सिस्टम पर ऍनाउन्समेंट हुई – “यात्रीगण कृपया ध्यान दें, जो यात्री फोन पर बात कर रहे हैं वे अपने सहयात्रियों का ध्यान रखते हुए कृपया अपनी आवाज़ धीमी रखें, या फिर कैफे-यान में चले जाएँ।” लगता है महिला नंबर दो सीधा कंडक्टर से शिकायत करने गई थीं। मुझे नहीं लगता कि फोन पर बात कर रही महिला ने यह उद्घोषणा सुनी भी, क्योंकि उनकी बातचीत जारी रही — कुछ मिनटों के लिए आवाज़ थोड़ी सी धीमी ज़रूर हुई। कुछ पन्द्रह-बीस मिनट बाद पहले गई महिला अपना सामान लेकर वापस आईं और फिर बैठने लगीं। लगता है, जहाँ गई थीं वहाँ उन्हें मन मुआफिक सीट नहीं मिली थी। आज गाड़ी में सामान्य से कुछ अधिक भीड़ है। आमतौर पर अधिक यात्री नहीं होते और यदि आप दो सीटों पर अकेले बैठना चाहते हैं, तो ऐसी सीट ढ़ूँढ़ने में दिक्कत नहीं होती। साथ वही बैठते हैं जो साथ सफर कर रहे होते हैं। पर आज कुछ भीड़ है। दरअसल कल देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में काफी हिमपात हुआ था और कई रेलगाड़ियाँ रद्द हो गई थीं। मुझे भी कल जाना था, पर इसी कारण आज जा रहा हूँ।

खैर महिला नंबर दो वापस तो आईं पर पहले वाली महिला का वार्तालाप समाप्त न होता देख कर एक मिनट में ही फिर झुंझलाती हुई उठीं, उसी प्रकार अपना लैपटॉप, कोट, बैग उठाया और फिर कहीं और चली गईं। अब नहीं आएँगी। मुझे उनसे सुहानुभूति तो है (शायद कुछ ज़रूरी काम कर रही थीं लैपटॉप पर, और उस में खलल हो रहा था), पर रेलगाड़ी में इतने एकान्त की अपेक्षा कुछ ज़्यादा नहीं है? उन्हें क्वायट कार में बैठना चाहिए था।

इस बीच महिला नंबर एक की बातचीत जारी रही। मैं जब बाल्टीमोर में ट्रेन में चढ़ा था तो यह महिला पहले से बैठी हुई थीं, शायद वाशिंगटन से आ रही थी। पहले से बातें कर रही थीं। एक घंटे के बाद फिलाडेल्फिया के आसपास उन्होंने फोन रखा। पर यह क्या, अलविदा कहते ही यह तो फिर हैलो कर रही हैं। अबकी बार बॉस को फोन कर रही हैं। उनसे शायद किसी प्रकार की सुलह कर रही हैं। जिस रफ्तार से, और जिस प्रवाह से बोल रही हैं, मुझे नहीं लगता अगले को हूँ-हाँ करने का भी मौका दे रही हैं। जब से मैंने यह लिखना शुरू किया तब से वह बॉस से बात कर रही हैं। वे चाहती हैं कि उनके और बॉस के बीच कोई मनमुटाव न रहे। उन्हें मालूम है कि उनमें कुछ बुराइयाँ भी हैं। कई बार गॉसिप में ऐसी बातें कह जाती हैं जो नहीं कहनी चाहिएँ। पर फिर भी, उनको अपने काम में अधिक स्वतन्त्रता चाहिए, अपने काम के दौरान वे किन शहरों को कवर करती हैं, इसका निर्णय स्वयं उन पर छोड़ा जाना चाहिए।

मेरे साथ की सीट पर जो सज्जन बैठे हैं, वे शुरू से ही अपने किंडल ई-बुक रीडर पर कुछ पढ़ रहे हैं। शक्ल से अमरीकी नहीं लगते, भारतीय भी हो सकते हैं, हिस्पैनिक भी। पर मुझ में हिम्मत नहीं हो रही कि पूछूँ। दरअसल कुछ देर पहले जो कंडक्टर (टीसी) आया था, वह भी शक्ल से भारतीय ही लग रहा था। उसने टिकट चैक करते हुए मेरे नाम को दोहराया था – कौल। पर सही उच्चारण के साथ नहीं, इस कारण मैंने पूछना उचित नहीं समझा। खैर, मैं उठकर कैफे कार की ओर चला जाता हूँ। कुछ चाय वगैरा ले लेता हूँ। वहाँ काउंटर पर कैफे कर्मचारी के साथ वही कंडक्टर खड़ा है। मुझे देख कर उसने मेरा नाम दोहराया – कौल। मैंने पूछा – “आपका नाम क्या है?” बोले – “जॉश”। मैंने दोहराया – जॉश। वे बोले – जॉश चैंड्रश। मुझे उत्सुकता हुई। उनके गले में जो पहचानपत्र लटक रहा था वह टेढ़ा था; मैं उसकी ओर बढ़ा। जॉश ने पहचानपत्र सीधा किया। मैंने ज़ोर से पढ़ा – चन्द्रेश जोशी। मैंने कहा, आप तो भारत से हैं। वे खुशी का इज़हार करते हुए बोले, “हाँ, मैं भारत से हूँ, गुजरात से। क्या आप भी…? आप कहाँ से हैं?” मैंने बता दिया। साथ में जितनी गुजराती आती थी, वह भी बोल दी – “केम छो, मजा माँ छो?” खैर चन्द्रेश जी से कुछ देर बातचीत हुई, फिर अपनी सीट पर लौटा। दवे का डेव तो सुना था, जोशी का जॉश आज पहली बार सुना।

अब तक मेरे पड़ौस की महिला का स्टेशन आ गया था। उन्हें न्यूयॉर्क में उतरना था। वह अभी भी फोन पर थीं। मेरे साथ वाले यात्री भी वहीं उतर गए। उनसे परिचय भी नहीं हो पाया। मेरे लिए अभी डेढ़ घंटे की यात्रा शेष है। मैं अब दो सीटों पर अकेला बैठा हूँ। यहाँ से ज़्यादा भीड़ नहीं है।

यह था मेरी आजकी यात्रा का वृतान्त जो इस इरादे से शुरू किया था कि भारत की और यहाँ की रेल यात्रा के अन्तर को बयान कर सकूँ। पिछले साल भर से दफ्तर के काम से मैं इस रूट पर कम से कम पचास बार सफर कर चुका हूँ। चार घंटे का सफर है, दूरी 450 किमी की है। अमरीका में रेल यात्रा अधिक प्रचलित नहीं है। महंगी भी है — हवाई यात्रा से कहीं अधिक। और सभी शहरों में उपलब्ध भी नहीं। यह रेलगाड़ी सब से तेज़ रेलगाड़ी मानी जाती है — हालाँकि यूरोप या चीन-जापान में यही सफर शायद कम समय में तय हो। शताब्दी के ए.सी. चेयर कार जैसे ही डिब्बे हैं। सीटें आरक्षित नहीं होती, जहाँ मर्ज़ी बैठ जाओ। वाइ-फाइ उपलब्ध है। खानपान उपलब्ध तो है, पर सीट पर नहीं आता। एक डिब्बा कैफे-कार कहलाता है, वहाँ जाकर भोजन खरीदकर लाना पड़ता है। वाइन-बियर आदि भी उपलब्ध है। कुछ गाड़ियों में जहाज़ों जैसी ट्राली सेवा शुरू हुई है, जिस के द्वारा भोजन अपनी सीट से ही खरीदा जा सकता है। ट्रेन में पाँच-छः बिज़नेस क्लास डिब्बे है, और एक फर्स्ट क्लास। एक क्वायट कार भी है, जिस में बात करने की इजाज़त नहीं है। यानी यदि आप को बिल्कुल शान्तिपूर्ण यात्रा चाहिए, किसी शोर-शराबे के बिना, तो क्वायट कार में बैठ जाइए। वहाँ आपको फोन पर बात करने की भी इजाज़त नहीं है, आपस में बात करेंगे तो फुसफुसाकर।

आपके सहयात्री किस बात पर खफा हो जाएँ, इसका कोई भरोसा नहीं। अभी कुछ हफ्ते पहले, मैं इसी सफर पर जा रहा था। घर से निकलते समय जल्दी में शेव करते निकला था, त्वचा में कुछ जलन सी हो रही थी। बाथरूम में जाकर आफ्टर-शेव लगा कर आगया। मेरे साथ की सीट पर बैठे यात्री बोले, क्या आपने कोलोन लगाया है, मैंने कहा, नहीं आफ्टर-शेव। वे बोले, नहीं मुझे कोलोन से एलर्जी है। यह कह कर वे अपना सामान समेट कर कहीं और बैठने चले गए। मैं सकपका गया, पर अपना सामान फैलाकर दो सीटों पर अकेला बैठ गया।

इसके विपरीत भारत में रेल यात्रा करने का अलग ही अनुभव याद आता है्। काफी समय हो गया पहले की तरह थ्री टियर स्लीपर कार में सफर किए। दिल्ली से जम्मू का सफर व्यक्तिगत कारणों से होता था, और आम तौर पर थ्री टियर से ही होता था। बारह चौदह घंटे के सफर में अपने कैबिन के सह यात्रियों से जो आत्मीयता होती थी, वह यहाँ कभी नसीब नहीं हो सकती। यहाँ प्राइवेसी की अपेक्षा इतनी अधिक रहती है कि आत्मीयता होना बहुत कठिन है। ट्रेन के दरवाजे के बाहर आरक्षण चार्ट पर सब के नाम रहते हैं। वह चीज़ यहाँ मुमकिन नहीं है। प्राइवेसी की ऐसी तैसी हो जाएगी। भारत में छोटे बड़े स्टेशनों की रौनक, हर स्टेशन पर उतर कर इधऱ उधर प्लैटफार्म का चक्कर लगा आना, कुछ खाने को, कुछ पढ़ने को खरीद लाना, और ट्रेन चलने के दो सैकंड पहले वापस चढ़ जाना, यह सब यहाँ कहाँ मयस्सर है। प्लैटफॉर्म तो ऐसे सूने होते हैं, जैसे मातम छाया हो। ट्रेन के दरवाज़े चलने से पहले लॉक हो जाते हैं, इस कारण दौड़ कर भी नहीं पकड़ सकता।


बाल्टीमोर स्टेशन का प्लैटफॉर्म और न्यूयॉर्क के एक उपनगर क्रोटन हार्मन का प्लैटफॉर्म – मरघट का सन्नाटा

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कुछ दिन पहले अपने अंग्रेज़ी ब्लॉग पर मैं ने कश्मीर पर एक लेख लिखा जो कई दिनों से मन में उबल रहा था, पर कश्मीर में हो रही हाल की घटनाओं के कारण उफन पड़ा। इस लेख को काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली — कुछ टिप्पणियाँ अच्छी, कुछ बुरी। फेसबुक और ट्विटर पर सैंकड़ों लोगों ने इसे शेयर किया। लेख का सार यह था कि कश्मीर जितना बड़ा दिखता है, उतना है नहीं। कश्मीरी मुसलमान आज़ादी ले भी लेंगे तो उनका यह “देश” नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या। कुछ पाठकों ने सुझाव दिया कि इसे हिन्दी में छापूँ। इसलिए अनुवाद कर सामयिकी में भेज दिया। नीचे मूल अंग्रेज़ी लेख और सामयिकी में छपे हिन्दी अनुवाद की कड़ियाँ हैं। कृपया पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। अंग्रेज़ी लेख पर एक लंबे चौड़े वार्तालाप के ज़रिए कुछ और बिन्दु सामने आए हैं।

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गूगल ने उर्दू के शौकीनों के लिए बहुत ही नायाब टूल उपलब्ध करा दिया है। पिछली 13 मई से गूगल अनुवादक में उर्दू जोड़ दी गई है, यानी आप अब उर्दू से, या उर्दू में, दर्जनों भाषाओं का अनुवाद कर सकते हैं। गूगल ट्रान्सलेट पर जाइए, “Translate from” में “Urdu ALPHA” चुनिए, “Translate to” में हिन्दी, अंग्रेज़ी या दर्जनों अन्य भाषाओं में से कोई भी चुन लीजिए और ट्रान्सलेट का बटन दबाइए। अनुवादक अभी एल्फा, या यूँ कहें अलिफ़ अवस्था में है, इस कारण कुछ बचपना, कुछ शरारतें तो करेगा ही, पर कुल मिला कर काम की चीज़ है।

बढ़िया बात यह है कि इस टूल का प्रयोग न केवल अनुवाद करने में किया जा सकता है, बल्कि उर्दू लिखनें में भी किया जा सकता है, और कुछ शब्दों का हिन्दी से लिप्यन्तरण करने में भी प्रयोग किया जा सकता है। यानी यदि आप को उर्दू लिखनी पढ़नी नहीं आती, तो भी आप रोमन अक्षरों का प्रयोग कर उर्दू टाइप कर सकते हैं। ध्यान रखें कि Type Phonetically वाला चैकबॉक्स सक्रिय हो, अब उर्दू वाले बक्से में bhaarat लिखें और आप को بھارت लिखा मिल जाएगा।

कुछ वर्ष पहले मैं ने एक पोस्ट लिखी थी जिस में मैं ने बताया था कि जैसे अन्य भारतीय भाषाओं में एक लिपि से दूसरी में लिप्यन्तरण संभव है, वह उर्दू के साथ क्यों संभव नहीं है। लिपि की भिन्नता की यह समस्या किसी हद तक गूगल ने इस टूल के द्वारा हल कर दी है, हालाँकि कमियाँ अभी मौजूद हैं।

अनुवाद की कुछ कमियाँ तो बड़ी रोचक हैं, और इनकी ओर ध्यान दिलाने के लिए शुएब और अरविन्द का धन्यवाद — उन से बज़ पर कुछ बातचीत हुई थी इस बारे में। मुलाहिज़ा फरमाइए गूगल-उर्दू-अनुवादक के कुछ नमूने

उर्दू में लिखिए हिन्दी अनुवाद
کراچی (कराची) भारत
افغانستان (अफ़ग़ानिस्तान) भारत
انڈیا (इंडिया) भारत और पड़ौस
پاکستان (पाकिस्तान) भारत

यानी गूगल वालों को इस क्षेत्र में भारत के सिवाय कुछ नहीं दिखता। यह विशेष अनुवाद उर्दू से हिन्दी में ही उपलब्ध है, उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद ठीक हो रहा है। यह आश्चर्च की बात है कि जब कि उर्दू से हिन्दी में अनुवाद सब से आसान होना चाहिए था, इसी में दिक्कतें आ रही हैं। अरे गूगल भाई, कुछ नहीं आता तो शब्द को जस का तस लिख दो। हिन्दी से उर्दू के अनुवाद में भारत का अनुवाद भारत ही है, पर भारत और पड़ौस लिखेंगे तो उसका अनुवाद है انڈیا (इंडिया)।

ऊपर दिए शब्दों के इस स्क्रीनशॉट में देखिए
Google Translator Urdu Alpha

वैसे कुछ उर्दू पृष्ठ जो आप अभी तक नहीं समझ पाते थे, अब समझ पाएँगे। पृष्ठ का यूआरएल, या मसौदा, गूगल के अनुवादक में डालिए और अनुवाद पाइए। समझ पाने लायक तो अनुवाद हो ही जाएगा। उदाहरण के लिए शुएब के इस ब्लॉग-पोस्ट का अनुवाद

कुछ प्रश्न हों, कुछ संशय हों, कृपया टिप्पणी खाने में पूछें। यदि आपको भी कुछ अजीबोग़रीब तरजमे मिले हों तो अवश्य बताएँ।

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विश्व भर में आजकल आतंकवाद की जितनी घटनाओं का पर्दाफाश होता है, वह चाहे भारत में हो, योरप या अमरीका में — उन में से अधिकांश की जड़ें किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जा मिलती हैं। न्यूयॉर्क में कल पाकिस्तानी मूल के अमरीकी नागरिक फैसल शाहज़ाद का पकड़ा जाना इसी सिलसिले की नवीनतम कड़ी है।

मीडिया में जो रिपोर्टें आईं हैं, उन के हिसाब से फैसल शाहज़ाद के पकड़े जाने का घटनाक्रम किसी जासूसी उपन्यास से कम नहीं लगता। तीन दिन पहले, यानी 1 मई को न्यू यॉर्क के टाइम्स स्क्वायर में एक निसान पाथफाइंडर कार खड़ी पाई गई, जिस का इंजन चालू था और गाड़ी में से धुँवा निकल रहा था। आसपास के लोगों की सतर्कता और पुलिस-एफ.बी.आइ. आदि की मेहनत से दो दिन बाद इस गाड़ी के मालिक फैसल शहज़ाद को तब पकड़ा गया जब वह पाकिस्तान की ओर अपनी यात्रा आरंभ कर चुका था। आज़ादी की ओर अपने सफर के पहले हिस्से में वह न्यू यॉर्क के जे.एफ.के. हवाई अड्डे पर दुबई के जहाज़ में बैठा था। जहाज़ चलने वाला था, जब उसे रोका गया और फैसल को गिरफ्तार किया गया। भारत को इस से सीख लेनी चाहिए।

फैसल भाई ने पिछले वर्ष ही अमरीकी नागरिकता की शपथ ली थी। उससे पहले अमरीका में ही बी.एस. और एम.बी.ए. किया था — यानी पढ़ा लिखा था। उस ने अपनी ओर से काफी सतर्कता से काम लिया था। सस्ती सेकंड हैंड गाड़ी दो हफ्ते पहले खरीदी थी। जिससे खरीदी थी, उससे इंटरनेट द्वारा संपर्क किया था, किसी मॉल के पार्किंग लॉट में मुलाकात की थी, और नकदी दे कर गाड़ी ली थी। गाड़ी का उस के नाम से संबन्ध न जुड़े, इस लिए उसे अपने नाम रजिस्टर नहीं कराया था। उस पर किसी और गाड़ी के नंबर प्लेट लगा लिए थे। गाड़ी के सामने के शीशे के अन्दर गाड़ी का VIN (Vehicle Identification Number) खुदा रहता है, जिसके साथ छेड़छाड़ करना गैरकानूनी होता है। गाड़ी का मालिक कोई बने, नंबर कोई लगे, पर VIN से गाड़ी की मूल पहचान बनी रहती है। इस गाड़ी में VIN को मिटा दिया गया था।

फैसल को शायद यह मालूम नहीं था (मुझे भी आज ही मालूम हुआ), कि गाड़ी के निचले हिस्से में भी इंजन पर VIN खुदा रहता है। पुलिस ने उस से गाड़ी के पिछले मालिक का पता खोजा। उस ने फैसल के साथ गाड़ी के विषय में जो ईमेल किये थे, उससे फैसल के विषय में कुछ पता चला। अन्त में फैसल के नागरिकता संबन्धी कागज़ों से उस का चित्र लेकर गाड़ी के मालिक को दिखाया गया, जिससे उसने फैसल की पहचान की। फैसल को फटाफट नो-फ्लाई लिस्ट पर डाला गया, पर जब तक वह जहाज़ में बैठा तब तक एयरलाइन के कंप्यूटर में नई लिस्ट आई नहीं थी। पर इस से पहले कि जहाज़ उड़ता, यात्रियों की सूची अधिकारियों के पास पहुँची और जहाज़ को उड़ने से रोका गया। इस पूरे मरहले में अधिकारियों की सतर्कता का तो हाथ था ही, किस्मत ने भी अधिकारियों का खासा साथ दिया लगता है। वरना एक बार शहज़ाद साहब कराची पहुँच जाते तो अल्लाह हाफिज़।

प्रश्न यह उठता है कि पाकिस्तान में ऐसा क्या है कि पूरे विश्व को आतंकवाद निर्यातित करने की उन्होंने फैक्ट्री लगा रखी है? माना कि उन्हें अमरीकी नीतियों से इख्तिलाफ है, पर इस तरह मासूमों की भीड़ पर हमला करना, यह क्या किसी किताब में लिखा है? शायद वे सोचते हैं कि जो भी मरेंगे, उन में से अधिकतर काफिर होंगे और वे इस तरह खुदा का ही काम कर रहे हैं। हैरानी इस बात की है कि कई बार ये लोग पढ़े लिखे नौजवान होते हैं। कितनी नफरत चाहिए इतनी शिक्षा को शून्य करने के लिए। (ऊपर दिया गया चित्र सी.एन.एन. डॉट कॉम से लिया गया है और लगता है फैसल के औरकुट खाते से है।)

इस घटना का सीधा परिणाम यह होगा कि पाकिस्तानियों को अमरीका का वीज़ा मिलने में और दिक्कतें आएँगी। एयरपोर्टों पर अधिक छानबीन का सामना करना पड़ेगा। इंटरनेट पर पाकिस्तानी लोग इन बातों का रोना रो रहे हैं। पर यह कोई नहीं कहता कि इसका ज़िम्मेदार कौन है — सभी लोग एयरपोर्ट वालों पर, अमरीकियों पर, नस्लभेद का इलज़ाम लगाते हैं, पर यह कोई नहीं कहता कि इस का मूल कारण इस तरह के आतंकी हैं। जितना ऐसा आतंकी पढ़ा लिखा हो, भोली सूरत वाला हो, उतना ही नस्ल आधारित खोजबीन का शिकंजा बड़ा होता जाता है। मेरा पड़ौसी यदि यह मेरे बारे में सोचे कि पड़ौस के इस दक्षिण ऐशियाई बन्दे से सावधान रहना चाहिए तो मैं उसे दोष नही देता। दोष देता हूँ हम जैसे दिखने वाले ऐसे पाकिस्तानियों को जिन्होंने पाकी को एक नापाक शब्द बना दिया है।

ऐसे मौकों पर मुझे फिर सुदर्शन की लिखी कहानी हार की जीत याद आती है। यदि आजकल का बाबा भारती दीन-दुखी-अन्धे को देख कर मुख मोड़ता है या उन पर विश्वास नहीं करता तो इस में गलती बाबा भारती की है या खड़ग सिंह की?

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आज हफिंगटन पोस्ट में पिछले नवंबर में हुए पाकिस्तान फैशन वीक से यह तस्वीर छपी है। पोस्ट नें लेख का शीर्षक दिया है “वाट द….?”। सच है, तस्वीर अपनी कहानी खुद कहती है, शब्दों की अधिक आवश्यकता नहीं है। मेरा बस यह कहना है… यह फैशन वीक है, या फैशन वीक है? Read the rest of this entry »

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फरवरी में भारत यात्रा के दौरान कार्यक्रम बना श्रीलंका घूमने का। श्रीलंका भ्रमण का अनुभव बहुत ही बढ़िया रहा। विस्तार से जल्दी लिखूँगा, फिल्हाल यह लघु-चित्र-प्रविष्टि। वहाँ, छाते का एक अनूठा प्रयोग देखने को मिला। अक्सर प्रेमी युगल छाता साथ लेकर चलते हैं — अकस्मात वर्षा हो जाए, उसमें तो काम आ ही जाएगा, पर न भी हो तो आप कहीं भी अपना निजी प्रणय-कक्ष बना सकते हैं। गाल अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के पास खींचे गए यह दो चित्र देखिए। Read the rest of this entry »

आज सुबह सुबह गूगल खोला तो देखा गूगल के स्थान पर नाम है “टोपीका”। उसके नीचे लिंक था “हमारे नए नाम के बारे में जानें“। गूगल ब्लॉग पर बताया गया है कि गूगल ने अपना नाम क्यों बदला। Read the rest of this entry »

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