वाशिंगटन-बॉस्टन असेला एक्सप्रेस पर मेरे सामने की सीट पर जो खिड़की के साथ महिला बैठी हैं, वह पिछले पौने घंटे से फोन पर बात करने में लगी हुई हैं। उनकी सीट की पीठ मेरी ओर है, इस कारण मुझे दिख नहीं रहीं, पर ऐसा लगता है कि अपने दफ्तर का कोई मसला हल कर रही हैं। उन्हें अपने बॉस से शिकायत है, और इस बारे में या तो अपने सहकर्मी से या अपने बॉस के सहकर्मी से बात कर रही हैं। लगातार बोले जा रही हैं। कुछ महिलाएँ कितना बोल सकती हैं। आधा घंटा पहले उनके साथ जो दूसरी महिला बैठी हुई थीं, वह अपना लैपटॉप, कोट और बैग लेकर झुंझलाती हुई उठीं और आगे की किसी सीट पर चली गईं। एक मिनट बाद पी.ए. सिस्टम पर ऍनाउन्समेंट हुई – “यात्रीगण कृपया ध्यान दें, जो यात्री फोन पर बात कर रहे हैं वे अपने सहयात्रियों का ध्यान रखते हुए कृपया अपनी आवाज़ धीमी रखें, या फिर कैफे-यान में चले जाएँ।” लगता है महिला नंबर दो सीधा कंडक्टर से शिकायत करने गई थीं। मुझे नहीं लगता कि फोन पर बात कर रही महिला ने यह उद्घोषणा सुनी भी, क्योंकि उनकी बातचीत जारी रही — कुछ मिनटों के लिए आवाज़ थोड़ी सी धीमी ज़रूर हुई। कुछ पन्द्रह-बीस मिनट बाद पहले गई महिला अपना सामान लेकर वापस आईं और फिर बैठने लगीं। लगता है, जहाँ गई थीं वहाँ उन्हें मन मुआफिक सीट नहीं मिली थी। आज गाड़ी में सामान्य से कुछ अधिक भीड़ है। आमतौर पर अधिक यात्री नहीं होते और यदि आप दो सीटों पर अकेले बैठना चाहते हैं, तो ऐसी सीट ढ़ूँढ़ने में दिक्कत नहीं होती। साथ वही बैठते हैं जो साथ सफर कर रहे होते हैं। पर आज कुछ भीड़ है। दरअसल कल देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में काफी हिमपात हुआ था और कई रेलगाड़ियाँ रद्द हो गई थीं। मुझे भी कल जाना था, पर इसी कारण आज जा रहा हूँ।
खैर महिला नंबर दो वापस तो आईं पर पहले वाली महिला का वार्तालाप समाप्त न होता देख कर एक मिनट में ही फिर झुंझलाती हुई उठीं, उसी प्रकार अपना लैपटॉप, कोट, बैग उठाया और फिर कहीं और चली गईं। अब नहीं आएँगी। मुझे उनसे सुहानुभूति तो है (शायद कुछ ज़रूरी काम कर रही थीं लैपटॉप पर, और उस में खलल हो रहा था), पर रेलगाड़ी में इतने एकान्त की अपेक्षा कुछ ज़्यादा नहीं है? उन्हें क्वायट कार में बैठना चाहिए था।
इस बीच महिला नंबर एक की बातचीत जारी रही। मैं जब बाल्टीमोर में ट्रेन में चढ़ा था तो यह महिला पहले से बैठी हुई थीं, शायद वाशिंगटन से आ रही थी। पहले से बातें कर रही थीं। एक घंटे के बाद फिलाडेल्फिया के आसपास उन्होंने फोन रखा। पर यह क्या, अलविदा कहते ही यह तो फिर हैलो कर रही हैं। अबकी बार बॉस को फोन कर रही हैं। उनसे शायद किसी प्रकार की सुलह कर रही हैं। जिस रफ्तार से, और जिस प्रवाह से बोल रही हैं, मुझे नहीं लगता अगले को हूँ-हाँ करने का भी मौका दे रही हैं। जब से मैंने यह लिखना शुरू किया तब से वह बॉस से बात कर रही हैं। वे चाहती हैं कि उनके और बॉस के बीच कोई मनमुटाव न रहे। उन्हें मालूम है कि उनमें कुछ बुराइयाँ भी हैं। कई बार गॉसिप में ऐसी बातें कह जाती हैं जो नहीं कहनी चाहिएँ। पर फिर भी, उनको अपने काम में अधिक स्वतन्त्रता चाहिए, अपने काम के दौरान वे किन शहरों को कवर करती हैं, इसका निर्णय स्वयं उन पर छोड़ा जाना चाहिए।
मेरे साथ की सीट पर जो सज्जन बैठे हैं, वे शुरू से ही अपने किंडल ई-बुक रीडर पर कुछ पढ़ रहे हैं। शक्ल से अमरीकी नहीं लगते, भारतीय भी हो सकते हैं, हिस्पैनिक भी। पर मुझ में हिम्मत नहीं हो रही कि पूछूँ। दरअसल कुछ देर पहले जो कंडक्टर (टीसी) आया था, वह भी शक्ल से भारतीय ही लग रहा था। उसने टिकट चैक करते हुए मेरे नाम को दोहराया था – कौल। पर सही उच्चारण के साथ नहीं, इस कारण मैंने पूछना उचित नहीं समझा। खैर, मैं उठकर कैफे कार की ओर चला जाता हूँ। कुछ चाय वगैरा ले लेता हूँ। वहाँ काउंटर पर कैफे कर्मचारी के साथ वही कंडक्टर खड़ा है। मुझे देख कर उसने मेरा नाम दोहराया – कौल। मैंने पूछा – “आपका नाम क्या है?” बोले – “जॉश”। मैंने दोहराया – जॉश। वे बोले – जॉश चैंड्रश। मुझे उत्सुकता हुई। उनके गले में जो पहचानपत्र लटक रहा था वह टेढ़ा था; मैं उसकी ओर बढ़ा। जॉश ने पहचानपत्र सीधा किया। मैंने ज़ोर से पढ़ा – चन्द्रेश जोशी। मैंने कहा, आप तो भारत से हैं। वे खुशी का इज़हार करते हुए बोले, “हाँ, मैं भारत से हूँ, गुजरात से। क्या आप भी…? आप कहाँ से हैं?” मैंने बता दिया। साथ में जितनी गुजराती आती थी, वह भी बोल दी – “केम छो, मजा माँ छो?” खैर चन्द्रेश जी से कुछ देर बातचीत हुई, फिर अपनी सीट पर लौटा। दवे का डेव तो सुना था, जोशी का जॉश आज पहली बार सुना।
अब तक मेरे पड़ौस की महिला का स्टेशन आ गया था। उन्हें न्यूयॉर्क में उतरना था। वह अभी भी फोन पर थीं। मेरे साथ वाले यात्री भी वहीं उतर गए। उनसे परिचय भी नहीं हो पाया। मेरे लिए अभी डेढ़ घंटे की यात्रा शेष है। मैं अब दो सीटों पर अकेला बैठा हूँ। यहाँ से ज़्यादा भीड़ नहीं है।
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यह था मेरी आजकी यात्रा का वृतान्त जो इस इरादे से शुरू किया था कि भारत की और यहाँ की रेल यात्रा के अन्तर को बयान कर सकूँ। पिछले साल भर से दफ्तर के काम से मैं इस रूट पर कम से कम पचास बार सफर कर चुका हूँ। चार घंटे का सफर है, दूरी 450 किमी की है। अमरीका में रेल यात्रा अधिक प्रचलित नहीं है। महंगी भी है — हवाई यात्रा से कहीं अधिक। और सभी शहरों में उपलब्ध भी नहीं। यह रेलगाड़ी सब से तेज़ रेलगाड़ी मानी जाती है — हालाँकि यूरोप या चीन-जापान में यही सफर शायद कम समय में तय हो। शताब्दी के ए.सी. चेयर कार जैसे ही डिब्बे हैं। सीटें आरक्षित नहीं होती, जहाँ मर्ज़ी बैठ जाओ। वाइ-फाइ उपलब्ध है। खानपान उपलब्ध तो है, पर सीट पर नहीं आता। एक डिब्बा कैफे-कार कहलाता है, वहाँ जाकर भोजन खरीदकर लाना पड़ता है। वाइन-बियर आदि भी उपलब्ध है। कुछ गाड़ियों में जहाज़ों जैसी ट्राली सेवा शुरू हुई है, जिस के द्वारा भोजन अपनी सीट से ही खरीदा जा सकता है। ट्रेन में पाँच-छः बिज़नेस क्लास डिब्बे है, और एक फर्स्ट क्लास। एक क्वायट कार भी है, जिस में बात करने की इजाज़त नहीं है। यानी यदि आप को बिल्कुल शान्तिपूर्ण यात्रा चाहिए, किसी शोर-शराबे के बिना, तो क्वायट कार में बैठ जाइए। वहाँ आपको फोन पर बात करने की भी इजाज़त नहीं है, आपस में बात करेंगे तो फुसफुसाकर।
आपके सहयात्री किस बात पर खफा हो जाएँ, इसका कोई भरोसा नहीं। अभी कुछ हफ्ते पहले, मैं इसी सफर पर जा रहा था। घर से निकलते समय जल्दी में शेव करते निकला था, त्वचा में कुछ जलन सी हो रही थी। बाथरूम में जाकर आफ्टर-शेव लगा कर आगया। मेरे साथ की सीट पर बैठे यात्री बोले, क्या आपने कोलोन लगाया है, मैंने कहा, नहीं आफ्टर-शेव। वे बोले, नहीं मुझे कोलोन से एलर्जी है। यह कह कर वे अपना सामान समेट कर कहीं और बैठने चले गए। मैं सकपका गया, पर अपना सामान फैलाकर दो सीटों पर अकेला बैठ गया।
इसके विपरीत भारत में रेल यात्रा करने का अलग ही अनुभव याद आता है्। काफी समय हो गया पहले की तरह थ्री टियर स्लीपर कार में सफर किए। दिल्ली से जम्मू का सफर व्यक्तिगत कारणों से होता था, और आम तौर पर थ्री टियर से ही होता था। बारह चौदह घंटे के सफर में अपने कैबिन के सह यात्रियों से जो आत्मीयता होती थी, वह यहाँ कभी नसीब नहीं हो सकती। यहाँ प्राइवेसी की अपेक्षा इतनी अधिक रहती है कि आत्मीयता होना बहुत कठिन है। ट्रेन के दरवाजे के बाहर आरक्षण चार्ट पर सब के नाम रहते हैं। वह चीज़ यहाँ मुमकिन नहीं है। प्राइवेसी की ऐसी तैसी हो जाएगी। भारत में छोटे बड़े स्टेशनों की रौनक, हर स्टेशन पर उतर कर इधऱ उधर प्लैटफार्म का चक्कर लगा आना, कुछ खाने को, कुछ पढ़ने को खरीद लाना, और ट्रेन चलने के दो सैकंड पहले वापस चढ़ जाना, यह सब यहाँ कहाँ मयस्सर है। प्लैटफॉर्म तो ऐसे सूने होते हैं, जैसे मातम छाया हो। ट्रेन के दरवाज़े चलने से पहले लॉक हो जाते हैं, इस कारण दौड़ कर भी नहीं पकड़ सकता।

बाल्टीमोर स्टेशन का प्लैटफॉर्म और न्यूयॉर्क के एक उपनगर क्रोटन हार्मन का प्लैटफॉर्म – मरघट का सन्नाटा





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