वर्डप्रेस 2.6 अपग्रेड

यदि आप अपने चिट्ठे के लिए अपने सर्वर पर वर्डप्रेस का प्रयोग कर रहे हैं, तो वर्डप्रेस का नया रूपान्तर 2.6 इन्सटाल कर लें। कई प्रयोक्ताओं को वर्डप्रेस 2.6 अपग्रेड करने के बाद, लॉग-इन करने में दिक्कत आई है। मुझे भी आई। यदि आप को लॉग-इन करने की समस्या आती है, तो उस का इलाज यह है कि अपने कंप्यूटर पर से कुकियों (cookies) को खत्म करें

वर्डप्रेस 2.6 में नया क्या है, यह इस वीडियो में देखें -

मुक्का बला मुक्का बला

प्रभु देवा के डान्स वाला गाना तो आप ने देखा सुना ही होगा, “मुकाबला मुकाबला”। उस का तमिल वर्जन भी शायद सुना होगा। पर तमिल का अंग्रेज़ी वर्जन नहीं सुना होगा। देखने-सुनने लायक है, पेश है :

Gmail Betaजीमेल, तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? माना तुम स्वयं को बेटा* मानते हो, पर हम ने तो हमेशा से तुम्हें बड़ा माना है, और दूसरों से बढ़ कर दर्जा दिया है।

जीमेल वाले सुनें या न सुनें, पर आप सुन लीजिए। यदि आप के जीमेल में डॉट है तो उस का जीमेल वालों के लिए कोई अर्थ नहीं है। नहीं समझ में आया? बताता हूँ। अवांछित ईमेल यानी स्पैम को रोकने के मामले में तो जीमेल का शायद सानी न हो, पर मेरे खाते में कई बार कुछ अलग किस्म के अवांछित ईमेल आ जाते हैं।

पिछले साल जून में मेरे जीमेल में किन्हीं महिला का ईमेल कुछ इस तरह का आया, अनुवाद कर रहा हूँ

रमण, किसी कारण से पिछले कुछ दिनों से तुम्हारे बारे में बहुत सोचने लगी हूँ। तुम्हें मेल करने का सोचती हूँ तो यह याद आता है कि तुम कितने सुस्त हो मेल चैक करने में। तुम्हें फोन करने का सोचती हूँ तो कांपते हुए ख्याल आता है पता नहीं किस मूड में होगे - कहीं तुम मुझ पर बरस न पड़ो, या बेरुखी न दिखाओ। जब तुम ऐसा करते हो तो मेरा दिल टूट जाता है। इसलिए फोन ही नहीं करती…

यह शुरुआत थी एक लंबे चौड़े ईमेल की जो ब्लैकबेरी से भेजा गया था। बहुत मर्म भरा ईमेल था, जिस में कोशिश की गई थी एक पुराने रिश्ते को पुनर्जीवित करने की। बाकी सब तो ठीक था, मुझे यह लांछन बरदाश्त नहीं हुआ कि “ईमेल चैक करने में सुस्त हो”। :-) मेरे पास तो ईमेल बाद में आता है, मैं चैक पहले करता हूँ। मैं ने फौरन वापस लिखा, दो शब्दों में - “गलत रमण”। उस का भी फौरन जवाब आया, “धन्यवाद। क्षमा। मैं यकीन नहीं कर सकती कि इस नाम के दो लोग होंगे। Too much of a good thing! :-) Hard to believe!!” मैं ने सोचा, “थैंक यू”। दरअसल मैं भी सोचता था कि मेरा नाम इतना आम नहीं है।

बात आई गई हो गई। फिर कुछ हफ्तों बाद, मेरे जीमेल में हच कंपनी का मोबाइल बिल आया। यह किसी और रमण कौल के नाम था, जो फरीदाबाद में रहते हैं। मेरे यह हमनाम ऊपर वाले रमण कौल से अलग थे (अलग शहर)। मैं ने इस ईमेल को कचरे में डाल दिया। अगले महीने फिर आया। मैं ने हच को लिखा कि आप ग़लत ईमेल पर बिल भेज रहे हैं, मैं तो भारत में रहता भी नहीं और मैं आप का ग्राहक नहीं हूँ। उन का स्वचालित उत्तर आया कि हमें संपर्क करने के लिए धन्यवाद, आप की समस्या का समाधान शीघ्रातिशीघ्र किया जाएगा। अगले महीने फिर। फिर अगले महीने वोडाफोन का बिल आया। पता चला हच अब वोडाफोन है। इस बार मैं ने फोन नंबर देख कर भारत में अपने भाई को कहा, उस नंबर पर फोन कर के फोन के मालिक को बता दे। अगले महीने फिर बिल आया। इस बार वोडाफोन को भी लिखा, और फोन नंबर के मालिक को भी फोन लगाया। कश्मीरी में बात की - उन के फोन रिकॉर्ड से पता चल ही गया था कि जम्मू बहुत फोन जा रहे हैं, इसलिए “डालडा कश्मीरी”** नहीं हैं। मैं ने उन से कहा, “रमण जी, मैं रमण बोल रहा हूँ। यह बताइए कि आप का ईमेल पता क्या है?” बोले, “रमण डॉट कौल एट जीमेल डॉट कॉम”। मैं ने कहा यह तो मेरा जीमेल पता है। वे बोले, “अच्छा सॉरी, यह तो मेरा हॉटमेल वाला है, जीमेल वाले में डॉट नहीं है”। मैं ने कहा, “तो फिर आप अपनी मोबाइल कंपनी को फोन पर बताइए न, कि वे ग़लत पते पर बिल भेज रहे हैं”। वे बोले, “हाँ पहले भी आप का सन्देश मिला था, मैंने बताया भी था वोडाफोन को। अभी फिर फोन करता हूँ उन्हें।”

फिर और छानबीन की तो जीमेल सहायता पन्नों से यह पन्ना हाथ लगा: http://mail.google.com/support/bin/answer.py?answer=10313#

जीमेल वाले लिखते हैं,

Gmail doesn’t recognize dots as characters within usernames, adding or removing dots from a Gmail address won’t change the actual destination address. Messages sent to yourusername@gmail.com, your.username@gmail.com, and y.o.u.r.u.s.e.r.n.a.m.e@gmail.com are all delivered to your inbox, and only yours.

यानी आप के पते में कोई डॉट नहीं है, या दस डॉट हैं, जीमेल उसे एक ही पता समझता है, डॉटों को गिनता ही नहीं। यदि ऐसा है तो फिर मेरे नामराशि को बिना डॉट वाला पता कैसे मिला? कहीं ऐसा तो नहीं कि शुरू शुरू में वे डॉट को गिनते थे और बाद में गिनना बन्द किया? क्या हमें पुराना ग्राहक होने की सज़ा मिल रही है, जब जीमेल खुद को बेटा कहता था, पर था एल्फ़ा? यदि ऐसा है तो क्या मेरे ईमेल भी दूसरों को मिलते हैं? इस सब का कोई जवाब नहीं। जीमेल खुद को बेटा कहता है, इसलिए क्या उस से ज़िम्मेदारी की उम्मीद करना ग़लत है? यह कई प्रश्न हैं जिन का उत्तर नहीं है।

इस बीच हर महीने, बिना नागा, मेरे पास वोडाफ़ोन का बिल आता है। हर बार मैं उन को जवाब देता हूँ कि अपना पता ठीक करें। अपने नामराशि के हॉटमेल (डॉट के साथ) और जीमेल (बिना डॉट के) पर सीसी कर देता हूँ। जवाब में, जीमेल पर भेजा गया ईमेल मेरे खाते में वापस आ जाता है, हॉटमेल से कोई जवाब नहीं आता, और वोडाफ़ोन का स्वचालित मेल आ जाता है,

Dear Customer,
Thank you for writing to us.
This is an automated response to your e-mail. We will respond to you within 2 working days.
……
In the meantime, if you need any further assistance, please do call us on 111 (toll free) from your Vodafone mobile phone. We’ll do our best to help you.

Happy to help,
Vodafone Care

वे दो वर्किंग डेज़ कभी पूरे नहीं होते। हाँ, कस्टमर की सीक्योरिटी के लिए अब उन का बिल पासवर्ड सुरक्षित पीडीएफ़ के रूप में आता है। और पासवर्ड ईमेल में लिखा हुआ है - नाम के पहले चार अक्षर और नंबर के अन्तिम चार अंक। मेरे लिए कितना मुश्किल है इस पासवर्ड का राज़ खोलना।

क्या आप के जीमेल पते में नुक़्ता है? क्या आप में से किसी के पास जीमेल बेटा की शैतानियों के किस्से हैं? या फिर वोडाफोन के? या कोई लवलेटर आते हों? टिप्पणी कीजिए।
—-
* ग्रीक अक्षर β जिसे हम भारत में बीटा कहते हैं, अमरीकी उसे बेटा कहते हैं। बीटा- या बेटा-सॉफ़्टवेयर का अर्थ है रिलीज़ से पहले का प्रारूप, जिसे केवल टेस्टिंग के लिए रिलीज़ किया जाता है। यानी गूगल वालों के लिए पल्ला झाड़ने के लिए काफी है। पर क्या आप यह मानते हैं कि जीमेल अभी परीक्षण के अन्तर्गत है?
** मेरे एक मित्र हैं यहाँ राज़दान साहब, जो स्वयं को “डालडा कश्मीरी” कहते हैं। इस वर्ग में वे कश्मीरी पंडित आते हैं, जो कश्मीर से सदियों पहले आए हैं, और उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, आदि में बस गए हैं। ये लोग कश्मीरी तो हैं, पर कश्मीरी भाषा नहीं बोलते। समय के साथ उन के रस्मो-रिवाज भी कुछ कुछ बदल गए हैं। इस वर्ग में आप कुछ प्रसिद्ध कश्मीरी परिवार जैसे नेहरू परिवार, और उन से जुड़े अन्य परिवार - शीला कौल, कैलाशनाथ काट्जू, आदि को रख सकते हैं।

यदि आप ने कल की पहेली नहीं पढ़ी तो पहले उसे पढ़ें। नीरज रोहिल्ला जी ने सही पकड़ा, वही हल था।

तो हुआ यूँ कि कंप्यूटर जिस के हाथ में था, उसी के पास इस ज्योतिष विद्या की कुंजी थी। यानी, हमारी बड़ी बिटिया हमें बुद्धू बना रही थी। पर विद्या काम की है, इस लिए आप भी सीखिए और अपने दोस्तों को अचंभे में डालिए। यह लीजिए यह रहा साइट का पता - http://peteranswers.com/। ऊपर के खाने में आप को Peter, please answer: दिखेगा, और नीचे वाले खाने में अपना प्रश्न। पर यदि आप ने वैसे ही लिखा जैसा नीचे दिख रहा है, तो जवाब कुछ उल्टा सीधा मिलेगा। दरअसल सारा खेल ऊपर वाले खाने का है, जिस में उत्तर छिपा हुआ है। पहले अपने मित्र से प्रश्न पूछिए। यदि आप को उस का उत्तर नहीं मालूम है, तो उसी से पूछिए कि उसे किस जवाब की उम्मीद है। कहिए पीटर इस कमरे की हवा को भांप लेता है, या कुछ ऐसा ही। फिर पहले खाने में डॉट (.) डालिए, लेकिन दिखेगा “P”। फिर अपना जवाब लिखिए, पर स्क्रीन की तरफ देखने वाले को “Peter, please..” दिखेगा। उत्तर के अन्त में फिर डॉट (.) डालिए, उस के बाद जो लिखेंगे वही दिखेगा। अन्त में कोलन (:) डालना मत भूलिए। फिर निचले खाने में प्रश्न लिखिए, अन्त में प्रश्न चिह्न डालिए। कमाल देखिए - पीटर उत्तर दे देगा।

पीटर आन्सर्स

यहाँ मैं ने ऊपर वाले खाने में “Peter, please answer:” नहीं लिखा है, बल्कि “.chittha.ease answer:” और फिर निचले खाने में प्रश्न लिखा है। प्रश्न चिह्न (?) डालते ही उत्तर नीचे दिख जाता है।

पिछले रविवार मैं छुट्टी के मूड में सुस्ता रहा था कि मेरी छोटी बिटिया मेरे पास आई। बोली, “पापा कमाल हो गया, आप ऊपर आ कर देखिए कंप्यूटर पर क्या हो रहा है।” मैं उस की रोज़ की घिसी-पिटी अमरीकी कार्टूनों की यूट्यूब वीडियो देख देख कर तंग आ गया हूँ, इसलिए मैं ने टाल दिया, “बेटे मुझे आराम करने दो, इस समय मैं तुम्हारे कंप्यूटर के कमाल देखने के मूड में नहीं हूँ।”

बिटिया ज़बरदस्ती पकड़ कर उठाने लगी, “नहीं पापा, ऐसा लगता है किसी ने ऊपर दीदी के कमरे में कैमरा और माइक्रोफोन फिट किया है। ऐसी साइट है, उस पर जो सवाल पूछो उस का सही सही जवाब मिल जाता है।”

मैं ने तंग आ कर कहा, “अच्छा कंप्यूटर पर देखना है न? चलो यहाँ कंप्यूटर पर दिखाओ।”

“नहीं ऊपर दीदी के लैपटॉप पर, वहाँ साइट खुली हुई है।”

मैं कंप्यूटर के पास बैठ गया, “नहीं यहीं बताओ। बताओ, किस साइट पर जाना है?”

उसने साइट बताई। उस पर लिखा था ‘प्रश्न पूछिए’ और आगे एक खाली टेक्स्ट बॉक्स था। बिटिया बोली, “पूछिए ‘मैं ने किस रंग की शर्ट पहनी है?’।”

जवाब आया “मैं इस समय थका हुआ हूँ, इस समय नहीं बता सकता।”

“अरे, यह क्या? अच्छा, यह पूछिए इस कमरे में कितने लोग हैं।”

जवाब आया, “तुम मुझ पर विश्वास नहीं कर रहे, पहले मुझ पर विश्वास करो तब मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर दूँगा।”

मैं ने कहा, “देख लिया तुम्हारा कंप्यूटर का कमाल। अब छोड़ो मेरा पीछा।”

“नहीं, पापा प्लीज़, एक मिनट के लिए ऊपर आइए।”

मजबूर हो कर मैं उस के साथ ऊपर गया, साथ में श्रीमती जी भी आईं। ऊपर पहुँच कर, “दीदी, दिखाओ पापा को।”

मैं ने कहा, “अच्छा पूछो पापा ने किस रंग की शर्ट पहन रखी है।”

जवाब आया, “लाल”।

“अँय। शायद इत्तेफाक़ होगा। अच्छा पूछो, इस कमरे में कितने लोग हैं?” जवाब आया “चार”।

“देखा पापा, मैं कह नहीं रही थी? मुझे तो डर लग रहा है। लगता है यहाँ कैमरा लगा है।”

“चुप रहो ऐसा कुछ नहीं है। अच्छा पूछो, आस्था की आयु कितनी है।” जवाब आया, “तेरह साल”।

“मेरी स्कूल बस का क्या नंबर है?” बिल्कुल सही जवाब आया।

इसी तरह, और भी कई सवाल पूछे और सभी के सही जवाब। मैं चकरा गया। नीचे आकर मैं ने फिर कंप्यूटर पर चैक किया, पर वही उल्टे सीधे जवाब मिले। शाम तक मैं इसी परेशानी में रहा कि यह हो क्या रहा है। पर रात होते होते मालूम हो गया कि क्या हो रहा है। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं, कि इस पहेली का क्या रहस्य था। टिप्प्णी के रूप में बताएँ। नहीं भी लगा सकते तो भी टिप्पणी करें। पुराना चिट्ठाकार हूँ, पर अभी गुमनामी के अन्धेरे में हूँ। आप की टिप्पणियों के उजाले की आवश्यकता है। कल इसी ब्लॉग पर इसी समय, आप को पहेली का उत्तर भी मिलेगा, और इस चमत्कारी साइट का पता भी।

[बहुत समय बाद लिख रहा हूँ। पुराने साथियों तथा पाठकों से क्षमा याचना सहित।]
अगले मंगल को नॉर्थ कैरोलाइना में डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनाव होने वाले हैं, यानी अमरीकी चुनाव के लंबे खिंचते सेमी-फाइनल का एक और मुकाबला। मालूम नहीं इस बार भी इस बात का फैसला हो पाएगा या नहीं कि हिलरी क्लिंटन और बराक ओबामा में से कौन यह सेमीफाइनल जीतेगा, जो फाइनल चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के जॉन मकेन से लड़ेगा।

यदि अमरीकी चुनाव प्रक्रिया के यह शब्द - सुपर-ट्यूज़डे, आयोवा कॉकस, न्यू-हैंपशर प्राइमेरी, रिपब्लिकन, डेमोक्रेट जैसे शब्द आप को परेशान करते हैं तो आप अकेले नहीं हैं। यदि आप की समझ में यह नहीं आ रहा कि पिछले कई महीनों से हो रहा यह चुनाव समाप्त क्यों नहीं हो रहा तो आप अकेले नहीं हैं। अमरीकी चुनाव प्रणाली है ही बड़ी पेचीदा। यदि आप को संक्षेप में समझना है कि हो क्या रहा है, तो पढ़िए यह लेख। इस में मैं अमरीकी चुनाव प्रणाली के विषय में संक्षेप में बताने का प्रयास करूँगा।

द्विदलीय प्रणाली
सब से पहली बात, यहाँ कई पश्चिमी देशों की तरह द्वि-दलीय राजनीतिक प्रणाली है। अर्थात् भारत की तरह सैंकड़ों राजनीतिक दल न हो कर यहाँ केवल दो ही राजनीतिक दल हैं - रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी। तीसरा छोटा सा दल है, ग्रीन पार्टी, पर न होने के बराबर। रिपब्लिकन पार्टी मूलतः कन्ज़र्वेटिव (परंपरावादी) है, कुछ कुछ दक्षिण-पंथी (राइट ऑफ सेंटर), हमारी बीजेपी की तरह। डेमोक्रेटिक पार्टी मूलतः लिबरल (मुक्त) है, थोड़ा सा वाम विचारों वाली, लेफ्ट ऑफ सेंटर, हमारी कांग्रेस की तरह। यूं समझिए कि केवल कांग्रेस और बीजेपी में मुकाबला है, बाकी कोई दल हैं ही नहीं। यदि आप एक रजिस्टर्ड वोटर हैं तो आप स्वयं को एक रिपब्लिकन वोटर के रूप में रजिस्टर करा सकते हैं, या डेमोक्रैटिक वोटर के रूप में, या फिर आज़ाद वोटर के रूप में। तीनों मामलों में आप फाइनल चुनाव में किसी को भी वोट दे सकते हैं। पर आप किसी एक पार्टी के रजिस्टर्ड वोटर हैं या नहीं, इस से आप की प्राइमेरी चुनाव में भागीदारी पर असर पड़ सकता है।

प्राइमरी चुनाव क्या है
प्राइमरी चुनाव, जो आजकल चल रहा है, दरअसल पार्टियों का आन्तरिक चुनाव है — पर इस की महत्ता आम चुनाव से कुछ कम नहीं, क्योंकि इस में आम जनता भाग लेती है। रिपब्लिकन पार्टी का अपना प्राइमरी चुनाव होता है, डेमोक्रेटिक पार्टी का अपना। और इन आन्तरिक या प्राइमरी चुनावों के बाद चुना जाता है उस पार्टी का राष्ट्रपति पद के लिए दावेदार। फिर नवंबर के पहले मंगलवार (1 नवंबर को छोड़ कर) को मुख्य चुनाव में इन दोनों उम्मीदवारों में से एक को चुना जाता है। प्राइमरी और मुख्य चुनावों में एक और बड़ा अन्तर यह है कि प्राइमरी चुनाव हर स्टेट के लिए अलग अलग होते हैं, अलग अलग तरीके से और अलग अलग समय पर। इसी कारण प्राइमरी चुनावों की प्रक्रिया इतनी लंबी खिच जाती है। हर राज्य का अपना कानून है, और इस कारण हर राज्य की चुनावों में महत्ता भी कम-ज़्यादा होती है। शुरू शुरू में चुनाव कराने वाले राज्य छोटे होते हुए भी किसी उम्मीदवार को अकारण ही चढ़ा सकते हैं। जब तक आधे राज्य चुनाव करा लेते हैं, आम तौर पर एक स्पष्ट उम्मीदवार उभर कर आ जाता है, और ऐसा होने पर बाद के राज्यों को प्राइमरी चुनाव कराने का आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार तो महीनों पहले तै हो गया है, पर डैमोक्रैटों की रस्साकसी अभी चल रही है। उदाहरण के तौर पर पिछले हफ्ते हुए पेन्सिलवेनिया डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनावों के बारे में कहा जा रहा था कि वहाँ 32 साल बाद प्राइमरी चुनाव कराने की ज़रूरत पड़ी है। पिछली बार 1976 में तब यहाँ प्राइमरी चुनाव महत्वपूर्ण थे, जब जिमी कार्टर को चुना गया था। अन्यथा पेन्सिलवेनिया और बाद के राज्यों का नंबर आने से पहले ही उम्मीदवार का निर्णय हो जाता है।

हर राज्य का अलग अलग कानून है, इस कारण किसी राज्य में ओपन प्राइमरी होते हैं, तो किसी में क्लोज़ड। ओपन प्राइमरी में यह होता है कि एक पार्टी का पंजीकृत वोटर दूसरी पार्टी के चुनाव में भी भाग ले सकता है। कुछ राज्यों में आज़ाद वोटर दोनों तरफ वोट डाल सकते हैं। कुछ राज्यों में आप केवल उस पार्टी के प्राइमरी चुनाव में भाग ले सकते हैं, जिस के आप पंजीकृत वोटर हैं।

तो क्या लोग सीधे उम्मीदवार को वोट देते हैं?
हाँ भी और नहीं भी। हर वोटर अपने वोट द्वारा अपने क्षेत्र के डेलीगेट (संसद सदस्य) को अधिकृत करता है, किसी एक उम्मीदवार को चुनने के लिए। यानी, उस डेलिगेट के क्षेत्र से जिस उम्मीदवार को अधिक वोट मिलते हैं, वह डेलिगेट बाद में होने वाले एक पार्टी कन्वेन्शन में उसी उम्मीदवार को वोट देता है। इस कारण हर स्टेट के प्राइमरी के बाद यह निश्चित होता है कि किस उम्मीदवार को कितने डेलिगेट मिले हैं। कुछ राज्यों में यह चुनाव सीधे वोट डाल कर होता है, और कुछ अन्य राज्यों में वोटरों की बैठक या पंचायत बुला कर, जिसे कॉकस (caucus) कहा जाता है। इस में एक और पेचीदगी यह है कि कुछ राज्यों में विनर-टेक्स-आल (winner takes all) का नियम है, यानी उस राज्य में जो जीतेगा, राज्य के सारे डेलीगेट उसी को चुनेंगे। वोटरों पर निर्भर इन वचनबद्ध (pledged) डेलिगेटों के अतिरिक्त डैमोक्रैटिक पार्टी में सुपर-डिलिगेट्स की भी प्रथा है। ये कुछ विशिष्ट शक्ति वाले पार्टी के मुख्य सदस्य हैं, जो अपनी मर्ज़ी से वोट दे सकते हैं। रिपब्लिकन पार्टी में सुपर डेलीगेट्स का नियम नहीं है।

अभी क्या हो रहा है?
रिपब्लिकन पार्टी से जॉन मकेन ने अपने निकटतम प्रतिद्वन्द्वी माइक हक्कबी को इतना पीछे छोड़ दिया कि उन की उम्मीदवारी तय है। डेमोक्रैटिक पार्टी में दोनों उम्मीदवार एक दूसरे के इतना पास चल रहे हैं कि फैसला ही नहीं हो पा रहा। अमरीका के इतिहास में पहली बार एक महिला और एक अश्वेत व्यक्ति चुनावों के इस दौर तक पहुँचे हैं। पेन्सिलवेनिया में 32 साल बाद चुनाव हुए हैं, पर वहाँ भी फैसला नहीं हो पाया। हालाँकि हिलरी क्लिंटन ने राज्य को जीत लिया, पर कुल मिला कर बराक ओबामा से आगे नहीं निकल पाई। अब अगले सप्ताह मंगल को इंडियाना और नॉर्थ कैरोलाइना की बारी है। देखिए क्या होता है।

चुनावों की समयावली
- मुख्य चुनाव दिवस 1 नवंबर के बाद के पहले मगंल को होता है, हर साल। हाँ राष्ट्रपति चुनाव हर चार साल बाद होते हैं, और इस साल भी होने हैं। बुश के दो कार्यकाल पूरे हो जाएगें, और परंपरानुसार वे तीसरी बार चुनाव में भाग नहीं ले रहे हैं। उन के दल के उम्मीदवार जॉन मकेन हैं।
- चुनावों की सरगर्मी लगभग सवा-डेढ़ साल पहले शुरू हो जाती है, जब सभी उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करते हैं। इस के साथ शुरू हो जाता है पैसा और समर्थन जुटाने का काम। जो जिनते अधिक मिलियन बटोरेगा, उस की सफलता और चयनीयता उसी हिसाब से आँकी जाएगी।
- जनवरी में पहला प्राइमरी होता है आयोवा में, यानी आयोवा कॉकस। आयोवा यूँ तो छोटा सा राज्य है, जिस के चुनाव का राष्ट्रीय स्तर पर अधिक महत्व नहीं है, पर यह महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि यहाँ से पहला विजेता नामांकित होता है। शायद अपना यही महत्व बनाए रखने के लिए इस राज्य ने यह कानून पास किया है कि हमारा चुनाव सब से पहले होगा।
- कुछ दिन बाद ही होता है न्यू हैंपशर का प्राइमरी। यह और भी छोटा राज्य है, पर फिर जनवरी मे तीन चार राज्यों का चुनाव और होता है। अपना महत्व बढ़ाने के लिए दो और राज्यों - मिशिगन और फ्लोरिडा ने इस बार अपने प्राइमरी चुनाव आगे खिसका लिए। पर डेमोक्रेटिक पार्टी की केन्द्रीय कमान ने इस फैसले को नहीं माना, और हालाँकि चुनाव जनवरी में हो चुके हैं, इन दो राज्यों के डेलिगेटों को अभी भी नहीं गिना जा रहा है। इन की गिनती का क्या करना है, शायद अन्त में ही तय होगा।
- फिर फरवरी में आता है महामंगलवार (Super Tuesday) जिस दिन 24 राज्यों में एक साथ चुनाव होते हैं। आम तौर पर इस दिन उम्मीदवार का पता चल जाता है। पर इस बार डेमोक्रैटिक पार्टी में रेस काँटे की है।
- अप्रैल समाप्त होते होते 15-16 और राज्य हो जाते हैं। बाकी के 4-5 राज्य मई और जून में। जुलाई में आधिकारिक रूप से उम्मीदवारों की घोषणा हो जाती है, और फिर शुरू होती है असली रस्साकशी जो नवंबर में समाप्त होती है। मुख्य चुनावों के लिए भी वही डेलीगेटों की लड़ाई, और वही अलग राज्यों के अलग नियम — पर हाँ चुनाव एक ही दिन होते हैं। इस बार चुनावी मंगल 4 नवंबर को पड़ता है। देखते रहिए क्या होता है। पहली महिला राष्ट्रपति बनेगी, पहला अश्वेत बनेगा, या इन दोनों की आपसी रस्साकशी का फायदा जॉन मकेन को मिलेगा।

दो बातें संक्षेप में -

वर्डप्रेस का नया संस्करण पिछले सप्ताह जारी हो गया है। यदि आप अपने सर्वर पर वर्डप्रेस इस्तेमाल करते हैं, तो क्या आप ने अपग्रेड किया। यदि नहीं तो कर लीजिए। मैं ने कल ही अपग्रेड किया। अक्षरग्राम जैसे सामूहिक चिट्ठों की भी जिन के पास कुंजी है, वे भी ध्यान दें। इस में कहने को तो कई फीचर्स जोड़े गए हैं, पर अभी तक जो बात मुझे मुख्य लगी वह यह है, कि आप श्रेणियों के अतिरिक्त टैग भी जोड़ सकते हैं।

एक समस्या जो मुझे उम्मीद थी नया संस्करण अपलोड करने से हल हो जाएगी, नहीं हुई। कुछ महीनों से नई टिप्पणियाँ आने पर मुझे मेल नहीं आती, और न ही तब जब कोई टिप्पणी मॉडरेशन के लिए रोकी जाती है। इस कारण टिप्पणियों की मंज़ूरी या उन पर प्रतिक्रिया विलंबित हो जाती है। वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर इस के लिए जो सेटिंग्स ज़रूरी थी, वह सब करने के बाद भी ऐसा हो रहा है। वर्डप्रेस के सपोर्ट फोरम में खोजने पर भी कोई हल नहीं मिला। वहाँ इतनी समस्याएँ अहलित हैं कि लगता है वहाँ लोग सो रहे हैं। आप में से किसी को ऐसी समस्या का सामना हुआ हो और उस का हल पता हो तो बताया जाए।

सोच रहा हूँ, जब कहने को लंबा चौड़ा कुछ न हो तो मुख़्तसर ही सही, कुछ न कुछ लिखा जाए। इस से चिट्ठाकारी और चिट्ठाकारों से संबन्ध बना रहेगा।

Image courtesy: BBC Newsजी हाँ, यही है इस महंगे होटल में इस नए डेसर्ट की कीमत - और यह होटल लंदन, न्यूयॉर्क या टोकियो में नहीं, श्रीलंका के दक्षिणी तट के शहर गालि (காலி) में है।

छः लाख की चॉकलेट आइसक्रीम? इस में हीरे मोती जड़े हैं क्या?

वैसे भी यह होटल (द फोर्ट्रेस) एशिया के सब से महंगे होटलों में है, और वहाँ के कमरे का किराया 1700 डॉलर (68,000 रुपए) तक हो सकता है।

Prashant Tamang and Amit Paulप्रशान्त तामांग बुरे गायक नहीं हैं, पर अमित पॉल से जीतने की शक्ति उन में गाने के आधार पर तो नहीं थी। प्रशान्त की इंडियन आइडल के फाइनल में जीत ने यह साबित कर दिया कि उन के समर्थकों ने एस.एम.एस. द्वारा अमित को ही नहीं, बल्कि और कई अच्छे गायकों को धूल चटा दी। फाइनल तक सब ठीक था - इमॉन, दीपाली, चारू, पूजा, अंकिता जैसे अच्छे गायकों का बाहर हो जाना तब तक नहीं खला, जब तक अमिल पॉल बचा हुआ था और उस के जीतने की उम्मीद मौजूद थी। मैं मानता था कि इस खेल में एसएमएस पर काफी दारोमदार है, पर सारा खेल उसी का है, यह अन्त में प्रशान्त की जीत ने साबित कर दिया।

इंटरनेट पर नेपाल और दार्जीलिंग के कई फोरम चल रहे थे, जहाँ से प्रशान्त के लिए वोटिंग जुटाई जा रही थी। कुछ फ्री एसएमएस का भी जुगाड़ था।

इंडियन आइडल पर मेरे पिछले पोस्ट पर संजय बेंगाणी ने जो भविष्यवाणी की थी, वह सौ फीसदी सच साबित हुई। फिर भी यदि जजों की बातों में, खासकर जावेद अख़्तर की बातों में, कुछ ईमानदारी थी, तो अमित पॉल को पार्श्वगायन का काम मिलना चाहिए।

टैक्सी नंबर 9-11

कल 11 सितंबर थी, और ऐतिहासिक 11 सितंबर की छठी बरसी। कल जितना समय रेडियो सुना, अधिकांश कार्यक्रम इसी घटना से संबन्धित थे। कई कार्यक्रम रोचक लगे - जैसे कि वर्जीनिया की दारुल-नूर मस्जिद के युवा इमाम की कहानी, जिस के लिए अमरीकी मुसलमानों को शान्ति का पाठ पढ़ाना एक चुनोती है, या एक पाकिस्तानी मूल की युवती की आपबीती जिसे ट्रेन में आतंकवादी की नज़र से देखा गया (नीचे पढ़ें)। या फिर न्यू यॉर्क शहर की एक टैक्सी चालिका की कहानी….

मलिस्सा प्लाउट पिछले तीन साल से न्यूयॉर्क में टैक्सी चलाती हैं। यही नहीं, उन का ब्लॉग भी है, और उन्होंने अपने टैक्सी चालन के अनुभवों पर एक किताब भी लिखी है - Hack: How I Stopped Worrying About What to Do with My Life and Started Driving a Yellow Cab.

मलिस्सा का 11 सितंबर वाला लेख आप यहाँ सुन सकते हैं, यहाँ अंग्रेज़ी में पढ़ सकते हैं, और यह रहा उस का हिन्दी अनुवाद..

2004 में वह एक शनिवार का दिन था जब मैं ने पहली बार न्यूयॉर्क में टैक्सी चलाई। जब मैं उस सुबह मैनहैटन की ओर जाने वाले 59थ स्ट्रीट के पुल की ओर बढ़ी तो बाहर अभी धुंधलका था। यूँ तो उस जॉब के पहले दिन की याद मेरे मस्तिष्क में धुंधली हैं, पर कुछ यात्रियों की तस्वीर एकदम साफ है - जैसे कि वह जोड़ा जिसे में ने ग्रैमर्सी पार्क में टैक्सी में बिठाया था। कोई 30-35 साल के थे, बढ़िया कपड़े पहने, एक दूसरे का हाथ थामे।

“बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड होंगे”, में ने सोचा। “ब्रंच करने जा रहे होंगे।”

मैं लोगों को “पढ़ने” की कोशिश कर रही थी, यानी जो कला टैक्सी चालकों को अपने रोज़मर्रा के काम में आते आते आती है, मुझे वहम हुआ कि मुझे पहले ही दिन आ जाएगी। जब यह जोड़ा बैठा तो उन के गन्तव्य स्थान ने कुछ और ही कहानी कही।

“ग्राउंड ज़ीरो प्लीज़।”

“अरे हाँ, बिल्कुल। आज 11 सितंबर है।”

यह तारीख मेरे दिमाग़ के पार्श्व में सुबह से थी, पर इस से यह अगली सीट पर आ गई। उन के टैक्सी में बैठते ही मुझे 11 सितंबर 2001 की वह सुबह याद आ गई, जब मैं डाउनटाउन एक टफ़्तर में काम पर जा रही थी। मैं सबवे की ट्रेन में बैठ गई थी पर कुछ ही मिनट बाद वह टनल में रुक गई थी और लगभग दो घंटे तक हम उस के चलने का इंतज़ार करते रहे।

ट्रेन पर किसी को भनक नहीं थी कि ऊपर क्या हो रहा है। यह पता था कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से एक जहाज़ टकराया है, पर सब यह कह रहे थे कि यह कोई अजीबोग़रीब दुर्घटना है। हम लोग ट्रेन के लेट होने पर कुढ़ते रहे, पर घबराहट किसी को नहीं हुई।

आख़िरकार जब 11 बजे के क़रीब हम लोगों को टनल से निकाला गया तो सड़कों पर हो रहे पागलपन ने मुझे चौंका दिया। पुलिसवाले चिल्ला रहे थे, साइरन बज रहे थे, पे-फोन पर लोगों की कतारें थीं। सब से ज़्यादा मेरा इस बात से माथा ठनका कि लोग खड़ी कारों के गिर्द जमा थे, और रेडियो पर समाचार सुन रहे थे। कुछ बड़ी मुसीबत सी आई दिख रही थी। और जब मैं ने फिफ्थ एवेन्यू की ओर नज़र डाली तो दृष्य अवास्तविक था। पच्चीस ब्लॉक परे, जहाँ टॉवर दिखने चाहिएँ थे, वहाँ केवल धुआँ दिख रहा था।

तीन साल बाद शनिवार की उस शान्त सुबह को टैक्सी में बैठे हुए भी मुझे वह कुछ अवास्तविक सा ही लग रहा था। पर फिर मुझे अहसास हुआ कि मैं इस जोड़े को उस समृति सभा में ले जा रही थी, जो इस शहर के इतिहास के बदतरीन दिन की याद में आयोजित हो रही थी, और वे मृत अपनों का मातम मनाने जा रहे थे।

मैं ट्रैफिक में घुसी तो मुझे लगा मैं किसी ऐसे चालक की तरह हूँ जिसो कोई महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया हो। पूरा रास्ता वे चुपचाप बैठे रहे, और आईने में मैं ने देखा कि वे खिड़कियों से इस शहर को देख रहे थे। मैं ने रेडियो धीमा किया, और उन का सफ़र कुछ आरामदेह करने की कोशिश की।

मैं स्मृति-स्थल के जितना क़रीब जा सकती थी, उतना क़रीब जा कर मैं ने उन को उतारा - रास्ते में उन सब सुरक्षा नाकों और सीमेंट की रुकावटों को पार करते हुए, जो पिछले तीन सालों में खड़ी की गई थीं। किसी भी टैक्सी वाले को इन सब के बारे में पहले ही पता होगा, पर मैं एकदम नई थी, और मुझे डर था कि मेरी सवारियों को इस से झुंझलाहट न हो।

उन्हें परवा नहीं थी। बल्कि वे टैक्सी से उतरे तो उन्होंने मुझे सहृदय धन्यवाद दिया। यह यात्रा कुल दस मिनट की थी, और मैनहैटन के दो मील भर का रास्ता था, पर जब मैं ने उन्हें जाते देखा, मुझे लगा कि उस दिन टैक्सी चला कर मैं इस शहर को कुछ लौटा रही थी।

और अब, उन हमलों की छठी बरसी पर, और टैक्सी चालक के रूप में उस पहले दिन के तीन साल बाद, मुझे ग्राउंड ज़ीरो का रास्ता बख़ूबी मालूम है।

और अब, उस पाकिस्तानी (शायद) मूल की युवती की कहानी, जो मैं ने NPR पर सुनी पर उसे इंटरनेट पर नहीं खोज पाया। उस युवती का लहजा अमरीकी था, पर नाम देसी।

“9-11 के बाद के अमरीका में मुसलमान हो कर लोगों की अजीब नज़रों से बचना काफी मुश्किल काम है। एक घटना खास तौर पर याद आती है। मैं एमट्रैक (अमरीका की “शताब्दी एक्सप्रेस”) की ट्रेन में बैठी, तो मेरे पास वाली सीट खाली थी। गाड़ी चलने से पहले एक महिला जल्दी में आईं और बिना देखे मेरे पास बैठ गईं। कुछ देर बाद उन्होंने मुझे देखा तो हड़बड़ाहट में एकदम उठकर दो कतार पीछे एक सीट पर बैठ गईं। मुझे अजीब लगा, मैं ने मुड़ कर पूछा, क्या हुआ, क्या आप को लगा मैं इस गाड़ी को बम से उड़ा दूँगी? ऐसे में ईमानदारी की उम्मीद करना मुश्किल है, पर उस महिला ने चुपचाप हाँ में सिर हिला दिया। मैं ने कहा, फिर तो दो कतार पीछे भी आप बच नहीं पाएँगी।”






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